फेसबुक पर बधाईयां पढ़कर अपने जन्मदिन की याद आई-हिन्दी


           
आज फेसबुक देखा तो पता लगा की हमारे लिए खास दिन है। सामाजिक संपर्क बनाने मे इंटरनेट का जो योगदान है वह अब समझ में आ रहा है। बहरहाल अहो, आज 10 मार्च की तारीख पर हमारा जन्मदिन है। सच बात तो यह है कि अंतर्जाल पर ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर वगैरह पर हमने अपने जन्मदिन की तारीख डाली थी तो केवल इस बाध्यता की वजह से कि कहीं परिचय पूरा न होने की वजह से हमारी परिचय सामग्री अपंजीकृत न रह जाये। 10 मार्च को हमारा जन्म हुआ पर आज तक इस तारीख को हमने कभी महत्व नहीं दिया। जन्म दिन तो खैर हमने कभी मनाया ही नहीं। इस बार भी याद नहीं था अगर फेसबुक पर बधाई संदेश नहीं देखते। जन्म दिन की तारीख को भले महत्व नहीं दिया पर बदलते समय के साथ हमने अनेक लोगों को जन्मदिन की बधाई दी है। यह परंपरा हमें विरासत में नहीं मिली। भारतीय अध्यात्म दर्शन में कहीं भी इस तरह जन्म दिन मनाने की चर्चा नहीं है इसलिये हृदय में इस परंपरा को स्थान बहुत देर बाद ही मिला। हमारी स्थिति यह है कि कहीं हम खड़े हों और कोई 10 मार्च की तारीख पुकारे भी तो हम उसे नहीं बताते कि आज हमारा जन्म दिन है-यह अलग बात है कि हमें याद भी न आता हो। सोचते हैं कि क्यों किसी को औपचारिकता पूरे के लिये बाध्य करें। इसमें कोई संदेह नहीं है कि समकालीन लोगों से जन्मदिन की बधाई मिलना हृदय में स्पंदन उत्पन्न नहीं करता। इसकी वजह यह है कि हमारी तरह उनका हाल भी यही है कि जन्म दिन पर औपचारिक रूप से बधाई देकर अपना मित्र धर्म निभाओ भले हृदय में तो उसका स्थाई भाव रहता नहीं हो।
         इधर फेसबुक, ब्लॉग और ट्विटर पर जो नयी पीढ़ी के लोग सक्रिय हैं उनके लिये जन्म दिन का विशेष महत्व है। जन्म दिन की बधाई देना उनके हृदय का स्थाई भाव बन चुका है। ऐसे में जब हम जैसा भावुक आदमी अपने जन्म दिन पर बधाई संदेश पढ़ता है तो पुरानी लीक से हटकर नयी लीक को स्वीकार कर लेता है। नयी पीढ़ी को पाश्चात्य संस्कृति से सराबोर होने का उलाहना देना ठीक नहीं है। आखिर, इसके लिये जिम्मेदार तो हम और हमारे समकालीन ही हैं। फिर हमारे जैसा लेखक बधाई संदेश के उत्तर में केवल धन्यवाद शब्द लिखकर निकल जाये तो वह हृदय स्वीकार नहीं करता। जिस तरह जन्म दिन पर बधाई देना हृदय का स्थाई भाव नहीं है उसी तरह धन्यवाद जैसी औपचारिकता निभाना भी नहीं है। पहली समस्या के हल के लिये हम कुछ नहीं कर सकते पर दूसरे के माध्यम से हम अपने नये मित्रों को यह दिखाकर प्रसन्न तो कर ही सकते हैं कि जिसे उन्होंने जन्म दिन की बधाई दी उसने अपने हृदय से उसे स्वीकार किया। एक लेखक के रूप में हमारे जैसे आम इंसान के लिये भारतीय अध्यात्म दर्शन एक शक्तिपुंज है इसमें कोई संदेह नहीं हैं। उसके अध्ययन से जहां उचित नवीन परंपराओं को स्वीकार करने का सहज भाव पैदा होता है वहीं प्राचीन ज्ञान की आधुनिक संदर्भों में व्याख्या करने की प्रेरणा हृदय में स्थापित हो जाती हैं। अपने जन्म दिन पर बधाई देने वाले अपने नये तथा पुराने मित्रों को धन्यावाद करते हुए जो हमने लिखा है वह हृदय से ही लिखा है। आशा है वह अपना सहयोग आगे भी बनाये रखेंगे।
अपने जन्मदिन के अवसर पर प्रस्तुत है यह कविता
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अपने जन्मदिन की तारीख
हम कहाँ याद रख पाते हैं,
कैलेंडर में तारीख बदलती हैं
घड़ियाँ बदलती समय
हम हालातों से जूझते रहे उम्र भर
नतीजों के हिसाब में ही
हमेशा खो जाते हैं।
कहें दीपक बापू
पूरे दिन की थकावट
बना देती है रात को बुझा चिराग
हम ठहरे आम इंसान
अंधेरे में अपने ही मौन को साथी पाते हैं,
प्रात: उगता सूरज देता हैं कुछ देर राहत
बाकी दिन तो
अपनी जरूरतों के आग से ही नाता निभाते हैं। 
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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