Tag Archives: मस्ती

शराब न खुशी बढाती न गम घटाती-हिंदी व्यंग्य कविता


हर रात की तरह आज भी

महफिलों में जाम छलकेंगे,

कुछ लोग मदहोशी में खामोश होंगे,

कुछ अपना मुद्दा उठाकर भड़केंगे,

जाम के पैमाने का हिसाब पीने वाले नहीं रखते

चढ़ गया नशा उनके दिमाग भी बहकेंगे।

कहें दीपक बापू

कमबख्त! शराब चीज क्या है

कोई समझ नहीं पाया,

जिसने नहीं पी वह रहा उदास

जिसने पी वह भी अपने दर्द का

पक्का इलाज नहीं कर पाया,

शराब न खुशी बढ़ाती है,

न गम कभी घटाती है,

छोड़ गयी हमें फिर भी उसके कायल हैं,

अपने घाव कभी नहीं भूलते, ऐसे हम भी घायल हैं,

सच यह है कि शराब का नशा एक भ्रम है,

नशा हो या न हो

इंसान के जज़्बातों के बहने का तय क्रम है,

पीकर कोई अपने नरक में

स्वर्ग के अहसास करे यह संभव है

मगर जिसने नहीं पी

वह भी नरक के अहसास भुला नहीं पाते,

शराब का तो बस नाम है

इंसान अपने जज़्बातों में यूं ही बह जाते,

अपने दर्द का इलाज इंसान क्या करेगा

अपने घाव की समझ नहीं दवा क्या भरेगा,

अलबत्ता, रात में खामोशी बढ़ती जायेगी

बस, पीने वाले ही नशे में नहाकर गरजेंगे।

————–

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 

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खूबसूरत और डरावने चेहरे-हिंदी व्यंग्य कविता


सामने पर्दे पर खबरची टीवी पर

खबरें ही खबरें चल रही हैं,

देखते रहो तो मानस रोऐगा

यह मानकर गोया कि पूरी दुनियां में

आग ही आग जल रही है,

अरे, जल्दी रात को सो जाओ

कुछ खूबसूरत कुछ डरावने सपने

आने को तैयार खड़े हैं

पथराई आंखें खोले बैठे हो

जिनमें नींद करवट बदल रही है।

कहें दीपक बापू

खबरे पहले से आयोजित,

बहसें हैं प्रायोजित,

कपड़े पहने घूमती नारियों की मर्यादा

कभी बाज़ार में बेचने की शय नहीं होती

पर्दे की नायिकायें बनती वही

जो कपड़ों से बाहर झांकते अंगों वाली

तस्वीर में ढल रही हैं,

खबर दर खबर से ज़माना सुधर जायेगा

यह आसरा देते प्रचार के प्रबंधक,

जिनकी नौकरी है बाज़ार के सौदागरों के यहां बंधक,

भूखे को रोटी देने की बजाय

वह उसकी खबर पकायेंगे,

शीतल हवा क्या वह बहायेंगे,

जिनके खाने की  पुड़ी

देशी घी से भरी कड़ाई में

आग पर तल रही है।

—————————

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

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सम्मान का पाखंड-हिंदी व्यंग्य कविता


 

दौलत के भंडार है उनके घर

 

पर जिस्म में ताकतवर जान नहीं है,

 

महापुरुषों की  तस्वीरों पर

 

चढ़ाते हैं दिखावे के लिये  माला

 

पर दिल में उनके लिये मान नहीं है,

 

सारे जहान में फैला है पाखंड

 

दिखना चाहते हैं शानदार वह लोग

 

जिनकी आंखों में किसी की शान नहीं है।

 

कहें दीपक बापू

 

मजदूर ने तराशा जिस पत्थर को

 

अपनी पसीने से तराशा

 

बन गया भगवान,

 

पड़ा रहा जो रास्ते पर

 

बना रहा दुनियां में अनजान,

 

जिनके पेट भरे हैं

 

उनकी चिंता सभी करते हैं

 

परिश्रम करने वालों को पूरी रोटी मिले

 

इससे आंखें फेरते है

 

स्वर्ग की चिंता में जिंदगी

 

दाव पर लगाते हैं लोग

 

जिसका किसी को ज्ञान नहीं है,

 

दिवंगतों की तस्वीर के  आगे सिर झुकाते लोग

 

शोकाकुल सुरत से श्रद्धा निभाते

 

भले ही उनकी बनती  शान नहीं है।

 

————–

 

 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

 

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

 

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

 

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दौलत के भंडार है उनके घर

 

पर जिस्म में ताकतवर जान नहीं है,

 

महापुरुषों की  तस्वीरों पर

 

चढ़ाते हैं दिखावे के लिये  माला

 

पर दिल में उनके लिये मान नहीं है,

 

सारे जहान में फैला है पाखंड

 

दिखना चाहते हैं शानदार वह लोग

 

जिनकी आंखों में किसी की शान नहीं है।

 

कहें दीपक बापू

 

मजदूर ने तराशा जिस पत्थर को

 

अपनी पसीने से तराशा

 

बन गया भगवान,

 

पड़ा रहा जो रास्ते पर

 

बना रहा दुनियां में अनजान,

 

जिनके पेट भरे हैं

 

उनकी चिंता सभी करते हैं

 

परिश्रम करने वालों को पूरी रोटी मिले

 

इससे आंखें फेरते है

 

स्वर्ग की चिंता में जिंदगी

 

दाव पर लगाते हैं लोग

 

जिसका किसी को ज्ञान नहीं है,

 

दिवंगतों की तस्वीर के  आगे सिर झुकाते लोग

 

शोकाकुल सुरत से श्रद्धा निभाते

 

भले ही उनकी बनती  शान नहीं है।

 

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 लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा भारतदीप

 

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

 

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हिंदी दिवस पर व्यंग्य कविता-अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है


14 सितंबर हिन्दी दिवस के बहाने,

राष्ट्रभाषा का महत्व मंचों पर चढ़कर

बयान करेंगे

अंग्रेजी के सयानो।

कहें दीपक बापू

अंग्रेजी में रंगी जिनकी जबान,

अंग्रेजियत की बनाई जिन्होंने पहचान,

हर बार की तरह

साल में एक बार

हिन्दी का नाम जपते नज़र आयेंगे।

लिखें और बोलें जो लोग हिन्दी में

श्रोताओं और दर्शकों की भीड़ में

भेड़ों की तरह खड़े नज़र आयेंगे,

विद्वता का खिताब होने के लिये

अंग्रेजी का ज्ञान जरूरी है

वरना सभी गंवार समझे जायेंगे,

गुलामी का खून जिनकी रगों में दौड़ रहा है

वही आजादी की मशाल जलाते हैं

वही लोग हमेशा की तरह हिन्दी भाषा के  महत्व पर

एक दिन रौशनी डालने आयेंगे।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

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सूरज की रौशनी में रंग फीके हो जाते हैं-हिंदी व्यंग्य कविता


