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क्रिकेट, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन और फिक्सिंग-हिन्दी व्यंग्य (fising in cricket and anti corrupiton movement-hindi satire article


       अन्ना हजारे ने कथित भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के चलते जो प्रतिष्ठा अर्जित की उसे बाज़ार और उसका प्रचार माध्यम भुनाने में लगा है। जनमानस में उनकी लोकप्रियता का दोहन करने के लिये पहले तो फटाखे तथा अन्य सामान अन्ना छाप बने तो लंबी चौड़ी बहसों में टीवी चैनलों का विज्ञापन समय भी पास हो गया। इधर अन्ना हजारे साहब ने अपने ही प्रदेश के एक खिलाड़ी जिसे क्रिंकेट का कथित भगवान भी कहा जाता को भारत रत्न देने की मांग की है। ऐसे में लगता है कि बाज़ार और प्रचार समूहों ने शायद अपने भगवान को भारत रत्न दिलाने के लिये उनका उपयोग करना शुरु कर दिया है। हो सकता है अब यह सम्मान उसे देना भी पड़े। हालांकि इसके लिये अन्ना साहेब को अनशन या आंदोलन का धमकी देनी पड़ सकती है।
         एक बात यहां हम साफ कर दें कि हम न तो अन्ना हज़ारे के आंदोलन के विरोधी हैं न समर्थक! हम शायद इसके समर्थक होते अगर अन्ना ने अपने पहले अनशन की शुरुआत में ही विश्व कप क्रिकेट में भारत की विजय से प्रेरित होकर यह आंदोलन शुरु होने की बात नहीं कही होती। जिस तरह पेशेवर समाज सेवकों की मंडली ने उनके आंदोलन का संचालन किया उससे यह साफ लगा कि कहीं न कहीं आंदोलन प्रायोजित है और देश की निराश जनता में एक आशा का संचार करने का प्रयास है ताकि कहीं उसकी नाराजगी कहीं देश में बड़े तनाव का कारण न बन जाये। ऐसे में बाज़ार और प्रचार समूहों के स्वामियों के लिये यह जरूरी होता है कि वह कोई महानायक खड़ा कर जनता को आशावदी बनाये रखें। उस समय विश्व के कुछ देशों में अपने कर्णधारों के नकारापन से ऊगह निराश जनता हिंसा पर उतर रही थी तब भारतीय जनता में आशा का संचार करने के लिये उनका आंदोलन चलवाया गया लगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी फिक्सिंग होना बुरा नहीं है पर मुश्किल तब होती है जब जज़्बातों ने ओतप्रोत लोगों को यह बात कहीं जाये तो वह उग्र हो जाते हैं
             देश की स्थिति से सभी चिंतित हैं और इस पर तो हम पिछले छह साल से लिख ही रहे है। क्रिकेट का किसी समय हमें बहुत शौक था पर जब क्रिकेट में फिक्सिंग की बात पता चली तो दिल टूट गया और उसके बाद जब कोई इस खेल का नाम लेता है तो हमें अच्छा नहीं लगता।
          क्रिकेट में फिक्सिंग होती है और इस पर चर्चा प्रचार माध्यमों में अब जमकर चल रही है। आज ही पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी कांबली ने आरोप लगाया कि सन् 1996 में कलकत्ता में खेले गये विश्व कप किकेट सेमीफायनल में भारत के कुछ खिलाड़ियों ने मैच में हार फिक्स की थी। 15 साल बाद यह आरोप वह तब लगा रहे हैं जब सारा देश क्रिकेट मैच देखते हुए भी यह मानता है कि वह फिक्स हो सकता है। स्पष्टतः बाज़ार और प्रचार समूहों ने अपने लाभ के लिये क्रिकेट खेल को व्यवसाय बना लिया है। इतना ही नहीं सट्टा बाज़ार में भी वह अन्य उत्पाद से ज्यादा व्यापार करने वाला खेल बन गया है। ऐसे में इस खेल को मनोरंजन के लिये या फिर टाईम पास के लिये देखना बुरा नहीं है पर इसमें शुचिता की आशा करना मूर्खता है।
           जब अन्ना हज़ारे क्रिकेट से अपने लगाव और किसी खिलाड़ी को भारत रत्न देने की बात कर रहे हैं तो उनको नहीं पता कि इससे वह देश के उन लाखों लोगों के घावों को कुरेद रहे हैं जिन्होंने अपनी युवावस्था इस खेल को देखते हुए गुजार दी और तब पता लगा कि उनके देश के खिलाड़ी तो बाज़ार, प्रचार और अपराध जगत के संयुक्त उपक्रम के तय किये हुए पात्र हैं जो उनके इशारे पर ही चलकर कुछ भी कर सकते हैं। ऐसे में उनमें से कुछ लोग अन्ना हजारे के आंदोलन को ही नहीं उनकी कार्यशैली पर भी प्रश्न उठा सकते हैं।
            आखिरी बात यह कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन एक महान कार्य है और उसके अगुआ होने के नाते अन्ना को प्रमाद वाले विषयों से दूर रहना चाहिए था। हम उन पर कोई अपनी बात थोप नहीं रहे पर यह सच है कि क्रिकेट से संबंधित विषय अनेक लोगों के लिये मनोरंजन के अलावा कुछ नहीं है। फिर अन्ना हज़ारे के कथित आंदोलन किसी परिणाम की तरफ जाता नहीं दिख रहा। दूसरा यह भी कि अन्ना हजारे ने जनलोकपाल का जो स्वरूप तय किया था उसे आमजन न समझें हो पर जानकार उस नजर रखे हुए हैं। एक बात यहां भी बता दें कि अन्ना हजारे साहब के लक्ष्य और उनके जनलोकपाल के स्वरूप में तालमेल पहले से ही नहीं दिख रहा था। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को हटाने के लिये जूझ रहे अन्ना साहब ने कहा था कि देश में आम जनता से जुड़ी राशन कार्ड, लाइसैंस, विद्यालयों में बालकों के प्रवेश तथा बिजली पानी समस्याओं का निराकरण होना चाहिए। स्पष्टतः यह सभी राज्यों का विषय है जबकि केंद्र सरकार के लोकपाल की परिधि केवल राष्ट्रीय समस्याओं का हल ही संभव है। फिर अन्ना पूरे देश में एक जनलोकपाल की बात कर रहे हैं पर उसके कार्य क्षेत्र का विषय केवल केंद्र होगा। मान लीजिये संसद में लोकपाल विधेयक पास भी हो गया तो क्या अन्ना आम जनता की समस्याओं के हल का दावा कर रहे हैं वह संभव होगा?
