Tag Archives: मनोरंजन

स्वर्ग व मोक्ष का दृश्यव्य रूप नहीं-हिन्दी लेख


                                   हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के भ्रम फैलाये गये हैं। खासतौर से स्वर्ग और मोक्ष के नाम पर ऐसे प्रचारित किये गये हैं जैसे वह  देह त्यागने के बाद ही प्राप्त होते हैें।  श्रीमद्भागवतगीता के संदेशों का सीधी अर्थ समझें तो यही है कि जब तक देह है तभी तक इंसान अपने जीवन में स्वर्ग तथा मोक्ष की स्थिति प्राप्त कर सकता है। देह के बाद कोई जीवन है, इसे हमारा अध्यात्मिक दर्शन मनुष्य की सोच पर छोड़ता है। अगर माने तो ठीक न माने तो भी ठीक पर उसे अपनी इस देह में स्थित तत्वों को बेहतर उपयोग करने के लिये योग तथा भक्ति के माध्यम से प्रयास करने चाहिये-यही हमारे अध्यात्मिक दर्शन का मानना है।

अष्टावक्र गीता में कहा गया है कि

————-

मोक्षस्य न हि वासीऽस्ति न ग्राम्यान्तरमेव वा।

अज्ञानहृदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतः।।

                                   हिन्दी में भावार्थ-मोक्ष का किसी लोक, गृह या ग्राम में निवास नहीं है किन्तु अज्ञानरूपी हृदयग्रंथि का नाश मोक्ष कहा गया है।

                                   जिस व्यक्ति को अपना जीवन सहजता, सरलता और आनंद से बिताना हो वह विषयों से वहीं तक संपर्क जहां तक उसकी दैहिक आवश्यकता पूरी होती है।  उससे अधिक चिंत्तन करने पर उसे कोई लाभ नहीं होता।  अगर अपनी आवश्यकताआयें सीमित रखें तथा अन्य लोगों से ईर्ष्या न करें तो स्वर्ग का आभास इस धरती पर ही किया जा सकता है। यही स्थिति मोक्ष की भी है।  जब मनुष्य संसार के विषयों से उदासीन होकर ध्यान या भक्ति में लीन में होने मोक्ष की स्थिति प्राप्त कर लेता है।  सीधी बात कहें तो लोक मेें देह रहते ही स्वर्ग तथा मोक्ष की स्थिति प्राप्त की जाती है-परलोक की बात कोई नहीं जानता।

————————-

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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गुलामी जब जायेगी तभी तो आजादी आयेगी-हिन्दी लेख


                                   15 अगस्त भारत का स्वतंत्रता दिवस हमेशा अनेक तरह से चर्चा का विषय रहता है। अगर हम अध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो भारत कभी गुलाम हुआ ही नहीं क्योंकि भौतिक रूप से कागजों पर  इसका नक्शा छोटा या बड़ा  भले ही होता रहा हो पर धार्मिक दृष्टि से भौतिक पहचान रखने वाले तत्वों में  गंगा, यमुना और नर्मदा नदियां वहीं बहती रहीं हैं जहां थीं।  हिमालय और विंध्याचल पर्वत वहीं खड़े रहे जहां थे। अध्यात्मिक दृष्टि से श्री रामायण, श्रीमद्भागवत गीता तथा वेदों ने अपना अस्तित्व बनाये रखा-इसके लिये उन महान विद्वानों को नमन किया जाना चाहिये जो सतत इस प्रयास में लगे रहे। भारत दो हजार साल तक गुलाम रहा-ऐसा कहने वाले लोग शुद्ध राजसी भाव के ही हो सकते हैं जो मानते हैं कि राज्य पर बैठा शिखर पुरुष भारत या यहां की धार्मिक विचारधारा मानने वाला नहीं रहा।

                                   हम जब अध्यात्मिक दृष्टि से देखते हैं तो पाते हैं कि विदेशों से आयी अनेक जातियां यहीं के समाज में लुप्त हो गयीं पर उस समय तक विदेशों में किसी धार्मिक विचाराधारा की पहचान नहीं थी। जब विदेशों में धार्मिक आधार पर मनुष्य में भेद रखना प्रारंभ हुआ तो वहां से आये राजसी व्यक्तियों ने भारत में आकर धार्मिक आधार पर भेद करने वाला  वही काम किया जो वहां करते थे।  अब तो स्थिति यह है कि भारतीय विचाराधारा न मानने वाले लोग यहीं के प्राचीन इतिहास से परे होकर विदेशी जमीन से अपनी मानसिक सोच चलाते हैं।  पाकिस्तानी मूल के कनाडाई लेखक तारिक फतह ने एक टीवी चैनल में साक्षात्कार में अपने ही देश की विचारधारा की जो धज्जियां उड़ाईं वह अत्यंत दिलचस्प है।  उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का मुसलमान यह सोचता है कि वह अरब देशों से आया है जबकि उसे समझना चाहिये कि वह प्राचीन भारतीय संस्कृति का हिस्सा है।

                                   भारतीय उपमहाद्वीप में आये विदेशी लोगों ने यहां अपना वर्चस्प स्थापित करने के लिये जो शिक्षा प्रणाली चलाई वह गुलाम पैदा करती है। अगर हम राजसी दृष्टि से भी देखें तो भी आज वही शिक्षा प्रणाली प्रचलन में होने के कारण भारत की पूर्ण आजादी पर एक प्रश्न चिन्ह लगा मिलता है।  लोगों की सोच गुलामी के सिद्धांत पर आधारित हो गयी है।  विषय अध्यात्मिक हो या सांसरिक हमारे यहां स्वतंत्र सोच का अभाव है।  लोग या तो दूसरों को गुलाम बनाने की सोचते हैं या फिर दूसरे का गुलाम बनने के लिये लालयित होते हैं। इसलिये स्वतंत्रता दिवस पर इस बात पर मंथन होना चाहिये कि हमारी सोच स्वतंत्र कैसे हो?

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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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विकास और दौलत-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


अपनी हालातों से लाचार लोग दूसरों की ताकते हैं,

दौलत के पहाड़ पर बैठे लोग उसकी केवल ऊंचाई नापते हैं।

कहें दीपक बापू फैशन के नाम पर लोग कर रहे

अपनी जिंदगी से खिलवाड़

रौशनी के लिये लगा लेते अपने ही घर में आग

वह रोते है मगरं  तमाशाबीन उस पर हाथ तापते हैं।

———

कन्या भ्रुण हत्या करते हुए थका नहीं समाज,

वर के लिये वधुओं के आयात की बात हो रही आज,

कहें दीपक बापू  लोग अपनी पुरानी सोच को

आधुनिक विज्ञान के साथ ढो रहे हैं,

बेजुबान पशु पक्षी की तरह जीना मंजूर कर लिया

मनुष्य शरीर है पर अक्ल खो रहे हैं,

अब बारी आ रही है जब नस्ल पर ही गिरेगी गाज।

———–

तख्त पर जो बैठ जाये वही बुद्धिमान कहलाता है,

खामोश भीड़ सामने बैठती वह रास्ता बतलाता है।

कहें दीपक बापू कुदरत का नियम है बड़ो के बोले भी बड़े

छोटा वही ज्ञानी है जो अपने घाव खुद ही सहलाता है।

————

पुराने विकास के दौर में बड़ी बड़ी इमारतें खड़ी हो गयी,

अब गिरने लगी हैं तो नये विनाश की कड़ी हो गयी।

कहें दीपक बापू नये विकास का कद तो बहुत ऊंचा होगा

विनाश का ख्याल नहीं उम्मीद अब पहले से बड़ी हो गयी।

———-

विकास को दौर पहले भी चलते रहे हैं,

चिराग अपना रंग बदलकर हमेशा जलते रहे हैं।

कहें दीपक बापू आम आदमी महंगाई के बाज़ार में खड़ा रहा

उसका भला चाहने वाले दलाल महलों में पलते रहे हैं।

एक बात तय है कि आज जो बना है कल ढह जायेगा,

पत्थरों से प्रेम करने वाला हमेशा पछतायेगा,

बड़े बड़े बादशाह तख्त बेदखल हो गये,

चमकीले राजमहल देखते देखते खंडहर हो गये,

इतिहास में उगे बहुत लोग उगत सूरज की तरह

मगर समय के साथ सभी ढलते रहे हैं।

————

भारत में आस्तिक और नास्तिक की पहचान कठिन-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन लेख