रोज पर्दे पर देखकर उनके चेहरे

मन उकता जाता है,

जब तक दूर थे आंखों से

तब तक उनकी ऊंची अदाओं का दिल में ख्वाब था,

दूर के ढोल की तरह उनका रुआब था,

अब देखकर उनकी बेढंगी चाल,

चरित्र पर काले धब्बे देखकर होता है मलाल,

अपने प्रचार की भूख से बेहाल

लोगों का असली रूप  बाहर आ ही जाता है।

कहें दीपक बापू

बाज़ार के सौदागर

हर जगह बैठा देते हैं अपने बुत

इंसानों की तरह जो चलते नज़र आते हैं,

चौराहों पर हर जगह लगी तस्वीर

सूरज की रौशनी में

रंग फीके हो ही जाते हैं,

मुख से बोलना है उनको रोज बोल,

नहीं कर सकते हर शब्द की तोल,

मालिक के इशारे पर उनको  कदम बढ़ाना है,

कभी झुकना तो कभी इतराना है,

इंसानों की आंखों में रोज चमकने की उनकी चाहत

जगा देती है आम इंसान के दिमाग की रौशनी

कभी कभी कोई हमाम में खड़े

वस्त्रहीन चेहरों पर नज़र डाल ही जाता है,

एक झूठ सौ बार बोलो

संभव है सच लगने लगे

मगर चेहरों की असलियत का राज

यूं ही नहीं छिप पाता है।

——————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष हिन्दी लेख-श्रीगीता के सृजक को कोटि कोटि नमन


                        आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है।  भारत में धर्मभीरु लोगों के लिये यह उल्लास का दिन है।  इसमें कोई संशय नहीं है कि मनुष्य में मर्यादा का सर्वोत्तम स्तर का मानक जहां भगवान श्रीराम ने स्थापित किया वहीं भगवान श्रीकृष्ण ने अध्यात्मिक ज्ञान के उस स्वर्णिम रूप से परिचय कराया जो वास्तविक रूप से मनुष्यता की पहचान है। भोजन और भोग का भाव सभी जीवो में समान होता है पर बुद्धि की अधिकता के कारण मनुष्य तमाम तरह के नये प्रयोग करने में ंसक्षम है बशर्ते वह उसके उपयोग करने का तरीका जानता हो।  भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता में मनुष्य को बुद्धि पर नियंत्रण करने की कला बताई है। आखिर उन्होंने इसकी आवश्यकता क्यों अनुभव की होगी? इसका उत्तर यह है कि मनुष्य का मन उसकी बुद्धि से अधिक तीक्ष्ण है।  बुद्धि की अपेक्षा  से कहीं उसकी गति तीव्र है।  सबसे बड़ी बात मनुष्य पर उसके मन का  ही नियंत्रण है।  ज्ञान के अभाव में मनुष्य अपनी बुद्धि का उपयोग मन के अनुसार करता है पर जिसने श्रीगीता का अध्ययन कर लिया वह बुद्धि से ही मन पर नियंत्रण कर सफलतापूर्वक जीवन व्यतीत करता है। वही ब्रह्मज्ञानी है।

                        चंचल मन मनुष्य को इधर से उधर भगाता है। बेकाबू मन के दबाव में मनुष्य अपनी बुद्धि का उपयोग केवल उसी के अनुसार करता है। बुद्धि की चेतना उस समय तक सुप्तावस्था में रहती है जब तक मन उस पर अधिकार जमाये रहता है।  ऐसे में जो मनुष्य सांसरिक विषयों में सिद्धहस्त हैं वह सामान्य मनुष्य को भेड़ की तरह भीड़ बनाकर हांकते हुए चले जाते हैं।  सामान्य मनुष्य समाज की सोच का स्तर इसी कारण इतना नीचा रहता है कि वह अधिक भीड़ एकत्रित करने वाले सांसरिक विषयों में  प्रवीण लोगों को ही सिद्ध मानने लगता है।

                        इस देश में अध्यात्मिक ज्ञान और धार्मिक कर्मकांडों का अंतर नहीं किया गया।  जिस हिन्दू धर्म की हम बात करते हैं उसके सभी प्रमाणिक ग्रंथों में  कहीं भी इस नाम से नहीं पुकारा गया। कहा जाता है कि प्राचीन धर्म सनातन नाम से जाना जाता था पर इसका उल्लेख भी प्रसिद्ध ग्रंथों में नहंी मिलता। दरअसल इन ग्रंथों में आचरण को ही धर्म का प्रमाण माना गया हैं।  इस आचरण के सिद्धांतों को धारण करना ही अध्यात्मिक ज्ञान कहा जाता है।  हमारी देह पंच तत्वों से बनी है जिसमें मन, बुद्धि तथा अहंकार तीन प्रवृत्तियां स्वाभाविक रूप से आती हैं। हम अपने ही मन, बुद्धि तथा अहंकार के चक्रव्यूह में फंसी देह को धारण करने वाले अध्यात्म को नहीं पहचानते। अपनी ही पहचान को तरसता अध्यात्म यानि आत्मा जब त्रस्त हो उठता है और पूरी देह कांपने लगती है पर ज्ञान के अभाव में यह समझना कठिन है-यदि ज्ञान हो तो फिर ऐसी स्थिति आती भी नहीं।  यह ज्ञान कोई गुरु ही दे सकता है यही कारण है कि गुरु सेवा को श्रीगीता में बखान किया है।  समस्या यह है कि अध्यात्मिक गुरु किसी धर्म के बाज़ार में अपना ज्ञान बेचते हुए नहीं मिलते। जिन लोगों ने धर्म के नाम पर बाज़ार सजा रखा है उनके पास ज्ञान के नारे तो हैं पर उसका सही अर्थ से वह स्वयं अवगत नहीं है। 

                        हमारे देश में धार्मिक गुरुओं की भरमार है। अधिकतर गुरु आश्रमों के नाम पर संपत्ति तथा गुरुपद प्रतिष्ठित होने के लिये शिष्यों का संचय करते हैं।  गुरु सेवा का अर्थ वह इतना ही मानते हैं कि शिष्य उनके आश्रमों की परिक्रमा करते रहें।  श्रीकृष्ण जी ने गुरुसेवा की जो बात की है वह केवल ज्ञानार्जन तक के लिये ही कही है। शास्त्र मानते हैं कि ज्ञानार्जन के दौरान गुरु की सेवा करने से न केवल धर्म निर्वाह होता है वरन् उनकी शिक्षा से सिद्धि भी मिलती है।  यह ज्ञान भी शैक्षणिक काल में ही दिया जाना चाहिये।  जबकि हमारे वर्तमान गुरु अपने साथ शिष्यों को बुढ़ापे तक चिपकाये रहते हैं।  हर वर्ष गुरु पूर्णिमा के दिन यह गुरु अपने आश्रम दुकान की तरह सजाते हैं।  उस समय धर्म कितना निभाया जाता है पर इतना तय है कि अध्यात्म ज्ञान का विषय उनके कार्यक्रमों से असंबद्ध लगता है।  शुद्ध रूप से बाज़ार के सिद्धांतों पर आधारित ऐसे धार्मिक कार्यक्रम केवल सांसरिक विषयों से संबद्ध होते हैं। नृत्य संगीत तथा कथाओं में सांसरिक मनोरंजन तो होता है  पर अध्यात्म की शांति नहीं मिल सकती।  सीधी बात कहें तो ऐसे गुरु सांसरिक विषयों के महारथी हैं।  यह अलग बात है कि उनके शिष्य इसी से ही प्रसन्न रहते हैं कि उनका कोई गुरु है।

