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भारतीय धनपतियों की खुलती पोल-हिन्दी लेख (indial capitalist and comman society-hindi article)


               जब हम आधुनिक लोकतंत्र की बात करते हैं तो उसमें अप्रत्यक्ष रूप से धनपतियों की राज्य का उपयोग अपने हित में करने की प्रवृत्ति स्पष्टतः सामने आती है। एक समय तक भारत में कथित मिश्रित अर्थव्यवस्था-साम्यवादी और पूंजीवाद विचारधारा से निर्मित खिचड़ी चिंतन जैसा ही समझें-अपनाया गया। इसी आधार पर हमारे यहां समाजवाद का नारा भी लगा। यहां यह स्पष्टतः कर दें कि समाजवादी विचारधारा भारत में ही पैदा हुई है। अधिकांश विश्व में पूंजीवादी राजकीय व्यवस्था है पर कुछ देशों फिर वामपंथियेां का शासन है जो मूलतः तानाशाही के सिद्धांतों पर आधारित है। हमारे देश में अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से ओतप्रोत विद्वानों को कभी भारतीय दर्शन में वैज्ञानिक आधार पर राज्य और समाज के गठन का विचार सूझा ही नहीं। चूंकि विदेशी विचाराधारा लानी थी और जलकल्याण करते दिखना भी था तो वामपंथी विचाराधारा बहुत अच्छी थी। इधर अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन में भारतीय धनपतियों के अप्रत्यक्ष सहयोग की वजह से उनको खुश रखने के लिये पूंजी की आजादी का पक्ष भी रखना जरूरी था सो समाजवाद की विचाराधारा बनी।
               संदर्भ हम नोएडा एक्सेंटेशन को लेकर अधिग्रहीत किसानों की जमीन पर बने आवासीय परिसरों को बढ़ते हुए विवादों को लें। यह उस खिचड़ी व्यवस्था से उत्पन्न वह दृश्य है जो कालांतर में आना ही था। भारतीय धनपतियों का प्रभुत्व आजादी से पहले स्थापित हो चुका था और वह देश को अपने ही आर्थिक नियंत्रण में रखकर आजाद देखना चाहते थे। उन्हें समाजवाद बहुत भाया होगा। दरअसल वामपंथ राज्य के समाज की हर गतिविधि पर नियंत्रण करने का मार्ग बतलाता है। पूंजीवाद इसके विपरीत समाज को आजाद देखना चाहता है। समाजवाद बीच की विचारधारा इसलिये बनी क्योंकि भारतीय धनपतियों को यह लगा कि उनकी तो अपनी शक्ति है इसलिये कोई उन पर नियंत्रण करेगा नहीं पर समाज जितना ही अधिक राज्य के नियंत्रण में रहेगा उतना ही अच्छा है क्योंकि अंततः देश की गतिविधियों का नियंता तो उनका ही धन है।
                      किसानों की रक्षा, गरीब का कल्याण, बीमार के लिये इलाज और नारी उद्धार के नारों के चलते जहां अनेक बुद्धिजीवी और समाज सेवक प्रचारक जगत में जननायक बनते रहे वहीं धनपतियों ने भी खूब नामा कमाया। आप आयकर की दरों को ही देख लें। एक समय बहुत अधिक दर थी। ऐसे में इस पर कोई यकीन नहीं कर सकता कि किसी धनपति ने ईमानदारी से यह कर दिया होगा। स्पष्टतः धनपतियों को पता था कि वह अपने दावपैंचों से अपना साम्राज्य बचाते रहेंगे पर कोई दूसरा बड़ा धनपति नहंी बन पायेगा। बन भी गया तो कालाधन होने की वजहा से उनके समकक्ष खड़ा नहीं हो सकेगा।
          इसके अलावा भी कृषि जमीन को आवासीय स्थल में परिवर्तन करने के भी अनेक प्रतिबंध रहे। स्थिति यह हो गयी थी कि देश की अनेक कॉलोनियां केंद्रीय और सरकारी संस्थाओं की छत्रछाया में बनी। निजी क्षेत्र में आवास निर्माण तो बहुत कम ही होता था। देश में आवास समस्या थी पर यह सरकारी संस्थायें धीरे धीरे उसे समायोजित करती रहीं। देश का एक बहुत बड़ा मध्यम वर्ग इन्हीं कॉलोनियों में आया जिनमें बुद्धिजीवी भी थे। तब तक मकान निर्माण लोगों की निजी क्षमताओं के इर्दगिर्द ही सीमित था इसलिये उसमें निजी ठेकेदार और व्यवसायी एक सीमा तक ही लाभान्वित होते थे।
           कालांतर में उदारीकरण के चलते देश की स्थितियां बदली हैं। अब मकान निर्माण एक भारी फायदे का धंधा बन गया है। यह अकेला एसा धंधा है जिसमें कोई योग्यता होना जरूरी नहीं है। बस दावपेंच आना चाहिए। अगर हम कोई हजारों का टीवी या फ्रिज खरीदते हैं तो दुकानदार गारंटी या वारंटी देता है पर मकान निर्माण करने वाला व्यवसायी कोई गारंटी नहीं देता। न इसका कोई कानूनी प्रावधान किया गया है। उपभोक्ता फोरम के अनेक चर्चित निर्णयों में कोई मकान से संबंधित नही होता।
              भारत में उदारीकरण की गति धीमी होने की शिकायत करने वाले उद्योगपति कभी यह मांग नहीं करते कि आम जनता के हितों की रक्षा के लिये उसे आजादी दी जाये। वह मकान बनाना चाहते हैं पर चाहते हैं कि उसके लिये सरकारी संस्थाायें अपनी ताकत से ज़मीन खरीद कर उनको दें। इतना ही नहीं वह कृषि भूमि को आवासीय स्थल में बदलने का कानून रद्द करने की बात भी नहीं करते जिससे निजी लोग स्वयं ही जमीन खरीद कर मकान बनाने लगें। अगर ऐसा हो गया तो इन धनपतियों को थोक में इतनी जमीन नहीं मिलेगी क्योंकि तब सामान्य लोग उसे खरीद चुके होंगे। मकान निर्माण में गारंटी का नियम लागू करने की भी यह मांग नहीं करते। कहने का अभिप्राय यह है कि भारतीय धनपति नहीं चाहते कि धन का विकें्रदीयकरण हो क्योंकि उनके आने वाली पीढ़ियां राज्य नहीं कर पायेंगी।
           राजधानी दिल्ली में नोएडा उत्तरप्रदेश का ऐसा शहर है जो दिल्ली का ही हिस्सा लगता है। जिसे दिल्ली में जगह नहीं मिली वह नोएडा में मकान ढूंढ रहा है। तय बात है कि वहां मकानों के लिये कृषि भूमि ही आवासीय स्थल बन सकती है। जैसा कि आरोप लगाया है कि किसानों को कम मुआवजा देकर भूमि ली गयी और वहां महंगे आवास बनाये गये। अब अदालत के निर्णय के बाद औद्योगिक विकास के नाम पर कृषि भूमि को आवासीय स्थल में बदलने पर भी नये सिरे से विचार प्रारंभ हो गया है।
            किसानों को पैसा कम मिला पर उन्होंने लिया। उधर फ्लैट लेने वालों ने बिल्डर को पैसा दिया। अब अदालत के निर्णय से किसानों से जमीन अधिग्रहण रद्द हो गया है। चूंकि अभी निर्णय ऊंची अदालतों में जाना है इसलिये कहना कठिन है कि आगे क्या होगा पर इतना तय है कि इसमें धनपतियों को कोई हानि नहीं है। दरअसल फंसा तो वह निवेशक है जिसने फ्लैट के लिये पैसा दिया है। जिसने अपना पैसा दिया है वह सब्र कर सकता है पर जिसने कर्ज लेकर किश्त दी है उसके लिये भारी संकट बन सकता है। जिस तरह मकान के लिये बैंक कर्ज दे रहे हैं उसे लेने वालों की संख्या बढ़ गयी है। मध्यम वर्ग कर्ज लेने के लिये हमेशा तैयार रहता है।
जहां तक किसानों को जमीन वापस मिलने का सवाल है तो उसमें भी कठिनाई आयेगी। इसका कारण यह है कि अनेक किसानों ने टीवी चैनलों पर बताया कि वह पैसा लेकर खर्च कर चुके हैं इसलिये उसे वापस करने का संकट उनके सामने है। ऐसे में मुआवजे की रकम दिये बिना उनको जमीन वापस मिलना मुश्किल है। इसके अलावा जब उनकी भूमि पर खेती होती थी तो उसका सीमांकन अब कैसे दुबारा होगा। वहां तो अनेक तरह के निर्माण कार्य चल रहे हैं। हैरानी की बात है कि अदालत में मामला होते हुए भी वहां निर्माण कार्य होने दिया गया। वैसे देखा जाये तो अदालतों के माननीय न्यायाधीश तो अपने सामने उपस्थित तथ्यों को देखते ही फैसला देते हैं इसलिये उनके निर्णय का समर्थन करना चाहिए। ऐसा लगता है कि भवन निर्माताओं को अपने पक्ष में फैसला होने का कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास रहा होगा। न्यायालय के निर्णय से उनका यह भ्रम टूट गया होगा कि पैसे और ताकत से कुछ भी किया जा सकता है। सुनने में आया है कि अब विनिवेशक भी न्यायालय में जा रहे हैं। अभी तक मामला किसानों की जमीन और उनके अधिग्रहण तक ही सीमित था और न्यायालयों के सामने इसी संदर्भ में तथ्य प्रस्तुत किये गये होंगे तो निर्णय इसी तरह आना था। अब विनिवेशक भी एक पक्ष बन रहे हैं तो न्यायालयों में उनकी बात भी सुनी जायेगी। इस मामले के आगे बढ़ने की संभावना है।
             आगे जो निर्णय होंगे वह तो एक अलग बात है पर मुख्य बात यह है कि एक तरफ बड़े धनपति अपनी ताकत के दमपर चाहे जो हासिल कर लेते हैं पर सामान्य आदमी के लिये हर चीज प्राप्त करना कठिन इसलिये बना दिया गया है ताकि वह मजबूरों की भीड़ का हिस्सा बन रहे। इससे वह भारतीय धनपतियों को अपने उत्पादों, भवनों और अन्य सुविधाओं के लिये प्रयोक्ता के रूप में मिलता रहे। इसलिये धनपति चाहते हैं कि राज्य का समाज पर कठोर नियंत्रण रहे और उस पर तो उनका निंयत्रण अंग्रेजों के समय था और अब भी है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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भरोसे के नाम पर तोहफा धोखे का-हिन्दी व्यंग्य कविता (bharose ka naam par tohfe dhokhe ka-hindi vyangya akvita)


तख्त के लिये मची है चारों तरफ जंग,
इंसानों के मुंह खुले पर दिमाग हैं तंग।
सजे हुए सब चेहरे, ओढ़े चमकीले कपड़े
मगर सभी की नीयत का काला है रंग।
भरोसा का नाम, मिलता तोहफा धोखे का
सच की लय को भ्रम ने किया है भंग।
कहें दीपक बापू अंधों के आगे क्या रोना
समाज बड़ा है, पर बंधे है उसके सारे अंग।
संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक   ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
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बाबा रामदेव को कौन क्या समझा रहा है-उनके आंदोलन पर लेख (baba ramdev ko kaun kya samjha raha hai-a hindi lekh his new movement on anti corruption)


