Category Archives: व्यंग्य कविता

आदर्श के नाम पर समाज सेवा-हिन्दी हास्य व्यंग्य कविता (adrash ke nam par samaj seva-hindi hasya vyangya kavita)


आया फंदेबाज और बोला
‘‘दीपक बापू मेरे बेरोजगार भतीजे को
समाज सेवा करने का ख्याल आया है,
यह ज्ञान उसने जेल में बंद अपने गुरु से पाया है,
उसने बताया कि
वह एक सहायता समिति बनायेगा,
अब जनता में अपनी समाज सेवक की तरह छायेगा,
अभी दीपावली के अवसर पर
नकली खोये और
गंदी बनी मिठाईयां खाकर
बहुत लोग बीमार पड़ेंगे,
कुछ पटाखों से घायल होकर
अस्पताल का रुख करेंगे,
उनको वह सहायता प्रदान करेगा,
इसके लिये वह जनता से
पैसा लेकर
हताहतों के जख्म भरेगा,
बस,
समस्या यह है कि वह
उस संस्था का नाम क्या रखे
इसको लेकर विचार कर रहा है,
आया था मेरे पास पूछने
पर अपनी संस्था के काम का प्रचार कर रहा है,
आप ही बताओ कोई शुभ नाम,
कर दो बस, इतना काम,
मेरा भतीजा हमेशा आपका आभार जतायेगा।’’

सुनकर कहैं दीपक बापू
‘‘कमबख्त तुम्हारें कुनबे ने भी
कभी समाज सेवा की है,
जहां मिला वही मेवा की लूट की है,
जहां तक नाम का सवाल है,
उस पर यह कैसा बवाल है,
आदर्श या चरित्र निर्माण जैसा नाम रखकर,
मिठाई का टुकड़ा चखकर,
शुरु कर दो समाज सेवा का काम,
बस,
एक बात याद रखना,
सारा चंदा स्वयं ही चखना,
तुम्हारे कुनबे का भला क्या दोष,
ज़माना आदर्श के नाम पर लूट रहा
इसलिये आम इंसानों में है रोष,
बात जितनी आदर्श की बढ़ती जा रही है,
उतनी ही नैतिकता नीचे आ रही है,
बन गया है भ्रष्टाचार,
ताकतवार आदमी का शिष्टाचार,
आदर्श बनकर कर रहे हैं
वही समाज का चरित्र निर्माण,
जिनमें नहीं है पवित्रता का प्राण,
कोई फर्क नहीं पड़ेगा
अगर तुम्हारा भतीजा
आदर्श समाज सेवा समिति बनायेगा,
चलो एक बेरोगजार काम पर लग जायेगा,
जिनके पास दौलत है
वही आम इंसान को लूट रहे हैं,
अपराध से सराबोर हैं
वही निर्दोष कहलाकर छूट रहे हैं,
सर्वशक्तिमान ने चाहा तो
तुम्हारा भतीजा किसी घोटाले फंसकर
किसी बड़े पद पर चढ़ जायेगा।’’
———-

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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दशहराःरावण के नये रूप महंगाई, भ्रष्टाचार, और बेईमानी से लड़ना आवश्यक-हिन्दी लेख (ravan ke naye roop-hindi lekh