                        हमारे देश में श्रीकृष्ण के बालस्वरूप का प्रचार ऐसे पेशेवर गुरु अवश्य करते हैं। अनेक गुरु तो ऐसे भी हैं जो राधा का स्वांग कर श्रीकृष्ण की आराधना करते हैं।  कुछ गुरु तो राधा के साथ श्याम के नाम का गान करते हैं।  वृंदावन की गलियों का स्मरण करते हैं। महाभारत युद्ध में श्रीमद्भावगत गीता की स्थापना करने वाले उन भगवान श्रीकृष्ण को कौन याद करता है? वही अध्यात्मिक ज्ञानी तथा साधक जिन्होंने गुरु न मिलने पर भगवान श्रीकृष्ण को ही गुरु मानकर श्रीमद्भागवत के अमृत वचनों का रस लिया है, उनका स्मरण मन ही मन करते हैं। उन्होंनें महाभारत युद्ध में हथियार न उठाने का संकल्प लिया पर जब अर्जुन संकट में थे तो चक्र लेकर भीष्म पितामह को मारने दौड़े।  उस घटना को छोड़कर वह पूरा समय रक्तरंजित हो रहे कुरुक्षेत्र के मैदान में कष्ट झेलते रहे। एक अध्यात्मिक ज्ञानी के लिये ऐसी स्थिति में खड़े रहने की सोचना भी कठिन है पर भगवान श्रीकृष्ण ने उस कष्ट को उठाया।  उनका एक ही लक्ष्य था अध्यात्मिक ज्ञान की प्रक्रिया से धर्म की स्थापना करना। यह अलग बात है कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर गीता की चर्चा करने की बजाय  उनके बालस्वरूप और लीलाओं पर ध्यान देकर भक्तों की भीड़ एकत्रित करना पेशेवर धार्मिक व्यक्तित्व के स्वामी भीड़ को एकत्रित करना सुविधाजनक मानते हैं।

                        जैसे जैसे आदमी श्रीगीता की साधना की तरफ बढ़ता है वह आत्मप्रचार की भूख से परे होता जाता है। वह अपना ज्ञान बघारने की बजाय उसके साथ जीना चाहता है। न पूछा जाये तो वह उसका ज्ञान भी नहीं देगा। सम्मान की चाहत न होने के कारण वह स्वयं को ज्ञानी भी नहीं कहलाना चाहता। सबसे बड़ी बात वह भीड़ एकत्रित नहीं करेगा क्योंकि जानता है कि इस संसार में सभी का ज्ञानी होना कठिन है।  भीड़ पैसे के साथ प्रसिद्धि दिला सकती है मगर वह  सिद्धि जो उद्धार करती है वह एकांत में ही मिलना संभव है।  गुरु न मिले तो ज्ञान चर्चा से भी अध्यात्म का विकास होता है। श्रीमद्भागवत गीता के संदेश तथा भगवान श्रीकृष्ण का चरित्र भारतीय धरती की अनमोल धरोहर है।  भारतीय धरा को ऐसी महान विरासत देने वाले श्रीकृष्ण के बारे में लिखते या बोलते  हुए अगर होठों पर मुस्कराहट की अनुभूति हो रही हो तो यह मानना चाहिये कि यह उनके रूप स्मरण का लाभ मिलना प्रारंभ हो गया है। ऐसे परमात्मा स्वरूप भगवान श्रीकृष्ण को कोटि कोटि नमन!

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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विक्रम संवत 2070 प्रारंभःभिन्न रूपों के बावजूद सांस्कृतिक एकता का प्रतीक-हिन्दू नववर्ष पर एक लेख


आज पूरे भारत में भारतीय नववर्ष 2070 मनाया जा रहा है। इसे हम विक्रमी संवत भी कहते हैं।  मूलतः इसे हिन्दू नर्व वर्ष कहते हैं पर इसे प्रथक प्रथक समाज अपने ढंग से मनाते हैं।  सिन्धी समाज चेटीचांड तो पंजाबी इसे वैशाखी के रूप तो दक्षिण में इसे उगादि का नाम देकर मनाया जाता है। प्रथक नाम होने के बावजूद समाजों में कहीं वैचारिक भिन्नता का भाव नहीं होता।  यही हमारे संस्कार और संस्कृति हैं।

आश्चर्य इस बात का है कि इस अवसर पर भारतीय प्रचार माध्यम केवल औपचारिकता निभाते हुए समाचार भर देते हैं जबकि इसे मनाने वालों की संख्या अंग्रेजी नव वर्ष पर झूमने वालों से अधिक होती है।  इससे यह बात तो पता लगती है कि बाज़ार और प्रचार माध्यम उस नयी पीढ़ी को लक्ष्य कर  अपने कार्यक्रम तथा समाचार बनाते हैं जो उन  आधुनिक वस्तुओं की क्रेता बनती है जिसके विज्ञापन उनके संस्थान चलाते हैं।  हमने दोनो नववर्षों की तुलना करते हुए भारतीय नववर्ष के मनाने वालों की संख्या इसलिये ज्यादा बताई क्योंकि अंग्रेजी नववर्ष पर बधाई ढोने की औपचारिकता वह समाज अब बड़े अनमने ढंग से निभा रहा है जिससे अंग्रेजी भाषा और संस्कृति ने लाचार बना दिया है। हम यह तो नहीं कहते कि अंग्रेजी संस्कृति या भाषा कोई बुरी बात नहीं है पर इतना जरूर मानते हैं कि भाषा, भाव, और भक्त की अपनी अपनी भूमि  से संबंध होता है। भूमि का भूगोल भावों का निर्माण करता है जो कि भाषा और भक्त के स्वरूप का निर्धारित करने वाला तत्व है।  जिस तरह चाय की फसल के लिये असम  तो गेहूं के लिये उत्तर भारत का मैदानी इलाका उपयुक्त है। उसी तरह सेव के लिये हिमालय के बर्फीले इलाके प्रकृति ने बनाये हैं। चावल के लिये छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहा जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि  हम एक फसल को दूसरी जगह नहीं पैदा कर सकते। इन्हीं फसलों के अनुसार ही पर्व बनते हैं। भारतीय नववर्ष सभी जगह भिन्न रूपों में इसी कारण मनाया जाता है।  यह पर्व हर भारतीय धर्म  के मानने वाले के घर में सहजता से मनाया जाता है जबकि अंग्रेजी संवत् के लिये बाज़ार को प्रचार का तामझाम लेकर  जूझना पड़ता है।

