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विकास और दौलत-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


अपनी हालातों से लाचार लोग दूसरों की ताकते हैं,

दौलत के पहाड़ पर बैठे लोग उसकी केवल ऊंचाई नापते हैं।

कहें दीपक बापू फैशन के नाम पर लोग कर रहे

अपनी जिंदगी से खिलवाड़

रौशनी के लिये लगा लेते अपने ही घर में आग

वह रोते है मगरं  तमाशाबीन उस पर हाथ तापते हैं।

———

कन्या भ्रुण हत्या करते हुए थका नहीं समाज,

वर के लिये वधुओं के आयात की बात हो रही आज,

कहें दीपक बापू  लोग अपनी पुरानी सोच को

आधुनिक विज्ञान के साथ ढो रहे हैं,

बेजुबान पशु पक्षी की तरह जीना मंजूर कर लिया

मनुष्य शरीर है पर अक्ल खो रहे हैं,

अब बारी आ रही है जब नस्ल पर ही गिरेगी गाज।

———–

तख्त पर जो बैठ जाये वही बुद्धिमान कहलाता है,

खामोश भीड़ सामने बैठती वह रास्ता बतलाता है।

कहें दीपक बापू कुदरत का नियम है बड़ो के बोले भी बड़े

छोटा वही ज्ञानी है जो अपने घाव खुद ही सहलाता है।

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पुराने विकास के दौर में बड़ी बड़ी इमारतें खड़ी हो गयी,

अब गिरने लगी हैं तो नये विनाश की कड़ी हो गयी।

कहें दीपक बापू नये विकास का कद तो बहुत ऊंचा होगा

विनाश का ख्याल नहीं उम्मीद अब पहले से बड़ी हो गयी।

———-

विकास को दौर पहले भी चलते रहे हैं,

चिराग अपना रंग बदलकर हमेशा जलते रहे हैं।

कहें दीपक बापू आम आदमी महंगाई के बाज़ार में खड़ा रहा

उसका भला चाहने वाले दलाल महलों में पलते रहे हैं।

एक बात तय है कि आज जो बना है कल ढह जायेगा,

पत्थरों से प्रेम करने वाला हमेशा पछतायेगा,

बड़े बड़े बादशाह तख्त बेदखल हो गये,

चमकीले राजमहल देखते देखते खंडहर हो गये,

इतिहास में उगे बहुत लोग उगत सूरज की तरह

मगर समय के साथ सभी ढलते रहे हैं।

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भारत में आस्तिक और नास्तिक की पहचान कठिन-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन लेख


      अमेरिका में नास्तिकतावादी चर्चों का प्रभाव बढ़ रहा है- समाचार पत्रों प्रकाशित यह खबर दिलचस्प होने के साथ  विचारणीय भी है। पाश्चात्य दृष्टि से  ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करने वालो को कहा जाता है। न करने वाले को नास्तिक का तमगा लगाकर निंदित घोषित किया जाता है। वहां के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण है जिनमें धर्मांध समाज के क्रूर शिखर पुरुषों ने नास्तिक होने को आरोप लगाकर अनेक लोगों को निर्दयी दंड दिया।  हमारे यहा आस्तिकता और नास्तिकता के विवाद अधिक  संघर्ष नहीं देखे जाते इसलियें ऐसे उदाहरण नहीं मिलते।  यह अलग बात है कि परमात्मा के अस्तित्व पर हार्दिक आस्था रखने वाले कितने हैं इसका सही आंकलन करना सहज नहीं है। कारण यह कि यहां धर्मभीरुता का भाव अधिक है इसलिये  कुछ चालाक लोग तो केवल इसलिये धर्म के धंधे में आ जाते हैं कि भीड़ का आर्थिक दोहन किया जा सके।  वह पुराने ग्रंथों को रटकर राम का नाम लेकर अपने मायावी संसार का विस्तार करते हैं।  माया के शिखर पर बैठे ऐसे लोग एकांत में वह परमात्मा पर चिंत्तन करने होंगे इस पर यकीन नहीं होता।  सच्ची भक्ति का अभाव यहां अगर न देखा गया होता तो हमारे हिन्दी  साहित्य में भक्तिकाल के कवि कभी ऐसी रचनायें नहीं देते जिनमें समाज को सहज और हार्दिक भाव से परमात्मा का स्मरण करने का संदेश दिया गया।  इतना ही नहीं संत कबीर और रहीम ने तो जमकर भक्ति के नाम पर पाखंड की धज्जियां उड़ाईं है। स्पष्टतः यह इस बात का प्रमाण है कि हमारे समाज में भक्ति के नाम पर न केवल पाखंड रहा है बल्कि अपनी शक्ति अर्जित करने तथा उसके प्रदर्शन करने का भी यह माध्यम रहा है।