आज पूरे देश में त्रेतायुग में श्री राम की रावण पर युद्ध के समय हुई विजय के रूप में मनाये जाने वाले दशहरा पर्व की धूम मची हुई है। एक दिन के लिये खुशी से मनाये जाने वाले इस पर्व के मायने बहुत हैं यह अलग बात है कि लोग इसे समझना नहीं चाहते। दरअसल भगवान श्री राम और रावण दो ऐसे व्यक्तित्व थे जो अपने समय में सर्वाधिक शक्तिशाली और पराक्रमी माने जाते थे पर इसके बावजूद भगवान श्रीराम को अच्छाई तथा रावण को बुराई का प्रतीक माना जाता है। रावण के बारे तो कहा जाता है कि उसमें विद्वता कूट कूट कर भरी हुई थी। जहां तक उसकी धार्मिक प्रवृत्ति का सवाल है तो उसने भगवान शिव की तपस्या कर ही अमरत्व का वरदान प्राप्त किया था। इसका मतलब यह है कि कम से कम वह भगवान शिव का महान भक्त था और वह उसके आराध्य देव थे जिनको आज भी भारतीय समाज बहुत मानता है। आखिर रावण में क्या दुर्गुण थे इस पर अवश्य विचार करना चाहिये क्योंकि कहीं न कहीं हम उनकी समाज में उपस्थिति देखते हैं और तब अनेक लोग रावण तुल्य लगते हैं।
अमरत्व के वरदान ने रावण के मन में अहंकार का भाव स्थापित कर दिया था। वह अपने अलावा अन्य सभी पूजा पद्धतियों का विरोधी था। उसे लगता था कि केवल तपस्या के अलावा अन्य सब पूजा पद्धतियां व्यर्थ है और वह यज्ञ और हवन का विरोधी था। दूसरा वह यह भी कि वह नहीं चाहता था कोई दूसरा तप या स्वाध्याय कर उस जैसा शक्तिशाली हो जाये। इसलिये ही उसने वनों में रहने वाले ऋषियों, मुनियों तथा तपस्वियों के साथ उस समय के अनेक समृद्ध राजाओं को भी सताया था। देवराज इंद्र तक उससे आतंकित थे। वह यज्ञ और हवन करने वाले स्थानों पर उत्पात मचाने के लिये अपने अनुचर नियुक्त करता था जिनमें सुबाहु और मारीचि के साथ भगवान श्रीराम की मुठभेड़ ऋषि विश्वमित्र के आश्रम पर हुई थी। दरअसल यहीं से ही भगवान श्रीराम की शक्ति का परिचय तत्कालीन रावण विरोधी रणनीतिकारों को मिला जिससे वह भगवान श्री राम का रावण से युद्ध कराने के लिये जुट गये तो साथ ही रावण को भी यह संदेश गया कि अब उसका पतन सन्निकट है। जो लोग सीताहरण को ही भगवान श्रीराम और रावण का कारण मानते हैं वह अन्य घटनाओं पर विचार नहंीं करते। रावण ने श्रीसीता का हरण केवल भगवान श्रीराम को अपने राज्य में लाकर उनको मारने के लिये किया था। सूपर्णखा का नाक कान कटना भी भगवान श्रीराम के द्वारा रावण को चुनौती भेजने जैसा ही था।
एक भारतीय उपन्यासकार कैकयी को खलनायिका मानने की बजाय तत्कालीन कुशल रणनीतिकारों में एक मानते हैं। इसका कारण यह है कि वह स्वयं एक युद्ध विशारद होने के साथ ही कुशल सारथी थी। उसे एक युद्ध में राजा दशरथ के घायल होने पर उनका रथ स्वयं दूर ले जाकर उनको बचाया था जिसके एवज में तीन वरदान देने का वादा पति से प्राप्त किया जो अंततः भगवान श्रीराम के वनवास तथा भरत का राज्य मांगने के रूप में प्रकट हुए। रावण के समय में देवराज इंद्र उसके पतन के लिये बहुत उत्सुक थे। कैकयी को राम के वनवास के लिये उकसाने वाली मंथरा भी शायद इसलिये अयोध्या आयी थी। संभवत उसे देवताओं ने ही कैकयी को भड़काने या संदेश देने के लिये भेजा था जबकि प्रकटतः बताया जाता है कि सरस्वती देवी ने मंथरा की बुद्धि हर ली थी। कहा जाता है कि श्रीराम कके वनवास के बाद मंथरा फिर अयोध्या में नहीं दिखी जो इस बात का प्रमाण है कि वह केवल इसी काम के लिये आयी थी और कहीं न कहीं उस समय के धार्मिक रणनीतिकारों के दूत या गुप्तचर के रूप में उसने काम किया था। कैकयी स्वयं एक युद्ध और रणनीतिकविशारद थी इसलिये जानती थी कि ऋषि विश्वमित्र के आश्रम पर सुबाहु के वध और मारीचि के भाग जाने के परिणाम से रावण नाखुश होगा और वह भगवान श्रीराम से कभी न कभी लड़ेगा। ऐसे में अयोध्या में संकट न आये और भगवान श्रीराम सामर्थ्यवान होने के कारण राजधानी से दूर जाकर उसका वध करें इसी प्रयोजन से उसने भगवान श्रीराम को वन भेजने का वर मांगा होगा। रावण के विद्वान और आदर्शवादी होने की बात कैकयी जानती होंगी पर उनको यह अंदाज बिल्कुल नहीं रहा होगा कि वह श्रीसीता का हरण जैसा जघन्य कार्य करेगा। जब कैकयी भगवान श्री राम को वनवास का संदेश दे रही थीं तब वह मुस्करा रहे थे। इससे ऐसा लगता है वह सारी बातें समझ गये थे। इतना ही नहीं भगवान श्रीराम ने हमेशा ही अपने भाईयों को कैकयी का सम्मान करने का आदेश दिया जो इस बात को समझते थे कि वह अयोध्या के हितार्थ एक रणनीति के तहत स्वयं काम रही हैं या उनको प्रेरित किया जा रहा है। जब कैकयी ने भगवान श्रीराम और श्री लक्ष्मण के साथ श्रीसीता को भी वल्कल वस्त्र पहनने को लिये दिये तब वहां उपस्थिति पूरा जनसमुदाय हाहाकार कर उठा। दशरथ गुस्से में आ गये पर कैकयी का दिल नहीं पसीजा। इस घटना से पूर्व तक कैकयी को एक सहृदय महिला माना जाता था। उसकी क्रूरता का एक भी उदाहरण नहीं मिलता। तब यकायक क्या हो गया? कैकयी क समर्थन करने वाले यह भी सवाल उठाते हैं कि उसने 14 वर्ष की बजाय जीवन भर का वनवास क्यों नहीं मांगा क्योंकि भगवान श्रीराम 14 वर्ष बाद तो और अधिक बलशाली होने वाले थे। वनवास जाते समय तो नवयुवक थे और बाद में भी उनके बाहुबल और पराक्रम के साथ ही अनुभव में वृद्धि की संभावना थी। ऐसे में कैकयी जैसी बुद्धिमान महिला यह सोच भी नहीं सकती थी कि 14 वर्ष बाद राम अयोध्या का राज्य पुनः प्राप्त करने लायक नहीं रहेंगें।
कैकयी जानती थी कि देवता, ऋषि गण, तथा मुनि लोग भगवान श्रीराम और रावण के बीच युद्ध की संभावनाऐं ढूंढ रहे हैं। उन सभी के रणनीतिकार रावण के पतन के लिये भगवान श्रीराम की तरफ आंख लगाये बैठे हैं। ऐसे में भगवान श्रीराम अगर अयोध्या में राज सिंहासन पर बैठेंगे तो चैन से नहीं रह पायेंगे और इससे प्रजा पर भी कष्ट आयेगा। फिर रावण वध उस समय के सभी राजाओं की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी और प्रमुख होने के कारण अयोध्या पर ही इसका दारोमदार था।
जब वनवास में भगवान श्री राम अपने भ्राता लक्ष्मण और सीता के साथ अगस्त्य ऋषि के आश्रम पर आये तो देवराज इंद्र उनको देखकर चले गये जो संभावित राम रावण युद्ध पर ही विचार करने वहां आये थे। वहीं अगस्त्य ऋषि ने उनको अलौकिक धनुष दिया जिससे रावण का वध हुआ।
अपने यज्ञ की रक्षा करने के लिये जब ऋषि विश्वमित्र भगवान श्रीराम का हाथ मांगने दशरथ की दरबार में पहुंचे तो उनका पिता हृदय सौंपने को तैयार नहीं हुआ। तब गुरु वशिष्ठ ने उनको समझाया तब कहीं दशरथ ने भगवान श्रीराम को ऋषि विश्व मित्र के साथ भेजा। यहां यह भी याद रखना चाहिए कि गुरु वशिष्ट ने विश्वमित्र ने अपनी पुरानी शत्रुता को इसलिये भुला दिया था क्योंकि उस समय समाज में रावण का संकट विद्यमान था जिसका निवारण आवश्यक था। इस तरह भगवान शिव की तपस्या से अवध्य हो चुके रावण की भूमिका तैयार हुई थी।
इससे एक संदेश मिलता है कि राज्य और समाज के उत्थान और रक्षा के लिये दूरगामी अभियान बनाने पड़ते हैं जिनके परिणाम में बरसो लग जाते हैं। केवल नारों और धर्म की रक्षा के लिये हिंसक संघर्ष का भाव रखने से काम नहीं चलता। दूसरी बात यह भी कि ऋषि विश्वमित्र, अगस्त्य, वशिष्ठ, भारद्वाज मुनि तथा अन्य अपने तपबल से रावण का अस्त्र शस्त्रों के साथ ही शाप देकर भी संहार करने में समर्थ थे पर तपस्या के कारण अहिंसक प्रवृत्ति के चलते उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनको रावण वध या पतन से मिलने वाली प्रतिष्ठा का लोभ नहीं था और उन्होंने उस समय के महान धनुर्धर भगवान श्रीराम को इस कार्य के लिये चुनकर समाज के लिये एक आदर्श के रूप में प्रतिष्ठत करने का रावण वध के साथ ही दूसरा अभियान प्रारंभ कर उसे पूरा किया जिसमें उस समय के देवराज इंद्र जैसे समृद्ध और पराक्रमी पुरुषों का भी सहयोग मिला। सीधी बात यह है कि ऐसे अभियानों के लिये नेता के रूप में एक शीर्षक मिल जाता है पर आवश्यक यह है कि उसके लिये सामूहिक प्रयास हों।
दशहरे पर रावण का पुतला जलाना अब कोई खुशी की बात नहीं रही। भ्रष्टाचार, बेईमानी, मिलावट, तथा महंगाई के रूप में यह रावण अब अनेक सिर लेकर विचर रहा है। इनसे लड़ने के लिये हर भारतीय में विवेक, संतोष, तथा सहकारिता के भाव का होना जरूरी है। अब बुद्धि को धनुष, विचार को तीर तथा संकल्प को गदा की तरह साथ रखना होगा तभी अब अदृश्य रूप से विचर रहे रावण के रूपों का संहार किया जा सकता है।
इस दशहरे के अवसर इसी पाठ के साथ इस ब्लाग लेखक के मित्र ब्लाग लेखकों तथा पाठकों इस पर्व की ढेर सारी बधाई। उनका भविष्य मंगलमय हो यही हमारी कामना है।
———–