           भारत स्वाभिमान यात्रा करते करते बाबा रामदेव अब ऐसे मोड़ पर आ गये हैं जहां इतिहास अपनी कोई नई पारी खेलने के लिये तैयार खड़ा दिखता है। उन पर लिखने और बोलने वाले बहुत हैं पर उनका दायरा बाबा के ‘सुधार आंदोलन’ के विरोध या समर्थन तक ही सीमित है। बाबा के समर्थक और भक्त बहुत होंगे पर सच्चे अनुयायी कितने हैं, इसका सही अनुमान कोई नहीं  कर पाया। बाबा के प्रशंसक उनके शिष्यों के अलावा दूसरे ज्ञानी भी हो सकते हैं इसका आभास भी किसी को नहीं है। यह आवश्यक नहीं है कि बाबा रामदेव के सभी प्रशंसक उनके शिष्य हों पर इतना तय है कि उनके कार्यक्रम के प्रति सकारात्मक भाव इस देश के अधिकांश बौद्धिक वर्ग में है। हमारी मुख्य चर्चा का विषय यह है कि बाबा रामदेव की योग शिक्षा की प्रशंसा करने वाले कुछ लोगों को उनकी इतर गतिविधियां पंसद नहीं आ रही हैं और वह उनको ऐसा या वैसा न करने की शिक्षा देते हुए बयान दे रहे हैं तो इधर उनके प्रशंसक भी केवल ‘आगे बढ़ो, हम तुम्हारे साथ हैं’ का नारे लगाते हुए उनके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की ज्योति प्रज्जवलित किये हुए हैं। इन सभी के बीच स्वामी रामदेव के व्यक्त्तिव का पढ़ने का प्रयास कोई नहीं कर रहा जो कि जरूरी है।
      बाबा रामदेव के आंदोलन में  चंदा लेने के अभियान पर उठेंगे सवाल-हिन्दी लेख (baba ramdev ka andolan aur chanda abhiyan-hindi lekh)
      अंततः बाबा रामदेव के निकटतम चेले ने अपनी हल्केपन का परिचय दे ही दिया जब वह दिल्ली में रामलीला मैदान में चल रहे आंदोलन के लिये पैसा उगाहने का काम करता सबके सामने दिखा। जब वह दिल्ली में आंदोलन कर रहे हैं तो न केवल उनको बल्कि उनके उस चेले को भी केवल आंदोलन के विषयों पर ही ध्यान केंद्रित करते दिखना था। यह चेला उनका पुराना साथी है और कहना चाहिए कि पर्दे के पीछे उसका बहुत बड़ा खेल है।
    उसके पैसे उगाही का कार्यक्रम टीवी पर दिखा। मंच के पीछे भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का पोस्टर लटकाकर लाखों रुपये का चंदा देने वालों से पैसा ले रहा था। वह कह रहा था कि ‘हमें और पैसा चाहिए। वैसे जितना मिल गया उतना ही बहुत है। मैं तो यहां आया ही इसलिये था। अब मैं जाकर बाबा से कहता हूं कि आप अपना काम करते रहिये इधर मैं संभाल लूंगा।’’
          आस्थावान लोगों को हिलाने के यह दृश्य बहुत दर्दनाक था। वैसे वह चेला उनके आश्रम का व्यवसायिक कार्यक्रम ही देखता है और इधर दिल्ली में उसके आने से यह बात साफ लगी कि वह यहां भी प्रबंध करने आया है मगर उसके यह पैसा बटोरने का काम कहीं से भी इन हालातों में उपयुक्त नहीं लगता। उसके चेहरे और वाणी से ऐसा लगा कि उसे अभियान के विषयों से कम पैसे उगाहने में अधिक दिलचस्पी है।
            जहां तक बाबा रामदेव का प्रश्न है तो वह योग शिक्षा के लिये जाने जाते हैं और अब तक उनका चेहरा ही टीवी पर दिखता रहा ठीक था पर जब ऐसे महत्वपूर्ण अभियान चलते हैं कि तब उनके साथ सहयोगियों का दिखना आवश्यक था। ऐसा लगने लगा कि कि बाबा रामदेव ने सारे अभियानों का ठेका अपने चेहरे के साथ ही चलाने का फैसला किया है ताकि उनके सहयोगी आसानी से पैसा बटोर सकें जबकि होना यह चाहिए कि इस समय उनके सहयोगियों को भी उनकी तरह प्रभावी व्यक्तित्व का स्वामी दिखना चाहिए था।
अब इस आंदोलन के दौरान पैसे की आवश्यकता और उसकी वसूली के औचित्य की की बात भी कर लें। बाबा रामदेव ने स्वयं बताया था कि उनको 10 करोड़ भक्तों ने 11 अरब रुपये प्रदान किये हैं। एक अनुमान के अनुसार दिल्ली आंदोलन में 18 करोड़ रुपये खर्च आयेगा। अगर बाबा रामदेव का अभियान एकदम नया होता या उनका संगठन उसको वहन करने की स्थिति में न होता तब इस तरह चंदा वसूली करना ठीक लगता पर जब बाबा स्वयं ही यह बता चुके है कि उनके पास भक्तों का धन है तब ऐसे समय में यह वसूली उनकी छवि खराब कर सकती है। राजा शांति के समय कर वसूलते हैं पर युद्ध के समय वह अपना पूरा ध्यान उधर ही लगाते हैं। इतने बड़े अभियान के दौरान बाबा रामदेव का एक महत्वपूर्ण और विश्वसीनय सहयोगी अगर आंदोलन छोड़कर चंदा बटोरने चला जाये और वहां चतुर मुनीम की भूमिका करता दिखे तो संभव है कि अनेक लोग अपने मन में संदेह पालने लगें।
            संभव है कि पैसे को लेकर उठ रहे बवाल को थामने के लिये इस तरह का आयोजन किया गया हो जैसे कि विरोधियों को लगे कि भक्त पैसा दे रहे हैं पर इसके आशय उल्टे भी लिये जा सकते हैं। यह चालाकी बाबा रामदेव के अभियान की छवि न खराब कर सकती है बल्कि धन की दृष्टि से कमजोर लोगों का उनसे दूर भी ले जा सकती है जबकि आंदोलनों और अभियानों में उनकी सक्रिय भागीदारी ही सफलता दिलाती है। बहरहाल बाबा रामदेव के आंदोलन पर शायद बहुत कुछ लिखना पड़े क्योंकि जिस तरह के दृश्य सामने आ रहे हैं वह इसके लिये प्रेरित करते हैं। हम न तो आंदोलन के समर्थक हैं न विरोधी पर योग साधक होने के कारण इसमें दिलचस्पी है क्योंकि अंततः बाबा रामदेव का भारतीय अध्यात्म जगत में एक योगी के रूप में दर्ज हो गया है जो माया के बंधन में नहीं बंधते।
       स्वामी रामदेव के आंदोलन के समर्थन या विरोध से अधिक महत्वपूर्ण बात हमारे नजरिये से यह है कि इससे देश में लोगों के अंदर चेतना और कर्म शक्ति का निर्माण होना चाहिए। अगर उनका यह अभियान ऐसा लाभ देश को देता है तो प्रत्यक्ष उससे हम लाभान्वित न भी हों पर इसकी प्रशंसा करेंगे। मूल बात यह है कि जब हम पूरे समाज के हित की बात सोचते हैं तो हमारी न केवल शक्ति बढ़ती है बल्कि स्वयं अपना हित भी होता है। जब हम केवल अपने हित पर ही अपना ध्यान केंद्रित करते हैं तो शक्ति और चिंतन सिमट जाता है। आजकल मनुष्य का खानपान और रहनसहन ऐसा हो गया है कि उसके अंदर चेतना और कर्म शक्ति का निर्माण वैसे भी सीमित मात्रा में होता है। ऐसे में योग साधना ही एकमात्र उपाय है जिससे कोई मनुष्य अपना सामान्य स्तर प्राप्त कर सकता है वरना तो वह भेड़ों की तरह हालतों के चाबुक खाकर भटकता रहे।
         अब बात करें सीधी! जो लोग योग साधना करने और न करने वालों के बीच का देख पायें या समझ पायें हों वही अगर स्वामी रामदेव के कर्म पर टिप्पणियां करें तो बात समझ में आये। दो फिल्मी हीरो बाबा रामदेव के आंदोलन का विरोध कर रहे हैं। अगर हम उनके विरोध का विश्लेषण करें तो शायद बात रास्ते से भटक जायेगी पर यह बताना जरूरी है कि उन दोनों में से कोई योग साधना की प्रक्रिया और साधक की शक्ति को नहीं जानता।
          एक कह रहा है कि ‘बाबा रामदेव को अपने काम से काम रखना चाहिए।’
        दूसरा कह रहा है कि ‘स्वामी रामदेव को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने की बजाय अपने भक्तों को इससे बचने की सलाह देना चाहिए।’’
         कुछ समय पहले जब अन्ना हजारे जी के आंदोलन के समय इन्हीं अभिनेताओं ने उनका समर्थन किया था और अब उनका यह रुख उनको संदेहास्पद बना देता है। इस पर हम शायद टिप्पणी नहीं करते पर यह दोनो उस ं बाज़ार और प्रचार तंत्र के मुखपत्र की तरह पेश आ रहे हैं जो भारतीय अध्यात्म से घबड़ाया रहता है। उसमें उसे कट्टरत्व की बू आने लगती है। इधर अन्ना हजारे की कथित सिविल सोसाइटी ने भी बाबा रामदेव को सलाह दे डाली कि वह अपने आंदोलन से धार्मिक तत्वों को दूर रखें।
     ऐसे में यह सवाल उठाता है कि विश्व का बाज़ार तथा प्रचारतंत्र-हम यहां मानकर चल रहे हैं कि अब आर्थिक उदारीकरण के चलते सारे विश्व के आर्थिक, धार्मिक तथा सामाजिक शिखर पुरुष संगठित होकर काम करते हैं-कहीं दो भागों मे बंट तो नहीं गया है।
      वैसे तो किसी आम लेखक की औकात नहीं है कि वह इतने बड़े आंदोलनों के शिखर पुरुषों पर टिप्पणी करे पर ब्लाग लिखने वालों के पास अपनी भड़ास निकालने का अवसर आता है तो वह चूकते नहीं है। जिस तरह भारतीय प्रचार माध्यमों ने हिन्दी ब्लाग लेखकों को अनदेखा किया उससे यह बात साफ लगती है कि बाज़ार अपने प्रचार तंत्र के साथ अनेक घटनाओं को रचता है। वह घटना के नायकों को धन देता है खलनायकों को पालता है। सबसे बड़ी बात यह कि वैश्विक आर्थिकीकरण ने हालत यह कर दिया है कि कोई भी आंदोलन धनपतियों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहयोग के बिना चल ही नहीं सकता। ऐसे में अन्ना हज़ारे और स्वामी रामदेव के आंदोलनों का परिणाम जब तक प्रथ्वी पर प्रकट नहीं होता तब तक उन पर भी संदेह बना रहेगा। मतलब यह कि हम तो कथित सिविल सोसइटी और कथित नायकों के विरोध तथा संदेहास्पद रवैये से आगे जाकर अपनी बात कह रहे हैं जो कि स्वयं ही बाज़ार के प्रायोजित लगते हैं। हम जैसे लेखकों की जिज्ञासा के कारण ऐसे आंदोलनों में रु.िच रहती है। फिर जब बात योग शिक्षक की अध्यात्मिक से इतर गतिविधियों की हो और उनके विरोध करने वाले ज्ञान और सात्विकता से पैदल हों तो उनका प्रतिवाद करने का मजा किसी भी ऐसे योग साधक को आ सकता है जो हिन्दी में लिखना जानता हो। हिन्दी फिल्मों के जिन दो अभिनेताओं ने स्वामी रामदेव का विरोध किया है वह हिन्दी नहीं जानते कम से कम उनकी पत्रकार वार्ताऐं और टीवी साक्षात्कार देखकर तो यही लगता है। ऐसे में वह दोनों इस लेख को पढ़ेंगे या उनके समर्थक इसे समझेंगे यह खतरा कम ही हो जाता है। बहरहाल बुढ़ा चुके और अभिनय की बजारय विवादों से अधिक प्रचारित यह दोनों अभिनेता बाज़ार और प्रचारतंत्र के उस हिस्से के मुखौटे हैं जो स्वामी रामदेव के अभियान से भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के प्रचार बढ़ने की आशंका से त्रस्त है। हालांकि ऐसा भी लगता है कि बाज़ार का दूसरा वर्ग उसे हिलाने के लिये भी ऐसे आंदेालन प्रायोजित कर सकता है यह बात हम लिख रहे हैं जो कि इन दोनों अभिनेताओं और सिविल सोसाइटी वालेां की हिम्मत नहीं है क्योंकि तब इनके आर्थिक स्वामियों  की उंगली उठनी शुरु हो जायेंगी। यहां यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि हिन्दी से पैदल दोनों यह अभिनेता कहीं स्वामी रामदेव का विरोध इसलिये तो नहीं कर रहे क्योंकि वह हिन्दी के प्रचार का काम भी प्रारंभ कर चुके हैं।
       मगर यह अनुमान ही है क्योंकि यह दोनों अभिनेता  तो दूसरे के लिखे वाक्य बोलने के आदी हैं इसलिये संभव है कि बाजार और प्रचारतंत्र के संयुक्त प्रबंधकों का यह प्रयास हो कि इस आंदोलन की वजह से देश में किसी ऐसी स्थाई एकता का निर्माण न हो जाये जो बाद में उनके लिये विध्वंसकारी साबित हो। इसलिये साम्प्रदायिक बताकर इसे सीमित रखना चाहिए। शायद प्रबंधक यह नहीं चाहते हों कि कहीं उनका यह प्रायोजित अभियान कभी उनके लिये संकट न बन जाये। कहीं वह सिविल सोसाइटी और इन अभिनेताओं के माध्यम से इस अभियान से किसी वर्ग को दूर रहने का संदेश तो नहीं भेजा जा रहा।
          आखिरी बात बाबा रामदेव के बारे में। देश का कोई मामूली योग साधक भी यह जानता है कि बचपन से योग साधना में रत रामकृष्ण यादव अब स्वामी रामदेव बन गया तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। भौतिक से अधिक उनकी अभौतिक अध्यात्मिक शक्ति है। सिद्धि और चमत्कारों के लिये सर्वशक्तिमान की तरफ हाथ फैलाये रखने वाले लोग इस बात को नहीं समझेंगे कि योग साधना इंसान को कितना शारीरिक तथा मानिसक रूप से शक्तिशाली बनाती है। जबकि फिल्में और टीवी चैनल इस भ्रमपूर्ण संसार मे अधिक भ्रम फैलाते हैं और उनके नायक किंग, भगवान, बॉडी बिल्डर भले ही प्रचारित हों पर उनकी कोई व्यक्तिगत औकात नहीं होती। जो चाहे जैसा नचाता है नचा ले। जो बुलवाता है बुलवा ले। एक महायोगी  की एक एक क्रिया, एक एक शब्द और एक एक कदम मौलिकता धारण किये होंता है। बाबा रामदेव के आंदोलन लंबा चलने वाला है। इस पर बहुत कुछ लिखना है और लिखेंगे। बाबा रामदेव के हम न शिष्य हैं न समर्थक पर इतना जरूर कहते हैं कि योगियों की लीला अद्भुत होती है, कुछ वह स्वयं करते हैं कुछ योगामाता ही करवा लेती है। सो वह खास लोग जो आम जीवन शैली अपनाते हैं वह उनको समझाने से बाज आयें तो उनके लिये बेहतर रहेगा वरना वैसे ही वह भ्रमपूर्ण जीवन जीते हैं और योग का विरोध उनकी उलझने अधिक बढ़ायेगा।
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
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भ्रष्टाचार एक अदृश्य राक्षस–हिन्दी हास्य कविताएँ/शायरी (bhrashtachar ek adrishya rakshas-hindi hasya kavitaen)


भ्रष्टाचार के खिलाफ
लड़ने को सभी तैयार हैं
पर उसके रहने की जगह तो कोई बताये,
पैसा देखकर
सभी की आंख बंद हो जाती है
चाहे जिस तरह घर में आये।
हर कोई उसे ईमानदारी से प्यार जताये।
———-
सभी को दुनियां में
भ्रष्ट लोग नज़र आते हैं,
अपने अंदर झांकने से
सभी ईमानदार घबड़ाते हैं।
भ्रष्टाचार एक अदृश्य राक्षस है
जिसे सभी गाली दे जाते हैं।

सुसज्जित बैठक कक्षों में
जमाने को चलाने वाले
भ्रष्टाचार पर फब्तियां कसते हुए
ईमानदारी पर खूब बहस करते है,
पर अपने गिरेबों में झांकने से सभी बचते हैं।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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हास्य कविता-भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन (hasya kavita-bhrashtachar ke khilaf andolan)


समाज सेवक की पत्नी ने कहा
‘तुम भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
शामिल मत हो जाना,
वरना पड़ेगा पछताना।
बंद हो जायेगा मिलना कमीशन,
रद्द हो जायेगा बालक का
स्कूल में हुआ नया एडमीशन,
हमारे घर का काम
ऐसे ही लोगों से चलता है,
जिनका कुनबा दो नंबर के धन पर पलता है,
काले धन की बात भी
तुम नहीं उठाना,
मुश्किल हो जायेगा अपना ही खर्च जुटाना,
यह सच है जो मैंने तुम्हें बताया,
फिर न कहना पहले क्यों नहीं समझाया।’
सुनकर समाज सेवक हंसे
और बोले
‘‘मुझे समाज में अनुभवी कहा जाता है,
इसलिये हर कोई आंदोलन में बुलाता है,
अरे,
तुम्हें मालुम नहीं है
आजकल क्रिकेट हो या समाज सेवा
हर कोई अनुभवी आदमी से जोड़ता नाता है,
क्योंकि आंदोलन हो या खेल
परिणाम फिक्स करना उसी को आता है,
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
मेरा जाना जरूरी है,
जिसकी ईमानदारी से बहुत दूरी है,
इसमें जाकर भाषण करूंगा,
अपने ही समर्थकों में नया जोशा भरूंगा,
अपने किसी दानदाता का नाम
कोई थोडे ही वहां लूंगा,
बस, हवा में ही खींचकर शब्द बम दूंगा,
इस आधुनिक लोकतंत्र में
मेरे जैसे ही लोग पलते हैं,
जो आंदोलन के पेशे में ढलते हैं,
भ्रष्टाचार का विरोध सुनकर
तुम क्यों घबड़ाती हो,
इस बार मॉल में शापिंग के समय
तुम्हारे पर्स मे ज्यादा रकम होगी
जो तुम साथ ले जाती हो,
इस देश में भ्रष्टाचार
बन गया है शिष्टाचार,
जैसे वह बढ़ेगा,
उसके विरोध के साथ ही
अपना कमीशन भी चढ़ेगा,
आधुनिक लोकतंत्र में
आंदोलन होते मैच की तरह
एक दूसरे को गिरायेगा,
दूसरा उसको हिलायेगा,
अपनी समाज सेवा का धंधा ऐसा है
जिस पर रहेगी हमेशा दौलत की छाया।’’
———–
कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
poet writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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नकली ट्राफी का असली खेल-व्यंग्य चिंत्तन (asali match nakli cup trofy ka khel-vyangya chittan)