हम यहां श्रीमद्भागवत गीता की बात करें तो शायद लोगों को अजीब लगे।  उसमें ‘‘गुण ही गुण को बरतता है’’ वाला सूत्र बताया गया है।  यह  अत्यंत वैज्ञानिक सूत्र है। फिर यह भी कहा जाता है कि जैसा खाये वैसा अन्न। दरअसल अन्न में आत्मा होती है और उसके स्वभाव के भिन्न  रूपों का भी भिन्न स्वभाव है इसलिये उनका सेवन करने वाला उससे प्रभावित होता है।  हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि आदमी रहन सहन, खान पान, और संगत से प्रभावित होता है।  बात को लंबा खींचने की बजाय संक्षेप में यह कहें कि भूमि के अनुसार ही संस्कृति बनती है।  अंग्रेजी भाषा और संस्कृति का भारत में प्रचार हो इसका विरोध हम नहीं कर रहे पर यह स्पष्ट कर दें कि भाषा, भूगोल, भाव तथा भक्त के स्वभाव में वह कभी स्थाई जगह नहीं सकती।  जबरन या अनायास प्रयास से अंग्रेजी संस्कृति, संस्कार और सभ्यता लाने का प्रयास यहां लोगों को अन्मयस्क बना रहा है। लोग न इधर के रहे हैं  न उधर के।  भाषा की दृष्टि में तुतलाहट, भाव की दृष्टि में फुसलाहट और भक्त की दृष्टि में झुंझलाहट स्पष्ट रूप से सामने आती जा रही है। भक्त से हमारा आशय सभ्य मनुष्य से है और विरोधाभास में फंसा हमारा समाज उसका एक समूह है।

अध्यात्म ज्ञान के अभाव में आत्ममंथन की प्रक्रिया हो नहीं  सकती जबकि   एक सभ्य, संस्कारवान और सशक्त व्यक्ति बनने क लिये आत्ममंथन की प्रक्रिया से गुजरना जरूरी है। फिलहाल तो प्रचार माध्यम देश के विकास को लेकर आत्ममुग्ध हैं पर उससे जो भाषा, भाव और भक्त का विनाश हुआ है उसका आंकलन करने का समय अभी किसी के पास नहीं है।  अर्थोपार्जन ने अध्यात्म के विषय को गौण कर दिया है।  ऐसे में इस नववर्ष पर आत्ममंथन की प्रक्रिंया से गुजरने का प्रण करें तो शायद हमें इस विकसित संसार का वह पतनशील दृश्य भी दिखाई दे जिससे हम बचना चाहते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि फिर भी कुछ लोग हैं जो पुरानी राह पर चल रहे हें और उनसे ही यह अपेक्षा की जाती है कि वह आधार भक्त  स्तंभ की तरह भाषा और भाव को बचाये रहेंगे।

इस नववर्ष पर सभी पाठकों को हार्दिक बधाई तथा शुभाकामनायें।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

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वीडियो प्रस्तुति के रूप में प्रयोग के लिए दो छोटी कविताएँ


http://youtu.be/OazauM-rBQ4

 

वीडियो प्रस्तुति के रूप में प्रयोग के लिए दो छोटी कविताएँ

विज्ञापन और सुंदरियां-हिंदी कविता


कुछ खबरें खुशी में झुलाती हैं,
कुछ खबरें जोर से रुलाती हैं।
कमबख्त!
किस पर देर तक गौर करें
अपनी खूंखार असलियतें भी
जल्दी से अपनी तरफ बुलाती हैं।
कहें दीपक बापू
खबरचियों का धंधा है
लोगों के जज़्बातों से खेलना,
कभी होठों में हंसी लाने की कोशिश होती
कभी शुरु होता आंखों में आंसु पेलना,
बिकने के लिये बाज़ार में बहुत सामान है,
ग्राहक खुश है खरीद कर शान में,
हमारे जज़्बातों से न कर पाये खिलवाड़ कोई
इसलिये फेर लेते हैं नज़रे
विज्ञापनों में दिखने वाली सुंदरियों से
खबर और बहस के बीच कंपनियों के
उत्पाद बिकवाने के लिये
अपने हाथ में झुलाती हैं।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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सामान महंगा, आदमी सस्ता-हिंदी हास्य कविता


चेले ने कहा उस्ताद से

‘‘महाराज,

केवल झाड़ फूंकने से अब काम नहीं चलने वाला,

कुछ नया करो वरना लग जायेगा आपकी दरबार में ताला,

आप भी अब फिल्मी हीरो की तरह

माशुका पटाने के नुस्खे बताना शुरु करें,

शायद नये युवा आपके नाम के साथ  शब्द गुरु भरें,

वरना यही सब थम जायेगा,

खालीपन का यहां गम आयेगा,

मेरा भी अब यहां मन नहीं लगता

छोड़ दूंगा आना जब वह उचट जायेगा।सुनकर उस्ताद ने कहा

‘‘जाना है तो चला जा,

तू ही इश्क गुरु बन कर आ,

हमसे यह बेईमानी नहीं हो पायेगी,

इश्क तो मिल जाये पैसे के धोखे मे,

अपनी तबाही पर रोते  लोग

जब जिंदगी की सच्चाई दिखती अभाव के खोके में,

महंगाई का हाल यह है कि

सामान हो गये महंगे

आदमी सस्ता हो गया है,

आशिकी हो सकती है थोड़ी देर

जिंदगी का हाल खस्ता हो गया है,

जब तक किसी ने इश्क करने के तरीके पूछे

तभी तक ठीक है

हम फिल्म के हीरो नहीं

जिंदगी के फलासफे के उस्ताद है

किसी ने पूछा अगर गृहस्थी चलाने का तरीका

तब हमारे पास जवाब मुश्किल होगा,

कमबख्त,

जिस रास्ते से भाग कर

सर्वशक्तिमान का यह डेरा जमाया है

कुछ नहीं केवल उस्ताद का खिताब कमाया है

हम जानते हैं जो इश्क में हमने भोगा,

तू भी कर बंद आना कल से

वरना हमारे अंदर मरे आशिक का

भूत जाकर तेरी पीछे लग जायेगा।

—————–

 

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””

Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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आग लगाने वाले मशहूर हो गए-हिंदी कविता


रौशनी का चिराग रखा
अंधेरी गली में
मुसाफिरों को रास्ता दिखाने के लिये
किसी ने तारीफ नहीं की
लगाई आग जिन्होंने सड़क पर
मशहूर हो गये,
सनसनी फैलायी जिन्होंने
लोगों के जज़्बातों का कत्ल कर
कभी चमक रहे पर्दे पर
कभी मंच पर चढ़ रहे हैं,
दर्द बांटते रहे
सहलाते रहे जख्म
पूरे ज़माने का
भीड़ में कहीं इसलिये खो गये।
कहें दीपक बापू
दुनियां मे जुल्म करने वाले
कसूरवार नहीं है,
आदी हो गये हैं जमाने के लोग
मर मरकर जीने के
फिर सजा देने वाले
फरिश्ते भी अब उनके हमदर्द हो गये।
——————————
लेखक एवं कवि- दीपक राज कुकरेजा,ग्वालियर
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मरे दिलों में जज़्बातों की तलाश-हिन्दी शायरी