              हम यहां अन्ना समर्थकों को निराश नहीं करना चाहते पर एक बात बता दें कि हमें अन्ना के दावों, सरकार के वादों तथा तथा लोगों की यादों के बीच में जाकर देखना है इसलिये निरंतर इस विषय पर कुछ न कुछ लिखते रहते हैं। यह सही है कि हमें अधिक पढ़ा नहीं जाता पर दूसरा सच यह भी कि सुधि लोग पढ़कर इसे अपने लेखों में स्थान देते हैं। हमारा नाम नदारत हो तो क्या पर वह हमारा संदेश जनता के बीच में जाता तो है। बाज़ार और प्रचार समूह क्रिकेट की बात करते हैं अन्ना भी कर रहे हैं। ऐसे में लगता है कि कहीं न कहीं उनके आंदोलन में फिक्सिंग भी हो सकती है भले ही उन्होंने नहीं की हो। देश में भ्रष्टाचार हटाना तो असंभव है पर उसे न्यूनतम स्तर तक लाया जा सकता है पर वह भी ढेर सारी मुंश्किलों के बाद! अलबत्ता अन्ना चाहें तो अपने ही प्रदेश के खिलाड़ी को भारत रत्न दिला सकते हैं। हां, उन्होंने इतनी अच्छी छवि बना ली है कि बाज़ार अपने व्यापारिक उत्पाद और प्रचार माध्यम विज्ञापन से अच्छी कमाई करवाने वाले भगवाने को भारत रत्न दिला सकता है। अभी तक अन्ना अपने आंदोलन को आधी जीत बताकर जनता को खुश करते रहे थे पर भारत रत्न दिलाकर वह देश के जनमानस को पूरी जीत का तोहफा दे सकते हैं। वैसे भी अन्ना देश में राजकीय क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की बात करते हैं क्रिकेट में उनको वह नहीं दिखता मगर जिनको दिखता है वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बारे में तमाम तरह के अनुमान भी कर सकते हैं। उनको लग सकता है अन्ना हजारे के आंदोलन प्रबंधक चूंकि बाज़ार से प्रायोजित हैं इसलिये उनके माध्यम से वह अपने हित साध सकता है।
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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अन्ना हज़ारे कोर टीम के अरविंद कीजरीवाल के मीडिया को सीख-हिंदी व्यंग्य चिंत्तन (anna hazare core team ke arvind kejariwal aur media-hindi vyangya chittan)


             अन्ना हजारे की कथित कोर टीम की सक्रियता अब हास्य व्यंग्य का विषय बन रही है। अरविंद केजरीवाल एक तरह से इस तरह व्यवहार कर रहे हैं कि जैसे कि वह स्वयं कोई प्रधानमंत्री हों और अन्ना हजारे राष्ट्रपति जो उनकी सलाह के अनुरूप काम कर रहे हैं। दरअसल अब अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन पिछले अनेक महीनों से चलते हुए इतना लोकप्रिय हो गया है कि लगता है कि देश में कोई अन्य विषय ही लिखने या चर्चा करने के लिये नहीं बचा है। अरविंद केजरीवाल, प्रशांत भूषण, और किरण बेदी ने अन्ना हजारे के आंदोलन से जुड़कर जो प्रतिष्ठा पाई है वह उनके लिये इससे पहले सपना थी। इधर जनप्रिय हो जाने से इन सभी ने अनेक तरह के भ्रम पाल लिये हैं। इतना भ्रम तो ब्रह्मज्ञानी भी नहीं पालते। इसका अंदाज इनको नहीं है कि इस देश में बुद्धिमान लोगों की कमी नहीं है जो उनकी गतिविधियों और बयानों पर नजर रखे हुए हैं। अन्ना टीम के सदस्यों ने इतिहास के अनेक महापुरुषों को अपना आदर्श बनाया होगा पर उनको यह नहीं भूलना चाहिए उस समय प्रचार माध्यम इतने शक्तिशाली और तीव्रगामी नहीं थे वरना उनकी महानता भी धरातल पर आ जाती।
          बात दरअसल यह है कि अन्ना हजारे टीम के एक सदस्य अरविंद केजरीवाल अब प्रचार कर्मियों को समझा रहे हैं कि वह अपना ध्यान जनलोकपाल बनवाने पर ही रखें। अन्य विवादास्पद मुद्दो पर ध्यान न दें।
केजरीवाल की प्रचार माध्यमों में बने रहने की इच्छा तो अन्ना के पूर्व ब्लागर राजू परुलेकर ने बता ही दी थी। ऐसे में किरण बेदी के यात्रा दौरों पर विवाद पर बोलने के लिये किसने अरविंद केजरीवाल को प्रेरित किया था? इस सवाल का जवाब कौन देगा?