लेखक संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior, madhyapradesh
http://dpkraj.blogspot.com

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आशिक खिलाड़ी-हिन्दी दिवस पर हास्य कविता (player and lover-comic poem on hindi diwas)


आशिक ने माशुका से कहा
‘तुम आज जाकर अपने माता पिता से
अपनी शादी की बात करना,
मेरी प्रशंसा का उनकी आंखों के सामने बहाना झरना,
उनको बताना
मेरा आशिक कई खेलों का खिलाड़ी है,
अपने प्रतिद्वंद्वियों की हालत उसने हमेशा बिगाड़ी है,
हॉकी में बहुत सारे गोल ठेलता है,
तो कुश्ती के लिये भी डंड पेलता है,
बहुत दूर तक भाला उछालता है,
तो बॉल भी उछल कर बॉस्केट में डालता है,
देखना वह खुश हो जायेंगे,
तब हम अपनी शादी बनायेंगे।’

जवाब में माशुका बोली
‘‘मैंने उनको यह सब बताया था,
पर उनको खुश नहीं पाया था,
उन्होनें मुझे समझाया कि
‘खिलाड़ी नहायेगा क्या
निचोड़ेगा क्या,
जो क्रिकेट नहीं खेले वह खिलाड़ी कैसा,
पैसा न कमाये वह होता अनाड़ी जैसा,
अगर खेल प्रतियोगिता का ठेकेदार होता
तो बात कुछ बनती,
कहीं मैदान बनवाता तो कहीं खरीदता खेल का सामान
तब कमीशन लेने पर ही जिंदगी उसकी छनती,
हमने तो बड़े बड़े खिलाड़ियों को सोने का पदक
पीतल के भाव बेचते देखा है,
कईयों को ठेला खींचते भी देखा है,
खेलने में मज़दूरी जितनी कमाई,
भला किसके काम आई,
अगर हो कोई खेल प्रबंधक तो ही
रिश्ता मंजूर है,
वरना उसके लिये दिल्ली अभी दूर है,’
इसलिये तुम खेलना बंद करो,
या मुझे भूल जाओ,
कहीं अपनी जुगाड़ लगाओ
इतने सारे संगठन हैं
कहीं सचिव या अध्यक्ष पद पर कब्जा कर
बढ़ाओ अपना सामाजिक सम्मान,
नामा और मिले और नाम,
वरना अपने सपने अधूरे रह जायेंगे।’’
———–

कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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भारत में भूत-हिन्दी हास्य कविता (bharat men bhoot-hindi hasya kavita)


पोते ने दादा से पूछा
‘‘अमेरिका और ब्रिटेन में
कोई इतनी भूतों की चर्चा नहीं करता,
क्या वहां सारी मनोकामनाऐं पूरी कर
इंसान करके मरता है,
जो कोई भूत नहीं बनता है।
हमारे यहां तो कहते हैं कि
जो आदमी निराश मरते हैं,
वही भूत बनते हैं,
इसलिये जहां तहां ओझा भूत भगाते नज़र आते हैं।’’

दादा ने कहा-
‘‘वहां का हमें पता नहीं,
पर अपने देश की बात तुम्हें बताते हैं,
अपना देश कहलाता है ‘विश्व गुरु’
इसलिये भूत की बात में जरा दम पाते हैं,
यहां इंसान ही क्या
नये बनी सड़कें, कुऐं और हैंडपम्प
लापता हो जाते हैं,
कई पुल तो ऐसे बने हैं
जिनके अवशेष केवल काग़ज पर ही नज़र आते हैं,
यकीनन वह सब भूत बन जाते हैं।’’
——–

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कमीशन-हिन्दी व्यंग्य कविताएँ


गरजने वाले बरसते नहीं,
काम करने वाले कहते नहीं,
फिर क्यों यकीन करते हैं वादा करने वालों का
को कभी उनको पूरा करते नहीं।
———
जिनकी दौलत की भूख को
सर्वशक्तिमान भी नहीं मिटा सकता,
लोगों के भले का जिम्मा
वही लोग लेते हैं,
भूखे की रोटी पके कहां से
वह पहले ही आटा और आग को
कमीशन में बदल लेते हैं।
——–

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बेईमान चढ़े हैं हर शिखर पर-हिन्दी शायरी (beiman shikhar par-hindi shayri)


उनके दिखाये सपनों का पीछा करते कई घर तबाह हो गये,
अंधेरे को भगाने के लिये जलाई आग में अंधे स्वाह हो गये।
जंग भड़काई थी जमाने में, ईमान और इंसाफ लाने के लिये
हार गये तो अपने ही दोस्तों के खिलाफ एक गवाह हो गये।
मुखौटा लगाया पहरेदार का, सब का भरोसा जीतने के लिये,
लुट गया सामान, भरोसा करने वालों के चेहरे स्याह हों गये।
जिंदगी बनाने का दावा करने वालों पर नहीं करना भरोसा,
बेईमान चढ़े हैं हर शिखर पर, ईमानदार अब तबाह हो गये।
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हंसना और रोना भी व्यापार है-हिन्दी शायरी (hansha aur rone ka vyapar-hindi shayri)
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दौलत कमाने से अधिक वह
उसे छिपाने के लिये वह जूझ रहे हैं,
उनके अमीर होने पर किसी को शक नहीं
लोग तो बस उनके
काले ठिकानों की पहेली बूझ रहे हैं।
——–
इतनी दौलत कमा ली कि
उसे छिपाने के लिये वह परेशान है,
खौफ के साये में जी रहा खुद
फिर भी जमाने को लूटने से उसको फुरसत नहीं
उसकी अदाओं पर जमाना हैरान हैं।
———-
यूं तो दुनियां को वह
ईमान का रास्ता बताते है,
पर मामला अगर दौलत का हो तो
वह उसे खुद ही भटक जाते हैं।
——-
उनका हंसना और रोना भी व्यापार है,
पैसा देखकर मुस्कराते है,
कहो तो रोकर भी दिखाते हैं,
अकेले में देखो उनका चेहरा
लोग क्या, वह स्वयं ही डर जाते हैं।
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हवस और तकदीर-हिंदी शायरी


रोटी के भूखे को एक टुकड़ा भी
खुश कर जायेगा,
आधा पेट भरने पर भी
वह खुश हो जायेगा।
मगर अपनी हवस में ढूंढते हैं तकदीर
वह हमेशा रहेगा भूखा
जब तक सामने से आकर कोई
आंख में नश्तर न चुभा जायेगा।
———-
अपनी तबाही खुद करने पर
जब आमादा होता है इंसान,
हवस में ढूंढता है अमृत
चंद लफ्ज हमदर्दी के जताने वाले को
फरिश्ता समझ लेता है।
पेट की भूख तो मिटा देती है रोटी
पर हवस में अंधा इंसान
अपनी तकदीर अपने हाथ से बिगाड़ लेता है।
——–

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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किताब और हादसे-हिन्दी हास्य कवितायें


दिन भर वह दोनों ज्ञानी

अपने शब्दों की प्रेरणा से

लोगों को लड़ाने के लिये

झुंडों में बांट रहे थे,

रात को ईमानदारी से

लूट में मिले सामान में

अपना अपना हिस्सा

ईमानदारी से छांट रहे थे।

——-

शब्द रट लेते हैं किताबों से,

सुनाते हैं उनको हादसों के हिसाबों से,

पर अक्लमंद कभी खुद जंग नहीं लड़ते।

नतीजों पर पहुंचना

उनका मकसद नहीं

पर महफिलों में शोरशराबा करते हुए

अमन की राह में उनके कदम

बहुत  मजबूती से बढ़ते।

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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बंटवारा-हास्य व्यंग्य कवितायें