अपनी आँखों से जो देखा है
वह सच किसी को न बताना,
अपने कानों से जो सुना नहीं
वह स्वर किसी को समझाना,
अपने दिमाग में भले ही पालो सपने
वह किसी के सामने न सजाना।
कहें दीपक बापू
जमाने के लोग अपने जिस्म का बोझ उठाने से लाचार है,
खरीदने वहाँ खड़े जाते, जहां खुशी का लगता बाज़ार है,
मरे जज़्बातों में हमदर्दी
ढूँढने में अपना वक्त गंवाना।
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सच का इतिहास-हिन्दी कविता


उदासीन नहीं हैं,
बड़ों बड़ों के बीच लगी है
ऊंचे ऊंचे बयानों की ज़ंग
हम नहीं लड़ेंगे
क्योंकि किसी पद पर आसीन नहीं हैं।
कहें दीपक बापू
बरसों से अखबार पढ़ा है,
नहीं चाहिए किसी से
अपने चेतन होने का प्रमाणपत्र
हमारी सोच में
तुमसे अधिक सच का इतिहास जड़ा है।
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फेसबुक पर बधाईयां पढ़कर अपने जन्मदिन की याद आई-हिन्दी


           
आज फेसबुक देखा तो पता लगा की हमारे लिए खास दिन है। सामाजिक संपर्क बनाने मे इंटरनेट का जो योगदान है वह अब समझ में आ रहा है। बहरहाल अहो, आज 10 मार्च की तारीख पर हमारा जन्मदिन है। सच बात तो यह है कि अंतर्जाल पर ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर वगैरह पर हमने अपने जन्मदिन की तारीख डाली थी तो केवल इस बाध्यता की वजह से कि कहीं परिचय पूरा न होने की वजह से हमारी परिचय सामग्री अपंजीकृत न रह जाये। 10 मार्च को हमारा जन्म हुआ पर आज तक इस तारीख को हमने कभी महत्व नहीं दिया। जन्म दिन तो खैर हमने कभी मनाया ही नहीं। इस बार भी याद नहीं था अगर फेसबुक पर बधाई संदेश नहीं देखते। जन्म दिन की तारीख को भले महत्व नहीं दिया पर बदलते समय के साथ हमने अनेक लोगों को जन्मदिन की बधाई दी है। यह परंपरा हमें विरासत में नहीं मिली। भारतीय अध्यात्म दर्शन में कहीं भी इस तरह जन्म दिन मनाने की चर्चा नहीं है इसलिये हृदय में इस परंपरा को स्थान बहुत देर बाद ही मिला। हमारी स्थिति यह है कि कहीं हम खड़े हों और कोई 10 मार्च की तारीख पुकारे भी तो हम उसे नहीं बताते कि आज हमारा जन्म दिन है-यह अलग बात है कि हमें याद भी न आता हो। सोचते हैं कि क्यों किसी को औपचारिकता पूरे के लिये बाध्य करें। इसमें कोई संदेह नहीं है कि समकालीन लोगों से जन्मदिन की बधाई मिलना हृदय में स्पंदन उत्पन्न नहीं करता। इसकी वजह यह है कि हमारी तरह उनका हाल भी यही है कि जन्म दिन पर औपचारिक रूप से बधाई देकर अपना मित्र धर्म निभाओ भले हृदय में तो उसका स्थाई भाव रहता नहीं हो।
         इधर फेसबुक, ब्लॉग और ट्विटर पर जो नयी पीढ़ी के लोग सक्रिय हैं उनके लिये जन्म दिन का विशेष महत्व है। जन्म दिन की बधाई देना उनके हृदय का स्थाई भाव बन चुका है। ऐसे में जब हम जैसा भावुक आदमी अपने जन्म दिन पर बधाई संदेश पढ़ता है तो पुरानी लीक से हटकर नयी लीक को स्वीकार कर लेता है। नयी पीढ़ी को पाश्चात्य संस्कृति से सराबोर होने का उलाहना देना ठीक नहीं है। आखिर, इसके लिये जिम्मेदार तो हम और हमारे समकालीन ही हैं। फिर हमारे जैसा लेखक बधाई संदेश के उत्तर में केवल धन्यवाद शब्द लिखकर निकल जाये तो वह हृदय स्वीकार नहीं करता। जिस तरह जन्म दिन पर बधाई देना हृदय का स्थाई भाव नहीं है उसी तरह धन्यवाद जैसी औपचारिकता निभाना भी नहीं है। पहली समस्या के हल के लिये हम कुछ नहीं कर सकते पर दूसरे के माध्यम से हम अपने नये मित्रों को यह दिखाकर प्रसन्न तो कर ही सकते हैं कि जिसे उन्होंने जन्म दिन की बधाई दी उसने अपने हृदय से उसे स्वीकार किया। एक लेखक के रूप में हमारे जैसे आम इंसान के लिये भारतीय अध्यात्म दर्शन एक शक्तिपुंज है इसमें कोई संदेह नहीं हैं। उसके अध्ययन से जहां उचित नवीन परंपराओं को स्वीकार करने का सहज भाव पैदा होता है वहीं प्राचीन ज्ञान की आधुनिक संदर्भों में व्याख्या करने की प्रेरणा हृदय में स्थापित हो जाती हैं। अपने जन्म दिन पर बधाई देने वाले अपने नये तथा पुराने मित्रों को धन्यावाद करते हुए जो हमने लिखा है वह हृदय से ही लिखा है। आशा है वह अपना सहयोग आगे भी बनाये रखेंगे।
अपने जन्मदिन के अवसर पर प्रस्तुत है यह कविता
——————————–
अपने जन्मदिन की तारीख
हम कहाँ याद रख पाते हैं,
कैलेंडर में तारीख बदलती हैं
घड़ियाँ बदलती समय
हम हालातों से जूझते रहे उम्र भर
नतीजों के हिसाब में ही
हमेशा खो जाते हैं।
कहें दीपक बापू
पूरे दिन की थकावट
बना देती है रात को बुझा चिराग
हम ठहरे आम इंसान
अंधेरे में अपने ही मौन को साथी पाते हैं,
प्रात: उगता सूरज देता हैं कुछ देर राहत
बाकी दिन तो
अपनी जरूरतों के आग से ही नाता निभाते हैं। 
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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ख्यालों का दरिया-हिन्दी कविता


खत अब हम कहाँ लिखते हैं,
जज़्बातों को फोन पर
बस यूं ही फेंकते दिखते हैं।
कहें दीपक बापू
बोलने में बह गया
ख्यालों का दरिया
खाली खोपड़ी में
लफ्जों का पड़ गया है अकाल
आवाज़ों में टूटे बोल जोड़ते दिखते हैं।
—————-
इस जहां में
लोगों से क्या बात करें
पहले अपनी रूह की तो सुन लें।

कहें दीपक बापू
बात का बतंगड़ बन जाता है
मज़े की महफिलों में
दूसरों की बातें सुनकर
हैरान या परेशान हों
बेहतर हैं लुत्फ उठाएँ
अपने दिल के अंदर ही
जिन्हें खुद सुन सकें
उन लफ्जों का जाल बुन लें।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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ज़िदगी का कारवां और नए पड़ाव-हिन्दी कविता