            किरण बेदी हर विषय पर ऐसा बोलती हैं कि गोया कि उनको हर विषय का ज्ञान है। प्रशांत भूषण ने कश्मीर के विषय पर बयान क्यों दिया? विश्वास नाम के एक सदस्य अन्ना के पूर्व ब्लागर राजू परूलेकर से बहस करने क्यों टीवी चैनल पर आ गये?
         एक ब्लाग लेखक होने के नाते राजू परुलेकर से हमें सहानुभूति है। इस विषय पर लिखे गये एक लेख पर हमारे एक सम्मानीय पाठक ने आपत्ति दर्ज कराई थी। हम उनका आदर करते हुए यह कहना चाहते हैं कि कि अन्ना हजारे और उनके भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को लेकर दुराग्रह नहीं है। इस आंदोलन को लेकर हमने संदेहास्पद बातें अंतर्जाल पर पढ़ी थी और हमें लगता है कि इसके कर्ताधर्ता अपनी गतिविधियों से दूर नहीं कर पाये है।
          अन्ना हजारे की प्रशंसा में अब हमें कोई प्रशंसात्मक शब्द भी नहीं कहना क्योंकि उनके दोनों अनशन केवल आश्वासन लेकर समाप्त हुए और इससे उन पर अनेक लोगों ने संदेह के टेग लगा दिये हैं। उनके साथ जुड़ी कथित सिविल सोसायटी के सदस्य भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से प्रचार पाकर अपने अन्य कार्यों के प्रचार में उसका लाभ उठा रहे हैं। कोई हल्का फुल्का लेखक होता तो उनको जोकर कहकर अपना जी हल्का कर लेता है पर हम जैसा चिंतक जानता है कि कहीं न कहीं इस आंदोलन  को जारी करने के पीछे जन असंतोष को भ्रमित करने का प्रायोजित भी हो सकता है। भ्रष्टाचार सहित अन्य समस्याओं से लोगों के असंतोष है। यह असंतोष की वीभत्स रूप न ले इसलिये उसके सामने काल्पनिक महानायक के रूप में अन्ना हजारे को प्रस्तुत किया गया लगता है क्योंकि उनका मार्गदर्शन करने वाली कथित कोर टीम में पेशेवर समाज सेवक हैं जो पहले ही अन्य विषयों पर चंदा लेकर अपनी सक्रियता दिखाते हैं। सीधी बात कहें कि बाज़ार अपना व्यवसाय चलाने के लिये समाज में धर्म, राजनीति, और फिल्म के अलावा सेवा के नाम पर भी संगठन प्रायोजित करता है ताकि लोग निराशा वादी हालतों में आशावाद के स्वप्न देखते हुए यथास्थिति के घेरे में बने रहें। माननीय टिप्पणीकार कहते हैं कि अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के के विरुद्ध समाज में चेतना जगायी पर उसका परिणाम क्या हुआ है? यह सवाल हम हर लेख में करते रहे हैं और इस जारी रखेंगे।
           अरविंद केजरीवाल प्रचार कर्मियों को सिखा रहे हैं कि अन्य विषयों से हटकर केवल भ्रष्टाचार पर ही अपना ध्यान केंद्रित करें। अब उनसे कौन सवाल करे कि किरण बेदी की यात्राओं पर विवाद पर उन्होंने क्यों अपना बयान दिया? सीधी बात है कि वह अपने को अन्ना का उत्तराधिकारी साबित करना चाहते हैं। भ्रष्टाचार हटाने में उनकी दिलचस्पी कितनी है यह तो समय बतायेगा। जब अन्ना के अनशन का प्रचार चरम पर था तब यही केजरीवाल हर निर्णय का जिम्मा अन्ना पर सौंप देते थे। अब इन्हीं  प्रचार माध्यमों ने उनको इतना ज्ञानवान बना दिया है कि वह उनको सिखा रहे हैं कि अपना ध्यान केवल जनलोकपाल पर केंद्रित करें।
          प्रशांत भूषण से किसने कहा था कि कश्मीर पर बयान दो। इससे भी एक महत्वपूर्ण बात है कि केजरीवाल ने कहा था कि हमारे साथ जुड़े छोटे मोटे विवादों से बड़ी समस्या देश में व्याप्त भ्रष्टाचार है फिर क्यों अन्य विषयों पर जवाब देने आ जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि अन्ना हजारे की कोर टीम एक मुखौटा दिख रही है जिसकी डोर कहीं अन्यत्र केंद्रित है। अन्ना हजारे अनशन करने और आंदोलन चलाने में सिद्धहस्त हैं पर वह भी बिना पैसे नहीं चलते और यही पेशेवर समाज सेवक उनका खर्च उठाते हैं। ऐसे में यह संभव नहीं है कि अन्ना उनके बिना काम कर सकें। मूल बात यह है कि जब तक कोई परिणाम नहीं आता ऐसे सवाल उठते हैं। मूल बात यह है कि यह आंदोलन अभी नारों से आगे नहीं बढ़ पाया। इंटरनेट में फेसबुक के साथ ट्विटर पर इसका समर्थन बहुत दिखता है पर ब्लाग और वेबसाइटों पर अभी इसे परखा जा रहा है। फेसबुक और ट्विटर पर नारे लिखकर लोग काम चला लेते हैं इसलिये ‘अन्ना हम तुम्हारे साथ हैं, क्योंकि जनलोकपाल के पीछे तुम्हारे हाथ हैं’ के नारे लिखे जा सकते हैं पर ब्लाग और वेबसाईटों पर विस्तार से लिखने वाले पूरी बात लिखकर ही चैन पाते हैं। इसलिये अन्ना की कोर टीम को दूसरों से गंभीरता दिखाने की बजाय स्वयं गंभीर होना चाहिए।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com