<b>पहले जाति में बांटा
भाषा में छांटा
और धर्म में काटा
फिर समाज में एकता की कोशिश
अमन के ठेकेदार करने लगे।
नारी की तरक्की देखकर
हक के नाम पर लड़ाने के लिये
उसे भी अब बांटने, छांटने तथा काटने  के लिये जगे।
……………………………….
क्या पता नारियां आगे बढ़कर
कहीं दुनियां में एकता न स्थापित कर दें
इस खौफ से
जमाने की फूट पर रोटियां सैंकने वाले
कंपने लगे हैं।
इसलिये ही जाति, भाषा और धर्म के
अलग अलग खंडों में नारियों को भी बांटने लगे हैं।
————-
मां है
बहिन है
पत्नी है
और बेटी है
नारी हर रिश्ता ईमानदारी से निभाती है।
जाति, धर्म और भाषा के नाम पर
लड़ने वाले पुरुषों की जननी जरूर है
पर फिर भी अपनी निर्मलता पर नहीं उसे गरुर है
इज्जत के अहंकार में लड़ने वाले  पुरुष
जब उसके  हकों में पुराने जमाने के तर्क देने लगे
समझ लो उन्हें स्त्री सत्ता की आशंकायें सताती हैं।
—————-
जमाना बदल रहा है
महिलाओं के हकों के लिये
पुरुष भी लड़ने लगे हैं।
इसे चालाकी कहें या सादगी कि
जाति, धर्म और भाषा के नाम पर
महिलाओं को आगे लाने की बात कर
अपने समूहों के भले का नारा देने वाले ठेकेदार
अपनी रोटी सैंकने के लिये भी तत्काल जगे हैं। </b>
———
<b>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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————————————-
<blockquote>
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चमचागिरी का फन-हिन्दी शायरी


बाजार के खेल में चालाकियों के हुनर में
माहिर खिलाड़ी
आजकल फरिश्ते कहलाते हैं।
अब होनहार घुड़सवार होने का प्रमाण
दौड़ में जीत से नहीं मिलता,
दर्शकों की तालियों से अब
किसी का दिल नहीं खिलता,
दौलतमंदों के इशारे पर
अपनी चालाकी से
हार जीत तय करने के फन में माहिर
कलाकार ही हरफनमौला कहलाते हैं।
———-
काम करने के हुनर से ज्यादा
चमचागिरी के फन में उस्ताद होना अच्छा है,
अपनी पसीने से रोटी जुटाना कठिन लगे तो
दौलतमंदों के दोस्त बनकर
उनको ठगना भी अच्छा है।
अपनी रूह को मारना इतना आसान नहीं है
इसलिये उसकी आवाज को
अनसुना करना भी अच्छा है।
किस किस फन को सीख कर जिंदगी काटोगे
नाम का ‘हरफनमौला’ होना ही अच्छा है।

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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अमीर का पीछा नहीं छोड़ता ज़मीर-हिन्दी हास्य व्यंग्य कविताएँ


आदर्श पुरुषों ने अपनी दरबार में
देशभक्ति का नारा बड़े तामझाम के साथ सजाया।
बाजार को बेचनी थी मोमबत्तियों
शहीदों के नाम पर,
इसलिये प्रचारकों से नारे को संगीत देने के लिये
शोक संगीत भी बजवाया।
भेजे आदर्श पुरुषों के नाम से
रुपयों से भरे लिफाफे
जिनकी समाज सेवा से आम इंसान हमेशा कांपे
दिल में न था भाव फिर भी
आदर्श पुरुषों के खौफ से
सभी ने देशभक्ति का गीत गाया।
———
उनकी देशभक्ति की दुहाई,
कभी नहीं सुहाई,
मुखौटे हैं वह बाजार के सौदागरों के
जो जज़्बात बेचने आते हैं,
उनकी जुबां कभी बोलती नहीं
पर पर्दे के पीछे
वही संवाद लिखकर लाते हैं,

खरीदे देशभक्तों ने बस, उनको दोहराया ।
——————–
इंसान की हर अदा पर मिलते हैं

पर सच बोलने पर कोई इनाम नहीं होता।

कितना भी हो जाये कोई अमीर,

पीछा नहीं छोड़ता उसका जमीर,

कैसे दे सकते हैं इनाम, उस शख्स को

बोलता है हमेशा सच जो,

खड़ी है दौलत की इमारत उनकी झूठ पर

चाटुकारों को लेते हैं, अपनी बाहों में भर

क्योंकि सच बोलने वालो से उनका काम नहीं होता।
कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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पुतलों के भेष में इंसान-हिन्दी हास्य कवितायें


न हार है, न जीत है,
न क्रोध है,न प्रीत है।
पर्दे के दृश्यों में मत बहो
सभी इंसानों से अभिनीत हैं।
——-
उनकी अदायें देखकर
हम भी हैरान थे,
दरअसल पुतलों के भेष में
वह चलते फिरते इंसान थे।
पर उनका कदम बढ़ता था
दूसरे के इशारे पर,
जुबां से निकलते तभी शब्द
लिख कर देता कोई कागज पर,
लुटाये लोगों ने उन पर पैसे
अपनी झोली में समेट कर, वह चल पड़े
किसी को जानते न हों जैसे,
चेहरा सजाया था फरिश्तों की तरह
दरअसल वह खरीदे हुए शैतान थे।