             समझ में नहीं आ रहा है कि व्यंग्य लिखें कि गंभीर चिंत्तन। क्रिकेट को वैसे ही यकीनी खेल नहीं मानते। यहां तक कि जिसे लोग टीम इंडिया कहकर देश के लोग सिर पर उठाये रहते हैं उसके लिये भी हमने केवल एक क्लब बीसीसीआई की टीम मानते हैं। यह क्लब अपने क्रिकेट के व्यापार के लिये भारत के नाम, झंडे और गान का इस्तेमाल करता है इसलिये ही उसे भारत में दर्शक भारी मात्रा में मिलते हैं जिनकी जेब की दम पर पूरी दुनिया का क्रिकेट चल रहा है। बहरहाल हमारी टीम ने विश्व कप जीता खुशी की बात है-जीतने पर हम ऐसा ही करते हैं, हारने पर बीसीसीआई की टीम कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं-खिलाड़ियों के हाथ में ट्राफी या कप देखकर खुशी हुई।
            धोनी और गंभीर ने मन मोह लिया, मगर सारी प्रसन्नता चौबीस घंटे में हवा हो गयी। पता लगा कि उनको नकली कप या ट्राफी दी गयी है और असली भारतीय कस्टम विभाग के भंडार कक्ष की शोभा बढ़ा रही है। गनीमत है कि नागरिक सेवाओं से जुड़े कर्मचारी गोपनीयता के नियमों का पालन करते हैं वरना भंडार कक्ष में रखी ट्राफी का सरेआम दृश्य प्रसारित होता तब देश की इज्जत पर जो बट्टा लगता वह दुःखदायी होता।
            वैसे प्रचार माध्यम घुमाफिरा रहे हैं। बीसीसीआई के प्रवक्ता ने जब यह माना है कि ट्राफी नकली है तब उसमें शक की गुंजायश नहंी रहती। फिर भी आईसीसी कहती है कि असली ट्राफी यह कप है। वैसे प्रचार माध्यमों ने प्रमाणित कर दिया है कि वानखेड़े स्टेडियम में खेले गये विश्व कप 2011 के मैच के बाद भारत को दी गयी ट्राफी नकली है। उसमें विश्व कप का वह लोगो नहीं दिख रहा जिसे कोलंबो में अनावरण के समय देखा गया था। चूंकि यह ट्राफी अत्यंत महत्वपूर्ण है इसलिये यह संभव नहीं है कि उसे कहीं खुले में रखा गया हो जिससे उसका रंग उड़ जाये।
मतलब यह कि यह नकली ट्राफी है।
                  यह देश के साथ मजाक है और यकीनन बिना सोचे समझे नहीं किया गया। यह चिढ़कर किया गया है ताकि भारतीय लोग खुशी के बाद अवसाद के वातावरण का सामना करें। कोई है जो भारत की जीत से चिढ़ गया है। कौन हैं वह लोग? इसकी पड़ताल जरूरी है।
               इसमें कोई संदेह नहीं है कि सट्टेबाजों की ताकत जहां व्यापक है वहीं उनके हाथ लंबे हैं। कहा जाता है कि दुनियां के देशों के कानूनों से अलग आईसीसी तथा सट्टेबाजों का के नियम हैं। वह कई जगह कानून बनकर काम चलाते हैं वहां उनके हाथ भी लंबे हैं। भले ही कहा जाता है कि गोरे ईमानदार होते हैं पर जिस तरह अपराधियों के हाथ वह बिकते देखे गये हैं उससे यह भ्रम टूट गया है। ऐसा लगता है कि इस विश्व कप में कहीं न कहीं सट्टेबाजों को अपना काम सही तरह से करने का अवसर नहीं मिला। सेमीफायनल में पाकिस्तान और फायनल में श्रीलंका पर भारत की जीत तय मानी जा रही थी। ऐसे में सट्टेबाजों के लिये विपरीत परिणाम ही फायदेमंद हो सकता था पर ऐसा हुआ नहीं। हालांकि सट्टेबाजों ने अब स्पॉटफिक्सिंग का रास्ता निकाल लिया है पर लगता है कि वह अपनी कमाई से संतुष्ट नहीं है। फिर सेमीफायनल में पहुंची चार टीमों में-भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका तथा न्यूजीलैंड-से तीन गोरवर्ण का प्रतिनिधित्व नहीं करती। क्या गोरों के मन में यह मलाल रह गया था?
                  दूसरा सेमीफायनल और फायनल मैचों को भारत के अनेक संवैधानिक, राजनीतिक, आर्थिक, फिल्मी तथा अन्य विशिष्ट क्षेत्रों से जुड़े शिखर पुरुषों ने देखा। अपने कामकाज से फुरसत निकालकर वह कुछ देर आम इंसानों की तरह मैच देखने आये? उनकी मासुमियत तथा रुचियों को मजाक उड़ाने का कहीं यह इरादा तो नहीं है? क्या गोरे तथा भारत के विरोधियों को यह लगता है कि अमेरिका की लीबिया पर चल रही बमबारी को ही हम लोग देखते रहें और अपने क्रिकेट मैचों को देखना बंद कर देते।
क्रिकेट मैचों में हारने या जीतने पर भावुक नहीं होना चाहिए, यह हम हमेशा ही कहते रहे हैं पर नकली कप का मामला राष्ट्रवादियों को चिढ़ाने वाला है। भारत में आज नववर्ष विक्रम या विक्रमी संवत् 2068 के आगमन का स्वागत हो रहा है। ईसाई संवत् मानने वालों को यह बात समझ में नहीं आयेगी कि ऐसे अवसर इस तरह की अपमान जनक खबर बेहद दुःखदायी है। दो कौड़ी की आईसीसी-विश्व की क्रिकेट पर नियंत्रण करने वाली संस्था-और एक कोड़ी का फायनल मैच, पर देश का नाम अनमोल है। क्रिकेटर और उससे जुड़े संघों के लोग पैसे कमाने के चक्कर में चुप बैठ जायेंगे पर जिनको क्रिकेट से अधिक देश के प्रति प्रेम का भाव है वह इस व्यवहार से क्षुब्ध अवश्य होंगे।
          यह तो एक विचार है। इसका दूसरा पक्ष यह भी हो सकता है कि यह समाचार ही फिक्स कर बनाया गया हो। विश्व कप क्रिकेट प्रतियोगिता का फायनल देखने के बाद यहां के लोगों का क्रिकेट से मन भर सकता है। इधर एक क्लब स्तरीय प्रतियोगिता शुरु हो रही है और उसे दर्शक कम मिल सकते हैं क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता और क्लब स्तरीय क्रिकेट मैचों में अंतर होता है। कहीं यह विश्व कप प्रतियोगिता का स्तर कमतर साबित करने का प्रयास तो नहीं है ताकि दर्शक इसे भूल जायें और क्लब स्तरीय प्रतियोगिता की तरफ जायें।
इधर यह भी सुनने में आया था कि कुछ सट्टेबाज इधर उधर पकड़े गये। उनके साथ आस्ट्रेलिया के दो गोरे खिलाड़ियों की मिलीभगत की बात सामने आयी। शायद इससे गोरे लोगों को सदमा लगा हो।
                  कहने का अभिप्राय है कि यह घटना पूर्वनियोजित है। इससे दो उद्देश्य या दोनों में से एक प्राप्त करने का प्रयास हो सकता है।
        एक तो भारत को अपमानित करना या फिर विश्व कप प्रतियोगिता को कमतर साबित करना ताकि क्लब स्तरीय प्रतियोगिता की तरफ जायें। लंबे समय तक विश्व कप की खुमारी उन पर न रहे क्योंकि छह अप्रैल से क्लब स्तरीय प्रतियोगिता प्रारंभ होने वाली है। शक की पूरी गुंजायश है कि इतनी बड़ी प्रतियोगिता में सब कुछ ठीकठाक रहा तो यह ट्राफी कस्टम का कर चुकाकर स्टेडियम में लायी क्यों न गयी? क्या वह इसे फ्री में लाना चाहते थे? करोड़ो रुपये की मालिक संस्थायें 20 लाख रुपये खर्च करने से मुकर क्यों गयीं? आखिरी बात दूसरी नकली ट्राफी अचानक कैसे बनकर आ गयी? मतलब जांच हो तो मामला कुछ का कुछ निकल सकता है।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
poet writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका पर लिख गया यह पाठ मौलिक एवं अप्रकाशित है। इसके कहीं अन्य प्रकाश की अनुमति नहीं है।
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विश्व कप क्रिकेट के मैच साफ सुथरे होने पर सवाल-हिन्दी व्यंग्य (vishwa cup tournment ke cricket match-hindi vyangya)


अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने पाकिस्तान के तीन खिलाड़ियों को स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में अगले कुछ वर्ष तक न खेलने देने का दंड दिया है। इस दंड की सजा सुनाने के लिये एक गोरा चेहरा लाया गया ताकि यह लगे कि सारा काम ईमानदारी से ईमानदारी लाने के लिये किया गया है। मगर कमबख्त जिस तरह सावन का अंधा हर जगह हरियाली देखता है वैसे ही क्रिकेट का वह अंधा सभी जगह फिक्सिंग देखता है जिसने कई वर्षों तक अपनी आंखों टीवी पर मैच देखकर बर्बाद की और अब जाकर पता लगा कि इसमें मैच ही नहीं बल्कि हर बॉल फिक्स होती हैै।
पहले तो यह माना जाता था कि गोरे ईमानदार हैं पर अब वह बात नहीं रही। क्रिकेट में कोई मैच बिना फिक्सिंग के भी हो सकता है यह मानना अब कठिन लगता है। याद रखिये भारत के कुछ खिलाड़ी भी फिक्सिंग का दंड भोग चुके हैं और उससे अनेक क्रिकेट प्रेमियों को निराश किया। सच तो यह है कि यह खेल अब खेल नहीं बल्कि व्यापार है। व्यापार में जिस तरह वस्तु बेचने के लिये तमाम तरह का प्रचार किया जाता है वैसा ही क्रिकेट के खिलाड़ियों का हो रहा है। यह जरूरी नहीं है कि जिस चीज की कोई विशेषता बताई जा रही है वह उसमें न हो पर यह व्यापार और प्रचार का हिस्सा है। उसे गलत नहीं माना जाता। यही स्थिति क्रिकेट भी व्यापार है। हो सकता है कि लोग किसी टीम को जीतने की इच्छा से मैदान पर आयें पर वह हार जाये पर उससे पहले मैदान पर दर्शकों को खींचने के लिये उनकी जीतने की इच्छा वाली टीम के खिलाड़ियों को नायक की तरह प्रचारित करना जरूरी है। भारतीय टीम के एक एक खिलाड़ी का जीवन चरित्र प्रचारित हो रहा है। वह बचपन में क्या खाता था, अब क्या खाता है, पहले कहां पढ़ता था और तब उसके दोस्त कौन थे? गोया भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल होना जैसे किसी फिल्म के लिये अच्छे अभिनय के लिये पुरस्कार मिलने जैसा हो। बहरहाल चूंकि अब हम क्रिकेट को खेल न मानते हुए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मानते हैं तब कुछ भी बुरा नहीं लगता। यकीन करिये न मैच फिक्स होना बुरा लगता है और न ही  स्पॉट फिक्सिंग।
अगला एक दिवसीय क्रिकेट विश्व कप भारत में होना है। पहले यह पाकिस्तान में होना था मगर भारत को अवसर मिल गया। मिलना ही था क्योंकि पूरे विश्व की क्रिकेट का खेल भारतीय कंपनियों के विज्ञापन से चल रहा है। इसके मैचों पर सट्टा भी एशियाई देशों में अधिक लगता है और यकीनन भारत में इसके स्त्रोत अधिक हैं। जिस तरह दुनियां में एक नंबर और दो नंबर के धंधेबाजों के हर क्षेत्र में संयुक्त उद्यम चल रहे हैं उसे देखकर लगता है कि क्रिकेट मैचों में कहीं न कहीं  फिक्सिंग होती ही होगी। कंपनियों को विज्ञापन तथा उत्पाद बेचने हैं इसलिये खिलाड़ियों के चेहरे चमकाने हैं। सट्टेबाजों को आम लोगों के जुआ खेलने की आदत का लाभ उठाना है सो फिक्सिंग करानी है। सट्टेबाज ही कंपनियों में भी भारी विनिवेश करते हैं। उनसे कोई बैर नहीं बांधता क्योंकि धनपति तो उनकी कृपा से शिखर पर पहुंचे हैं। मतलब काले धंधों का चेहरा अब कंपनियों के सफेद चेहरे के पीछे छिप जाता है जो कि भारतीय होने के साथ और क्रिकेट का मज़बूत आधार भी हैं।
भारतीय टीम के खिलाड़ियों का जोरदार प्रचार हो रहा है। इन सभी का खेल जाना पहचाना है और अभी हाल ही में दक्षिण अफ्रीका में सबकी असलियत पता लग ही गयी थी। क्रिकेट के कथित भगवान की चाहत है कि एक विश्व कप उसके नाम पर चढ़ जाये पर लगता नहीं है कि पूरी होगी। भारतीय खिलाड़ियों के पास पैसा देश की कंपनियों की वजह से आ रहा है पर उनमें पराक्रम चाहे कितना भी हो रणनीतिक क्षेत्र में उनका ज्ञान शून्य है जबकि आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका की टीमें रणनीति के साथ खोलती  हैं। उसके बाद न्यूजीलैंड, वेस्ट इंडीज और श्रीलंका की टीमें भी कम नहीं है।
बाज़ार और प्रचार प्रबंधक देश में किसी तरह क्रिकेटमय वातवरण बनाना चाहते हैं पर लगता है कि बन नहीं रहा। पहले लोग शिद्दत के साथ इंतजार करते थे वह अब नहीं दिखता। मैच होंगे तो जबरन हर चैनल पर देखने ही पड़ेंगे। अखबार भी रंगे होंगे। इसके बावजूद क्रिकेट के लिये पहले जैसा वातावरण नहीं है।
पाकिस्तान एक आसान लक्ष्य है इसलिये उसके खिलाड़ी दंडित हो गये पर दुनियां के अन्य देशों के खिलाड़ी आरोप लगने और प्रमाण होने के बावजूद बचते रहे हैं। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों को दंडित कर इस क्रिकेट के साफ सुथरे होने के संकेत भारत के लोगों को भेजे गये हैं ताकि वह मैदान पर पैसा खर्च करें और उनके खिलाड़ियों के अभिनीत विज्ञापनों पर नज़र डालें। पाकिस्तान के प्रति में भारतीय लोगों में नाराजगी भी है इसलिये उसका दोहन करने के लिए यहाँ पाकिस्तानी खिलाड़ियों को दंडित कर यहां के दर्शकों को प्रसन्नता देने का भी यह प्रयास लगता है। हम यह नहीं कहते कि ऐसा ही है पर क्रिकेट में अपना दिल और समय लगाया और वह टूट गया तो ऐसा कि मानता ही नहीं कि अब इसमें कुछ साफ सुथरा बचा है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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मंदिर निर्माण के लिये मनोरंजन-व्यंग्य चिंतन लेख (mandir nirman ke liye manoranjan-vyangya chittan lekh)