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अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) की कोर टीम और ब्लॉगर की ज़ंग-हिन्दी व्यंग्य (ward war between anna hazare core team and his blogger-hindi satire article)


             अन्ना हजारे की टीम ने राजू परूलेकर नामक ब्लॉगर से पंगा लेकर अपने लिये बहुत बड़ी चुनौती बुला ली है। हमने परुलेकर को टीवी चैनलों पर देखा। अन्ना टीम का कोई सदस्य भी योग्यता में उनके मुकाबले कहीं नहीं टिकता। अब भले ही अन्ना हजारे ने अपनी टीम को बचाने के लिये उससे किनारा कर लिया है पर यह कहना कठिन है कि भविष्य में क्या करेंगे? अगर राजू परुलकर की बात को सही माने तो एक न एक दिन अन्ना का अपनी इसी कोर टीम से टकराव होगा।
             अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अब एक ऐसी बहुभाषी फिल्म लगने लगी है जिसकी पटकथा बाज़ार के सौदागरों के प्रबंधकों ने राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक विषयों में पारंगत लेखकों से लिखवाया है तो इन्हीं क्षेत्रों में सक्रिय उनके प्रायोजित नायकों ने अभिनीत किया है। बाज़ार से पालित प्रचार माध्यम सामूहिक रूप से फिल्म को दिखा रहे हैं। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि जैसे किसी टीवी चैनल पर कोई कई कड़ियों का धारावाहिक प्रसारित हो रहा है। इसमें सब हैं। कॉमेडी, रोमांच, रहस्य, कलाबाजियां और गंभीर संवाद, सभी तरह का मसाला मिला हुआ है।
          अन्ना के ब्लॉगर राजू ने जिस तरह राजफाश किया उसके बाद अन्ना की गंभीर छवि से हमारा मोहभंग नहीं हुआ पर उनके आंदोलन की गंभीरता अब संदिग्ध दिख रही है। यहां हम पहले ही बता दें कि सरकार ने एक लोकपाल बनाने का फैसला किया था। उस समय तक अन्ना हजारे राष्ट्रीय परिदृश्य में कहीं नहीं दिखाई दे रहे थे। लोकपाल विधेयक के संसद में रखते ही अन्ना हजारे दिल्ली में अवतरित हो गये। उससे पहले बाबा रामदेव भी जमकर आंदोलन चलाते आ रहे थे। देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक वातावरण बन गया था जिसका लाभ उठाने के लिये चंद पेशेवर समाजसेवकों ने अन्ना हजारे के लिये दिल्ली में अनशन की व्यवस्था की। अन्ना रालेगण सिद्धि और महाराष्ट्र में भले ही अपने साथ कुछ सहयोगी रखते हों पर दिल्ली में उनके लिये यह संभव इसलिये नहीं रहा होगा क्योंकि उनका कार्यक्षेत्र अपने प्रदेश के इर्दगिर्द ही रहा है। इन्हीं पेशेवर समाज सेवकों ने प्रचार माध्यमों की सहायता से अण्णा हजारे को महानायक बना दिया। देश में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी तथा बीमारी से परेशान लोगों के लिये अण्णा हजारे एक ऐसी उम्मीद की किरण बन गये जिससे उनको रोशनी मिल सकती थी। प्रचार माध्यमों को एक ऐसी सामग्री मिल रही थी जिससे पाठक और दर्शक बांधे जा सकते थे ताकि उनके विज्ञापन का व्यवसाय चलता रहे।
        हालांकि अब अन्ना हजारे का जनलोकपाल बिल पास भी हो तो जनचर्चा का विषय नहीं बन पायेगा क्योंकि महंगाई का विषय इतना भयानक होता जा रहा है कि लोग अब यह मानने लगे हैं कि भ्रष्टाचार से ज्यादा संकट महंगाई का है जबकि अन्ना हजारे जनलोकपाल के नारे के साथ ही चलते जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह कि वह दूसरों को बनाये प्रारूप पर काम कर रहे हैं। स्पष्टतः यह जनलोकपाल उनके स्वयं का चिंत्तन का परिणाम नहीं है। गांधीजी की तरह उनकी गहन चिंत्तन की क्षमता प्रमाणिक नहीं मानी जा सकती। जहां तक उनके आंदोलनों और अनशन का सवाल है तो वह यह स्वयं कहते हैं कि उन्होंने कई मंत्री हटवायें हैं और सरकारें गिरायी हैं। ऐसे में यह पूछा जा सकता है कि उनके प्रयासों से रिक्त हुए स्थानों पर कौन लोग विराजमान हुए? क्या वह अपने पूर्ववर्तियों  की तरह से साफ सुथरे रह पाये? आम आदमी को उनसे क्या लाभ हुआ? सीधी बात कहें तों उनके अनशन या आंदोलन दीर्घ या स्थाई परिणाम वाले नहीं रहे। अगर उनका प्रस्तावित जनलोकपाल विधेयक यथारूप पारित भी होता है तो वह परिणाममूलक रहेगा यह तय नहीं है। ऐसे में उनका आंदोलन आम लोगों को अपनी परेशानियों से अलग हटाकर सपनों में व्यस्त व्यस्त रखने का प्रयास लगता है। जिस तरह फिल्मों के सपने बेचे जाते हैं उसी तरह अब जीवंत फिल्में समाचारों के रूप प्रसारित होती दिख रही हैं।