रोज नैतिकता की बात

हर बार आदर्श पर चर्चा

सिद्धांतों की दुहाई देते लोग थकते नहीं हैं।

फिर भी समाज के बिगड़ते जाने की चिंता

सभी को सता रही है,

हर जगह से

भ्रष्टाचार की बू आ रही है,

धर्म की राह के सभी राहगीर,

अपने पाप से बना रहे अपने लिये खीर,

प्रवचनों में ढेर सारे लोगों का जमा है झुंड,

शायद मूक और बधिर हैं सभी नरमुंड,

चक्षुओं से देखते आसमान में

देवताओं के जमीन पर आने की राह,

अपने को छोड़कर सभी इंसानों को

ईमानदारी का बोझ ढोते देखने की चाह,

वह उम्मीदें करते हैं जमाने से

जो खुद पूरी कर सकते नहीं हैं।

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स्वयंवर का नया रूप-हिंदी हास्य कविता (svyanvar ka naya roop-hasya kavita)


पति ने पत्नी से कहा

‘ बहुत कोशिश पर भी इतने दिनों में

अपने बेटे की

 शादी नहीं करवा पाये,

कमाता कौड़ी भी नहीं है

पर कमाऊ दिखाने के लिये

अपने बैंक खाते भी उसके नाम करवाये।

जानने वाले लोग पोल खाते हैं

इसलिये क्यों न अब उसके लिये स्वयंवर

आयोजित किया जाये।

नयी परंपरा है

लोग दौड़े चले आयेंगे

हो सकता है कि काम बन जाये।’

पत्नी ने कहा

‘हां, अच्छा है

अपना बेटा भी भगवान राम की तरह ही गुणवान है,

भले ही कमाता नहीं पर अपनी शान है,

सीता जैसी बहू मिल जाये

तो जीवन धन्य हो जाये,

पर समधी भी जनक जैसा हो,

दहेज देने में झिझके नहीं, ऐसा हो,

पर किसी पर यकीन नहीं करना

अपने कार्यक्रम में ऐसे ही लोगों को

आमंत्रित करना जिनके पास माल हो,

ऐसा न कि बाद में बुरा हाल हो,

घुसने से पहले सभी को

अपनी मांग बता देना,

उनकी हालत भी पता कर लेना,

सभी खोये रहें इस नयी स्वयंवर परंपरा में

पर तुम कम दहेज पर सहमत न होना

कोई कितना भी समझाये।’
———————
कान में लगाये मोबाइल पर

ऊंची आवाज में बतियाते

पांव उठाता सीना तानकर

आंखों से बहती कुटिल मुस्कराहट

वह अभिमान से चला जा रहा है।

लोगों ने बताया

‘अपनी बेईमानी से कभी लाचार

वह भाग रहा था जमाने से

गिड़गिड़ाता तथा छोटे इंसानों के सामने भी

अब मिल गया है उसे लोगों के भला करने का काम

उसकी कमाई से उसका कद बढ़ता जा रहा है।
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कामयाबी का खिताब-हिन्दी व्यंग्य कविता


 दिन भर अपने लिए साहब शब्द सुनकर

वह रोज फूल जाते हैं।

मगर उनके ऊपर भी साहब हैं

जिनकी झिड़की पर वह झूल जाते हैं।
——————–

नयी दुनियां में पुजने का रोग

सभी के सिर पर चढ़ा है।

कामयाबी का खिताब

नीचे से ऊपर जाता साहब की तरफ

नाकामी की लानत का आरोप

ऊपर से उतरकर नीचे खड़ा है,

भले ही सभी जगह साहब हैं

बच जाये दंड से, वही बड़ा है

——–

साहबी संस्कृति में डूबे लोग

आम आदमी का दर्द कब समझेंगे।

जब छोटे साहब से बड़े बनने की सीढ़ी

जिंदगी में पूरी तरह चढ़ लेंगे।

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इशारों के बंधन-हिन्दी व्यंग्य शायरी


हांड़मांस के बुत हैं

इंसान भी कहलाते हैं,

चेहरे तो उनके अपने ही है

पर दूसरे का मुखौटा बनकर

सामने आते हैं।

आजादी के नाम पर

उनके हाथ पांव में जंजीर नहीं है

पर अक्ल पर

दूसरे के इशारों के बंधन

दिखाई दे जाते हैं।

नाम के मालिक हैं वह गुलाम

गुलामों पर ही राज चलाये जाते हैं।

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विज्ञान और ज़माना-हिन्दी व्यंग्य शायरी (vigyan aur zamana)


धरती  का खुदा

नहीं है बंदों से जुदा।

फिर भी धरती को बचाने के लिये

चंद लोग एकत्रित हो जाते हैं

कभी कोपेनहेगन तो कभी

रियो-डि-जेनेरियों में

महंगी महफिलें सजाते हैं

बिगाड़ दिया है दुनियां का नक्शा

अब फिर तय करने लगे है नया चेहरा

बन रहे  नये खुदा

सोचते ऐसे हैं जैसे

दुनियां के बंदों से हैं जुदा।

———

गोरों का राज्य मिट गया

पर फिर भी संसार पर हुक्म चलता है।

उसे बजाने के लिये हर

काला और सांवला मचलता है।

कुछ चेहरा है उनका गजब,

तो चालें भी कम नहीं अजब,

काला अंधेरा कर दिया

अपने विज्ञान से,

बीमार बना दिया सारा जमाना

अपने ज्ञान से,

बिछा दी चहुं ओर अपनी शिक्षा,

पढ़लिखकर साहुकार भी मांगे भिक्षा,

बिगाड़ दी हवा सारी दुनियां की

अब ताजी हवा को गोरे तरस रहे हैं,

सारे संसार पर अपने शब्दों से बरस रहे हैं,

विष  लिये पहुंचते हैं सभी जगह

अमृत की तलाश में

फिर भी दान नहीं मांगते

लूट का अंदाज है

फिर भी लोग उन्हें देखकर बहलते हैं।

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धर्म और कमाई-हास्य साहित्य कविता