गुजरात के एक शहर में एक दिलचस्प समाचार टीवी चैनल पर देखने को मिला। वहां एक मंदिर निर्माण में धन जुटाने के लिये नृत्य और संगीत का कार्यक्रम आयोजित किया गया ताकि उससे मिलने वाली राशि से सर्वशक्तिमान को अनुग्रहीत किया जा सके। खबर देखकर तो हंसी आ गयी। वहां कार्यक्रम देखने के लिये अनेक लोग आये पर वह इतनी कम देर चला कि उससे अपने को ठगा अनुभव कर रहे अनेक दर्शक नाराज हो गये और उन्होंने कुर्सियां तोड़ डाली। इस धर्म और मनोरंजन के बीच रिश्ता देखकर बहुत सारे ख्याल मन में आये।
कार्ल मार्क्स की बहुत सारी बातें हमारे समझ में नहीं आती पर उसने जो कहा है कि धर्म एक अफीम की तरह है उसमें कोई शक नहीं है। मगर कार्ल मार्क्स ने कहा है कि दुनियां का सबसे बड़ा सच रोटी है, यही कारण है कि उसका कोई चेला इस बात पर यकीन नहीं करता कि जिसने पेट दिया है वह भोजन भी देता है। इसलिये सभी गरीबों और मज़दूरों को रोटी दिलाने में लगे हैं। मगर सत्य रोटी नहीं जीवन है जो कि अपनी गति से इस धरती पर विचरण करता है भले ही जीव पैदा होने के साथ ही मरते हैं भी हैं पर सभी भूखे नहंी मरते।
अलबत्ता अगर कार्ल मार्क्स भारत आया होता तो वह अनेक अन्य सत्य भी जान जाता। इस देश में रोटी के साथ ही स्वाद भी बड़ा सत्य है। लोग रोटी से अधिक स्वाद पर अपना ध्यान रखते हैं। रोटी पेट भरने के लिये नहीं पेट भरने को ही जीवन मानते हैं। पेट भर कर उनका मन मनोरंजन की तरह भागता है और यह मनोरंजन भी कहीं इतना बड़ा सत्य बन जाता है कि रोटी को भी आदमी भूलकर उसमे मस्त रहता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि गरीबी से जूझ रहे इस देश में भूख से कम बल्कि भरपेट और गंदा खाने से लोग अधिक बीमार पड़ने के साथ ही मरते भी हैं। यही कारण है कि कार्ल मार्क्स के शिष्य तथा अनुयायी बरसों तक इस पूरे देश में भूखों और गरीबों के सहारे सत्ता का स्वाद चखने का सपना पाले रहे पर चंद इलाकों के अलावा कुछ हाथ नहीं आता। धर्म को अफीम मानने वाले इस गुरु के चेले आज की धर्मनिरपेक्षता का स्वांग रच रहे हैं और उसमें अब उनको अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के बीच अपना सपना साकार होता दिखता है। इनमें कई तो सर्वशक्तिमान के एक दरबार ढहने पर अपना विलाप हर साल करते हैं। वैसे रोटी का सत्य ही केवल सत्य नहीं है। रोटी का स्वाद भी सत्य नहीं है। मनोरंजन भी सत्य नहीं है। उनके लिए सत्य केवल धर्मनिरपेक्षता है। बहुसंख्यक समाज के कुछ टुकड़े गरीबी, भुखमरी तथा बेकारी के नाम पर तो वैसे ही उनके साथ हो जाते हैं अब समूचा अल्पसंख्यक समाज भी हाथ आ जाये तो ही उनके सपने पूरे होंगे। यह अलग बात है कि बाबा रामदेव, आसाराम बापू तथा श्री रविशंकर जैसे संगठित धर्म प्रवर्तकों की धारा उसे पूरा होने देगी या नहीं क्योंकि देखा जा रहा है कि अपने धर्मों के पाखंड से उकताये भारतीय लोग एक नयी रौशनी योग तथा भारतीय अध्यात्म में ढूंढ रहे हैं।
इधर इन कार्ल मार्क्स के चेलों का सामना भारतीय धर्म रक्षकों से भी होता रहता है। शक है कि यह सब फिक्सिंग के तहत ही होता है। यह धर्म रक्षक भी वह हैं जो केवल मंदिरों के बनाने तक ही अपना अभियान रखते हैं। उनके लिए मंदिर बनाना ही धर्म निभाना है। ऐसा इसलिये कि मंदिर बनाने में ईंट, पत्थर, सीमेंट, लोहा, लकड़ी तथा अन्य सामान लगता है और उसकी खरीद में कमीशन बनने के साथ ही बाद में चढ़ावा भी आता है। गुजरात में तो धर्म की प्रवृत्ति बहंुत ज्यादा है। हमारे अध्यात्म के आधार स्तंभ भगवान श्रीकृष्ण ने वहीं अपना निवास बनाया था। आज भी अनेक बड़े संत वहीं के हैं। प्रसंगवश हम अनेक बार यह कह चुके हैं कि जिस तरह कमल कीचड़ में और गुलाब कांटों के बीच पनपता है उसी तरह हमारा अध्यात्म ज्ञान इसलिये ही सटीक है क्योंकि हमारे देश में अज्ञान का बोलबाला अधिक रहा है। दुष्टता में रावण और कंस जैसे प्रतापी शायद ही कहीं हुए जिनकी वजह से हम भगवान श्रीकृष्ण के साथ ही भगवान श्रीराम का नायकत्व हम अकेले ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लोग पहचान पाये। लोगों के मन में अज्ञान, लोभ, लालच तथा काम का ऐसा वास है कि वह उससे विरक्त होने पर अध्यात्म शांति के लिये भी उतनी तेजी से भागते हैं और फिर देश के चालाक धार्मिक ज्ञानी उनका दोहन करते हैं। ऐसा भी कहीं विश्व में अन्यत्र होता नहीं दिखता। जिस भारतीय योग को पूरा विश्व बरसों से मान रहा है उसकी मान्यता अब कहीं जाकर बाबा रामदेव के आकर्षण से बड़ी है। कोई येागी भी बिना युद्ध के महान बन सकता है, यही सोचकर योग की तरफ आम लोग आकर्षित हुए हैं। नतीजा यह है कि कहीं, हॉट योग, कहीं सैक्सी योग, कहीं नग्न योग तो कहीं हास्य योग भी होने लगा है। उसे एक नयी शैली में विक्रय वस्तु बना दिया है। मतलब धर्म कहीं न कहीं अफीम या व्यसन की तरह बिकने का काम करता ही है।
गुजरात में जिस जगह मंदिर बनाने के लिये आयोजन किया गया होगा उनकी ईमानदारी या बेईमानी पर हम सवाल नहीं उठा रहे बल्कि उनके चिंतन के तरीके पर ही अपनी राय रख रहे हैं जिसमें यह मान लिया गया है कि जिस तरह इस दुनियां में बिना गलत राह चले बड़ा आदमी नहीं बना जा सकता वैसे ही भगवान का मंदिर बनना भी संभव नहीं है।
हैरानी की बात है कि लोग दान देने की बजाय नृत्य और गीत के लिये पैसा खर्च कर आये-यकीनन उन्होंने सोचा होगा कि इस तरह हम धर्म का काम कर रहे हैं। अब दान लेना भी आसान नहीं रहा न! पहले अनेक स्थानों पर मंदिर बनाने या नवरात्रि और गणेश प्रतिमाओं की स्थापना को लेकर जबरदस्ती चंदा लेने के आरोप लगते थे। अब तो इस देश मे धर्मनिरपेक्षता मय वातावरण बना दिया गया है तो धार्मिक व्यवसायियों ने नृत्य और गीत के माध्यम से धन जुटाने के प्रयास शुरु किये हैं। कहीं गणेशोत्सव और नवरात्रि पर बाकायदा ऐसे कार्यक्रम हुए जिनमें भक्ति दिखावे की थी जिस पर मनोंरजन का लेबल चिपका दिया गया। मतलब भक्तों को अब दर्शक और श्रोता को चोला भी पहनाया जा रहा है।
हम यहां केवल इसके लिये शिखर पुरुषों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। आम लोग भी कम नहीं है। वह भी चाहते हैं कि हम दर्शक और श्रोता की तरह लुत्फ उठायें पर दिखें भक्त की तरह! अध्यात्मिक ज्ञान के बिना यह समाज भटकाव की तरफ जा रहा है।
हम अगर भारतीय अध्यात्म ज्ञान की बात करें तो उसे समझने वाले यहां कितने हैं, यह तय करना कठिन है! वजह यह है कि आदमी के अंदर स्वयं अभिव्यक्त होने की भावना उसे अहंकार की तरफ ले जाती है और अहंकार नैतिक पतन की तरफ! बहुत कम लोग इस बात पर यकीन करेंगे कि योगसाधना भी अगर नियमित की जाये तो वह व्यसन की तरफ चिपक जाती है यह अलग बात है कि वह खतरनाक नहीं है। ध्यान लगाने का अभ्यास हो जाये तो सारी दुनियां में चल रहे घटनाक्रम में स्वयं को देखने की इच्छा से आदमी विरक्त हो जाता है। मगर इससे यह फायदा होता है कि आपको कोई दूसरा संचालित नहंी कर सकता। भटकाव इसलिये नहीं होता क्योंकि अपना लक्ष्य हमेशा अपने पास रहता है जिसे हम कहते हैं मन की शांति! मनोरंजन कभी शांति नहीं देता बल्कि अपने साथ विकारों का ऐसा पिटारा ले आता है कि रात की नींद और दिन का चैन नहीं रह जाता। योग साधक भीड़ में इस बात का अहसास नहीं होने देता कि वह उससे अलग है पर होता तो है। धार्मिक तथा मनोंरजन के व्यवसायी इस कदर चालाक होते हैं कि वह आम इंसानों का अस्तित्व ही उससे अलग कर देते हैं पर योग साधक पर उनका जादू नहीं चलता। यही कारण है कि मनोरंजन और भक्ति को प्रथक रखने की कला वही जानते हैं। यह अलग बात है कि वह भक्ति में ही मनोरंजन करते हैं और बिना अध्यात्मिक ज्ञान के मनोरंजन को वह एक घटिया काम मानते हैं भले ही उसें सर्वशक्तिमान के लिये ढेर सारे निवेदन वाले गीत शामिल हों।
निष्कर्ष यही है कि जिस तरह इस संसार में कार्ल मार्क्स के अनुसार दो ही जातियां हैं एक अमीर और दूसरी गरीब! उसी तरह अपने देश में भी दो प्रकार के मनुष्य रहते हैं एक तो वह सच्चे भक्त हैं और दूसरे महा पाखंडी। मुश्किल यह है कि धर्म की ठेकेदारी अब विशुद्ध रूप से पाखंडियों के हाथ में आ गयी है जिनसे बचने की आवश्यकता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय अध्यात्म के मूल तत्व अत्यंत प्रभावी हैं पर इसके लिये यह जरूरी है कि हम अपने धर्म ग्रंथों का स्वयं अध्ययन करें।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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बाबा रामदेव क्या चमत्कार कर पायेंगे-हिन्दी आलेख (swami ramdev ka bhrashtacha ke viruddhi andolan-hindi lekh)