      अमेरिका में नास्तिकतावादी चर्चों का प्रभाव बढ़ रहा है- समाचार पत्रों प्रकाशित यह खबर दिलचस्प होने के साथ  विचारणीय भी है। पाश्चात्य दृष्टि से  ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करने वालो को कहा जाता है। न करने वाले को नास्तिक का तमगा लगाकर निंदित घोषित किया जाता है। वहां के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण है जिनमें धर्मांध समाज के क्रूर शिखर पुरुषों ने नास्तिक होने को आरोप लगाकर अनेक लोगों को निर्दयी दंड दिया।  हमारे यहा आस्तिकता और नास्तिकता के विवाद अधिक  संघर्ष नहीं देखे जाते इसलियें ऐसे उदाहरण नहीं मिलते।  यह अलग बात है कि परमात्मा के अस्तित्व पर हार्दिक आस्था रखने वाले कितने हैं इसका सही आंकलन करना सहज नहीं है। कारण यह कि यहां धर्मभीरुता का भाव अधिक है इसलिये  कुछ चालाक लोग तो केवल इसलिये धर्म के धंधे में आ जाते हैं कि भीड़ का आर्थिक दोहन किया जा सके।  वह पुराने ग्रंथों को रटकर राम का नाम लेकर अपने मायावी संसार का विस्तार करते हैं।  माया के शिखर पर बैठे ऐसे लोग एकांत में वह परमात्मा पर चिंत्तन करने होंगे इस पर यकीन नहीं होता।  सच्ची भक्ति का अभाव यहां अगर न देखा गया होता तो हमारे हिन्दी  साहित्य में भक्तिकाल के कवि कभी ऐसी रचनायें नहीं देते जिनमें समाज को सहज और हार्दिक भाव से परमात्मा का स्मरण करने का संदेश दिया गया।  इतना ही नहीं संत कबीर और रहीम ने तो जमकर भक्ति के नाम पर पाखंड की धज्जियां उड़ाईं है। स्पष्टतः यह इस बात का प्रमाण है कि हमारे समाज में भक्ति के नाम पर न केवल पाखंड रहा है बल्कि अपनी शक्ति अर्जित करने तथा उसके प्रदर्शन करने का भी यह माध्यम रहा है।

      अगर हम पाश्चात्य समाज में नास्तिकतावाद के प्रभाव की खबर को सही माने तो एक बात साफ लगती है कि कहीं न कहीं वहां वर्तमान प्रचलित धर्मों की शक्ति में हृास हो रहा है। हम यह सोचकर प्रसन्न न हों कि भारतीय धर्मों में कोई ज्यादा स्थिति बेहतर है क्योंकि कहीं न कहीं अंग्रेजी पद्धति की शिक्षा के साथ ही रहन सहन तथा खान पान में हमने जो आदते अपनायी हैं उससे यहां भी समाज मानसिक रूप से लड़खड़ा रहा है।  यहां नास्तिकतवाद जैसा तत्व सामाजिक वातावरण में नहीं है पर अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति  व्याप्त उदासीनता का भाव वैसा ही है जैसा कि पश्चिम में नास्तिकवाद का है।

      हम यहां भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की बात करें तो उसमें ज्ञान और कर्मकांडों के बीच एक पतली विभाजन रेखा खिंची हुई है जो दिखाई नहीं देती।  श्रीमद्भागवत गीता में स्पष्टतः स्वर्ग दिलाने वाले कर्मकांडों के प्रति रुचि दिखाने वालों को अज्ञानी बताया गया है।  मूल बात यह है कि भक्ति  आतंरिक भाव से की जाने वाली वह क्रिया मानी गयी है जो मानसिक विकारों से परे ले जाती है शर्त यह कि वह हृदय से की जाये।  इसके विपरीत भारत के बाहर पनपी विचाराधाराओं में अपने समूहों के लिये बकायदा खान पान और रहन सहन वाले बंधन लगाये गये हैं। इसके विपरीत भारतीय अध्यात्मिक दर्शन उन्मुक्त भाव से जीवन जीने की प्रेरणा देता है।  वह किसी वस्तु, विषय और व्यक्ति में दोष देखने की बजाय साधक को आत्ममंथन के लिये प्रेरित करता है।  इतना ही नहीं अध्यात्मिक दर्शन तो किसी कर्म को भी बुरा नहीं मानता पर वह यह तो बताता है कि वह अपनी प्रकृत्ति के अनुसार कर्ता को परिणाम भी देते हैं।  अब यह कर्ता को सोचना है कि किस कर्म को करना और किससे दूर रहना है। भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा के प्रवाह में लोच है।  वह परिवर्तन के लिये तैयार रहने की प्रेरणा देती है। अध्यात्मिक ज्ञान के साथ भौतिक विज्ञान के साथ संयुक्त अभ्यास करने का संदेश देती है।

      हम अक्सर विश्व में अध्यात्मिक गुरु होने के दावे का बखान करते हैं पर स्वयं अपनी मौलिक विचारधारा से दूर हटकर पाश्चात्य सिद्धांतों को अपना रहे हैं।  कहा जाता है कि अध्यात्मिक ज्ञान मनुष्य को मानसिक रूप से दृढ़ता प्रदान करता है जो कि सांसरिक विषयों में युद्धरत रहने के लिये आवश्यक है। भगवान के प्रति आस्था होने या न होने से किसी दूसरे को अंतर नहीं पड़ता वरन् हमारी मनस्थिति का ही इससे सरोकार है।  आस्था हमारे अंदर एक रक्षात्मक भाव पैदा करती है और सांसरिक विषयों संलिप्त रहते हुए सतर्कता बरतने की प्रेरणा के साथ आशावाद के मार्ग पर ले जाती है जबकि अनास्था आक्रामकता और निराशा पैदा करती है। तय हमें करना है कि कौनसे मार्ग पर जाना है।  संभव है कि हम दोनों ही मार्गों पर चलने वालों की भीड़ जमा कर लें पर हमारी दूरी हमारे स्वयं के कदम ही तय करते हैं और हमारा लक्ष्य हमारी तरह ही एकाकी होता है उसे किसी के साथ बांटना संभव नहीं है।

      भारत में नास्तिक विचाराधारा अभी प्रबल रूप से प्रवाहित नहीं है पर कुछ लोग हैं जिन्होंने यह दावा करना शुरू कर दिया है। ऐसे ही हमारे एक मित्र ने हमसे सवाल किया-‘‘आप भगवान पर विश्वास करते हैं?’

      हमने उत्तर दिया कि ‘‘पता नहीं!