      अगर हम पाश्चात्य समाज में नास्तिकतावाद के प्रभाव की खबर को सही माने तो एक बात साफ लगती है कि कहीं न कहीं वहां वर्तमान प्रचलित धर्मों की शक्ति में हृास हो रहा है। हम यह सोचकर प्रसन्न न हों कि भारतीय धर्मों में कोई ज्यादा स्थिति बेहतर है क्योंकि कहीं न कहीं अंग्रेजी पद्धति की शिक्षा के साथ ही रहन सहन तथा खान पान में हमने जो आदते अपनायी हैं उससे यहां भी समाज मानसिक रूप से लड़खड़ा रहा है।  यहां नास्तिकतवाद जैसा तत्व सामाजिक वातावरण में नहीं है पर अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति  व्याप्त उदासीनता का भाव वैसा ही है जैसा कि पश्चिम में नास्तिकवाद का है।

      हम यहां भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की बात करें तो उसमें ज्ञान और कर्मकांडों के बीच एक पतली विभाजन रेखा खिंची हुई है जो दिखाई नहीं देती।  श्रीमद्भागवत गीता में स्पष्टतः स्वर्ग दिलाने वाले कर्मकांडों के प्रति रुचि दिखाने वालों को अज्ञानी बताया गया है।  मूल बात यह है कि भक्ति  आतंरिक भाव से की जाने वाली वह क्रिया मानी गयी है जो मानसिक विकारों से परे ले जाती है शर्त यह कि वह हृदय से की जाये।  इसके विपरीत भारत के बाहर पनपी विचाराधाराओं में अपने समूहों के लिये बकायदा खान पान और रहन सहन वाले बंधन लगाये गये हैं। इसके विपरीत भारतीय अध्यात्मिक दर्शन उन्मुक्त भाव से जीवन जीने की प्रेरणा देता है।  वह किसी वस्तु, विषय और व्यक्ति में दोष देखने की बजाय साधक को आत्ममंथन के लिये प्रेरित करता है।  इतना ही नहीं अध्यात्मिक दर्शन तो किसी कर्म को भी बुरा नहीं मानता पर वह यह तो बताता है कि वह अपनी प्रकृत्ति के अनुसार कर्ता को परिणाम भी देते हैं।  अब यह कर्ता को सोचना है कि किस कर्म को करना और किससे दूर रहना है। भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा के प्रवाह में लोच है।  वह परिवर्तन के लिये तैयार रहने की प्रेरणा देती है। अध्यात्मिक ज्ञान के साथ भौतिक विज्ञान के साथ संयुक्त अभ्यास करने का संदेश देती है।