बाबा रामदेव और किरणबेदी ने मिलकर भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कुछ लोग उनके प्रयासों पर निराश हैं तो कुछ आशंकित! इस समय देश के जो हालात हैं वह किसी से छिपे नहीं हैं क्योंकि भारत का आम आदमी अज़ीब किस्म की दुविधा में जी रहा है। स्थिति यह है कि लोग अपनी व्यथाऐं अभिव्यक्ति करने के लिये भी प्रयास नहीं कर पा रहे क्योंकि नित नये संघर्ष उनको अनवरत श्रम के लिये बाध्य कर देते हैं।
      बाबा रामदेव के आंदोलन में  चंदा लेने के अभियान पर उठेंगे सवाल-हिन्दी लेख (baba ramdev ka andolan aur chanda abhiyan-hindi lekh)
      अंततः बाबा रामदेव के निकटतम चेले ने अपनी हल्केपन का परिचय दे ही दिया जब वह दिल्ली में रामलीला मैदान में चल रहे आंदोलन के लिये पैसा उगाहने का काम करता सबके सामने दिखा। जब वह दिल्ली में आंदोलन कर रहे हैं तो न केवल उनको बल्कि उनके उस चेले को भी केवल आंदोलन के विषयों पर ही ध्यान केंद्रित करते दिखना था। यह चेला उनका पुराना साथी है और कहना चाहिए कि पर्दे के पीछे उसका बहुत बड़ा खेल है।
    उसके पैसे उगाही का कार्यक्रम टीवी पर दिखा। मंच के पीछे भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का पोस्टर लटकाकर लाखों रुपये का चंदा देने वालों से पैसा ले रहा था। वह कह रहा था कि ‘हमें और पैसा चाहिए। वैसे जितना मिल गया उतना ही बहुत है। मैं तो यहां आया ही इसलिये था। अब मैं जाकर बाबा से कहता हूं कि आप अपना काम करते रहिये इधर मैं संभाल लूंगा।’’
          आस्थावान लोगों को हिलाने के यह दृश्य बहुत दर्दनाक था। वैसे वह चेला उनके आश्रम का व्यवसायिक कार्यक्रम ही देखता है और इधर दिल्ली में उसके आने से यह बात साफ लगी कि वह यहां भी प्रबंध करने आया है मगर उसके यह पैसा बटोरने का काम कहीं से भी इन हालातों में उपयुक्त नहीं लगता। उसके चेहरे और वाणी से ऐसा लगा कि उसे अभियान के विषयों से कम पैसे उगाहने में अधिक दिलचस्पी है।
            जहां तक बाबा रामदेव का प्रश्न है तो वह योग शिक्षा के लिये जाने जाते हैं और अब तक उनका चेहरा ही टीवी पर दिखता रहा ठीक था पर जब ऐसे महत्वपूर्ण अभियान चलते हैं कि तब उनके साथ सहयोगियों का दिखना आवश्यक था। ऐसा लगने लगा कि कि बाबा रामदेव ने सारे अभियानों का ठेका अपने चेहरे के साथ ही चलाने का फैसला किया है ताकि उनके सहयोगी आसानी से पैसा बटोर सकें जबकि होना यह चाहिए कि इस समय उनके सहयोगियों को भी उनकी तरह प्रभावी व्यक्तित्व का स्वामी दिखना चाहिए था।
अब इस आंदोलन के दौरान पैसे की आवश्यकता और उसकी वसूली के औचित्य की की बात भी कर लें। बाबा रामदेव ने स्वयं बताया था कि उनको 10 करोड़ भक्तों ने 11 अरब रुपये प्रदान किये हैं। एक अनुमान के अनुसार दिल्ली आंदोलन में 18 करोड़ रुपये खर्च आयेगा। अगर बाबा रामदेव का अभियान एकदम नया होता या उनका संगठन उसको वहन करने की स्थिति में न होता तब इस तरह चंदा वसूली करना ठीक लगता पर जब बाबा स्वयं ही यह बता चुके है कि उनके पास भक्तों का धन है तब ऐसे समय में यह वसूली उनकी छवि खराब कर सकती है। राजा शांति के समय कर वसूलते हैं पर युद्ध के समय वह अपना पूरा ध्यान उधर ही लगाते हैं। इतने बड़े अभियान के दौरान बाबा रामदेव का एक महत्वपूर्ण और विश्वसीनय सहयोगी अगर आंदोलन छोड़कर चंदा बटोरने चला जाये और वहां चतुर मुनीम की भूमिका करता दिखे तो संभव है कि अनेक लोग अपने मन में संदेह पालने लगें।
            संभव है कि पैसे को लेकर उठ रहे बवाल को थामने के लिये इस तरह का आयोजन किया गया हो जैसे कि विरोधियों को लगे कि भक्त पैसा दे रहे हैं पर इसके आशय उल्टे भी लिये जा सकते हैं। यह चालाकी बाबा रामदेव के अभियान की छवि न खराब कर सकती है बल्कि धन की दृष्टि से कमजोर लोगों का उनसे दूर भी ले जा सकती है जबकि आंदोलनों और अभियानों में उनकी सक्रिय भागीदारी ही सफलता दिलाती है। बहरहाल बाबा रामदेव के आंदोलन पर शायद बहुत कुछ लिखना पड़े क्योंकि जिस तरह के दृश्य सामने आ रहे हैं वह इसके लिये प्रेरित करते हैं। हम न तो आंदोलन के समर्थक हैं न विरोधी पर योग साधक होने के कारण इसमें दिलचस्पी है क्योंकि अंततः बाबा रामदेव का भारतीय अध्यात्म जगत में एक योगी के रूप में दर्ज हो गया है जो माया के बंधन में नहीं बंधते।
बाबा स्वामी रामदेव के हम शिष्य नहीं है पर एक योग साधक के नाते उनके अंतर्मन में चल रही साधना के साथ ही विचारक्रम का कुछ आभास है जिसे अभी पूरी तरह से लिखना संभव नहीं है। यहां एक बात बता दें कि आम बुद्धिजीवी चाहे भले ही उनके समर्थक हों इस बात का आभास नहीं कर सकते कि रामदेव बाबा की क्षमता कितनी अधिक है। उनके कथन और दावे अन्य सामान्य कथित महान लोगों से अलग हैं। वही एक व्यक्ति है जो परिणामोन्मुख आंदोलन का नेतृत्व कर सकते हैं और वह भी ऐसा जिसका सदियों तक प्रभावी हो। इससे भी आगे एक बात कहें तो शायद कुछ लोग अतिश्योक्ति समझें कि अगर बाबा रामदेव इस पथ पर चले तो एक समय अपने अंदर भगवान कृष्ण के अस्तित्व का आभास करने लगेंगे जो कि एक पूर्ण योगी के लिये ही संभव है। ऐसा हम इसलिये कह रहे हैं कि परिणाममूलक अभियान का सीधा मतलब है कि हिंसा रहित एक आधुनिक महाभारत का युद्ध! जब वह सारथी की तरह अपने अर्जुनों-मतलब साथियों-के रथ का संचालन करेंगे तब अनेक तरह से वार भी होंगे। यह एक ऐसा युद्ध होगा जिसे कोई पूर्ण योगी ही जितवा सकता है।
हां, एक अध्यात्मिक लेखक के रूप में हमें यह पता है कि अनेक भारतीय विचाराधारा समर्थक भी बाबा रामदेव को एक योग शिक्षक से अधिक महत्व नहीं देते और इसके पीछे कारण यह कि वह स्वयं योग साधक नहीं है। हम भी बाबा रामदेव को योग शिक्षक ही मानते हैं पर यह भी जानते हैं कि योग माता की कृपा से कोई भी शिक्षक महायोगी और महायोद्धा बन सकता हैं।
जो लोग या योग साधक नित बाबा रामदेव को योग शिक्षा देते हुए देखते हैं हैं वह उनके चेहरे, हावभाव, आंखें तथा कपड़ों पर ही विचार कर सकते हैं पर जो उनके अंदर एक पूर्णयोग विद्यमान है उसका आभास नियमित योग साधक को ही हो सकता है।
अब आते हैं इस बात पर कि आखिर बाबा रामदेव जब भ्रष्टाचार के विरुद्ध हिंसा रहित नया महाभारत रचेंगे तब उन पर आक्रमण किस तरह का होगा? उनका बचाव वह किस तरह करेंगे?
हम बाबा रामदेव से बहुत दूर हैं और किसी प्रत्यक्ष सहयोग के नाम पर अगर कुछ धन देना पड़े तो देंगे। कुछ लिखना पड़ा तो लिख देंगे। भारत को महान भारत बनाने के प्रयासों का सदैव हृदय से समर्थन करेंगे पर उनके साथ मैदान में आने वाले कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को यह बता दें कि उनके विरोधियों के पास अधिक हथियार नहीं है-शक्ति तो नाम की भी नहीं है। कभी न बरसने पर हमेशा गरजने वाले बादल समूह हैं भ्रष्टाचार को सहजता से स्वीकार करने वाले लोग! मंचों पर सच्चाई की बात करते हैं पर कमरों में उनको अपना भ्रष्टाचार केवल अपनी आधिकारिक कमाई दिखती है।
अभी तो प्रचार माध्यम उनके आधार पर अपनी सामग्री बनाने के लिये प्रचार खूब कर रहे हैं पर समय आने पर यही बाबा रामदेव के विरुद्ध विष वमन करने वालों को निष्पक्षता के नाम पर स्थान देंगे।
इनमें सबसे पहला आरोप तो पैसा बनाने और योग बेचने का होगा। उनके आश्रम पर अनेक उंगलियां उठेंगी। दूसरा आरापे अपने शिष्यों के शोषण का होगा। चूंकि योगी हैं इसलिये हिन्दू धर्म के कुछ ठेकेदार भी सामने युद्ध लड़ने आयेंगे। पैसा बनाने और योग बेचने के आरोपों का तो बस एक ही जवाब है कि योगी समाज को बनाने और बचाने के लिये माया को भी अस्त्र शस्त्र की तरह उपयोग करते हैं। माया उनकी दासी होती है। समाज उनको अपना भगवान मानता है। जहां तक करों के भुगतान करने या न करने संबंधी विवाद है तो यहां यह भी स्पष्ट कर देना चाहिए कि वह तो धर्म की सेवा कर रहे हैं। अस्वस्थ समाज को स्वस्थ बना रहे हैं जो कि अनेक सांसरिक बातों से ऊपर उठकर ही किया जा सकता-मतलब कि योगी को तो केवल चलना है इधर उधर देखना उसका काम नहीं है। लक्ष्मी तो उसकी दासी है, और फिर जो व्यक्ति, समाज या संस्थायें भ्रष्टाचार को संरक्षण दे रही है वह किस तरह नैतिकता और आदर्श की दुहाई एक योगी को दे सकती हैं?
आखिरी बात यह है कि सच में ही समाज का कल्याण करना है तो धर्म की आड़ लेना बुरा नहीं है। बुरा तो यह है कि अधर्म की बात धर्म की आड़ लेकर की जाये। चलते चलते एक बात कहें जो किसी योगी के आत्मविश्वास और ज्ञान का प्रमाण है वह यह कि बाबा रामदेव के अनुसार भ्रष्टाचार के विरुद्ध किसी एक मामले पर प्रतीक के रूप में काम करना शुरुआत है न कि लक्ष्य! अगर आप योग साधक नहीं हैं तो इस बात का अनुभव नहीं कर सकते कि योग माता की कृपा से ही कोई ऐसी दिव्य दृष्टि पा सकता है जो कि छोटे प्रयासों से संक्षिप्त अवधि में बृहद लक्ष्य की प्राप्ति की कल्पना न करे।
वैसे बाबा रामदेव को भी यह समझना चाहिए कि अगर कुछ जागरुक और सक्रिय लोग उनका समर्थन करने के लिये आगे आयें हैं तो वह उनका सही उपयोग करें। उनका आना वह योगमाता की कृपा का ही परिणाम है जो सभी योग साधकों को नहीं मिलती। योग से जुड़े भी दो प्रकार के लोग होते हैं-एक तो पूर्ण निष्काम योगी जो समाज के लिये कुछ करने का माद्दा रखते हैं दूसरे योग साधक जो केवल अपनी देह, मन तथा विचारों के विकारों के विसर्जन के अधिक कुछ नहीं करते। ऐसे में हम जैसा एक मामूली नियमित योग साधक केवल उनकी लक्ष्य प्राप्ति के लिये योग माता से अधिक कृपा की कामना ही कर सकता है। देखेंगे आगे आगे क्या होता है? बहरहाल उनके समर्थकों के साथ ही आलोचकों को भी बता दें कि एक योगी के प्रयास सामान्य लोगों से अधिक गंभीर और दूरगामी परिणाम देने वाले होते हैं। समर्थकों से कहेंगे कि वह योग साधना अवश्य शुरु करें और आलोचकों से कहेंगे कि पहले यह बताओ कि क्या तुम योग साधना करते हो। अगर नहीं तो यह अपने आप ही तय करो कि क्या तुम्हें उनकी आलोचना का हक है? भारत का नागरिक और योग साधक होने के नाते हमारी बाबा रामदेव के ंव्यक्तित्व और कृतित्व में हमेशा रुचि रही है और रहेगी।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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भ्रष्टाचार के विरुद्ध अभियान,आंदोलन,bhrashtachar ke virddh andolan,abhiyan,prayas
बाबा रामदेव क्या नया महाभारत रच पायेंगे-हिन्दी लेख (baba ramdev aur naya mahabharat-hindi lekh)

असली झगड़ा, नकली इंसाफ-हिन्दी व्यंग्य और कविता (asli jhagad aur nakli insaf-hindi vyangya aur kavita)


टीवी पर सुनने को को मिला कि इंसाफ नाम का कोई वास्तविक शो चल रहा है जिसमें शामिल हो चुके एक सामान्य आदमी का वहां हुए अपमान के कारण निराशा के कारण निधन हो गया। फिल्मों की एक अंशकालिक नर्तकी और गायिका इस कार्यक्रम का संचालन कर रही है। मूलतः टीवी और वीडियो में काम करने वाली वह कथित नायिका अपने बिंदास व्यवहार के कारण प्रचार माध्यमों की चहेती है और कुछ फिल्मों में आईटम रोल भी कर चुकी है। बोलती कम चिल्लाती ज्यादा है। अपना एक नाटकीय स्वयंवर भी रचा चुकी है। वहां मिले वर से बड़ी मुश्किल से अपना पीछा छुड़ाया। अब यह पता नहीं कि उसे विवाहित माना जाये, तलाकशुदा या अविवाहित! यह उसका निजी मामला है पर जब सामाजिक स्तर का प्रश्न आता है तो यह विचार भी आता है कि उस शादी का क्या हुआ?
बहरहाल इंसाफ नाम के धारावाहिक में वह अदालत के जज की तरह व्यवहार करती है। यह कार्यक्रम एक सेवानिवृत महिला पुलिस अधिकारी के कचहरी धारावाहिक की नकल पर बना लगता है पर बिंदास अभिनेत्री में भला वैसी तमीज़ कहां हो सकती है जो एक जिम्मेदार पद पर बैठी महिला में होती है। उसने पहले तो फिल्म लाईन से ही कथित अभिनय तथा अन्य काम करने वाले लोगों के प्रेम के झगड़े दिखाये। उनमें जूते चले, मारपीट हुई। गालियां तो ऐसी दी गयीं कि यहां लिखते शर्म आती है।
अब उसने आम लोगों में से कुछ लोग बुलवा लिये। एक गरीब महिला और पुरुष अपना झगड़ा लेकर पहुंच गये या बुलाये गये। दोनों का झगड़ा पारिवारिक था पर प्रचार का मोह ही दोनों को वहां ले गया होगा वरना कहां मुंबई और कहां उनका छोटा शहर। दोनों ने बिंदास अभिनेत्री को न्यायाधीश मान लिया क्योंकि करोड़ों लोगों को अपना चेहरा दिखाना था। इधर कार्यक्रम करने वालों को भी कुछ वास्तविक दृश्य चाहिये थे सो बुलवा लिया।
जब झगड़ा था तो नकारात्मक बातें तो होनी थी। आरोप-प्रत्यारोप तो लगने ही थे। ऐसे में बिंदास या बदतमीज अभिनेत्री ने आदमी से बोल दिया‘नामर्द’।
वह बिचारा झैंप गया। प्रचार पाने का सारा नशा काफूर हो गया। कार्यक्रम प्रसारित हुआ तो सभी ने देखा। अड़ौस पड़ौस, मोहल्ले और शहर के लोग उस आदमी को हिकारत की नज़र से देखने लगे। वह सदमे से मरा या आत्महत्या की? यह महत्वपूर्ण नहंी है, मगर वह मरा इसी कारण से यह बात सत्य है। पति पत्नी दोनों साथ गये या अलग अलग! यह पता नहीं मगर दोनों गये। घसीटे नहीं गये। झगड़ा रहा अलग, मगर कहीं न कहीं प्रचार का मोह तो रहा होगा, वरना क्या सोचकर गये थे कि वहां से कोई दहेज लेकर दोबारा अपना घर बसायेंगे?
छोटे आदमी में बड़ा आदमी बनने का मोह होता है। छोटा आदमी जब तक छोटा है उसे समाज में बदनामी की चिंता बहुत अधिक होती है। बड़ा आदमी बेखौफ हो जाता है। उसमें दोष भी हो तो कहने की हिम्मत नहीं होती। कोई कहे भी तो बड़ा आदमी कुछ न कहे उसके चेले चपाटे ही धुलाई कर देते हैं। यही कारण है कि प्रचार के माध्यम से हर कोई बड़ा बनना या दिखना चाहता है। ऐसे में विवादास्पद बनकर भी कोई बड़ा बन जाये तो ठीक मगर न बना तो! ‘समरथ को नहीं दोष, मगर असमर्थ पर रोष’ तो समाज की स्वाभविक प्रवृत्ति है।
एक मामूली दंपत्ति को क्या पड़ी थी कि एक प्रचार के माध्यम से कमाई करने वाले कार्यक्रम में एक ऐसी महिला से न्याय मांगने पहुंचे जो खुद अभी समाज का मतलब भी नहीं जानती। इस घटना से प्रचार के लिये लालायित युवक युवतियों को सबक लेना चाहिए। इतना ही नहीं मस्ती में आनंद लूटने की इच्छा वाले लोग भी यह समझ लें कि यह दुनियां इतनी सहज नहीं है जितना वह समझते हैं।
प्रस्तुत है इस पर एक कविता
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घर की बात दिल ही में रहे
तो अच्छा है,
जमाने ने सुन ली तो
तबाही घर का दरवाज़ा खटखटायेगी,
कोई हवा ढूंढ रही हैं
लोगों की बरबादी का मंजर,
दर्द के इलाज करने के लिये
हमदर्दी का हाथ में है उसके खंजर,
जहां मिला अवसर
चमन उजाड़ कर जश्न मनायेगी।
——