      उसने कहा-‘‘पर आप तो अध्यात्म पर लिखते हैं।  यह कैसे हो सकता है कि परमात्मा पर विश्वास न करें।  मैं तो नहीं करता।’’

      हमने कहा-‘‘हम तो अभी शोध के दौर से हैं।  जब काम पूरा हो जायेगा तब आपको बतायेंगे।

      उसने व्यंग्यताम्क रूप से कहा-‘‘अभी तक साधना से आपने कुछ पाया है तो बताईये  भगवान है कि नहीं!’’

      हमने कहा-‘‘वह अनंत है। हमारा दर्शन तो यही कहता है।’’

      फिर उसने व्यंग्य किया-‘‘अरे वाह, सभी कहते हैं कि वह एक है।’’

      हमने कहा-‘‘वह एक है कि अनेक, यह बात कहना कठिन है पर वह अनंत है।’’

      वह झल्ला गया और बोला-‘‘आप तो अपना मत बताईये कि वह है कि नहीं?’’

      हमने कहा-‘‘अगर हम हैं तो वह जरूर होगा।’’

      वह चहक कर बोला-‘मैं हूं इस पर कोई संशय नहीं पर भगवान को नहीं मानता।’

      हमने पूछा-‘‘मगर तुम हो यह बात भी विश्वास से कैसे कह सकते हो।’’

      वह चौंका-‘इसका क्या मतलब?’’

      हमने कहा-‘हमने अध्यात्मिक ग्रंथों में पढ़ा है कि ब्रह्मा जी के स्वप्न की अवधि में ही यह सृष्टि चलती है।  हम सोचते हैं कि जब ब्रह्मा जी के सपने या संकल्प पर ही यह संसार स्थित है तो फिर हम हैं ही कहां? अरे, हमारी निद्रा में भी सपने आते हैं पर खुलती है तो सब गायब हो जाता है।’’

      वह थोड़ी देर खामोश रहा फिर बोला-‘यार, तुम्हारी बात मेंरी समझ में नहीं आयी।’’

      हमने कहा-‘हमने तुम्हारे भगवान के प्रति विश्वास या अविश्वास का उत्तर इसलिये ही नहीं दिया क्योंकि अध्यात्मिक साधना करने वाले ऐसे प्रश्नों से दूर ही रहते हैं।’’

      उस बहस का कोई निष्कर्ष निकलना नहीं था और न निकला। आखिरी बात यह है कि अध्यात्मिक साधना करने वालों के लिये इस तरह की बहसें निरर्थक होती है जिनमें व्यक्ति अपने प्रभाव बढ़ाने के लिये तर्क गढ़ते हैं।  अध्यात्मिक साधना नितांत एकाकी विषय है और परमात्मा के प्रति विश्वास या अविश्वास बताने की आवश्यकता अपरिपकव ज्ञानियों को ही होती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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शराब न खुशी बढाती न गम घटाती-हिंदी व्यंग्य कविता


हर रात की तरह आज भी

महफिलों में जाम छलकेंगे,

कुछ लोग मदहोशी में खामोश होंगे,

कुछ अपना मुद्दा उठाकर भड़केंगे,

जाम के पैमाने का हिसाब पीने वाले नहीं रखते

चढ़ गया नशा उनके दिमाग भी बहकेंगे।

कहें दीपक बापू

कमबख्त! शराब चीज क्या है

कोई समझ नहीं पाया,

जिसने नहीं पी वह रहा उदास

जिसने पी वह भी अपने दर्द का

पक्का इलाज नहीं कर पाया,

शराब न खुशी बढ़ाती है,

न गम कभी घटाती है,

छोड़ गयी हमें फिर भी उसके कायल हैं,

अपने घाव कभी नहीं भूलते, ऐसे हम भी घायल हैं,

सच यह है कि शराब का नशा एक भ्रम है,

नशा हो या न हो

इंसान के जज़्बातों के बहने का तय क्रम है,

पीकर कोई अपने नरक में

स्वर्ग के अहसास करे यह संभव है

मगर जिसने नहीं पी

वह भी नरक के अहसास भुला नहीं पाते,

शराब का तो बस नाम है

इंसान अपने जज़्बातों में यूं ही बह जाते,

अपने दर्द का इलाज इंसान क्या करेगा

अपने घाव की समझ नहीं दवा क्या भरेगा,

अलबत्ता, रात में खामोशी बढ़ती जायेगी

बस, पीने वाले ही नशे में नहाकर गरजेंगे।

————–

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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खूबसूरत और डरावने चेहरे-हिंदी व्यंग्य कविता


सामने पर्दे पर खबरची टीवी पर

खबरें ही खबरें चल रही हैं,

देखते रहो तो मानस रोऐगा

यह मानकर गोया कि पूरी दुनियां में

आग ही आग जल रही है,

अरे, जल्दी रात को सो जाओ

कुछ खूबसूरत कुछ डरावने सपने

आने को तैयार खड़े हैं

पथराई आंखें खोले बैठे हो

जिनमें नींद करवट बदल रही है।

कहें दीपक बापू

खबरे पहले से आयोजित,

बहसें हैं प्रायोजित,

कपड़े पहने घूमती नारियों की मर्यादा

कभी बाज़ार में बेचने की शय नहीं होती

पर्दे की नायिकायें बनती वही

जो कपड़ों से बाहर झांकते अंगों वाली

तस्वीर में ढल रही हैं,

खबर दर खबर से ज़माना सुधर जायेगा

यह आसरा देते प्रचार के प्रबंधक,

जिनकी नौकरी है बाज़ार के सौदागरों के यहां बंधक,

भूखे को रोटी देने की बजाय

वह उसकी खबर पकायेंगे,

शीतल हवा क्या वह बहायेंगे,

जिनके खाने की  पुड़ी

देशी घी से भरी कड़ाई में

आग पर तल रही है।

—————————

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

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सम्मान का पाखंड-हिंदी व्यंग्य कविता


 

दौलत के भंडार है उनके घर

 

पर जिस्म में ताकतवर जान नहीं है,

 

महापुरुषों की  तस्वीरों पर

 

चढ़ाते हैं दिखावे के लिये  माला

 

पर दिल में उनके लिये मान नहीं है,

 

सारे जहान में फैला है पाखंड

 

दिखना चाहते हैं शानदार वह लोग

 

जिनकी आंखों में किसी की शान नहीं है।

 

कहें दीपक बापू

 

मजदूर ने तराशा जिस पत्थर को

 

अपनी पसीने से तराशा

 

बन गया भगवान,

 

पड़ा रहा जो रास्ते पर

 

बना रहा दुनियां में अनजान,

 

जिनके पेट भरे हैं

 

उनकी चिंता सभी करते हैं

 

परिश्रम करने वालों को पूरी रोटी मिले

 

इससे आंखें फेरते है

 

स्वर्ग की चिंता में जिंदगी

 

दाव पर लगाते हैं लोग

 

जिसका किसी को ज्ञान नहीं है,

 

दिवंगतों की तस्वीर के  आगे सिर झुकाते लोग

 

शोकाकुल सुरत से श्रद्धा निभाते

 

भले ही उनकी बनती  शान नहीं है।

 

————–

 

 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

 

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

 

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दौलत के भंडार है उनके घर

 

पर जिस्म में ताकतवर जान नहीं है,

 

महापुरुषों की  तस्वीरों पर

 

चढ़ाते हैं दिखावे के लिये  माला

 

पर दिल में उनके लिये मान नहीं है,

 

सारे जहान में फैला है पाखंड

 

दिखना चाहते हैं शानदार वह लोग

 