           अभी तक अन्ना को निर्विवाद माना जाता था पर राजू ब्लॉगर को हटाकर उन्होंने अपनी छवि को भारी हानि पहुंचाई है। राजू ब्लॉगर के अनुसार अन्ना चौकड़ी के दबाव में आ जाते हैं। इतना ही नहीं यह चौकड़ी उनका सम्मान नहीं करती। जिस तरह अन्ना ने पहले इस चौकड़ी से पीछा छुड़ाने की बात कही और दिल्ली आकर फिर उसके ही कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहे हैं उससे लगता है कि कहीं न कहंी न वह अपने अनशन और आंदोलन पर खर्च होने वाले पैसे के लिये उनके कृतज्ञ हैं। जब देश में पेट्रोल के दाम बढ़ने पर शोर मचा है तब अपने फोन टेपिंग का मामला प्रचार माध्यमों में उछाल रहे हैं। एक तरफ कहते हैं कि हमें इसकी चिंता नहीं है दूसरी तरफ अपने राष्ट्रभक्त होने का प्रमाणपत्र दिखा रहे हैं। सीधी बात कहें तो पेट्रोल की मूल्यवृद्धि से लाभान्वित पूंजीपतियों को प्रसन्न कर रहे हैं जो कहीं न कहीं इन पेशेवर समाजसेवकों के प्रायोजक हो सकते हैं।
        अब हमारी दिलचस्पी अन्ना हजारे से अधिक राजू ब्लॉगर में हैं। अन्ना ने दूसरा ब्लाग बनाकर दो सहायकों को रखने की बात कही है। राजू ब्लॉगर ने एक बात कही थी कि उनके ब्लॉग देखकर अन्ना टीम ने यह प्रतिबंध लगाया था कि उनसे पूछे बगैर उस पर कोई सामग्री नहीं रखी जाये। अन्ना ने इस पर सहमति भी दी थी। राजू ब्लॉगर ने उस पर अमल नहीं किया पर अब लगता है कि अन्ना के नये सहायक अब यही करेंगे। ऐसा भी लगता है कि उनकी नियुक्ति अन्ना टीम अपने खर्च पर ही करेगी। ऐसे में अन्ना हजारे पूरी तरह से प्रायोजक शक्तियों के हाथ में फंस गये लगते हैं। वह त्यागी होने का दावा भले करते हों पर रालेगण सिद्धि से दिल्ली और दिल्ली से रालेगण सिद्धि बिना पैसे के यात्रा नहंी होती। बिना पैसे के अनशन के लिये टैंट और लाउडस्पीकर भी नहीं लगते। अन्ना की टीम के चार पांच पेशेवर समाज सेवक पैसा लगाते हैं इसलिये पच्चीस सदस्यीय समिति में उनका ही रुतवा है। अभी तक अन्ना इस रुतवे में फंसे नहीं दिखते थे पर अगर राजू परुलेकर की बात मानी जाये तो अब वह स्वतंत्र नहीं दिखते। आखिरी बात यह है कि कहीं न कहीं अन्ना हजारे के मन में आत्मप्रचार की भूख है जिसे शांत रखने के लिये वह किसी की भी सहायता ले सकते हैं। राजू ब्लॉगर के अनुसार अन्ना ने अपनी टीम के सबसे ताकतवर सदस्य के बारे में कहा था कि ‘समय पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है।’
          मतलब अन्ना जांगरुक और त्यागी हैं तो आत्मप्रचार पाने के इच्छुक होने के साथ ही चालाक भी हैं। इधर अन्ना टीम ने एक ऐसे ब्लॉगर से पंगा लिया है जो लिखने पढ़ने और जानकारी के विषय में उनसे कई गुना अधिक क्षमतावान है। अभी तक अन्ना विरोधी जो काम नहीं कर पाये यह ब्लॉगर वही कर सकता है। ऐसे में अगर वह अन्ना टीम प्रचार माध्यमों में भारी पड़ा तो अन्ना पुनः उसे बुला सकते हैं। बहरहाल आने वाला समय एक जीवंत फिल्म में नये उतार चढ़ाव का है। आखिर इस धारावाहिक या फिल्म में एक ब्लॉगर जो दृश्य में आ रहा है। यह अलग बात है कि फिल्म या धारावाहिकों में इस तरह का परिवर्तन नाटकीय लगता है पर अन्ना हजारे के आंदोलन के जीवंत प्रसारण में यह एकदम स्वाभाविक है। हम यह दावा नहीं करते कि यह आंदोलन प्रायोजित है पर अगर है तो पटकथाकारों को मानना पड़ेगा।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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मन मरा तो आदमी जिंदा नहीं रहेगा-हिन्दी चिंत्तन आलेख (man mara to aadmi jinda nahin rahega-hindi cnittan aalekh)