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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घर की बात दिल में ही रहे-हिन्दी व्यंग्य और शायरी (ghar ki baat dil mein rah-hindi vyangya aur shayri)

आदर्श के नाम पर समाज सेवा-हिन्दी हास्य व्यंग्य कविता (adrash ke nam par samaj seva-hindi hasya vyangya kavita)


आया फंदेबाज और बोला
‘‘दीपक बापू मेरे बेरोजगार भतीजे को
समाज सेवा करने का ख्याल आया है,
यह ज्ञान उसने जेल में बंद अपने गुरु से पाया है,
उसने बताया कि
वह एक सहायता समिति बनायेगा,
अब जनता में अपनी समाज सेवक की तरह छायेगा,
अभी दीपावली के अवसर पर
नकली खोये और
गंदी बनी मिठाईयां खाकर
बहुत लोग बीमार पड़ेंगे,
कुछ पटाखों से घायल होकर
अस्पताल का रुख करेंगे,
उनको वह सहायता प्रदान करेगा,
इसके लिये वह जनता से
पैसा लेकर
हताहतों के जख्म भरेगा,
बस,
समस्या यह है कि वह
उस संस्था का नाम क्या रखे
इसको लेकर विचार कर रहा है,
आया था मेरे पास पूछने
पर अपनी संस्था के काम का प्रचार कर रहा है,
आप ही बताओ कोई शुभ नाम,
कर दो बस, इतना काम,
मेरा भतीजा हमेशा आपका आभार जतायेगा।’’

सुनकर कहैं दीपक बापू
‘‘कमबख्त तुम्हारें कुनबे ने भी
कभी समाज सेवा की है,
जहां मिला वही मेवा की लूट की है,
जहां तक नाम का सवाल है,
उस पर यह कैसा बवाल है,
आदर्श या चरित्र निर्माण जैसा नाम रखकर,
मिठाई का टुकड़ा चखकर,
शुरु कर दो समाज सेवा का काम,
बस,
एक बात याद रखना,
सारा चंदा स्वयं ही चखना,
तुम्हारे कुनबे का भला क्या दोष,
ज़माना आदर्श के नाम पर लूट रहा
इसलिये आम इंसानों में है रोष,
बात जितनी आदर्श की बढ़ती जा रही है,
उतनी ही नैतिकता नीचे आ रही है,
बन गया है भ्रष्टाचार,
ताकतवार आदमी का शिष्टाचार,
आदर्श बनकर कर रहे हैं
वही समाज का चरित्र निर्माण,
जिनमें नहीं है पवित्रता का प्राण,
कोई फर्क नहीं पड़ेगा
अगर तुम्हारा भतीजा
आदर्श समाज सेवा समिति बनायेगा,
चलो एक बेरोगजार काम पर लग जायेगा,
जिनके पास दौलत है
वही आम इंसान को लूट रहे हैं,
अपराध से सराबोर हैं
वही निर्दोष कहलाकर छूट रहे हैं,
सर्वशक्तिमान ने चाहा तो
तुम्हारा भतीजा किसी घोटाले फंसकर
किसी बड़े पद पर चढ़ जायेगा।’’
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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भारत में हिन्दीः आम और खास वर्ग की अलग अलग पहचान करती भाषा-हिन्दी लेख (comman and special class of hindi in india-hindi lekh)


भारत की खिल्ली उड़ाने वाले विदेशी लोग इसे ‘‘साधुओं और सपेरों का देश कहा करते थे। भारत के बाहर प्रचार माध्यम इसी पहचान को बहुत समय आगे बढ़ाते रहे पर जिन विदेशियों ने उस समय भी भारत देखा तो पाया कि यह केवल एक दुष्प्रचार मात्र था। हालांकि अब ऐसा नहीं है पर अतीत की छबि अभी कई जगह वर्तमान स्वरूप में विद्यमान दिखाई देती है। इससे एक बात तो मानी जा सकती कि आधुनिक प्रचार माध्यमों के -टीवी, समाचार पत्र पत्रिकाऐं- अधिकतर कार्यकर्ता जनमानस में अपनी बात स्थापित करने में बहुत सक्षम है। इसी क्षमता का लाभ उठाकर वह अनेक तरह के भ्रम मी सत्य के रूप में स्थापित कर सकते हैं और अनेक लोग तो करते ही हैं। इस साधु और सपेरों की छबि से देश मुक्त हुआ कि पता नहीं पर वर्तमान में भी भारत की छबि को लेकर अनेक प्रकार के अन्य भ्रम यही प्रचार माध्यम फैलाते हैं और जिनका प्रतिकार करना आवश्यक है।
अगर हम इस पर बहस करेंगे तो पता नहीं कितना लंबा लिखना पड़ेगा फिर यह भी तय नहीं है कि बहस खत्म होगी कि नहीं। दूसरा प्रश्न यह भी है कि यह प्रचार माध्यम कार्यकर्ता कहीं स्वयं ही तो मुगालतों में नहीं रहते। पता नहीं बड़े शहरों में सक्रिय यह प्रचार माध्यम कर्मी इस देश की छबि अपने मन की आंखों से कैसी देखते हैं? मगर इतना तय है कि यह सब अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से संपन्न है और यहां की अध्यात्मिक ताकत को नहीं जानते इसलिये अध्यात्म की सबसे मज़बूत भाषा हिन्दी का एक तरह से मज़ाक बना रहे हैं और यह मानकर चल रहे हैं कि उनके पाठक, दर्शक तथा श्रोता केवल कान्वेंट पढ़े बच्चे ही हैं या फिर केवल वही उनके अभिव्यक्त साधनों के प्रयोक्ता हैं। मज़दूर गरीब, और ग्रामीण परिवेश के साथ ही शहर में हिन्दी में शिक्षित लोगों को तो केवल एक निर्जीव प्रयोक्ता मानकर उस पर अंग्रेजी शब्दों का बोझ लादा जा रहा है।
अनेक समाचार पत्र पत्रिकाऐं अंग्रेजी भाषा के शब्द देवनागरी लिपि के शब्द धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रहे हैं-कहीं तो कहीं तो शीर्षक के रूप में पूरा वाक्य ही लिख दिया जाता है। यह सब किसी योजना के तहत हो रहा है इसमें संशय नहीं है और यह भी इस तरह की योजना संभवत तीन साल पहले ही तैयार की गयी लगती है जिसे अब कार्यरूप में परिवर्तित होते देखा जा रहा है।
अंतर्जाल पर करीब तीन साल पहले एक लेख पढ़ने में आया था। जिसमें किसी संस्था द्वारा रोमन लिपि में हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को लिखने के लिये प्रोत्साहन देने की बात कही गयी थी। उसका अनेक ब्लाग लेखकों ने विरोध किया था। उसके बाद हिन्दी भाषा में विदेशी शब्द जोड़ने की बात कही गयी थी तो कुछ ने समर्थन तो कुछ ने विरोध किया था। उस समय यह नहीं लगा था कि ऐसी योजनायें बनाने वाली संस्थायें हिन्दी में इतनी ताकत रखती हैं कि एक न एक दिन उनकी योजना ज़मीन पर रैंगती नज़र आती हैं। अब यह बात तो साफ नज़र आ रही है कि इन संस्थाओं में व्यवसायिक लोग रहते हैं जो कहीं न कहीं से आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक शक्ति प्राप्त कर ही आगे बढ़ते हैं। प्रत्यक्षः वह बनते तो हिन्दी के भाग्य विधाता हैं पर वह उनका इससे केवल इतना ही संबंध रहता है कि वह अपने प्रयोजको को सबसे अधिक कमा कर देने वाली इस भाषा में निरंतर सक्रिय बनाये रखें। यह उन लोगों के भगवान पिता या गॉड फादर बन जाते हैं जो हिन्दी से कमाने आते हैं। यह उनको सिफारिशें कर अपने प्रायोजकों के साथ जोड़ते हैं-आशय यह है कि टीवी, समाचार पत्र पत्रिकाओं तथा रेडियो में काम दिलाते होंगे। हिन्दी भाषा से उनका कोई लेना देना नहीं है अलबत्ता कान्वेंट मे शिक्षित  लोगों को वह हिन्दी में रोजगार तो दिला ही देते होंगे ऐसा लगता है। यही कारण है कि इतने विरोध के बावजूद देश के पूरे प्रचार माध्यम धड़ल्ले से इस कदर अंग्रेजी के शब्द जोड़ रहे हैं कि भाषा का कबाड़ा हुए जा रहा है। अब हिन्दी दो भागों में बंटती नज़र आ रही है एक आम आदमी की दूसरी खास लोगों की भाषा।
हिन्दी के अखबार पढ़ते हुए तो अपने ही भाषा ज्ञान पर रोना आता है। ऐसा लगता है कि हिन्दी भाषी होने का अपमान झेल रहे हैं। इससे भी ज्यादा इस बात की हैरानी कि आम आदमी के प्रति ऐसी उपेक्षा का भाव यह व्यवसायिक संस्थान कैसे रख रहे हैं। सीधी बात कहें तो देश का खास वर्ग और उसके वेतनभोगी लोग समाज से बहुत दूर हो गये हैं। यह तो उनका मुगालता ही है कि वह समाज या हिन्दी को अपने अनुरूप बना लेंगें क्योंकि इस देश का आधार अब भी गरीब, मज़दूर और आम व्यवसायी है जिसके सहारे हिन्दी भाषा जीवीत है। जिस विकास की बात कर रहे हैं वह विश्व को दिखाने तक ही ठीक हैं। उस विकास को लेकर देश के प्रचार माध्यम झूम रहे हैं उसकी अनुभूति इस देश का आम आदमी कितनी करता है यह देखने की कोशिश नहंी करते। उनसे यह अपेक्षा करना भी बेकार है क्योंकि उनकीभाषा आम आदमी के भाव से मेल नहीं खाती। वह साधु सपेरों वाले देश को दृष्टि तथा वाणी से हीन बनाना चाहते हैं। अपनी भाषा के विलुप्तीकरण में अपना हित तलाश रहे लोगों से अपेक्षा करना ही बेकार है कि वह हिन्दी भाषा के सभ्य रूप को बने रहने देंगे।
हिन्दी के कथित विकास के लिये बनी संस्थाओं में सक्रिय बुद्धिजीवी भाषा की दृष्टि से कितने ज्ञाता हैं यह कहना कठिन है अलबत्ता कहीं न कहीं अंग्रेजी के समकक्ष लाने के दावे वह जरूर करते हैं। दरअसल ऐसे बुद्धिजीवी कई जगह सक्रिय हैं और हिन्दी भाषा के लिये गुरु की पदवी भी धारण कर लेते हैं। उनकी कीर्ति या संपन्नता से हमें कोई शिकायत नहीं है पर इतना तय है कि व्यवसायिक संस्थानों के प्रबंधक उनकी मौजूदगी इसलिये बनाये रखना चाहते हैं कि उनको अपने लिये हिन्दी कार्यकर्ता मिलते रहें। मतलब हिन्दी के भाग्य विधाता हिन्दी के व्यववायिक जगत और आम प्रयोक्ता के बीच मध्यस्थ का कार्य करते हैं। इससे अधिक उनकी भूमिका नहीं है। ऐसे में नवीन हिन्दी कार्यकर्ता रोजगार की अपेक्षा में उनको अपना गुरु बना लेते हैं।
ऐसे प्रयासों से हिन्दी का रूप बिगड़ेगा पर उसका शुद्ध रूप भी बना रहेगा क्योंकि साधु और सपेरे तो वही हिन्दी बोलेंगे और लिखेंगे जो आम आदमी जानता हो। हिन्दी आध्यात्म या अध्यात्म की भाषा है। अनेक साधु और संत अपनी पत्रिकायें निकालते हैं। उनके आलेख पढ़कर मन प्रसन्न हो जाता है क्योंकि उसमें हिन्दी का साफ सुथरा रूप दिखाई देता है। अब तो ऐसा लगने लगा है हिन्द समाचार पत्र पत्रिकाऐं पढ़ने से तो अच्छा है कि अध्यात्म पत्रिकायें पढ़कर ही अपने हिन्दी भाषी होने का गर्व महसूस किया जाये। अखबार में भी वही खबरें पढ़ने लायक दिखती हैं जो भाषा और वार्ता जैसी समाचार एजेंसियों से लेकर प्रस्तुत की जाती है। स्थानीय समाचारों के लिये क्योंकि स्थानीय पत्रकार होते हैं इसलिये उनकी हिन्दी भी ठीक रहती है मगर आलेख तथा अन्य प्रस्तुतियां जो कि साहित्य का स्त्रोत होती हैं अब अंग्रेजीगामी हो रही हैं और ऐसे पृष्ठ देखने का भी अब मन नहीं करता। एक बात तो पता लग गयी है कि हिन्दी भाषा के लिये सक्रिय एक समूह ऐसा भी है जो दावा तो हिन्दी के हितैषी होने का है पर वह मन ही मन झल्लाता भी है कि अंग्रेजी में छपकर भी वह आम आदमी से दूर है इसलिये वह हिन्दी भाषा प्रचार माध्यमों में छद्म रूप लेकर घुस आया है। अंग्रेजी की तरह हिन्दी को वैश्विक भाषा बनाने का उसका इरादा केवल तात्कालिक आर्थिक हित प्राप्त करना ही है। वह हिन्दी का महत्व नहींजानता क्योकि आध्यात्मिक ज्ञान से परे हैं। हिन्दी वैश्विक स्तर पर अपने अध्यात्मिक ज्ञान शक्ति के कारण ही बढ़ेगी न कि सतही साहित्य के सहारे। ऐसे में हिन्दी की चिंदी करने वालों को केवल इंटरनेट के लेखक ही चुनौती दे सकते हैं पर मुश्किल यह है कि उनके पास आम पाठक का समर्थन नहीं है। 
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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यह कविता/आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की अभिव्यक्ति पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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दशहराःरावण के नये रूप महंगाई, भ्रष्टाचार, और बेईमानी से लड़ना आवश्यक-हिन्दी लेख (ravan ke naye roop-hindi lekh