जिनकी आंखों में किसी की शान नहीं है।

 

कहें दीपक बापू

 

मजदूर ने तराशा जिस पत्थर को

 

अपनी पसीने से तराशा

 

बन गया भगवान,

 

पड़ा रहा जो रास्ते पर

 

बना रहा दुनियां में अनजान,

 

जिनके पेट भरे हैं

 

उनकी चिंता सभी करते हैं

 

परिश्रम करने वालों को पूरी रोटी मिले

 

इससे आंखें फेरते है

 

स्वर्ग की चिंता में जिंदगी

 

दाव पर लगाते हैं लोग

 

जिसका किसी को ज्ञान नहीं है,

 

दिवंगतों की तस्वीर के  आगे सिर झुकाते लोग

 

शोकाकुल सुरत से श्रद्धा निभाते

 

भले ही उनकी बनती  शान नहीं है।

 

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 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

 

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

 

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हिंदी दिवस पर व्यंग्य कविता-अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है


14 सितंबर हिन्दी दिवस के बहाने,

राष्ट्रभाषा का महत्व मंचों पर चढ़कर

बयान करेंगे

अंग्रेजी के सयानो।

कहें दीपक बापू

अंग्रेजी में रंगी जिनकी जबान,

अंग्रेजियत की बनाई जिन्होंने पहचान,

हर बार की तरह

साल में एक बार

हिन्दी का नाम जपते नज़र आयेंगे।

लिखें और बोलें जो लोग हिन्दी में

श्रोताओं और दर्शकों की भीड़ में

भेड़ों की तरह खड़े नज़र आयेंगे,

विद्वता का खिताब होने के लिये

अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है

वरना सभी गंवार समझे जायेंगे,

गुलामी का खून जिनकी रगों में दौड़ रहा है

वही आजादी की मशाल जलाते हैं

वही लोग हमेशा की तरह हिन्दी भाषा के  महत्व पर

एक दिन रौशनी डालने आयेंगे।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

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सूरज की रौशनी में रंग फीके हो जाते हैं-हिंदी व्यंग्य कविता


रोज पर्दे पर देखकर उनके चेहरे

मन उकता जाता है,

जब तक दूर थे आंखों से

तब तक उनकी ऊंची अदाओं का दिल में ख्वाब था,

दूर के ढोल की तरह उनका रुआब था,

अब देखकर उनकी बेढंगी चाल,

चरित्र पर काले धब्बे देखकर होता है मलाल,

अपने प्रचार की भूख से बेहाल

लोगों का असली रूप  बाहर आ ही जाता है।

कहें दीपक बापू

बाज़ार के सौदागर

हर जगह बैठा देते हैं अपने बुत

इंसानों की तरह जो चलते नज़र आते हैं,

चौराहों पर हर जगह लगी तस्वीर

सूरज की रौशनी में

रंग फीके हो ही जाते हैं,

मुख से बोलना है उनको रोज बोल,

नहीं कर सकते हर शब्द की तोल,

मालिक के इशारे पर उनको  कदम बढ़ाना है,

कभी झुकना तो कभी इतराना है,

इंसानों की आंखों में रोज चमकने की उनकी चाहत

जगा देती है आम इंसान के दिमाग की रौशनी

कभी कभी कोई हमाम में खड़े

वस्त्रहीन चेहरों पर नज़र डाल ही जाता है,

एक झूठ सौ बार बोलो

संभव है सच लगने लगे

मगर चेहरों की असलियत का राज

यूं ही नहीं छिप पाता है।

——————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष हिन्दी लेख-श्रीगीता के सृजक को कोटि कोटि नमन


                        आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है।  भारत में धर्मभीरु लोगों के लिये यह उल्लास का दिन है।  इसमें कोई संशय नहीं है कि मनुष्य में मर्यादा का सर्वोत्तम स्तर का मानक जहां भगवान श्रीराम ने स्थापित किया वहीं भगवान श्रीकृष्ण ने अध्यात्मिक ज्ञान के उस स्वर्णिम रूप से परिचय कराया जो वास्तविक रूप से मनुष्यता की पहचान है। भोजन और भोग का भाव सभी जीवो में समान होता है पर बुद्धि की अधिकता के कारण मनुष्य तमाम तरह के नये प्रयोग करने में ंसक्षम है बशर्ते वह उसके उपयोग करने का तरीका जानता हो।  भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में मनुष्य को बुद्धि पर नियंत्रण करने की कला बताई है। आखिर उन्होंने इसकी आवश्यकता क्यों अनुभव की होगी? इसका उत्तर यह है कि मनुष्य का मन उसकी बुद्धि से अधिक तीक्ष्ण है।  बुद्धि की अपेक्षा  से कहीं उसकी गति तीव्र है।  सबसे बड़ी बात मनुष्य पर उसके मन का  ही नियंत्रण है।  ज्ञान के अभाव में मनुष्य अपनी बुद्धि का उपयोग मन के अनुसार करता है पर जिसने श्रीगीता का अध्ययन कर लिया वह बुद्धि से ही मन पर नियंत्रण कर सफलतापूर्वक जीवन व्यतीत करता है। वही ब्रह्मज्ञानी है।

                        चंचल मन मनुष्य को इधर से उधर भगाता है। बेकाबू मन के दबाव में मनुष्य अपनी बुद्धि का उपयोग केवल उसी के अनुसार करता है। बुद्धि की चेतना उस समय तक सुप्तावस्था में रहती है जब तक मन उस पर अधिकार जमाये रहता है।  ऐसे में जो मनुष्य सांसरिक विषयों में सिद्धहस्त हैं वह सामान्य मनुष्य को भेड़ की तरह भीड़ बनाकर हांकते हुए चले जाते हैं।  सामान्य मनुष्य समाज की सोच का स्तर इसी कारण इतना नीचा रहता है कि वह अधिक भीड़ एकत्रित करने वाले सांसरिक विषयों में  प्रवीण लोगों को ही सिद्ध मानने लगता है।

                        इस देश में अध्यात्मिक ज्ञान और धार्मिक कर्मकांडों का अंतर नहीं किया गया।  जिस हिन्दू धर्म की हम बात करते हैं उसके सभी प्रमाणिक ग्रंथों में  कहीं भी इस नाम से नहीं पुकारा गया। कहा जाता है कि प्राचीन धर्म सनातन नाम से जाना जाता था पर इसका उल्लेख भी प्रसिद्ध ग्रंथों में नहंी मिलता। दरअसल इन ग्रंथों में आचरण को ही धर्म का प्रमाण माना गया हैं।  इस आचरण के सिद्धांतों को धारण करना ही अध्यात्मिक ज्ञान कहा जाता है।  हमारी देह पंच तत्वों से बनी है जिसमें मन, बुद्धि तथा अहंकार तीन प्रवृत्तियां स्वाभाविक रूप से आती हैं। हम अपने ही मन, बुद्धि तथा अहंकार के चक्रव्यूह में फंसी देह को धारण करने वाले अध्यात्म को नहीं पहचानते। अपनी ही पहचान को तरसता अध्यात्म यानि आत्मा जब त्रस्त हो उठता है और पूरी देह कांपने लगती है पर ज्ञान के अभाव में यह समझना कठिन है-यदि ज्ञान हो तो फिर ऐसी स्थिति आती भी नहीं।  यह ज्ञान कोई गुरु ही दे सकता है यही कारण है कि गुरु सेवा को श्रीगीता में बखान किया है।  समस्या यह है कि अध्यात्मिक गुरु किसी धर्म के बाज़ार में अपना ज्ञान बेचते हुए नहीं मिलते। जिन लोगों ने धर्म के नाम पर बाज़ार सजा रखा है उनके पास ज्ञान के नारे तो हैं पर उसका सही अर्थ से वह स्वयं अवगत नहीं है। 