 

धर्म बन गयी है शय
बेचा जाता है इसे बाज़ार में,
सबसे बड़े सौदागर
पीर कहलाते हैं.
भूख, गरीबी, बेकारी और बीमारी को
सर्वशक्तिमान के  तोहफे बताकर
ज़माने को  भरमाते हैं.
मांगते हैं गरीब के  खाने के लिए पैसा
जिससे खुद खीर खाते हैं.
————————
धर्म का नाम लेते हुए
बढ़ता जा रहा है ज़माना,
मकसद है बस कमाना.
बेईमानी के राज में
ईमानदारी की सताती हैं याद
अपनी रूह करती है  फ़रियाद 
नहीं कर सकते दिल को साफ़ कभी 
हमाम में नंगे हैं सभी 
ओढ़ते हैं इसलिए धर्म का बाना.
फिर भी मुश्किल है अपने ही  पाप से बचाना..
 
 

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आदमी और अहसास-हिन्दी चिंतन और कविता (admi aur ahsas-hindi lekh aur kaivta)


आदमी अपनी जिंदगी को अपने नज़रिये से जीना चाहता है पर जिंदगी का अपना फलासफा है। आदमी अपनी सोच के अनुसार अपनी जिंदगी के कार्यक्रम बनाता है कुछ उसकी योजनानुसार पूर्ण होते हैं कुछ नहीं। वह अनेक लोगों से समय समय पर अपेक्षायें करता है उनमें कुछ उसकी कसौटी पर खरे उतरते हैं कुछ नहीं। कभी कभी तो ऐसा भी होता है कि संकट पर ऐसा आदमी काम आता है जिससे अपेक्षा तक नहीं की जाती। कहने का तात्पर्य यह है कि जिंदगी भी अनिश्तताओं का से भरी पड़ी है पर आदमी इसे निश्चिंतता से जीना चाहता है। बस यहीं से शुरु होता है उसका मानसिक द्वंद्व जो कालांतर में उसके संताप का कारण बनता है। अगर आदमी यह समझ ले कि उसका जीवन एक बहता दरिया की तरह चलेगा तो उसका तनाव कम हो सकता है। जीवन में हर पल संघर्ष करना ही है यही भाव केवल मानसिक शक्ति दे सकता है। इस पर प्रस्तुत हैं कुछ काव्यात्मक पंक्तियां-
खुद तरसे हैं
जो दौलत और इज्जत पाने के लिये
उनसे उम्मीद करना है बेकार।
तय कोई नहीं पैमाना किया
उन्होंने अपनी ख्वाहिशों
और कामयाबी का
भर जाये कितना भी घर
दिल कभी नहीं भरता
इसलिये रहते हैं वह बेकरार।
————-
समंदर की लहरों जैसे
दिल उठता और गिरता है।
पर इंसान तो आकाश में
उड़ती जिंदगी में ही
मस्त दिखता है।
पांव तले जमीन खिसक भी सकती है
सपने सभी पूरे नहीं होते
जिंदगी का फलासफा
अपने अहसास कुछ अलग ही लिखता है।
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चेहरा बदल जाता है, चाल नहीं-व्यंग्य कविता (Face turns, not tricks – satirical hindi poem)


इंसान के चेहरे बदल जाते हैं
नहीं बदलती चाल।
खून खराबा करने वाले
हाथ बदल जाते हैं
वही रहती तलवार और ढाल।

इंसान से ही उगे इंसान
संभालते उसका खानदान
जमाने को काबू करने का मिला जिनको वरदान,
पांव हमेशा पेट की तरफ ही मुड़ता है,
दौलत से ही किस्मत का साथ जुड़ता है,
बड़े आदमी करते दिखावा
जमाने का भला करने का
मगर लूटते हैं गरीब का दान,
छोटे आदमी के हिस्से आता है अपमान,
थामे अपनी अगली पीढ़ी का झंडा
लुटेरे लूट रहे जमाने को
लगे हैं कमाने को
अपनी दौलत शौहरत देकर
अपनी औलाद में जिंदा
रहने की ख्वाहिश पाले
मौत की सोच पर लगा ताले
दौड़ जा रहे हैं इज्जतदार लोग,
लिये साथ पाप और रोग
वाह री कुदरत! तेरा कमाल।

लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://rajlekh-patrika.blogspot.com
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यह आलेख इस ब्लाग ‘राजलेख की हिंदी पत्रिका’ पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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पैसे से गाडी खरीदी है रास्ता नहीं-व्यंग्य चिंतन