      हम अक्सर विश्व में अध्यात्मिक गुरु होने के दावे का बखान करते हैं पर स्वयं अपनी मौलिक विचारधारा से दूर हटकर पाश्चात्य सिद्धांतों को अपना रहे हैं।  कहा जाता है कि अध्यात्मिक ज्ञान मनुष्य को मानसिक रूप से दृढ़ता प्रदान करता है जो कि सांसरिक विषयों में युद्धरत रहने के लिये आवश्यक है। भगवान के प्रति आस्था होने या न होने से किसी दूसरे को अंतर नहीं पड़ता वरन् हमारी मनस्थिति का ही इससे सरोकार है।  आस्था हमारे अंदर एक रक्षात्मक भाव पैदा करती है और सांसरिक विषयों संलिप्त रहते हुए सतर्कता बरतने की प्रेरणा के साथ आशावाद के मार्ग पर ले जाती है जबकि अनास्था आक्रामकता और निराशा पैदा करती है। तय हमें करना है कि कौनसे मार्ग पर जाना है।  संभव है कि हम दोनों ही मार्गों पर चलने वालों की भीड़ जमा कर लें पर हमारी दूरी हमारे स्वयं के कदम ही तय करते हैं और हमारा लक्ष्य हमारी तरह ही एकाकी होता है उसे किसी के साथ बांटना संभव नहीं है।

      भारत में नास्तिक विचाराधारा अभी प्रबल रूप से प्रवाहित नहीं है पर कुछ लोग हैं जिन्होंने यह दावा करना शुरू कर दिया है। ऐसे ही हमारे एक मित्र ने हमसे सवाल किया-‘‘आप भगवान पर विश्वास करते हैं?’

      हमने उत्तर दिया कि ‘‘पता नहीं!

      उसने कहा-‘‘पर आप तो अध्यात्म पर लिखते हैं।  यह कैसे हो सकता है कि परमात्मा पर विश्वास न करें।  मैं तो नहीं करता।’’

      हमने कहा-‘‘हम तो अभी शोध के दौर से हैं।  जब काम पूरा हो जायेगा तब आपको बतायेंगे।

      उसने व्यंग्यताम्क रूप से कहा-‘‘अभी तक साधना से आपने कुछ पाया है तो बताईये  भगवान है कि नहीं!’’

      हमने कहा-‘‘वह अनंत है। हमारा दर्शन तो यही कहता है।’’

      फिर उसने व्यंग्य किया-‘‘अरे वाह, सभी कहते हैं कि वह एक है।’’

      हमने कहा-‘‘वह एक है कि अनेक, यह बात कहना कठिन है पर वह अनंत है।’’

      वह झल्ला गया और बोला-‘‘आप तो अपना मत बताईये कि वह है कि नहीं?’’

      हमने कहा-‘‘अगर हम हैं तो वह जरूर होगा।’’

      वह चहक कर बोला-‘मैं हूं इस पर कोई संशय नहीं पर भगवान को नहीं मानता।’

      हमने पूछा-‘‘मगर तुम हो यह बात भी विश्वास से कैसे कह सकते हो।’’

      वह चौंका-‘इसका क्या मतलब?’’

      हमने कहा-‘हमने अध्यात्मिक ग्रंथों में पढ़ा है कि ब्रह्मा जी के स्वप्न की अवधि में ही यह सृष्टि चलती है।  हम सोचते हैं कि जब ब्रह्मा जी के सपने या संकल्प पर ही यह संसार स्थित है तो फिर हम हैं ही कहां? अरे, हमारी निद्रा में भी सपने आते हैं पर खुलती है तो सब गायब हो जाता है।’’

      वह थोड़ी देर खामोश रहा फिर बोला-‘यार, तुम्हारी बात मेंरी समझ में नहीं आयी।’’

      हमने कहा-‘हमने तुम्हारे भगवान के प्रति विश्वास या अविश्वास का उत्तर इसलिये ही नहीं दिया क्योंकि अध्यात्मिक साधना करने वाले ऐसे प्रश्नों से दूर ही रहते हैं।’’

