कामयाब खिलाड़ी–हिंदी व्यंग्य कविता


वह ठहरे हल्के इंसान

चेहरे पर रोज नया मुखौटा लगाकर आते हैं,

गंभीरता का करते हैं नाटक

जल्दी ही जोकर हो जाते हैं।

कहें दीपक बापू

वादों पर कभी वह खरे उतर सकते नहीं,

अपने भरोसे पर यकीन खुद करते नहीं,

यह प्रचार का खेल हैं

जहां उनकी काली नीयत भी सुंदर नज़र आती है,

फरेबी अदायें महंगी बिक जाती हैं,

सौदागर बेच रहे बाज़ार में कागजी ख्वाब,

कारिंदों करें कारिस्तानी वह दिखायें रुआब,

सियायत हो या ज़माने का भला

कामयाब खिलाड़ी वही नज़र आते हैं,

वादों से वफादारी निभाने के बजाय

कागजी नाव जो चला पाते हैं।

—————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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टिप्पणियाँ

  • gulab37blog  On जनवरी 29, 2014 at 15:07

    Reblogged this on Chilmans37blog's Blog and commented:
    हम रोज सोचते हैं कि आज अपना सारा काम करके जाएँगे कुछ भी पेंडींग नहीं छोड़ेंगे फिर भी क्या हम ऐसा करते हैं ? नहीं पर क्यों ? ऐसा क्यों? होता है? पता नहीं। ऐसा नहीं कि हम करना नहीं चाहते पर, कर नहीं पाते न जाने क्यों? इच्छाशक्ति की भी कमी नहीं है? पर, न जाने क्यों? क्यों? क्यों? क्यों? ——————————

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