                        हमारे देश में धार्मिक गुरुओं की भरमार है। अधिकतर गुरु आश्रमों के नाम पर संपत्ति तथा गुरुपद प्रतिष्ठित होने के लिये शिष्यों का संचय करते हैं।  गुरु सेवा का अर्थ वह इतना ही मानते हैं कि शिष्य उनके आश्रमों की परिक्रमा करते रहें।  श्रीकृष्ण जी ने गुरुसेवा की जो बात की है वह केवल ज्ञानार्जन तक के लिये ही कही है। शास्त्र मानते हैं कि ज्ञानार्जन के दौरान गुरु की सेवा करने से न केवल धर्म निर्वाह होता है वरन् उनकी शिक्षा से सिद्धि भी मिलती है।  यह ज्ञान भी शैक्षणिक काल में ही दिया जाना चाहिये।  जबकि हमारे वर्तमान गुरु अपने साथ शिष्यों को बुढ़ापे तक चिपकाये रहते हैं।  हर वर्ष गुरु पूर्णिमा के दिन यह गुरु अपने आश्रम दुकान की तरह सजाते हैं।  उस समय धर्म कितना निभाया जाता है पर इतना तय है कि अध्यात्म ज्ञान का विषय उनके कार्यक्रमों से असंबद्ध लगता है।  शुद्ध रूप से बाज़ार के सिद्धांतों पर आधारित ऐसे धार्मिक कार्यक्रम केवल सांसरिक विषयों से संबद्ध होते हैं। नृत्य संगीत तथा कथाओं में सांसरिक मनोरंजन तो होता है  पर अध्यात्म की शांति नहीं मिल सकती।  सीधी बात कहें तो ऐसे गुरु सांसरिक विषयों के महारथी हैं।  यह अलग बात है कि उनके शिष्य इसी से ही प्रसन्न रहते हैं कि उनका कोई गुरु है।

                        हमारे देश में श्रीकृष्ण के बालस्वरूप का प्रचार ऐसे पेशेवर गुरु अवश्य करते हैं। अनेक गुरु तो ऐसे भी हैं जो राधा का स्वांग कर श्रीकृष्ण की आराधना करते हैं।  कुछ गुरु तो राधा के साथ श्याम के नाम का गान करते हैं।  वृंदावन की गलियों का स्मरण करते हैं। महाभारत युद्ध में श्रीमद्भावगत गीता की स्थापना करने वाले उन भगवान श्रीकृष्ण को कौन याद करता है? वही अध्यात्मिक ज्ञानी तथा साधक जिन्होंने गुरु न मिलने पर भगवान श्रीकृष्ण को ही गुरु मानकर श्रीमद्भागवत के अमृत वचनों का रस लिया है, उनका स्मरण मन ही मन करते हैं। उन्होंनें महाभारत युद्ध में हथियार न उठाने का संकल्प लिया पर जब अर्जुन संकट में थे तो चक्र लेकर भीष्म पितामह को मारने दौड़े।  उस घटना को छोड़कर वह पूरा समय रक्तरंजित हो रहे कुरुक्षेत्र के मैदान में कष्ट झेलते रहे। एक अध्यात्मिक ज्ञानी के लिये ऐसी स्थिति में खड़े रहने की सोचना भी कठिन है पर भगवान श्रीकृष्ण ने उस कष्ट को उठाया।  उनका एक ही लक्ष्य था अध्यात्मिक ज्ञान की प्रक्रिया से धर्म की स्थापना करना। यह अलग बात है कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर गीता की चर्चा करने की बजाय  उनके बालस्वरूप और लीलाओं पर ध्यान देकर भक्तों की भीड़ एकत्रित करना पेशेवर धार्मिक व्यक्तित्व के स्वामी भीड़ को एकत्रित करना सुविधाजनक मानते हैं।

                        जैसे जैसे आदमी श्रीगीता की साधना की तरफ बढ़ता है वह आत्मप्रचार की भूख से परे होता जाता है। वह अपना ज्ञान बघारने की बजाय उसके साथ जीना चाहता है। न पूछा जाये तो वह उसका ज्ञान भी नहीं देगा। सम्मान की चाहत न होने के कारण वह स्वयं को ज्ञानी भी नहीं कहलाना चाहता। सबसे बड़ी बात वह भीड़ एकत्रित नहीं करेगा क्योंकि जानता है कि इस संसार में सभी का ज्ञानी होना कठिन है।  भीड़ पैसे के साथ प्रसिद्धि दिला सकती है मगर वह  सिद्धि जो उद्धार करती है वह एकांत में ही मिलना संभव है।  गुरु न मिले तो ज्ञान चर्चा से भी अध्यात्म का विकास होता है। श्रीमद्भागवत गीता के संदेश तथा भगवान श्रीकृष्ण का चरित्र भारतीय धरती की अनमोल धरोहर है।  भारतीय धरा को ऐसी महान विरासत देने वाले श्रीकृष्ण के बारे में लिखते या बोलते  हुए अगर होठों पर मुस्कराहट की अनुभूति हो रही हो तो यह मानना चाहिये कि यह उनके रूप स्मरण का लाभ मिलना प्रारंभ हो गया है। ऐसे परमात्मा स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण को कोटि कोटि नमन!

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
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विक्रम संवत 2070 प्रारंभःभिन्न रूपों के बावजूद सांस्कृतिक एकता का प्रतीक-हिन्दू नववर्ष पर एक लेख


आज पूरे भारत में भारतीय नववर्ष 2070 मनाया जा रहा है। इसे हम विक्रमी संवत भी कहते हैं।  मूलतः इसे हिन्दू नर्व वर्ष कहते हैं पर इसे प्रथक प्रथक समाज अपने ढंग से मनाते हैं।  सिन्धी समाज चेटीचांड तो पंजाबी इसे वैशाखी के रूप तो दक्षिण में इसे उगादि का नाम देकर मनाया जाता है। प्रथक नाम होने के बावजूद समाजों में कहीं वैचारिक भिन्नता का भाव नहीं होता।  यही हमारे संस्कार और संस्कृति हैं।

आश्चर्य इस बात का है कि इस अवसर पर भारतीय प्रचार माध्यम केवल औपचारिकता निभाते हुए समाचार भर देते हैं जबकि इसे मनाने वालों की संख्या अंग्रेजी नव वर्ष पर झूमने वालों से अधिक होती है।  इससे यह बात तो पता लगती है कि बाज़ार और प्रचार माध्यम उस नयी पीढ़ी को लक्ष्य कर  अपने कार्यक्रम तथा समाचार बनाते हैं जो उन  आधुनिक वस्तुओं की क्रेता बनती है जिसके विज्ञापन उनके संस्थान चलाते हैं।  हमने दोनो नववर्षों की तुलना करते हुए भारतीय नववर्ष के मनाने वालों की संख्या इसलिये ज्यादा बताई क्योंकि अंग्रेजी नववर्ष पर बधाई ढोने की औपचारिकता वह समाज अब बड़े अनमने ढंग से निभा रहा है जिससे अंग्रेजी भाषा और संस्कृति ने लाचार बना दिया है। हम यह तो नहीं कहते कि अंग्रेजी संस्कृति या भाषा कोई बुरी बात नहीं है पर इतना जरूर मानते हैं कि भाषा, भाव, और भक्त की अपनी अपनी भूमि  से संबंध होता है। भूमि का भूगोल भावों का निर्माण करता है जो कि भाषा और भक्त के स्वरूप का निर्धारित करने वाला तत्व है।  जिस तरह चाय की फसल के लिये असम  तो गेहूं के लिये उत्तर भारत का मैदानी इलाका उपयुक्त है। उसी तरह सेव के लिये हिमालय के बर्फीले इलाके प्रकृति ने बनाये हैं। चावल के लिये छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहा जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि  हम एक फसल को दूसरी जगह नहीं पैदा कर सकते। इन्हीं फसलों के अनुसार ही पर्व बनते हैं। भारतीय नववर्ष सभी जगह भिन्न रूपों में इसी कारण मनाया जाता है।  यह पर्व हर भारतीय धर्म  के मानने वाले के घर में सहजता से मनाया जाता है जबकि अंग्रेजी संवत् के लिये बाज़ार को प्रचार का तामझाम लेकर  जूझना पड़ता है।