सोनाली और अनुराधा नाम की दो बहिनों ने छह माह तक अपने घर में स्वयं को बंद रखा। उन्होंने यह कैद खुद चुनी। उन्होंने भूख को चुना, प्यास को चुना यानि स्वयं अपनी मौत खुद चुनी। उसकी जिम्मेदारी किसी पर डालने का प्रयास बेतुका है। भाई जिम्मेदार है या समाज या पड़ौसी या पास में ही कार्यरत कल्याण संस्था के पदाधिकारी, यह सोचना व्यर्थ है। बिना रोए बच्चे को मां भी दूध नहीं पिलाती-क्या यह बात उन दोनों ने नहीं सुनी थी। पढ़ी लिखी थीं, प्रकृति ने उनको सारी इद्रियां कार्यरूप में प्रदान की थी। वह मन को मारकर बैठ गयीं तो उन इंद्रियों से काम कौन लेता? यह मन ही तो इंद्रियों को दौड़ता है, लड़ाता है और बहलाता है।
उनकी कहानी कोई ऐसी नहीं है जिस पर अधिक लिखा जाये। हादसों से गुजरता इंसान कई बार भारी तकलीफ में आ जाता है पर चंचल मन उसे आगे ले जाता है। वह लड़ता है फिर चल पड़ता है। इस संसार में ऐसा कौन है जिसने अपना नहीं खोया और कौन ऐसा है जो अपना नहीं खोएगा। पहले मां खोई फिर पिता! फिर उनका भाई विवाह के बाद अपनी बहिनों को दिल्ली में उनको छोड़कर बैंगलौर चला गया। उनका प्रिय कुत्ता मर गया। पहले तनाव फिर अवसाद के दौर में दोनों बहिनों की इंद्रियों को निष्क्रिय कर दिया। अहंकार बुरा होता है पर उसका भी इस सीमा तक होना जरूरी है कि ‘मेरा पास काम करने वाली देह है और वह बेकार नहीं है।’
इद्रियों की निष्क्रियता और अहंकार की शून्यता के परिणामस्वरूप आंखों से रूप दर्शन, कानों से स्वर श्रवण, नाक से गंध को ग्रहण, मुख से रस का उपभोग और देह से स्पर्श करते हुए भी उसकी अनुभूति से दूर हो गयीं। मन मरा तो मनुष्य देह होते हुए भी मृत हो जाता है। दूर दृश्यों के प्रसारण में उनके चेहरे देखे तो तय करना कठिन हो रहा था कि क्या देख रहे हैं? मानवियां या उनके शव! वह गुणातीत हो जातीं तो योगी कहलातीं पर अवसाद और निराशा ने उनको मनोरोगी बना दिया। देह विकारों की पहचान न करते हुए स्वयं ही विकारमयी हो गयी।
कुछ दिन पहले दूरदूश्यों में एक 80 वर्ष का योगी दिखाया गया जिसने 70 वर्ष तक कुछ खाया पीया नहीं था! मगर वह सक्रिय था पर अनुराधा और सोनाली योगी नहीं थी नतीजा वह शवरूप होती गयीं। योगी होती तो आदर की पात्र होतीं पर शवरूप हो गयीं तो दया उन पर बरसने लगी।
दोनों चार्टेड एकाउंटेंट और कंप्यूटर की जानकार थीं। अवसाद ने अपने कौशल से ही उनको दूर कर दिया। सोनाली ने दूरदृश्यों में कहा ‘किसी ने उनको कालू जादू किया था।’
हैरान करती हैं यह बात! हमारे आधुनिक शिक्षाविद् दावा करते हैं कि अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के विकास से देश अंधविश्वास से मुक्त हो जायेगा? यह तो उल्टा हो रहा है? पढ़े लिखे लोगों की जीवन से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है और ऐसे में दैहिक निष्क्रियता से उनका आत्मविश्वास लुप्त हो जाता है। अपढ़ महिला पुरुष काला जादू पर यकीन करते हैं पर फिर भी जीवन से लड़ते हैं पर पढ़ा लिखा आदमी तो संघर्ष करना ही छोड़ देता है। एक शानदार फ्लैट में रही रहीं थी। सभ्रांत परिवार और वैसा ही आसपास समाज भी बस रहा था। ऐसे में जिंदगी के सामने आत्मसमर्पण करते हुए भूख और प्यास को गले लगाना! यकीनन यह शिक्षित आदमी का काम नहीं लगता पर यह सच्चाई है। इस देश में ऐसी हजारों ऐसी महिलायें हैं जो अकेली होते हुए भी अपना संघर्ष जारी रखती हैं। यकीनन वह कथित रूप से उच्च सभ्रांत परिवार की नहीं होती।
हमारे बुद्धिजीवी समाज पर बरस रहे हैं। आजकल का पूरा समाज ही उनको अब संवेदनहीन दिखाई दे रहा है? समाज यानि क्या? लोगों का समूह ही न! मगर उसकी कोई अपनी सक्रियता नहीं होती। उसमें शामिल लोगों की निजी सक्रियता ही समाज की सक्रियता कहलाती है। फिर हर आदमी की निजता अलग है वैसे ही उसकी गतिविधि भी। बड़े शहर और सभ्रांत निवासघरों की निजता एकांत है जबकि छोटे शहरों और असभ्रांत, गरीब तथा शिक्षित समाज के लोग  निजता परिवार, पड़ौस तथा पैसा तीनों के साथ जोड़ते हैं। जरूरत पड़ने पर अहंकार दिखाते हैं तो फिर विनम्र भी हो जाते हैं। जीवन में लोचदार रुख अपनाने के लिये जरूरी है अतिअहंकार रहित होना और अंग्रेजी शिक्षा मनुष्य को एकांगी तथा अतिअहंकारी बना देती है। अपनी देह को नष्ट करने वालों की सूची अगर देखी जाये तो उसमें आधुनिक शिक्षा के छात्रों की संख्या कहीं अधिक है पर प्राचीन शिक्षा में रचे बसे लोग कम ही दिखेंगे यह अलग बात है कि हम उनको अशिक्षित और गंवार कहते हैं।
