समाधि से आशय केवल चित्त की वृतियों के निरोध से है-पतंजलि योग के आधार पर चिंत्तन लेख


      हमारे देश में पतंजलि योग साहित्य का अध्ययन अगर शैक्षणिक पुस्तकों में कराया जाता तो शायद धर्म के नाम पर कभी इतना पाखंड नहीं फैलता।  दरअसल लोगों को योग विद्या का ज्ञान नहीं है इसलिये कोई भी पेशेवर धर्म प्रवचनकर्ता उन्हें अपने  लाभ के लिये भ्रमित करते हैं। स्थिति यह है कि जितने पेशेवर गुरु हैं उतने ही प्रकार के योग के रूप बन गये हैं। हास्य की स्थिति तब होती है प्रचार माध्यमों में समाचार, बहस तथा लेखों में अनेक लोग योग में महारथी के रूप में प्रस्तुत होते हैं।  उस समय पतंजलि योग का अध्ययन करने वाले साधक दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। योग साधना के रूप तथा तत्वज्ञान को एक मानकर बहस होती है जो एकदम अर्थहीन है।

      अभी हाल ही में एक संगठन के गुरु की समाधि चर्चा का विषय बनी हुई है। चिकित्सक मानते हैं कि वह देह का त्याग कर चुके हैं-उनका हृदय, मस्तिष्क तथा अन्य दैहिक क्रियायें एकदम काम करना बंद कर चुकी हैं। अब बहस इस बात की हो रही है कि पश्चिमी चिकित्सा पद्धति के आधार पर समाधि मानी जानी चाहिये कि नहीं। फिर कहा जाता है कि विज्ञान अलग विषय है भारतीय धार्मिक आस्थायें उनकी तराजु पर नहीं तोली जा सकती। समाधि पर तमाम तरह के विचार आ रहे हैं। हैरानी इस बात की है कि अनेक कथित संत इस विषय पर तर्क दे रहे हैं पर पतंजलि योग के आधार पर यह कहा जा सकता है कि ऐसे लोगों को इस विधा का अध्ययन अब शुरु करें न कि उस पर अपनी बात रखकर समाज को भ्रमित करना चाहिये। जिन गुरु की समाधि की चर्चा हो रही है उनके चालक की बात मानी जाये तो उनकी संस्था के पास हजारों करोड़ की संपत्ति है। माया का यह विशाल रूप अध्यात्मिक सिद्धों के पास नहीं आता भले ही कहा जाता हो कि वह त्यागियों की दासी होती है। माया संतों के इर्दगिर्द चक्कर लगाती है पर वह उसके संग्रह का  मोह ं अपने जीवन में कभी नहीं पालते।

      पतंजलि योग साहित्य में योग के आठ भाग बतायें गये हैं-यम, नियम, प्रत्याहार, आसन, प्राणायाम, ध्यान, धारण और समाधि।  समाधि योग का चरम रूप है।  इसमें लीन होने पर योग सिद्ध होना माना जाता है। इस समािध में भी अनेक भेद हैं पर उसका कोई स्पष्ट प्रकट स्वरूप नहीं है। अक्सर लोग सांस रोककर पड़ रहने को समाधि मानने लगते हैं। कुछ लोग बैठकर ध्यान लगाते हैं तो उसे भी समाधि कहा जाने लगता है। सांस रोकना प्राणायाम है तो ध्यान लगाना एक तात्कालिक सहज स्थिति है। जबकि योग का चरमरूप समाधि  एक मनस्थिति है जिसे बाहर से देखा नहीं जा सकता।

पतंजलि योग साहित्य के समाधि पद में कहा गया है कि

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योगनिश्चितवृत्तिनिरोधः

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है।

तदा दृष्टुः स्वरूपेऽअवस्थानम्।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-उस सयम दृष्टा  अपने रूप में स्थित हो जाता है।

      पतंजलि योग में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि सांस रोकना, मस्तिष्क का कार्य न करना अथवा देह की चमक फीकी पड़ जाना समाधि का प्रमाण है।  समाधि एक आंतरिक स्थिति है जिसमें मन की प्रकृत्तियों को स्थिर रखा जाता है। इसका अभ्यास न किया जाये   एकदम कठिन लगती है। हमारी दृष्टि से समाधिस्थ होना एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति परमात्मा ही नहीं वरन् किसी विषय से जुड़कर उससे मानसिक रूप से एकाकार हो सकता है। जिन लोगों ने निरंकार परमात्मा में मन लगाया उसे पाया और जिन्होंने साकार रूप देखा भी पूज्यनीय रहे।

      समाधि का मतलब है किसी विषय या वस्तु से  से इस तरह जुड़ जाना कि दृष्टा और दृश्य एकाकार हो जाये।  यहां हम तुलसी, कबीर, रहीम तथा मीरा की बात करें तो कहा जा सकता है कि वह  जीवन भर समाधि में ही रहे। उन्होंने जीवन भर परमात्मा से अपना मन इस तरह जोड़ा कि उससे अध्यात्मिक प्रसाद प्राप्त कर समाज को महान रचनायें दी।  समाधि के बाद अध्यात्म का जो प्रसाद मिलता है उसे अनुभव ही  किया जा सकता है। तुलसी ने रामचरित मानस के रूप में पाया प्रसाद समाज को बांटा। कबीर के दोहे भी एक तरह का अध्यात्म प्रसाद है जो हमने पाया।  जितना अध्ययन एक साधक के रूप में हमने किया उससे तो यही लगता है कि समाधि और ध्यान के नाम पर पाखंड अधिक दिखायी देता हैं।  योग साधना एकांत का विषय है।  लोग इस पर सार्वजनिक चर्चा इस तरह करते हैं जैसे कि महान योग विशारद हैं।

      जिस संगठन के गुरु कथित रूप से समाधि में हैं उनके शिष्य आस्था का विषय बताकर जिस तरह के तर्क दे रहे हैं हमें उन पर कोई आपत्ति नहीं है। धर्म के प्रतीक पहनकर कोई उसका महारथी नहीं हो जाता। हम तो बस इतना कहना चाहते हैं कि समाधि एक मनस्थिति है जिसमें हृदय की गति रुकना, मस्तिष्क का निष्क्रिय होना अथवा देह की चमक कम होना समाधि का प्रमाण नहीं है। पतंजलि योग के साधक के रूप में हमारा इतना ही मानना है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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