हम यहां श्रीमद्भागवत गीता की बात करें तो शायद लोगों को अजीब लगे।  उसमें ‘‘गुण ही गुण को बरतता है’’ वाला सूत्र बताया गया है।  यह  अत्यंत वैज्ञानिक सूत्र है। फिर यह भी कहा जाता है कि जैसा खाये वैसा अन्न। दरअसल अन्न में आत्मा होती है और उसके स्वभाव के भिन्न  रूपों का भी भिन्न स्वभाव है इसलिये उनका सेवन करने वाला उससे प्रभावित होता है।  हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि आदमी रहन सहन, खान पान, और संगत से प्रभावित होता है।  बात को लंबा खींचने की बजाय संक्षेप में यह कहें कि भूमि के अनुसार ही संस्कृति बनती है।  अंग्रेजी भाषा और संस्कृति का भारत में प्रचार हो इसका विरोध हम नहीं कर रहे पर यह स्पष्ट कर दें कि भाषा, भूगोल, भाव तथा भक्त के स्वभाव में वह कभी स्थाई जगह नहीं सकती।  जबरन या अनायास प्रयास से अंग्रेजी संस्कृति, संस्कार और सभ्यता लाने का प्रयास यहां लोगों को अन्मयस्क बना रहा है। लोग न इधर के रहे हैं  न उधर के।  भाषा की दृष्टि में तुतलाहट, भाव की दृष्टि में फुसलाहट और भक्त की दृष्टि में झुंझलाहट स्पष्ट रूप से सामने आती जा रही है। भक्त से हमारा आशय सभ्य मनुष्य से है और विरोधाभास में फंसा हमारा समाज उसका एक समूह है।

अध्यात्म ज्ञान के अभाव में आत्ममंथन की प्रक्रिया हो नहीं  सकती जबकि   एक सभ्य, संस्कारवान और सशक्त व्यक्ति बनने क लिये आत्ममंथन की प्रक्रिया से गुजरना जरूरी है। फिलहाल तो प्रचार माध्यम देश के विकास को लेकर आत्ममुग्ध हैं पर उससे जो भाषा, भाव और भक्त का विनाश हुआ है उसका आंकलन करने का समय अभी किसी के पास नहीं है।  अर्थोपार्जन ने अध्यात्म के विषय को गौण कर दिया है।  ऐसे में इस नववर्ष पर आत्ममंथन की प्रक्रिंया से गुजरने का प्रण करें तो शायद हमें इस विकसित संसार का वह पतनशील दृश्य भी दिखाई दे जिससे हम बचना चाहते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि फिर भी कुछ लोग हैं जो पुरानी राह पर चल रहे हें और उनसे ही यह अपेक्षा की जाती है कि वह आधार भक्त  स्तंभ की तरह भाषा और भाव को बचाये रहेंगे।

इस नववर्ष पर सभी पाठकों को हार्दिक बधाई तथा शुभाकामनायें।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

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वीडियो प्रस्तुति के रूप में प्रयोग के लिए दो छोटी कविताएँ


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रंगों के त्यौहार होली का आध्यात्मिक महत्व-हिंदी लेख


     होली का पर्व पूरे देश में मनाया जा रहा है। जब हम किसी त्यौहार की बात करते हें तो उसके दो पहलू हमारे सामने होते हैं-एक अध्यात्मिक दूसरा सामाजिक।  हम अपने पर्वों पर हमेशा ही सामाजिक दृष्टिकोण से विचार करते हैं। यह माना जाता है कि लोग इस अवसर पर एक दूसरे मिलते हैं जिससे उनके बीच संवाद कायम होता है जो कि  आपसी सामंजस्य मनाये रखने के लिये यह आवश्यक है।  अपने नियमित काम से बचता हुआ आदमी जब कोई पर्व मनाता है तो यह अच्छी बात है।  इस अवसर पर सामाजिक समरसता बनने का दावा भी किया जाता है।  वैसे हमारे देश में अनेक पर्व मनाये जाते हैं।  पूरा देश ही हमेशा पर्वमय रहता है।  अगर मई जून के गर्मी के महीने छोड़ दिये जायें तो हर महीने कोई न कोई त्यौहार होता है इसलिये किसी खास त्यौहार में सामजिक सरोकार ढूंढना व्यर्थ है।

इसके अलावा हमारे देश में  तो अब मगलवार को हनुमानजी और सोमवार के दिन भगवान शिव के मंदिर के अलावा गुरुवार को सांई बाबा के मंदिर में भी भीड़ रहती है।  आम भक्त को कभी कहीं जाने में परहेज नही होती।  इसके अलावा अब तो रविवार लोगों के लिये वैसे भी अध्यात्मिक दिवस बन गया है-हालांकि इसके पीछे अंग्रेजी संस्कृति को अपनाना ही है। यह अलग बात है कि अवकाश की वजह से लोग अब अपने ढंग से छुट्टियां मनाते हैं। कोई अपने गुरु के दरबार जाता है तो कोई कहीं किसी तीर्थस्थान की तरफ निकल जाता है।  जहां तक समाज में औपचारिक मिलन की बात है तो दिवाली, राखी, रामनवमी, कृष्णजन्माष्टमी तथा अन्य अनेक पर्व आते हैं।  लोग एक दूसरे से मिलते हैं। मिलन से भीड़ एकत्रित होती है और वहां चहलपहल के वातावरण में एकांत साधना या ध्यान का कोई स्थान नहीं होता जो कि अध्यात्मिक शांति के लिये आवश्यक है।

इन पर्वो का अध्यात्मिक महत्व भी है।  एकांत में बैठकर चिंत्तन और ध्यान कर हम अपने ज्ञान चक्षुओं को जाग्रत कर सकते हैं जो जागते हुए भी बंद रहते हैं।  होली रंगों का पर्व है पर इसका मतलब यह कतई नही है कि केवल भौतिक पदार्थ ही रंगीन होते हैं। दुनियां का हर रंग हमारे अंदर हैं।  जिस तरह हिन्दी साहित्य में नौ रस है वैसे शब्दों के रंग भी हैं।  अलंकार भी हैं।  उनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं  दिखता क्योंकि शब्दों ही जो भाव होता है उसमें रंग, रस और अलंकार की अनुभूति होती हैं।  सीधा आशय यह है कि खेल केवल बाहर ही नहीं अपने ंअंतर में भी हो सकता है।  यह क्या बात हुई हृदय में सूखा है और बाहर पानी बरसा रहे हैं।  दिमाग में कोई रंग नहंी है पर बाहर हम मिट्टी को रंगकर होली मना रहे हैं। रसहीन विचार होते हैं पर उल्लास का पाखंड करते हैं।

मूल बात यह है कि सुख पाना चाहते हैं पर वह उसका स्वरूप क्या है? यह समझना अभी बाकी है।  लोग अपना मन बहलाने के लिये ताजमहल, कुतुबमीनार या कश्मीर जाते हैं। वहां जाकर अपने घर लौट आते हैं। सुख मिला कि पता नहीं पर घर आकर सफर की थकान मिटाते हुए उनको पसीना आ जाता है।  उस दिन एक सज्जन कुंभ से लौटे तो दो दिन तक घर में पड़े रहे।  दूसरे सज्जन ने पूछा-‘‘क्या बात है, आपकी तबियत ठीक नहीं है?’’