सभी बुद्धिजीवी बड़े शहरों में सभ्रांत समाजों में रहते हैं। वह वही समाज देख रहे हैं। देश में असभ्रांत, गरीब, अशिक्षित समाज से जुड़े छोटे शहरों के लोगों का संघर्ष वह नहीं देख पाते। जब हम अपने समाज को देखते हैं तो बड़े शहरों का समाज अपनी देश के छोटे और मझौले शहरों से अलग दिखता है। महात्मा गांधी ने शहरी और ग्रामीण भारत की पहचान की थी। वह अमीर और गरीब के बीच खाई पाटना चाहते थे। गांधी दर्शन इसलिये ही लोकप्रिय नहीं हो सका क्योंकि वह मध्य वर्गीय शहरों और नागरिकों को समझ नहीं पाये । एक मध्य वर्गीय शहरी भारतीय अमीरी का स्वांग करते हुए देश और समाज के लिए लड़ता भी है पर जब टूटता है तो भयानक अवसाद में घिर जाता है। यही वह वर्ग है जो विचाराधाराओं को अपनी प्रयासों से प्रवाहित करता है। गांधी दर्शन भारत में चर्चित बहुत है पर लोकप्रिय नहीं बन सका क्योंकि उसमें मध्य शहरी भारतीय वर्ग के लिये कुछ नहीं है। इस वर्ग ने गांधीजी के स्वतंत्रता को ताकत दी पर पाया कुछ नहीं। इसके विपरीत गरीब के कल्याण का बात करते हुए इसी मध्यम वर्ग की उपेक्षा की गयी।
समाज कोई व्यक्ति नहीं है। जब आप समाज को संबोधित करते हुए कोई बात कर रहे हैं तो समझ लीजिये हवा में उड़ा रहे हैं। समाज से व्यक्ति की पहचान है पर मनुष्य की इंद्रियां समाज के स्वरूप को समझ नहीं सकती। उसके लिये मन और बुद्धि की सक्रियता आवश्यक है। वह लोगों में मरती जा रही है। यह समाज की मौत नहीं है पर व्यक्ति को असहाय कर मौत के मार्ग पर जाने के लिये के प्रेरणादायक है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मतलब यह बिना दूसरे मनुष्य के साथ के जिंदा नहीं रह सकता। मनुष्य का स्वामी उसका मन है और अगर अपने आसपास मरे मन वाले मनुष्य हैं तो उनका होना न होना बराबर है। सोनाली और अनुराधा दोनों का मन मर गया। वह साथ होते हुए भी साथ नहीं थी। यह भयानक एकांत था। यह मार्ग उन्होंने स्वयं चुना था। इसके लिये कौन जिम्मेदार माना जा सकता है।
अनुराधा ने देह त्याग दी पर सोनाली जीवित है। वह अस्पताल में है। भाई आ गया है। भाई का संघर्ष ही सोनाली का मन जिंदा कर सकता है। मनो चिकित्सक इस बात को नहीं समझ पायेंगे कि आखिर हुआ क्या था? कुछ नहीं हुआ था। यह मन चंचल है। चलता रहे तो चलता रहे, मना खड़ा रहा तो जिंदा आदमी को मुर्दा बना देता है। हमारा अध्यात्मिक दर्शन मन पर नियंत्रण करने के लिये कहता है उसे मारने के लिये नहीं! अपढ़, अशिक्षित, और ग्रामीण भारत के लोग अध्यात्मिक दर्शन के निकट रहते हैं और भले ही मन पर नियंत्रण करने की कला नहीं जानते पर उसे मरने नहीं देते। काले जादू से भी नहीं। सोनाली स्वस्थ हो इसके लिये हमारी उसे हमारी शुभकामनायें हैं क्योंकि आदमी को मारता मन है न कि काला जादू।
लेखक संपादक-दीपक “भारतदीप”, ग्वालियर 
writer and editor-Deepak “Bharatdeep” Gwalior
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विश्व कप क्रिकेट के मैच साफ सुथरे होने पर सवाल-हिन्दी व्यंग्य (vishwa cup tournment ke cricket match-hindi vyangya)


अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने पाकिस्तान के तीन खिलाड़ियों को स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में अगले कुछ वर्ष तक न खेलने देने का दंड दिया है। इस दंड की सजा सुनाने के लिये एक गोरा चेहरा लाया गया ताकि यह लगे कि सारा काम ईमानदारी से ईमानदारी लाने के लिये किया गया है। मगर कमबख्त जिस तरह सावन का अंधा हर जगह हरियाली देखता है वैसे ही क्रिकेट का वह अंधा सभी जगह फिक्सिंग देखता है जिसने कई वर्षों तक अपनी आंखों टीवी पर मैच देखकर बर्बाद की और अब जाकर पता लगा कि इसमें मैच ही नहीं बल्कि हर बॉल फिक्स होती हैै।