ज़िंदगी का कारवां
बस यूं ही बढ़ता जाएगा,
रास्ते में आएंगे नए पड़ाव
साथी और हमसफरों के चेहरे भी
बदलते रहेंगे
कोई पीछे छूटेगा
कोई आगे निकाल जाएगा।
कहें दीपक बापू
महफिलों में मिलने वाले लोग
भले ही ताउम्र साथ चलने का वादा करें
मगर रात बीतते बीतते
उनके दावों का असर भी खत्म हो जाएगा,
सुबह फिर कोई नया चेहरा सामने आयेगा।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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टेस्ट क्रिकेट मैच के लिए चाहिए पाँच गुना शक्ति बढ़ाने वाला च्यवनप्राश-हिन्दी व्यंग्य


           च्यवनप्राश में तीन गुना शक्ति होती है-ऐसा कहना है बीसीसीआई क्रिकेट टीम के कप्तान का! अब इस तीन गुना शक्ति का पैमाना नापा जाये तो उसके सेवन से तीन दिन तक ही क्रिकेट खेलने लायक ही हो सकती है। गनीमत है कप्तान ने च्यवनप्राश के विज्ञापन में यह नहीं कहा कि इस च्यवनप्राश के सेवन से पांच गुना शक्ति मिलती है। वरना कंपनी पर उपभोक्ता फोरम में मुकदमा भी हो सकता था। फर्जी प्रचार से वस्तुऐं बेचना व्यापार की दृष्टि से अनुचित माना जाता है।
           बीसीसीआई की क्रिकेट टीम (indian cricket team and his australia tour)विदेश में पांच दिन के मैच खेलने  के लिये मैदान पर उतरती है पर तीन दिन में निपट जाती है। देश के शेर बाहर ढेर हो जाते हैं। सामने वाली टीम के तीन दिन में पांच विकेट जाते हैं और इनके बीस विकेट ढह जाते हैं। क्या करें? एक दिन खेलने की क्षमता है, च्यवनप्राश खाने पर तीन गुना ही शक्ति तो बढ़ती है। बाकी दो दिन कहां से दम दिखायें? इससे अच्छा है तो दो दिन मिलने पर तैराकी करें! क्लब में जायें। जश्न मनायें कि तीन दिन खेल लिये।
         च्यवनप्राश के नायक कप्तान ने तो यहां तक कह दिया है कि टेस्ट अब बंद होना चाहिये। उसकी खूब आलोचना हो रही है। हमारे समझ में नहीं आया कि उसका दोष क्या है? सब जानते हैं कि हमारे देश में शक्तिवर्द्धक के नाम पर च्यवनप्राश ही एक चीज है। अगर उसमें तीन गुना शक्ति आती है तो खिलाड़ी से अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि पांच गुना शक्ति अर्जित करे। इधर बीसीसीआई की क्रिकेट टीम की पांच दिन नहीं चली तो देश में हायतौबा मच गया है। यह हायतौबा मचाने वाले वह पुराने क्रिकेटर हैं जो विज्ञापनों के बोझ तले नहीं दबे। उनको नहीं मालुम कि अधिक धन का बोझ उठाना भी हरेक आदमी के बूते का काम नहीं है। शुद्ध रूप से क्रिकेट एक व्यवसाय है। टीम में वही खिलाड़ी होते हैं जिनके पास कंपनियों के विज्ञापन है। कंपनियां ही इस खेल की असली स्वामी है सामने भले ही कोई भी चेहरा दिखता हो। यही कारण है कि कंपनियों के चहेते खिलाड़ियों को टीम से हटाना आसान नहीं है। पुराने हैं तो फिर सवाल ही नहीं है क्योंकि एक नहीं दस दस कंपनियों के विज्ञापनों के नायक होते हैं। मैच के दौरान वही विज्ञापन आते हैं। इन्हीं कपंनियों के बोर्ड मैदान पर दिखते हैं। क्रिकेट सभ्य लोगों का खेल है और सभ्य लोगों के व्यवसाय और खेल कंपनी के बोर्ड तले ही होते हैं।
          बीसीसीआई की क्रिकेट टीम के विदेश में लगातार आठ बार हारने पर देश भर में रोना रहा है पर वहां क्रिकेट खिलाड़ियों को इसकी परवाह नहीं होगी। उनके पास तो इतना समय भी नहीं होगा कि वह हार के बारे में सोचें। मैच के बचे दो दिन वह अपने व्यवसाय की कमाई का हिसाब किताब जांच रहे होंगे। नये विज्ञापनों का इंतजार कर रहे होंगे। कंपनियां भी आश्वस्त होंगी यह सोचकर कि कोई बात नहीं देश के शेर है फिर यहां करिश्मा दिखाकर लोगों का गम मिटा देंगे। वैसे ही कहा जाता है कि जनता की याद्दाश्त कमजोर होती है।
        बहरहाल कुछ लोग बीसीसीआई की क्रिकेट टीम की दुर्दशा के लिये पूरे संगठन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। हम इस राय के खिलाफ हैं। इससे अच्छा है तो यह है कि ऐसा च्यवनप्राश बनवाना चाहिए जो पांच गुना शक्ति दे सके। इसके लिये अपने यहां अनेक योग भोग चिकित्सक हैं उनकी सहायता ली जा सकती है। क्या इसकी दुगुनी खुराक लेकर छह गुना शक्ति पाई जा सकती है, इस विषय पर भी अनुंसधान करना चाहिए। बीसीसीआई की क्रिकेट टीम के कप्तान ने तो पूरी तरह से ईमानदारी से अपना काम किया है। उसने एक दिवसीय क्रिकेट में जमकर खेला है और च्यवनप्राश के सेवन से तीन गुना शक्ति प्राप्त कर तीन दिन तक पांच दिवसीय क्रिकेट में अपना किला लड़ाया है। अब यह अपने देश के आयुर्वेद विशेषज्ञों की गलती है कि उन्होंने पांच या छह गुना शक्ति वाला च्यवनप्राश नहीं बनाया जिसका विज्ञापन उसे दिया जाता। उससे आय पांच गुना होती तो खेलने का उत्साह भी उतना ही बढ़ता। जब नये संदर्भों में भारतीय अध्यात्म का नये तरह से विश्लेषण हो रहे हैं तो आयुर्वेद को भी इससे पीछे नहीं रहना चाहिए। बिचारे खिलाड़ियों को पांच या छह गुना शक्ति बढ़ाने वाला च्यवनप्राश नहीं दिया गया तो वह क्या करते? सो इस हार को भी व्यंग्य का हाजमोला खाकर हज़म कर लो।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

धोखा और वफा भी-हिन्दी शायरी


रिश्ते जो दूर हो गये
यादों में धुंधले हो जाते हैं,
उनके साथ गुजरे पल
याद्दाश्त से होते हैं बाहर
मतलब है जिनसे
वही यार ताजगी भर पाते हैं,
कहें दीपक बापू
इस दुनियां में धोखा भी
वफा भी मिल जाती है
मगर लोगों के नजरिये अलग अलग
जिसकी नजर जैसी
वैसी ही तस्वीर वह सामने पाते हैं।
———
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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गर्मी सर्दी और बरसात से शरीर का मुकाबला-हिन्दी लेख (garmi sardi aur barsat se sharir ka mukabla-hindi lekh or article)