उन्होंने जवाब दिया-‘‘नहीं यार, कुंभ गया था।  बड़ा परेशान हुआ। अब थकान की वजह से बुखार आ गया है। इसलिये आराम कर रहा हूं।’’

क्या उन्होंने वाकई कुंभ में नहाने का सुख लिया। सुख लेने के बाद शरीर में स्फूर्ति होना चाहिये। यदि थकान है तो फिर सुख कहां गया?

सुख लेने या खुश होने के तत्व शरीर में अगर न हों तो फिर कोई इच्छित वस्तु, विषय या व्यक्ति के निकट होने पर भी न दिमाग को राहत मिलती है न ही देह विकार रहित हो पाती है।  आज के मिलावटी तथा महंगाई के युग में तो भौतिकता से वैसे भी सभी को सुख मिलना संभव नहीं है। जिनके पास माया का भंडार है वह भी सुखी नहीं है जिसके पास नहीं है तो उसके सुखी होने की बात  सोचना की गलत है। हमें तो अपने अंदर आनंद प्राप्त करने के लिये योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान के अलावा कोई मार्ग नहीं दिखता।  यह एकांत में ही संभव है। कहीं भीड़ में जाकर आनंद ढूंढना एक व्यर्थ प्रयास है।  वहां से केवल थकावट साथ आती है सुख या खुशी मिलना तो एक स्वप्न होकर रह जाता है।

होली का पर्व अपने अध्यात्मिक महत्व के कारण अत्यंत रंगीन है। मगर  सच बात तो यह भी है कि इस पर्व को अत्यंत संकीर्ण बना दिया गया है। अनेक शहरों में जिन लोगों  आज से बीस साल पहले तक की होली देखी होगी उनका मन कड़वाहर से भर जाता होगा।  उसमें होली के नाम हुड़दंग के अलावा दूसरों को अपमानित करने वालों ने इसे बदनाम किया।  कीचड़ फैंकना, नाली में किसी को गिराना, पगड़ी या गमछा कांटे से खींचना आदि ऐसे प्रसंग जो एक समय इसका हिस्सा थे। अनेक लोग  जबरदस्ती किसी दूसरे पर रंग डाल या मुंह काला कर  अपनी भड़ास निकालते या अपनी शक्ति दिखाते थे।  अब पुलिस तथा प्रशासन की मुस्तैदी के चलते रास्तों में ऐसी बदतमीजी करना खतरे से खाली नहीं है।  इसी कारण ऐसी घटनायें कम हो गयी हैं। फिर अब समय बदल गया है पर फिर भी पुराने लोग आशंकित रहते ही है।  जो लोग इस पर्व की प्रशंसा करते हैं वह जाकर शहरों की हालत देख लें। रंग खेलने  के समयकाल  में सड़कों में भीड़ एकदम इतनी कम हो जाती है जैसे कर्फ्य लगा हो।  अनेक लोग घर में दुबक जाते हैं।  वह तो गनीमत है कि अब मनोरंजन के लिये बहुत सारे साधन हो गये हैं पर जब कम थे तब भी अनेक भले लोग बोरियत झेलते पर घर के बाहर नहीं आते थे।

बहरहाल जिन लोगों को होली भौतिक रंगों से खेलनी है वह खेलें, मगर जिन लोगों को रंगों से परहेज है वह ध्यान और चिंत्तन कर अपना समय निकालें।  उनको होली जैसा एकांत मिलना मुश्किल है। अध्यात्मिक शांति के लिये एकांत में ध्यान के साथ चिंत्तन करना आवश्यक है।  इस होली पर इतना ही। सभी को होली की ढेर सारी शुभकामनायें।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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बालपन का गुलशन-हिंदी शायरी


बालपन की कच्ची माटी में
खिला था गुलशन
उम्र के दौर के साथ मुरझा गया
ख्वाहिशों ने बढ़ाये कदम दिल में
पत्थरों के शहर में सपना सजा नया,
कहें दीपक बापू
उस्ताद के ओहदे पर बैठे लोगों ने
सिखाई केवल मतलबपरस्ती,
दिखाई दौलत के दरिया में मस्ती,
अपनी उम्र से अब वह टूटे
हैंउनके ख्वाब आंखों से रूठे हैं,
अब तक रहे हैं
जवां शार्गिदों के माटी से बने पत्थर दिल में
कब बहेगी नदी बनकर दया।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

कीमत पर वफा का सौदा-हिन्दी कविता


जिंदगी के हर मोड़ पर
लोग मिल ही जाते हैं,
कभी हमें होता अपने कदम  भटकने का अहसास
होती हैरानी यह देखकर
उन्हीं रास्तों  को नया मानकर
लोग चले आते हैं।
कहें दीपक बापू
बेबस ज़माना,
जाने बस पैसा कमाना,
कीमत लेकर करता है वफा का सौदा,
विश्वास निभाने का नहीं, चर्चा का होता मसौदा,
ज़मीन पर जिंदा रहना आता नहीं
लोग पहाड़ों पर सांसों में सुगंध ढूंढने जाते हैं।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

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विज्ञापन और सुंदरियां-हिंदी कविता


कुछ खबरें खुशी में झुलाती हैं,
कुछ खबरें जोर से रुलाती हैं।
कमबख्त!
किस पर देर तक गौर करें
अपनी खूंखार असलियतें भी
जल्दी से अपनी तरफ बुलाती हैं।
कहें दीपक बापू
खबरचियों का धंधा है
लोगों के जज़्बातों से खेलना,
कभी होठों में हंसी लाने की कोशिश होती
कभी शुरु होता आंखों में आंसु पेलना,
बिकने के लिये बाज़ार में बहुत सामान है,
ग्राहक खुश है खरीद कर शान में,
हमारे जज़्बातों से न कर पाये खिलवाड़ कोई
इसलिये फेर लेते हैं नज़रे
विज्ञापनों में दिखने वाली सुंदरियों से
खबर और बहस के बीच कंपनियों के
उत्पाद बिकवाने के लिये
अपने हाथ में झुलाती हैं।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Gwalior, madhyapradesh
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एक कहानी-हिंदी कविता


एक कहानी बनी

पढ़ी लोगों ने

कई कहानियां बन गयी।

कहीं पात्रों के नाम बदले

तो कहीं हालात

लगती है हर कहानी नयी।

कहें दीपक बापू

इंसानों को मजा आता है

एक दूसरे की तकलीफ देखने में

सभी को नहीं मालुम

अंदर खुशी ढूंढने का तरीका

दूसरे के मुसीबत

सभी के दर्द की दवा यूं ही बन गयी।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

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सामान महंगा, आदमी सस्ता-हिंदी हास्य कविता