पहले तो यह माना जाता था कि गोरे ईमानदार हैं पर अब वह बात नहीं रही। क्रिकेट में कोई मैच बिना फिक्सिंग के भी हो सकता है यह मानना अब कठिन लगता है। याद रखिये भारत के कुछ खिलाड़ी भी फिक्सिंग का दंड भोग चुके हैं और उससे अनेक क्रिकेट प्रेमियों को निराश किया। सच तो यह है कि यह खेल अब खेल नहीं बल्कि व्यापार है। व्यापार में जिस तरह वस्तु बेचने के लिये तमाम तरह का प्रचार किया जाता है वैसा ही क्रिकेट के खिलाड़ियों का हो रहा है। यह जरूरी नहीं है कि जिस चीज की कोई विशेषता बताई जा रही है वह उसमें न हो पर यह व्यापार और प्रचार का हिस्सा है। उसे गलत नहीं माना जाता। यही स्थिति क्रिकेट भी व्यापार है। हो सकता है कि लोग किसी टीम को जीतने की इच्छा से मैदान पर आयें पर वह हार जाये पर उससे पहले मैदान पर दर्शकों को खींचने के लिये उनकी जीतने की इच्छा वाली टीम के खिलाड़ियों को नायक की तरह प्रचारित करना जरूरी है। भारतीय टीम के एक एक खिलाड़ी का जीवन चरित्र प्रचारित हो रहा है। वह बचपन में क्या खाता था, अब क्या खाता है, पहले कहां पढ़ता था और तब उसके दोस्त कौन थे? गोया भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल होना जैसे किसी फिल्म के लिये अच्छे अभिनय के लिये पुरस्कार मिलने जैसा हो। बहरहाल चूंकि अब हम क्रिकेट को खेल न मानते हुए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मानते हैं तब कुछ भी बुरा नहीं लगता। यकीन करिये न मैच फिक्स होना बुरा लगता है और न ही  स्पॉट फिक्सिंग।
अगला एक दिवसीय क्रिकेट विश्व कप भारत में होना है। पहले यह पाकिस्तान में होना था मगर भारत को अवसर मिल गया। मिलना ही था क्योंकि पूरे विश्व की क्रिकेट का खेल भारतीय कंपनियों के विज्ञापन से चल रहा है। इसके मैचों पर सट्टा भी एशियाई देशों में अधिक लगता है और यकीनन भारत में इसके स्त्रोत अधिक हैं। जिस तरह दुनियां में एक नंबर और दो नंबर के धंधेबाजों के हर क्षेत्र में संयुक्त उद्यम चल रहे हैं उसे देखकर लगता है कि क्रिकेट मैचों में कहीं न कहीं  फिक्सिंग होती ही होगी। कंपनियों को विज्ञापन तथा उत्पाद बेचने हैं इसलिये खिलाड़ियों के चेहरे चमकाने हैं। सट्टेबाजों को आम लोगों के जुआ खेलने की आदत का लाभ उठाना है सो फिक्सिंग करानी है। सट्टेबाज ही कंपनियों में भी भारी विनिवेश करते हैं। उनसे कोई बैर नहीं बांधता क्योंकि धनपति तो उनकी कृपा से शिखर पर पहुंचे हैं। मतलब काले धंधों का चेहरा अब कंपनियों के सफेद चेहरे के पीछे छिप जाता है जो कि भारतीय होने के साथ और क्रिकेट का मज़बूत आधार भी हैं।
भारतीय टीम के खिलाड़ियों का जोरदार प्रचार हो रहा है। इन सभी का खेल जाना पहचाना है और अभी हाल ही में दक्षिण अफ्रीका में सबकी असलियत पता लग ही गयी थी। क्रिकेट के कथित भगवान की चाहत है कि एक विश्व कप उसके नाम पर चढ़ जाये पर लगता नहीं है कि पूरी होगी। भारतीय खिलाड़ियों के पास पैसा देश की कंपनियों की वजह से आ रहा है पर उनमें पराक्रम चाहे कितना भी हो रणनीतिक क्षेत्र में उनका ज्ञान शून्य है जबकि आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका की टीमें रणनीति के साथ खोलती  हैं। उसके बाद न्यूजीलैंड, वेस्ट इंडीज और श्रीलंका की टीमें भी कम नहीं है।
बाज़ार और प्रचार प्रबंधक देश में किसी तरह क्रिकेटमय वातवरण बनाना चाहते हैं पर लगता है कि बन नहीं रहा। पहले लोग शिद्दत के साथ इंतजार करते थे वह अब नहीं दिखता। मैच होंगे तो जबरन हर चैनल पर देखने ही पड़ेंगे। अखबार भी रंगे होंगे। इसके बावजूद क्रिकेट के लिये पहले जैसा वातावरण नहीं है।
पाकिस्तान एक आसान लक्ष्य है इसलिये उसके खिलाड़ी दंडित हो गये पर दुनियां के अन्य देशों के खिलाड़ी आरोप लगने और प्रमाण होने के बावजूद बचते रहे हैं। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान के खिलाड़ियों को दंडित कर इस क्रिकेट के साफ सुथरे होने के संकेत भारत के लोगों को भेजे गये हैं ताकि वह मैदान पर पैसा खर्च करें और उनके खिलाड़ियों के अभिनीत विज्ञापनों पर नज़र डालें। पाकिस्तान के प्रति में भारतीय लोगों में नाराजगी भी है इसलिये उसका दोहन करने के लिए यहाँ पाकिस्तानी खिलाड़ियों को दंडित कर यहां के दर्शकों को प्रसन्नता देने का भी यह प्रयास लगता है। हम यह नहीं कहते कि ऐसा ही है पर क्रिकेट में अपना दिल और समय लगाया और वह टूट गया तो ऐसा कि मानता ही नहीं कि अब इसमें कुछ साफ सुथरा बचा है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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