आज पूरे देश में त्रेतायुग में श्री राम की रावण पर युद्ध के समय हुई विजय के रूप में मनाये जाने वाले दशहरा पर्व की धूम मची हुई है। एक दिन के लिये खुशी से मनाये जाने वाले इस पर्व के मायने बहुत हैं यह अलग बात है कि लोग इसे समझना नहीं चाहते। दरअसल भगवान श्री राम और रावण दो ऐसे व्यक्तित्व थे जो अपने समय में सर्वाधिक शक्तिशाली और पराक्रमी माने जाते थे पर इसके बावजूद भगवान श्रीराम को अच्छाई तथा रावण को बुराई का प्रतीक माना जाता है। रावण के बारे तो कहा जाता है कि उसमें विद्वता कूट कूट कर भरी हुई थी। जहां तक उसकी धार्मिक प्रवृत्ति का सवाल है तो उसने भगवान शिव की तपस्या कर ही अमरत्व का वरदान प्राप्त किया था। इसका मतलब यह है कि कम से कम वह भगवान शिव का महान भक्त था और वह उसके आराध्य देव थे जिनको आज भी भारतीय समाज बहुत मानता है। आखिर रावण में क्या दुर्गुण थे इस पर अवश्य विचार करना चाहिये क्योंकि कहीं न कहीं हम उनकी समाज में उपस्थिति देखते हैं और तब अनेक लोग रावण तुल्य लगते हैं।
अमरत्व के वरदान ने रावण के मन में अहंकार का भाव स्थापित कर दिया था। वह अपने अलावा अन्य सभी पूजा पद्धतियों का विरोधी था। उसे लगता था कि केवल तपस्या के अलावा अन्य सब पूजा पद्धतियां व्यर्थ है और वह यज्ञ और हवन का विरोधी था। दूसरा वह यह भी कि वह नहीं चाहता था कोई दूसरा तप या स्वाध्याय कर उस जैसा शक्तिशाली हो जाये। इसलिये ही उसने वनों में रहने वाले ऋषियों, मुनियों तथा तपस्वियों के साथ उस समय के अनेक समृद्ध राजाओं को भी सताया था। देवराज इंद्र तक उससे आतंकित थे। वह यज्ञ और हवन करने वाले स्थानों पर उत्पात मचाने के लिये अपने अनुचर नियुक्त करता था जिनमें सुबाहु और मारीचि के साथ भगवान श्रीराम की मुठभेड़ ऋषि विश्वमित्र के आश्रम पर हुई थी। दरअसल यहीं से ही भगवान श्रीराम की शक्ति का परिचय तत्कालीन रावण विरोधी रणनीतिकारों को मिला जिससे वह भगवान श्री राम का रावण से युद्ध कराने के लिये जुट गये तो साथ ही रावण को भी यह संदेश गया कि अब उसका पतन सन्निकट है। जो लोग सीताहरण को ही भगवान श्रीराम और रावण का कारण मानते हैं वह अन्य घटनाओं पर विचार नहंीं करते। रावण ने श्रीसीता का हरण केवल भगवान श्रीराम को अपने राज्य में लाकर उनको मारने के लिये किया था। सूपर्णखा का नाक कान कटना भी भगवान श्रीराम के द्वारा रावण को चुनौती भेजने जैसा ही था।
एक भारतीय उपन्यासकार कैकयी को खलनायिका मानने की बजाय तत्कालीन कुशल रणनीतिकारों में एक मानते हैं। इसका कारण यह है कि वह स्वयं एक युद्ध विशारद होने के साथ ही कुशल सारथी थी। उसे एक युद्ध में राजा दशरथ के घायल होने पर उनका रथ स्वयं दूर ले जाकर उनको बचाया था जिसके एवज में तीन वरदान देने का वादा पति से प्राप्त किया जो अंततः भगवान श्रीराम के वनवास तथा भरत का राज्य मांगने के रूप में प्रकट हुए। रावण के समय में देवराज इंद्र उसके पतन के लिये बहुत उत्सुक थे। कैकयी को राम के वनवास के लिये उकसाने वाली मंथरा भी शायद इसलिये अयोध्या आयी थी। संभवत उसे देवताओं ने ही कैकयी को भड़काने या संदेश देने के लिये भेजा था जबकि प्रकटतः बताया जाता है कि सरस्वती देवी ने मंथरा की बुद्धि हर ली थी। कहा जाता है कि श्रीराम कके वनवास के बाद मंथरा फिर अयोध्या में नहीं दिखी जो इस बात का प्रमाण है कि वह केवल इसी काम के लिये आयी थी और कहीं न कहीं उस समय के धार्मिक रणनीतिकारों के दूत या गुप्तचर के रूप में उसने काम किया था। कैकयी स्वयं एक युद्ध और रणनीतिकविशारद थी इसलिये जानती थी कि ऋषि विश्वमित्र के आश्रम पर सुबाहु के वध और मारीचि के भाग जाने के परिणाम से रावण नाखुश होगा और वह भगवान श्रीराम से कभी न कभी लड़ेगा। ऐसे में अयोध्या में संकट न आये और भगवान श्रीराम सामर्थ्यवान होने के कारण राजधानी से दूर जाकर उसका वध करें इसी प्रयोजन से उसने भगवान श्रीराम को वन भेजने का वर मांगा होगा। रावण के विद्वान और आदर्शवादी होने की बात कैकयी जानती होंगी पर उनको यह अंदाज बिल्कुल नहीं रहा होगा कि वह श्रीसीता का हरण जैसा जघन्य कार्य करेगा। जब कैकयी भगवान श्री राम को वनवास का संदेश दे रही थीं तब वह मुस्करा रहे थे। इससे ऐसा लगता है वह सारी बातें समझ गये थे। इतना ही नहीं भगवान श्रीराम ने हमेशा ही अपने भाईयों को कैकयी का सम्मान करने का आदेश दिया जो इस बात को समझते थे कि वह अयोध्या के हितार्थ एक रणनीति के तहत स्वयं काम रही हैं या उनको प्रेरित किया जा रहा है। जब कैकयी ने भगवान श्रीराम और श्री लक्ष्मण के साथ श्रीसीता को भी वल्कल वस्त्र पहनने को लिये दिये तब वहां उपस्थिति पूरा जनसमुदाय हाहाकार कर उठा। दशरथ गुस्से में आ गये पर कैकयी का दिल नहीं पसीजा। इस घटना से पूर्व तक कैकयी को एक सहृदय महिला माना जाता था। उसकी क्रूरता का एक भी उदाहरण नहीं मिलता। तब यकायक क्या हो गया? कैकयी क समर्थन करने वाले यह भी सवाल उठाते हैं कि उसने 14 वर्ष की बजाय जीवन भर का वनवास क्यों नहीं मांगा क्योंकि भगवान श्रीराम 14 वर्ष बाद तो और अधिक बलशाली होने वाले थे। वनवास जाते समय तो नवयुवक थे और बाद में भी उनके बाहुबल और पराक्रम के साथ ही अनुभव में वृद्धि की संभावना थी। ऐसे में कैकयी जैसी बुद्धिमान महिला यह सोच भी नहीं सकती थी कि 14 वर्ष बाद राम अयोध्या का राज्य पुनः प्राप्त करने लायक नहीं रहेंगें।
कैकयी जानती थी कि देवता, ऋषि गण, तथा मुनि लोग भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध की संभावनाऐं ढूंढ रहे हैं। उन सभी के रणनीतिकार रावण के पतन के लिये भगवान श्रीराम की तरफ आंख लगाये बैठे हैं। ऐसे में भगवान श्रीराम अगर अयोध्या में राज सिंहासन पर बैठेंगे तो चैन से नहीं रह पायेंगे और इससे प्रजा पर भी कष्ट आयेगा। फिर रावण वध उस समय के सभी राजाओं की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी और प्रमुख होने के कारण अयोध्या पर ही इसका दारोमदार था।
जब वनवास में भगवान श्री राम अपने भ्राता लक्ष्मण और सीता के साथ अगस्त्य ऋषि के आश्रम पर आये तो देवराज इंद्र उनको देखकर चले गये जो संभावित राम रावण युद्ध पर ही विचार करने वहां आये थे। वहीं अगस्त्य ऋषि ने उनको अलौकिक धनुष दिया जिससे रावण का वध हुआ।
अपने यज्ञ की रक्षा करने के लिये जब ऋषि विश्वमित्र भगवान श्रीराम का हाथ मांगने दशरथ की दरबार में पहुंचे तो उनका पिता हृदय सौंपने को तैयार नहीं हुआ। तब गुरु वशिष्ठ ने उनको समझाया तब कहीं दशरथ ने भगवान श्रीराम को ऋषि विश्व मित्र के साथ भेजा। यहां यह भी याद रखना चाहिए कि गुरु वशिष्ट ने विश्वमित्र ने अपनी पुरानी शत्रुता को इसलिये भुला दिया था क्योंकि उस समय समाज में रावण का संकट विद्यमान था जिसका निवारण आवश्यक था। इस तरह भगवान शिव की तपस्या से अवध्य हो चुके रावण की भूमिका तैयार हुई थी।
इससे एक संदेश मिलता है कि राज्य और समाज के उत्थान और रक्षा के लिये दूरगामी अभियान बनाने पड़ते हैं जिनके परिणाम में बरसो लग जाते हैं। केवल नारों और धर्म की रक्षा के लिये हिंसक संघर्ष का भाव रखने से काम नहीं चलता। दूसरी बात यह भी कि ऋषि विश्वमित्र, अगस्त्य, वशिष्ठ, भारद्वाज मुनि तथा अन्य अपने तपबल से रावण का अस्त्र शस्त्रों के साथ ही शाप देकर भी संहार करने में समर्थ थे पर तपस्या के कारण अहिंसक प्रवृत्ति के चलते उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनको रावण वध या पतन से मिलने वाली प्रतिष्ठा का लोभ नहीं था और उन्होंने उस समय के महान धनुर्धर भगवान श्रीराम को इस कार्य के लिये चुनकर समाज के लिये एक आदर्श के रूप में प्रतिष्ठत करने का रावण वध के साथ ही दूसरा अभियान प्रारंभ कर उसे पूरा किया जिसमें उस समय के देवराज इंद्र जैसे समृद्ध और पराक्रमी पुरुषों का भी सहयोग मिला। सीधी बात यह है कि ऐसे अभियानों के लिये नेता के रूप में एक शीर्षक मिल जाता है पर आवश्यक यह है कि उसके लिये सामूहिक प्रयास हों।
दशहरे पर रावण का पुतला जलाना अब कोई खुशी की बात नहीं रही। भ्रष्टाचार, बेईमानी, मिलावट, तथा महंगाई के रूप में यह रावण अब अनेक सिर लेकर विचर रहा है। इनसे लड़ने के लिये हर भारतीय में विवेक, संतोष, तथा सहकारिता के भाव का होना जरूरी है। अब बुद्धि को धनुष, विचार को तीर तथा संकल्प को गदा की तरह साथ रखना होगा तभी अब अदृश्य रूप से विचर रहे रावण के रूपों का संहार किया जा सकता है।
इस दशहरे के अवसर इसी पाठ के साथ इस ब्लाग लेखक के मित्र ब्लाग लेखकों तथा पाठकों इस पर्व की ढेर सारी बधाई। उनका भविष्य मंगलमय हो यही हमारी कामना है।
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लेखक संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior, madhyapradesh
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याद्दाश्त और ज़िंदगी-हिन्दी कविता (yaddashta aur zindagi-hindi poem)


अवसाद के क्षण भी बीत जाते हैं,
जब मन में उठती हैं खुशी की लहरें
तब भी वह पल कहां ठहर पाते हैं,
अफसोस रहता है कि
नहीं संजो कर रख पाये
अपने गुजरे हुए वक्त के सभी दृश्य
अपनी आंखों में
हर पल नये चेहरे और हालत
सामने आते हैं,
छोटी सी यह जिंदगी
याद्दाश्त के आगे बड़ी लगती है
कितनी बार हारे, कितनी बार जीते
इसका पूरा हिसाब कहां रख पाते हैं।
———-

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राम मंदिर पर अदालत का फैसला स्वागत योग्य-हिन्दी लेख (ayodhya ke ram mandir par adalat ka faisla-hindi lekh)


अंततः अयोध्या में राम जन्मभूमि पर चल रहे मुकदमे पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला बहुप्रतीक्षित फैसला आ ही गया। तीन जजों की खण्डपीठ ने जो फैसला दिया वह आठ हज़ार पृष्ठों का है। इसका मतलब यह है कि इस फैसले में लिये हर तरह के पहलू पर विचार करने के साथ ही हर साक्ष्य का परीक्षण भी किया गया होगा। तीनों माननीय न्यायाधीशों ने निर्णय लिखने में बहुत परिश्रम करने के साथ ही अपने विवेक का पूरा उपयोग किया इस बात में कोई संदेह नहीं है। फैसले से प्रभावित संबंधित पक्ष अपने अपने हिसाब से इसके अच्छे और बुरे होने पर विचार कर आगे की कार्यवाही करेंगे क्योंकि अभी सवौच्च न्यायालय का भी दरवाजा बाकी है। यह अलग बात है कि सभी अगर इस फैसले से संतुष्ट हो गये तो उच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार ही काम करेंगे।
इस फैसले से पहले जिस तरह देश में शांति की अपीलें हुईं और बाद में भी उनका दौर जारी है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि धार्मिक संवेदशीलता के मामले में हमारा देश शायद पूरे विश्व में एक उदाहरण है। सुनने में तो यह भी आया है कि इस ज़मीन पर विवाद चार सौ वर्ष से अधिक पुराना है। साठ साल से अब अदालत में यह मामला चल रहा था। पता नहंी इस दौरान कितने जज़ बदले तो कई रिटायर हो चुके होंगे। प्रकृति का नियम कहें या सर्वशक्तिमान की लीला जिसके हाथ से जो काम होना नियत है उसी के हाथ से होता है।
टीवी चैनलों के अनुसार तीनों जजों ने एक स्वर में कहा-‘रामलला की मूर्तियां यथा स्थान पर ही रहेंगी।’
अलबत्ता विवादित जमीन को संबंधित पक्षों  में तीन भागों में बांटने का निर्णय दिया गया है। इस निर्णय के साथ ही कुछ अन्य विषयों पर भी माननीय न्यायाधीशों के निर्णय बहुमत से हुए हैं पर मूर्तियां न हटाने का फैसला सर्वसम्मत होना अत्यंत महत्वपूर्ण तो है ही, इस विवाद को पटाक्षेप करने में भी सहायक होगा।
चूंकि यह फैसला सर्वसम्मत है इसलिये अगर सवौच्च न्यायालय में यह मामला जाता है तो वहां भी यकीनन न्यायाधीश इस पर गौर जरूर फरमायेंगे.ऐसा पिछले मामलों में देखा गया है यह बात कानूनी विशेषज्ञ कहते हैं। वैसे ऐसे मामलों पर कानूनी विशेषज्ञ ही अधिक बता सकते हैं पर इतना तय है कि अब अगर दोनों पक्ष न्यायालयों का इशारा समझ कर आपस में समझ से एकमत होकर देशहित में कोई निर्णय लें तो बहुत अच्छा होगा।
निर्मोही अखाड़ा एक निजी धार्मिक संस्था है और उसका इस मामले में शामिल होना इस बात का प्रमाण है कि अंततः यह विवाद निजी व्यक्तियों और संस्थाओं के बीच था जिसे भगवान श्रीराम के नाम पर संवदेनशील बनाकर पूरे देश में प्रचारित किया गया। बरसों से कुछ लोग दावा करते हैं कि भगवान श्री राम के बारे में कहा जा रहा है कि वह हम भारतीयों के लिये आस्था का विषय है। ऐसा लगता है कि जैसे भगवान श्रीराम के जीवन चरित्र को मंदिरों के इर्दगिर्द समेटा जा रहा है। सच बात तो यह है कि भगवान श्रीराम हमारे न केवल आराध्य देव हैं बल्कि अध्यात्मिक पुरुष भी हैं जिनका चरित्र मर्यादा के साथ जीवन जीना सिखाता है। यह कला बिना अध्यात्मिक ज्ञान के नहीं आती। इसके लिये दो मार्ग हैं-एक तो यह कि योग्य गुरु मिल जाये या फिर ऐसे इष्ट का स्मरण किया जाये जिसमें योग्य गुरु जैसे गुण हों। उनके स्मरण से भी अपने अंदर वह गुण आने लगते हैं। एकलव्य ने गुरु द्रोण की प्रतिमा को ही गुरु मान लिया और धनुर्विद्या में महारथ हासिल की। इसलिये भगवान श्री राम का हृदय से स्मरण कर उन जैसे सभी नहीं तो आंशिक रूप से कुछ गुण अपने अंदर लाये जा सकते हैं। बाहरी रूप से नाम लेकर या दिखाने की पूजा करने से आस्था एक ढोंग बनकर रह जाती है। हम जब धर्म की बात करते हैं तो याद रखना चाहिये कि उसका आधार कर्मकांड नहीं  बल्कि अध्यात्मिक ज्ञान है और भगवान श्री राम उसके एक आधार स्तंभ है। हम जब उनमें आस्था का दावा करते हुए वैचारिक रूप संकुचित होते हैं तब वास्तव में हम कहीं न कहीं अपने हृदय को ही धोखा देते हैं।
मंदिरों में जाना कुछ लोगों को फालतू बात लगती है पर वहां जाकर अगर अपने अंदर शांति का अनुभव किया जाये तब इस बात का लगता है कि
मन की मलिनता को निकालना भी आवश्यक है। दरअसल इससे ध्यान के लाभ होता है। अगर कोई व्यक्ति घर में ही ध्यान लगाने लगे तो उससे बहुत लाभ होता है पर निरंकार के प्रति अपना भाव एकदम लगाना आसान नहीं होता इसलिये ही मूर्तियों के माध्यम से यह काम किया जा सकता है। यही ध्यान अध्यात्मिक ज्ञान सुनने और समझने में सहायक होता है और तब जीवन के प्रति नज़रिया ही बदल जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि मंदिर और मूर्तियों का महत्व भी तब है जब उनसे अध्यात्मिक शांति मिले। बहरहाल इस फैसले से देश में राहत अनुभव की गयी यह खुशी की बात है।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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नीयत में भ्रष्टाचार-हिन्दी व्यंग्य कवितायें (neeyat men bhrashtachar-hindi satire poem’s)