             ठंड बढ़ रही है, और ऐसा लगता है उन इलाकों से गुजरने पर भी आसपास बर्फ जमे होने का अहसास होता है जो भीषण गर्मी की वजह से जाने जाते हैं। हम भारतीय लोग ठंड, बरसात और गर्मी का सामना करने के आदी माने जाते हैं पर लगता है आधुनिक जीवन शैली ने भारतीय समाज में ढेर सारे विभाजन कर दिये हैं जिसकी वजह से आज हम अपनी कोई बात या अपना सिद्धांत समस्त लोगों पर लागू नहीं कर सकते। मूल बात यह है कि गर्मी का सामना बचकर, बरसात का सामना हटकर और सर्दी का सामना डटकर ही हो सकता है। जब गर्मी में सूर्य की तेज किरणें धरती पर बरस रही हों तब आदमी पेट में पानी भरने के साथ ही पांव में ऐसे जूते पहनकर निकले जिनसे वह जले नहीं। जब बरसात हो रही हो तब जहां तक हो सके अपना सिर भीगने से बचाये ताकि सिर पर पानी पड़ने से स्वास्थ्य की हानि न हो। उसी तरह सर्दी का मुकाबला भले ही रात में बिस्तर में दुबककर हो सकता है पर दिन में जहां तक हो सके अपने शरीर को चलाईये जिससे उसमें अग्नि प्रज्जवलित रहे।
          टीवी पर एक कार्यक्रम में बताया गया कि दिल्ली में बढ़ती सर्दी के बावजूद लोगों के दिमाग में गर्म भरी हुई है। रास्ते चलते हुए वाहन टकराने पर झगड़े और कत्ल हो रहे हैं। इस पर तमाम तरह के सवाल जवाब हो सकते हैं पर मूल बात यह है कि हम मानव के बाह्य रूप के विज्ञान को जानते हैं। संभव है कि कोई मनोविज्ञानिक होने का दावा कर यह बताये कि वह मनुष्य की दिमागी गतिविधियों पर अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत कर कसते हैं। मगर प्रकृति और निवृत्ति के विज्ञान का सही ज्ञान केवल गीता साधकों को ही हो सकता है। इसके सूत्र बहुत हो सकते हैं पर उनका विस्तार करने से असली बात रह जायेगी। मुख्य बात यह है कि मनुष्य शरीर को एक आत्मा धारण करता है जिसके बिना इस जीवन की कल्पना करना मुश्किल है। यह अलग बात है कि इस देह का संचालन मनुष्य स्वाभाविक रूप से मन, बुद्धि तथा अहंकार के वश होने देता है। यह केवल ज्ञानियों के लिये ही संभव है कि इन तीनों प्रकृतियों के प्रभाव से निवृत होना जानते हैं। इसके अलावा पंच तत्वों से बनी देह में जल, अग्नि, आकाश, वायु तथा प्रथ्वी पर जो समयानुसार प्रतिक्रिया होती है उसका भी मनुष्य की मनस्थिति पर प्रभाव पड़ता है। जैसा खाये अन्न वैसा हो मन। जैसा पाये धन वैसा हो जाये तन! हम अगर अधिक ज्ञान की बात करेंगे तो शायद समाज का ऐसा भयानक रूप दिखने लगेगा जिससे अंततः स्वयं को ही असहजता अनुभव होगी मगर सत्य तो सत्य है! हमेशा ज्ञानी बने रहना एकाकी बना देता है।
           अभी तक अधिकतर लोगों का हृदय असहज था तब तक चलता रहा पर अब तो लोगों के मस्तिष्क भी असंवेदनशील हो गये हैं जो कि आने वाले खतरों का संकेत है। उनकी प्राणशक्ति अत्यंत क्षीण है जो उनको असहनशील बना रही है। हमारे देश में विकास का पर्याय भौतिक साधनों के अधिक उपभोग से आंकी जा रही है। चीन से हमारे यहां कंप्युटर कम हैं, वहां के मुकाबले कारें कम चल रही हैं, वहां के मुकाबले हमारे यहां टीवी कम चल रहे तथा वहां के मुकाबले यहां इंटरनेट प्रयोक्ता कम है इसलिये हम उससे पीछे हैं, यह बात देश के हितचिंतक बड़े दुःख से कहते हैं। उपभोक्ता बाजार को बढ़ाया जा रहा है। यही कारण है कि कारें और बाईक की तो संख्या में बढ़ रही है पर सड़के चौडी होने की बजाय अतिक्रमण का शिकार हो गयी हैं। फिर आजकल का खानपान ऐसा है कि लोगों की शक्ति कम हो रही है। जैसा कि कहा जाता है कि जो चीज आदमी के पास नहीं होती वह उसके होने का अहसास करना चाहता है। शक्ति है नहीं पर वह दिखाना चाहता है। इसलिये रास्ते पर जरा जरा सी बात झगड़ा। कहीं कहीं कत्ल हो जाता हैं। कहीं सड़क दुर्घटना पर जाम लग जाता है। हमें तो ऐसा लगता है कि अनेक ऐसे लोगों के पास कार या बाइक आ गयी है जो उसके लायक नहीं है पर मगर यह बात उनसे कहना जान आफत में डालना है। बंदर के हाथ में उस्तरा कहें या गंजे को भगवान ने नाखून दे दिये यह कहें। हमारा समाज यह मानता है कि जिसके पास पैसा है उसके पास सब कुछ है। अक्ल तो भगवान उसे वैसे ही दे देता है। हमारा अनुभव इसका उल्टा है। सबसे ज्यादा नकारा धनवान हो गये है यही कारण है कि समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा राजरोगों की चपेट में है। यह रोग उनकी मनस्थिति को खतरनाक न बनायें यह संभव नहीं है।
          अन्ना हजारे ने समाज में चेतना लायी यह कहते हुए बहुत लोग थकते नहीं है पर इसका मतलब यह है कि हमारे यहां लोग सुप्तावस्था में थे। प्रचार माध्यमों को देखकर भले ही लोग समाज में चेतना का दंभ भर रहे हैं पर यह एक भ्रम है। अनेक मनोविशेषज्ञ लगतार यह कह रहे हैं कि भारत में मनोरोगी इतनी बड़ी संख्या में है कि कईयों को इसका आभास तक नहीं कि वह इसका शिकार हैं। मानसिक रूप से रुग्ण समाज अगर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पर तालियां बजा रहा है तो उसके नायक के अभिनय को श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता है। प्रश्न तो दर्शक दीर्घा में उपस्थित लोगों की योग्यता पर भी संदेह है। भीड़ प्रसिद्ध का प्रमाण है पर प्रतिभा के लिये किसी भी आदमी की योग्यता के भौतिक सत्यापन से ही संभव है जो कि अपने लिये काम करने से नहीं वरन् समाज को कुछ देने से मिल सकता है। आदमी अकेले जीने का आदी है। वह सड़क पर भी अकेले चलने की अनुभूति चाहता है। ऐसे में कोई   वाहन से टक्कर मारत है तो वह उसमें थोड़ी टूट फूट से बिफर जाता है। घबड़ाता है कि घर पर लोग कहीं यह ताना न दें कि वाहन नहीं चलाना आता। इसलिये वह लड़कर अपनी भड़ासं निकालना चाहता है। पैसा वसूलना चाहता है। सर्दी, गर्मी और बरसात अब उसकी देह को प्रभावित करती है मस्तिष्क को नहीं जो कि असंवेदशील हो चुका है।
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इस ब्लाग ने पार की तीन लाख पाठक/पाठक संख्या-हिन्दी संपादकीय