चेले ने कहा उस्ताद से

‘‘महाराज,

केवल झाड़ फूंकने से अब काम नहीं चलने वाला,

कुछ नया करो वरना लग जायेगा आपकी दरबार में ताला,

आप भी अब फिल्मी हीरो की तरह

माशुका पटाने के नुस्खे बताना शुरु करें,

शायद नये युवा आपके नाम के साथ  शब्द गुरु भरें,

वरना यही सब थम जायेगा,

खालीपन का यहां गम आयेगा,

मेरा भी अब यहां मन नहीं लगता

छोड़ दूंगा आना जब वह उचट जायेगा।सुनकर उस्ताद ने कहा

‘‘जाना है तो चला जा,

तू ही इश्क गुरु बन कर आ,

हमसे यह बेईमानी नहीं हो पायेगी,

इश्क तो मिल जाये पैसे के धोखे मे,

अपनी तबाही पर रोते  लोग

जब जिंदगी की सच्चाई दिखती अभाव के खोके में,

महंगाई का हाल यह है कि

सामान हो गये महंगे

आदमी सस्ता हो गया है,

आशिकी हो सकती है थोड़ी देर

जिंदगी का हाल खस्ता हो गया है,

जब तक किसी ने इश्क करने के तरीके पूछे

तभी तक ठीक है

हम फिल्म के हीरो नहीं

जिंदगी के फलासफे के उस्ताद है

किसी ने पूछा अगर गृहस्थी चलाने का तरीका

तब हमारे पास जवाब मुश्किल होगा,

कमबख्त,

जिस रास्ते से भाग कर

सर्वशक्तिमान का यह डेरा जमाया है

कुछ नहीं केवल उस्ताद का खिताब कमाया है

हम जानते हैं जो इश्क में हमने भोगा,

तू भी कर बंद आना कल से

वरना हमारे अंदर मरे आशिक का

भूत जाकर तेरी पीछे लग जायेगा।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””

Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior

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विदुर नीति-आत्मप्रवंचना से दूर रहने वाला ही लोकप्रिय होता है


      मनुष्य में पूज्यता का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है।  दूसरे लोग उसे देखें और सराहें यह मोह विरले ही छोड़ पाते हैं।  हमारे देश में जैसे जैसे  समाज अध्यात्मिक ज्ञान से परे होता गया है वैसे वैसे ही हल्के विषयों ने अपना प्रभाव लोगों पर जमा लिया है।  फिल्म और टीवी के माध्यम से लोगों की बुद्धि हर ली गयी है।  स्थिति यह है कि अब तो छोटे छोटे बच्चे भी क्रिकेट खिलाड़ी, फिल्म या टीवी अभिनेता अभिनेत्री और गायक कलाकर बनने के लिये जूझ रहे हैं।  आचरण, विचार और व्यवहार में उच्च आदर्श कायम करने की बजाय बाह्य प्रदर्शन से समाज में प्रतिष्ठा पाने के साथ ही धन कमाने का स्वप्न लियेे अनेक लोग विचित्र विचित्र पोशाकें पहनते हैं जिनको देखकर हंसी आती है।  ऐसे लोग  अन्मयस्क व्यवहार करने के इतने आदी हो गये हैं कि देश अब सभ्रांत और रूढ़िवादी दो भागों के बंटा दिखता है।  जो सामान्य जीवन जीना चाहते हैं उनको रूढ़िवादी और जो असामान्य दिखने के लिये व्यर्थ प्रयास कर रहे हैें उनको सभ्रांत और उद्यमी कहा जाने लगा है।  यह समझने का कोई प्रयास कोई नहीं करता कि बाह्य प्रदर्शन से कुछ देर के लिये वाह वाही जरूर मिल जाये पर समाज में कोई स्थाई छवि नहीं बन पाती।
   विदुर नीति में कहा गया है कि


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यो नोद्भुत कुरुते जातु वेषं न पौकषेणापि विकत्वत्तेऽयान्।


न मूचर््िछत्रः कटुकान्याह किंचित् प्रियं सदा तं कुरुते जनेहि।।

 


हिन्दी में भावार्थ-सभी लोग उस मनुष्य की प्रशंसा करते हैं जो कभी अद्भुत वेश धारण करने से परे रहने के साथ कभी  आत्मप्रवंचना नहीं  करता और क्रोध में आने पर भी कटु वाणी के उपयोग बचते हैं।



न वैरमुद्दीययाति प्रशांतं न दर्पभाराहृति नास्तमेसि।


न दुर्गतोऽस्पीति करोत्यकार्य समार्यशीलं परमाहुरायांः।।

 


हिन्दी में भावार्थ- सभी लोग उत्तम आचरण वाले उस पुरुष को सर्वश्रेष्ठ कहते हैं जो कभी एक बार बैर शांत होने पर फिर उसे याद नहीं करता, कभी अहंकार में आकर किसी को त्रास नहीं देता और न ही कभी अपनी हीनता का प्रदर्शन सार्वजनिक रूप  करता है।
     इस विश्व में बाज़ार के धनपति स्वामियों और प्रचार प्रबंधकों ने सभी क्षेत्रों में अपने बुत इस तरह स्थापित कर दिये हैं कि उनके बिना कहीं एक पत्ता भी नहीं हिल सकता।  इनकी चाटुकारिता के बिना खेल, फिल्म या कला के क्षेत्र कहीं भी श्रेष्ठ पद प्राप्त नहीं हो सकता।   क्रिकेट, फिल्म और कला के शिखरों पर सभी नहीं पहुंच सकते पर जो पहुंच जाते हैं-यह भी कह सकते हैं कि बाज़ार और प्रचार समूह अपने स्वार्थों के लिये कुछ ऐसे लोगों को अपना लेते हैं जो पुराने बुतों के घर में ही उगे हों और मगर भीड़ को नये चेहरे लगें-मगर सभी को ऐसा सौभाग्य नहीं मिलता।  ऐसे में अनेक आम लोग निराश हो जाते हैं।  अलबत्ता अपने प्रयासों की नाकामी उन्हे समाज में बदनामी अलग दिलाती है।  ऐसे में अनेक लोग हीन भावना से ग्रसित रहते हैं।  पहले अहंकार फिर हीनता का प्रदर्शन आदमी की अज्ञानता का प्रमाण है।  इससे बचना चाहिए।
  हमें यह बात समझना चाहिए कि व्यक्तिगत व्यवहार और छवि समाज में लंबे समय तक प्रतिष्ठा दिलाती है। यह स्थिति गाना गाकर या नाचकर बाह्य प्रदर्शन की बजाय आंतरिक शुद्धता से व्यवहार करने पर मिलती है। खिलाड़ी या अभिनेता होने से समाज का मनोरंजन तो किया जा सकता है।  बाज़ार और प्रचार समूह भले ही वैभव के आधार पर समाज के मार्गदर्शके रूप में चाहे कितने भी नायक नायिकायें प्रस्तुत करें पर कालांतर में उनकी छवि मंद होही जाती है।
लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर

jpoet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior

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दिल की एक कविता


भीड़ में जाकर
अपना दर्द कहना
अब  हमें नहीं सुहाता है,
अपने गमों से हारे
चीखते चिल्लाते लोग
कानों से सुनते नहीं
अपनी जुबां से
उनको अपना हाल  बयान करना ही  आता है।
कहें दीपक बापू
सर्वशक्तिमान का शुक्रिया
अपने दर्द और खुशी पर
कविता या गीत लिखने की
कला दी है
दिल हर नजारे पर
यूं ही कुछ लफ्ज गुनागुनाता है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
witer ane poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior, madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior

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