विकास और दौलत-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


अपनी हालातों से लाचार लोग दूसरों की ताकते हैं,

दौलत के पहाड़ पर बैठे लोग उसकी केवल ऊंचाई नापते हैं।

कहें दीपक बापू फैशन के नाम पर लोग कर रहे

अपनी जिंदगी से खिलवाड़

रौशनी के लिये लगा लेते अपने ही घर में आग

वह रोते है मगरं  तमाशाबीन उस पर हाथ तापते हैं।

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कन्या भ्रुण हत्या करते हुए थका नहीं समाज,

वर के लिये वधुओं के आयात की बात हो रही आज,

कहें दीपक बापू  लोग अपनी पुरानी सोच को

आधुनिक विज्ञान के साथ ढो रहे हैं,

बेजुबान पशु पक्षी की तरह जीना मंजूर कर लिया

मनुष्य शरीर है पर अक्ल खो रहे हैं,

अब बारी आ रही है जब नस्ल पर ही गिरेगी गाज।

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तख्त पर जो बैठ जाये वही बुद्धिमान कहलाता है,

खामोश भीड़ सामने बैठती वह रास्ता बतलाता है।

कहें दीपक बापू कुदरत का नियम है बड़ो के बोले भी बड़े

छोटा वही ज्ञानी है जो अपने घाव खुद ही सहलाता है।

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पुराने विकास के दौर में बड़ी बड़ी इमारतें खड़ी हो गयी,

अब गिरने लगी हैं तो नये विनाश की कड़ी हो गयी।

कहें दीपक बापू नये विकास का कद तो बहुत ऊंचा होगा

विनाश का ख्याल नहीं उम्मीद अब पहले से बड़ी हो गयी।

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विकास को दौर पहले भी चलते रहे हैं,

चिराग अपना रंग बदलकर हमेशा जलते रहे हैं।

कहें दीपक बापू आम आदमी महंगाई के बाज़ार में खड़ा रहा

उसका भला चाहने वाले दलाल महलों में पलते रहे हैं।

एक बात तय है कि आज जो बना है कल ढह जायेगा,

पत्थरों से प्रेम करने वाला हमेशा पछतायेगा,

बड़े बड़े बादशाह तख्त बेदखल हो गये,

चमकीले राजमहल देखते देखते खंडहर हो गये,

इतिहास में उगे बहुत लोग उगत सूरज की तरह

मगर समय के साथ सभी ढलते रहे हैं।

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