भ्रष्टाचार के विरुद्ध
अब कभी ज़ंग नहीं हो सकती,
अलबत्ता हिस्सा बांटने पर
हो सकता है झगड़ा
मगर मुफ्त में मिले पैसे को
हक की तरह वसूल करने में
किसी की नीयत तंग नहीं हो सकती।
————

मर गयी है लोगों की चेतना इस कदर कि
सपने देखने के लिये भी
सोच उधार लेते हैं,
अपनी मंज़िल क्या पायेंगे वह लोग
जो हमराह के रूप में कच्चे यार लेते हैं,
अपने ख्वाबों में चाहे कितने भी देखे सपने
आकाश में उड़ने के
पर इंसान को पंख नहीं मिले
फिर भी कुछ लोग उड़ने के अरमान पाल लेते हैं।
———-
लोगों में चेतना लाने का काम
भी अब ठेके पर होने लगा है,
जिसने लिया वह सोने लगा है,
मर गये लोगों के जज़्बात
मुर्दा दिलों में हवस के कीड़ों का निवास होने लगा है।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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आशिक खिलाड़ी-हिन्दी दिवस पर हास्य कविता (player and lover-comic poem on hindi diwas)


आशिक ने माशुका से कहा
‘तुम आज जाकर अपने माता पिता से
अपनी शादी की बात करना,
मेरी प्रशंसा का उनकी आंखों के सामने बहाना झरना,
उनको बताना
मेरा आशिक कई खेलों का खिलाड़ी है,
अपने प्रतिद्वंद्वियों की हालत उसने हमेशा बिगाड़ी है,
हॉकी में बहुत सारे गोल ठेलता है,
तो कुश्ती के लिये भी डंड पेलता है,
बहुत दूर तक भाला उछालता है,
तो बॉल भी उछल कर बॉस्केट में डालता है,
देखना वह खुश हो जायेंगे,
तब हम अपनी शादी बनायेंगे।’

जवाब में माशुका बोली
‘‘मैंने उनको यह सब बताया था,
पर उनको खुश नहीं पाया था,
उन्होनें मुझे समझाया कि
‘खिलाड़ी नहायेगा क्या
निचोड़ेगा क्या,
जो क्रिकेट नहीं खेले वह खिलाड़ी कैसा,
पैसा न कमाये वह होता अनाड़ी जैसा,
अगर खेल प्रतियोगिता का ठेकेदार होता
तो बात कुछ बनती,
कहीं मैदान बनवाता तो कहीं खरीदता खेल का सामान
तब कमीशन लेने पर ही जिंदगी उसकी छनती,
हमने तो बड़े बड़े खिलाड़ियों को सोने का पदक
पीतल के भाव बेचते देखा है,
कईयों को ठेला खींचते भी देखा है,
खेलने में मज़दूरी जितनी कमाई,
भला किसके काम आई,
अगर हो कोई खेल प्रबंधक तो ही
रिश्ता मंजूर है,
वरना उसके लिये दिल्ली अभी दूर है,’
इसलिये तुम खेलना बंद करो,
या मुझे भूल जाओ,
कहीं अपनी जुगाड़ लगाओ
इतने सारे संगठन हैं
कहीं सचिव या अध्यक्ष पद पर कब्जा कर
बढ़ाओ अपना सामाजिक सम्मान,
नामा और मिले और नाम,
वरना अपने सपने अधूरे रह जायेंगे।’’
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आतंक और युद्ध में फर्क होता है-हिन्दी लेख (diffarence between terarrism and war-hindi aticle)


फर्जी मुठभेड़ों की चर्चा कुछ
इस तरह सरेआम हो जाती कि
अपराधियों की छबि भी
समाज सेवकों जैसी बन जाती है।
कई कत्ल करने पर भी
पहरेदारों की गोली से मरे हुए
पाते शहीदों जैसा मान,
बचकर निकल गये
जाकर परदेस में बनाते अपनी शान
उनकी कहानियां चलती हैं नायकों की तरह
जिससे गर्दन उनकी तन जाती है।
——–
टीवी चैनल के बॉस ने
अपने संवाददाता से कहा
‘आजकल फर्जी मुठभेड़ों की चल रही चर्चा,
तुम भी कोई ढूंढ लो, इसमें नहीं होगा खर्चा।
एक बात ध्यान रखना
पहरेदारों की गोली से मरे इंसान ने
चाहे कितने भी अपराध किये हों
उनको मत दिखाना,
शहीद के रूप में उसका नाम लिखाना,
जनता में जज़्बात उठाना है,
हमदर्दी का करना है व्यापार
इसलिये उसकी हर बात को भुलाना है,
मत करना उनके संगीन कारनामों की चर्चा।
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भारत में भूत-हिन्दी हास्य कविता (bharat men bhoot-hindi hasya kavita)


पोते ने दादा से पूछा
‘‘अमेरिका और ब्रिटेन में
कोई इतनी भूतों की चर्चा नहीं करता,
क्या वहां सारी मनोकामनाऐं पूरी कर
इंसान करके मरता है,
जो कोई भूत नहीं बनता है।
हमारे यहां तो कहते हैं कि
जो आदमी निराश मरते हैं,
वही भूत बनते हैं,
इसलिये जहां तहां ओझा भूत भगाते नज़र आते हैं।’’

दादा ने कहा-
‘‘वहां का हमें पता नहीं,
पर अपने देश की बात तुम्हें बताते हैं,
अपना देश कहलाता है ‘विश्व गुरु’
इसलिये भूत की बात में जरा दम पाते हैं,
यहां इंसान ही क्या
नये बनी सड़कें, कुऐं और हैंडपम्प
लापता हो जाते हैं,
कई पुल तो ऐसे बने हैं
जिनके अवशेष केवल काग़ज पर ही नज़र आते हैं,
यकीनन वह सब भूत बन जाते हैं।’’
——–

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नागपंचमी पर्व का आधुनिक युग में महत्व-हिन्दी लेख


पूरे देश में नागपंचमी का पर्व बड़े धूमधाम से बनाया जाता है। दरअसल इसका धार्मिक महत्व सभी जानते हैं पर शायद ही कोई इसका अध्यात्मिक महत्व समझता हो क्योंकि उसका संबंध आंतरिक अनुभूतियों से है जो अव्यक्त होती हैं जबकि लोग व्यक्त भाव से मंदिरों में पूजा अर्चना कर ही इतिश्री कर लेते हैं। अध्यात्मिक विषय आंतरिक क्रियाओं से जुड़ा है उनका ज्ञान होने पर हम हमने कर्मों का दृश्यव्य के साथ अदृश्यव्य परिणामों का भी अध्ययन कर सकते हैं।
नागपंचमी मनाते हुए इस देश को बरसों हो गये पर आज भी नाग और सांप के नाम पर इतने भ्रम फैले हैं कि देखकर आश्चर्य होता है। मजे की बात यह है कि शिक्षित तबका भी उस भ्रम के साथ जी रहा है जबकि सच उसने अपनी किताबों में पढ़ा है।
जो भ्रम इस देश में फैले हैं वह यह है कि
-सारे सांप और नाग जहरीले होते हैं।
-सांप और नाग दूध पीते हैं।
-नाग बीन की आवाज पर नाचता है।
इनका सच यह है कि
-नब्बे फीसदी से अधिक सांप और नाग जहरीले नहीं होते।
-सांप और नाग दूध पी नहीं सकते क्योंकि उनके मुख में अंदर चीज ले जाने की क्षमता नहीं होती। वह निगलते हैं इसलिये चूहे या मैंढक को सीधे मुंह में लेकर पेट में निगल जाते हैं। ?
-सपेरा बीन बजाते हुए स्वयं भी नृत्य करता है जिसे देखकर उसका पालतू सांप या नाग नृत्य करता है। सांप या नाग को कान नहीं होते वह शरीर की धमनियों में जमीन पर होने वाले स्वर की अनुभूति कर अपना मार्ग चलता है।
अध्यात्मिक और आधुनिक ज्ञान के अभाव के कारण शिक्षित लोग जो कि आधुनिक कालोनी में बसते हैं वहां सांप या नाग के अपने घर में आने पर घबड़ा जाते हैं। वह कहते हैं कि सांप हमारे घर में आ गया जबकि सच यह है कि सांप या नाग के घर पर उन्होंने अपना निवास बनाया होता है। उनके घरों में सांप आने पर किसी को बुलाकर मरवा कर जलवा दिया जाता है। सांप को जीव शास्त्री वन संपदा मानते हैं क्योंकि वह फसलों को हानि पहुंचाने वाले कीड़ों को अपना भोजन बनाते हैं जिसमें चूहा भी शामिल है। अनेक लोग तो सांप और नाग को मनुष्य का बिना पाला हुआ वफादार जीव मानते हैं।
हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में सांपों और नागों की मनुष्य की तरह ही सक्रियता का वर्णन है। सबसे बड़ी बात यह है कि शेषनाग को प्रथ्वी धारण करने वाला माना गया है। इसे हम प्रतीकात्मक भी माने तो यह तो सच है कि सांप और नाग लंबे समय तक इस संसार के विनाशकारी कीड़ों को अपना भोजन बनाकर मनुष्य और पशुओं के जीवन का मार्ग ही प्रशस्त करते रहे हैं। जब कीटनाशक नहीं  रहे होंगे तब उनसे बचाने का काम इन्हीं जीवों ने किया होगा।
कालांतर में हम देखें तो सांप और नागों की संख्या कम होती गयी है और मनुष्य को अब अपनी फसलों के लिये कीटनाशक रसायनों का बड़े पैमाने पर उपयोग करना पड़ रहा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि अब विशेषज्ञ फलों और सब्जियों को इन कीटनाशकों के कारण विषैले होने की बात भी कह रहे हैं। किसी समय लोग केवल फलाहार कर जीवन गुजारते थे क्योंकि उनके लिये पका हुआ भोजन बीमारियों का कारण था। अनेक लोग तो मटर तथा अन्य सब्जियां बिना पकाये हुए खाते थे क्योंकि वह पौष्टिक मानी जाती थीं। अब हालत यह है कि बिना पकाये ग्रहण करना एक जोखिम भरा काम होता जा रहा है क्योंकि उनमें मिले कीटनाशकों को धोना जरूरी है। इनमें से कुछ कीटनाशक धोने में तो कुछ पकाने में अपना प्रभाव खो देते हैं पर उसके बावजूद भी सब्जियों की पौष्टिकता कम हो रही है।
अगर सांपों और नागों को पूज्यनीय बताया गया तो उसका कारण उनकी मनुष्य के लिए उपयोगिता से था। मगर आज हालत क्या है? वन क्षेत्र कम होने के साथ ही पशु पक्षियों और अन्य उपयोगी जीवों का जीना दुश्वार हो गया है। बरसात के समय जब सांप या नाग जमीन से बाहर निकलते हैं तो उनका जीवन एक खतरे की तरफ बढ़ता है। अनेक सांप और नाग वाहनों से कुचल जाते हैं तो अनेक दूसरों के घर में घुसने की सजा पाते हैं।
पेड़ पौद्यों की पर्यावरण की रक्षा के लिये आवश्यकता है और सांप और नाग इन्हीं पेड़ पौद्यों को नष्ट करने वाले कीड़ों को समाप्त करते हैं। जहां तक उनके द्वारा काटे जाने की घटनाओं की बात है वह नगण्य होती हैं और समय पर चिकित्सा मिल जाये तो आदमी बच भी जाता है-मगर देश की व्यवस्था ऐसी है कि कोई काम सहजता से नहीं होता, कहीं चिकित्सक है तो दवा नहीं मिलती। ऐसे में सांप और नाग की हत्या क्रेवल लोग भय के कारण ही करते हैं। सांप या नाग के काटे जाने का भय इस कदर लोगों में है कि शिक्षित से शिक्षित आदमी को भी समझाना कठिन है।
इसके बावजूद यह एक मान्य तथ्य है कि अन्य जीवों के अस्तित्व के कारण ही मनुष्य का अस्तित्व है और अगर वह उनको नहीं बचायेगा तो खुद मिट जायेगा। नागपंचमी में नाग या सांप की पूजा करने से ही केवल इतिश्री नहीं समझनी चाहिए बल्कि इन जीवों की रक्षा के प्रयास भी किये जाने चाहिये। इस नागपंचमी पर पाठकों तथा ब्लाग लेखक मित्रों को बधाई। इस अवसर पर यह संकल्प लेना चाहिए कि वन्य जीवों की रक्षा हर संभव प्रयास से करेंगे।
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कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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