            दीपक भारतदीप समूह के दीपक बापू कहिन ब्लॉग/पत्रिका ने तीन लाख की पाठक/पाठ पठन संख्या पार कर ली है। यह कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है पर जब देश में भाषा का तोतलीकरण-अंग्रेजी शब्दों की मिलावट-हो रहा हो और आधुनिक शिक्षा से ओतप्रोत नयी पीढ़ी सहज हिन्दी को बोध से विरक्त हो रही हो तब हम जैसे फोकटिया लेखकों के लिये इतना ही बहुत है कि उनके ब्लॉग अपनी विषय सामग्री के दम पर कुछ पाठक जुटा लेते हैं। यह सही है कि हिन्दी जगत में इस लेखक का नाम कोई चर्चित हस्ताक्षर नहीं है पर इससे लिखने समय जो बेपरवाही होती है वह ऐसी रचनाओं के सृजन में सहायक होती है जिसको चुराकर लोग छापना चाहते हैं।
             जिस तरह देश को आधुनिक बनाने के नाम पर अंग्रेजी पद्धति थोपी गयी उससे बेरोजगारों की फौज बनती जा रही है। उसी तरह अब हिन्दी भाषा में अंग्रेजी शब्द जोड़कर उसका तोतलीकरण हो रहा है। हमारे देश के मध्यम वर्ग के लोगों में विकास के नाम पर केवल अधिक से अधिक धन संपदा सृजन करते रहने का स्थाई भाव है। अधिक से अधिक सुविधा जुटाने की ललक पूरे समाज में है। सबसे बड़ी बात यह है कि बहुत कुछ कमाकर आराम से जिंदगी गुजारने का लक्ष्य है। इसमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है। मुश्किल यह है कि एक तो लोग आराम करना नहीं जानते दूसरी बात यह कि हमारी जो पंचतत्वों से बनी यह देह है उसमें मन, बुद्धि और अहंकार जैसी तीन प्रकृतियां हैं वह ऐसा नाच नचाती हैं कि विरले ज्ञानी ही उसके दुष्प्रभाव से बच पाते हैं। अगर किसी आदमी को ंसंगमरमर से बनी इमारत में बहुत दिन से रहना पड़े तो उसका मन गांव घूमने का करता है। जो गांव में है वह महल चाहता है। इस अंतर्द्वंद्व में फंसा आदमी इधर से उधर भटकता है। बदलते परिवेश में छोटा निजी व्यवसाय या नौकरी करना छोटे होने का प्रमाण बन गया है। इसलिये हमारा सभ्य समाज अपने लड़के लड़कियों के लिये विदेशों में नौकरी ढूंढ रहा है। पहले अंग्र्रेजी जरूरी जा रही थी तो अब उसे हिंन्दी में मिलाकर हिंगलिश बनाया जा रहा है। सभी को विदेश जगह नहीं मिलेगी और जो देश में बच गये वह यहां किस तरह गांव या मध्यवर्गीय शहर में काम करेंगे क्योंकि उनकी भाषा तो तोतली हो गयी होगी।
          लोगों की अपने बच्चों के भविष्य को लेकर बड़े सपने होते हैं जो अपने शहर में पूरे नहीं होते। इसलिये वह उनको बाहर भेजकर स्वयं अकेले रहना मंजूर कर लेते हैं। यह एकाकीपन अंततः उनके लिये असहनीय होता है। दूर रहते बच्चों पर आक्षेप आता है कि वह माता पिता को देखने नहीं आते। जब संस्कृति और संस्कार की बात हो तो प्राचीन बातें करते हुए सब खुश होते हैं, पर जब स्तर की बात हो तो अपने बच्चों को विदेश या परे दूसरे शहर में रहने के लिये स्वयं तैयार करने वाले दंपत्तियों का यह अंतद्वंद्व समाज में देखा जा सकता है। लब्बोलुआब यह कि खेल रही है माया और आदमी सोच रहा है कि मैं खेल रहा हूं।
       हम जब प्राचीन संस्कारों की बात करते हैं तो यह बात भी देखना चाहिए कि तब व्यवसाय और रहन सहन सहज था। अपने लोग अपनों के पास होते थे। अब विकास के नाम पर हमने जो मार्ग अपनाया है उसमें कथित रूप से संस्कारों की बात तो करना ही नहीं चाहिए। फिर भी लोग कर रहे हैं। ऐसे में व्यंग्य के लिये विषयों की कमी नहीं होती। लोग अपने सिर का बोझ दूसरे पर डालना चाहते हैं पर स्वयं किसी का बोझ उठाने को तैयार नहीं है। एक समृद्ध, संस्कारवान तथा प्रतिष्ठत परिवार का मुखिया होने का मोह आदमी को अंततः ऐसे संकट में डालता है जहां से उबरना सभी के बूते की बात नहीं होती।
        ऐसे में हम जैसे लोग उन गुरुओं का स्मरण करते हुए प्रसन्न होते हैं जिन्होंने तत्वज्ञान दिया है। इस नश्वर देह को लेकर जिस तरह लोग नाटकबाजी करते हुए उसे बर्बाद करते हैं उसे देखकर ज्ञानी लोग दुःखी होते हैं पर मुश्किल यह है कि अपने भौतिक शक्ति केंद्रों पर मजबूती से जमे आदमियों को यह बात समझाना मुश्किल ही नहीं खतरनाक भी होता है। आज ही रहीम के दोहे पर लेख लिखा था। उसका आशय यह था कि सच है तो संसार साथ नहीं है और झूठ है तो राम नहीं मिलते। ऐसे में यहां कुछ पैसा नही भी मिलने पर इस बात की प्रसन्नता होती है कि कबीर, रहीम, तुलसी, चाणक्य, विदुर तथा अन्य विद्वानों के संदेश और उन पर व्याख्यान लिखते हुए जो ज्ञान प्राप्त हो रहा है वह अनमोल है। लोग लाखों कमाते हैं पर ज्ञान तो विरलों को ही मिल पाता है। सच बात तो यह है कि ब्लॉग हमारे गुरु हो रहे हैं।
दीपक बापू ब्लॉग के तीन लाख पाठक/पाठ पठन संख्या पार करने पर पाठकों, मित्र ब्लॉग लेखकों तथा अंतर्जाल पर सक्रिय अज्ञात हिन्दी विशेषज्ञों का आभार। हिन्दी विशेषज्ञों को इसलिये आभार जता रहे हैं कि क्योंकि उनकी वजह से ही अनेक टूल लिखने के लिये मिले हैं।
संपादक और लेखक
दीपक भारतदीप
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com