अब यह फिल्मों का ही प्रभाव कहा जा सकता है कि रास्ते पर गाड़ी चलाने वाले लड़के लड़कियां अपने आपको नायक नायिका से कम नहीं समझा करते। फिल्मों में अनेक गीत नायक नायिका को रास्ते पर कार या मोटर साइकिलें चलाते हुए फिल्माये जाते हैं। वह लड़के लड़कियों के दिमाग में इस तरह अंकित रहते हैं कि जब गाड़ी पर उनका पंाव आता है तो वह ऐसे सोचते हैं जैसे कि वह किसी फिल्म का अभिनय कर रहे हैं। उनको शायद पता ही नहीं नायक नायिका के ऐसे गाने वाले दृश्य रास्ते पर पैदल या गाड़ियों चलाते हुए फिल्माये दृश्यों को स्टूडियो में तैयार किया जाता है। वहां उनके आसपास ऐसा आदमी नहीं आ सकता जिसे फिल्म का निदेशक न चाहे।
आम सड़क पर ऐसा नहीं होता। वह निजी सड़क नहीं है और न ही वहां आपके लिये ऐसी कोई सुविधा है।
एक समस्या दूसरी भी है जिसे समझ लें। खराब सड़कों पर कम ही दुर्घटना होती है क्योंकि वहां लोग वाहन पर ही क्या पैदल ही सोचकर धीमी गति से चलते हैं। कभी कभी तो इतनी धीमी गति हो जाती है कि स्कूटर बंद कर ही उस पर बैठकर उसे घसीटा जाता है। अधिकतर दुर्घटनायें साफ सुथरी और डंबरीकृत सड़कों पर ही होती है जहां गाड़ियां तीव्र गति से चलाने में मजा आता है।
जब भी दुर्घटना की खबरें आती हैं ऐसी ही सड़कों से आती हैं। कार या मोटर साइकिल निजी रूप से आकर्षक वाहन हैं पर सड़कें केवल उनके लिये नहीं है। इन पर ट्रक और बसें भी चलती हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि ट्राली के साथ जुड़े ट्रेक्टर भी चलते हैं जिनके कुछ चालक उनको बैलगाड़ी की तरह चलाते हैं। यह ट्राली ऐसे ही जैसे भैंस! पत नहीं कब सड़क पर थोड़ा झटका खाने से उसकी कमर मटक जाये। उसके समानांतर चलते हुए हमेशा चैकस रहना चाहिये।
आखिर यह ख्याल क्यों आया? उस दिन सड़क पर दो लड़के अपनी मोटर साइकिल पर ट्रेक्टर और ट्राली के एकदम समानातंर जा रहे थे। आगे बैठा लड़का अपनी धुन में कुछ ऐसा आया कि दोनो हाथ छोड़कर मोटर साइकिल चलाता रहा। पता नहीं वहां उसके आगे कोई छोटा पत्थर का टुकड़ा या कागज को कोई छोटा ठोस पुलिंदा आ गया जिससे मोटर साइकिल लड़खड़ी गयी। मोटर साइकिल ट्राली की तरफ बढ़ती इससे पहले ही लड़के ने संभाल लिया। यह दृश्य देखकर किसी की भी सांस थम सकती थी। याद रखिये जब वाहन की गति तीव्र होती है तब रास्ते पर पड़ी कोई छोटी ठोस चीज भी उसको विचलित कर सकती है। हवाई जहाज को आकाश में चिड़िया भी विचलित कर देती है-ऐसी अनेक घटनाएं अखबारों में पढ़ी जा सकती हैं।
यह तो केवल एक वाक्या है? यह सड़कें गरीब और अमीर दोनों के लिये बनी है। अपनी कार पर इतना मत इतराओ कि साइकिल छू जाने पर किसी गरीब को मारने लगो। यह सड़क केवल अमीर की नहीं है क्योंकि जिंदगी भी केवल वह नहीं जीते! यह सड़के के्रवल अमीरों की इसलिये भी नहीं है क्योंकि मौत भी केवल गरीब की नहीं होती। एक दिन वह अमीरों को भी लपेटती है। कार या मोटर साइकिल से टकराकर साइकिल सवार गरीब मरेगा तो कार और मोटर साइकिल वाले भी ट्रक, बस और ट्रेक्टर ट्राली से टकराकर बच नहीं सकते। तुम अपने पैसे से वाहन खरीदते हो सड़क नहीं।
नित प्रतिदिन दुर्घटनाऐं और टकराने पर जिस तरह झगड़े होते हैं उससे तो देखकर यही लगता है कि हम लोगों को रास्ते पर चलने की तमीज नहीं है। फिल्मी और धारावाहिक दृश्यों ने हमारी अक्ल का बल्ब फ्यूज कर दिया है।
कभी कभी तो लगता है कि सड़के तो उबड़ खाबड़ ही ठीक हैं क्योंकि लोग वाहनों को चलाते नहीं बल्कि घसीटते ही ठीक रहते हैं जहां उनको गति बढ़ाने का अवसर मिला वहां अपना होश हवास खो देते हैं। इसका मतलब क्या यह समझें कि हम अच्छी सड़कों के लायक नहीं है। याद रखो दुर्घटना के लिये सैकण्ड का हजारवां हिस्सा भी काफी है। इसलिये सड़क पर चलते हुए जल्दबाजी से बचो। इसलिये नहीं कि घर पर तुम्हारा कोई इंतजार कर रहा है बल्कि इसलिये क्योंकि बेमौत किसी को दूसरे क्यों मारना चाहते हो या मरना चाहते हो। न भी मरे तो शरीर का अंग भंग हमेशा ही जीवन का दर्द बन जाता है। हो सकता है कि इसमें लेख में कुछ कटु बातें हों पर क्या करें दर्द की दवा तो कड़वी भी होती है। वैसे भी कहते हैं कि नीम कड़वा है पर स्वास्थ के लिये उसका बहुत महत्व है। इस पर कुछ काव्यात्मक अभिव्यक्ति के रूप में पंक्तियां।

सड़कों पर इतनी तेज मत चलो कि
जमीन पर आ गिरो
पांव जमीन पर ही रखो
हवा में उड़ने की कोशिश मत करो कि
अपने ही ओढ़े दर्द के जाल में घिरो।
एक पल ही बहुत है दुर्घटना के लिये
वाहनों पर बिना अक्ल साथ लिये यूं न फिरो।
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