      उस बहस का कोई निष्कर्ष निकलना नहीं था और न निकला। आखिरी बात यह है कि अध्यात्मिक साधना करने वालों के लिये इस तरह की बहसें निरर्थक होती है जिनमें व्यक्ति अपने प्रभाव बढ़ाने के लिये तर्क गढ़ते हैं।  अध्यात्मिक साधना नितांत एकाकी विषय है और परमात्मा के प्रति विश्वास या अविश्वास बताने की आवश्यकता अपरिपकव ज्ञानियों को ही होती है।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
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गर्मी पर लिखकर बरसात लाने का प्रयास-फुर्सत में लिखा गया लेख


         देश में गर्मी पड़ना कोई नयी बात नहीं है।  सब जानते हैं कि जून का माह सबसे ज्यादा गर्म रहता है।  हिन्दू संवत् के अनुसार यह जेठ का महीना होता है जिसकी पहचान ही आग बरसाती गर्मी से होती है। जिन लोगों ने नियमित रूप से इस गर्मी का सामना किया है वह जानते हैं कि वर्षा ऋतु के आगमन का मार्ग यही जेठ का महीना तय करता है।  गर्मियों की बात करें तो नौतपा यानि नौ दिन तो भीषण गर्मी की वजह से ही पहचाने जाते हैं। हमारा बरसों से  यह अनुभव रहा है इन नौतपा में जमकर गर्म हवा चलती है।  धर की जिस वस्तु पर हाथ रखो वही गर्म मिलती है भले ही छाया में रखी हो।  इतना ही नहीं रात में भी गर्म हवा चलती है।  यह सब झेलते हैं यह सोचकर कि नौ दिन की ही तो बात है यह अलग बात है कि आजकल नौतपा इतने नहीं तपते जितने बाद के दिन तपाते हैं।  नौतपा समाप्त होते ही बरसात का इंतजार प्रारंभ हो जाता है। इस बार बरसात विलंब से आयेगी यह मौसम विशेषज्ञों ने बता दिया है इसलिये हम इसके लिये तैयार हैं कि जब तक पहली बरसात होगी तब तक यह झेलना ही है।

           वैसे देखा जाये तो पूरे विश्व में गर्मी का प्रकोप बढ़ा है।  माना यह जा रहा है कि दुनियां के सभी देश जो गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं उससे ओजोन परत में बड़ा छेद हो गया है। ओजोद परत वह है जो सूरज की किरणों को परावर्तित कर धरती पर आने देती है। जिस तरह हम देश की अनेक कालोनियों में देखतेे हैं कि लोग अपनी छतो पर एक हरी चादर लगा देते हैं जिससे कि सूरज की किरणे उनके आंगन पर सीधे न पड़ें और ठंडक रहे। यही काम धरती के लिये ओजोन परत करती है।  इसके जिस हिस्से मे छेद हो गया है वहां से सूरज की किरणें सीधे धरती पर आती हैं और यही विश्व में पर्यावरण प्रदूषण का कारण है।  विश्व के जिन हिस्सों में हमेशा बर्फ जमी रहती थी वहां इस गर्मी का प्रभाव होने से वह पिघल रही हैं। जिससे बरसात भी अधिक होती है।  यही कारण है कि आज जहां हम आग बरसते देख रहे हैं वहीं कुछ दिन में बाढ़ की स्थिति भी नजर आ सकती है।

        विशेषज्ञ पर्यावरण असंतुलन की जो बात करते हैं वह इसी ओजोन परत में बढ़ते छेद के कारण है।  हमने लू को झेला है। पहले सड़क पर चलते हुए ऐसा लगता था जैसे कि आग की भट्टी के थोड़ा दूर से निकल रहे हैं पर तो ऐसा लगता है जैसे उसके एकदम पास से चल रहे हैं।  एक समय यह तपिश असहनीय पीड़ा में बदल जाती है। अगर शरीर में पानी या खाना कम हो तो यकीनन आदमी बीमार हो जाये। संकट दूसरा भी है कि पहले की तरह निरंतर गर्मी से लड़ने की आदत भी नहीं रही।  दिन में कूलर या वातानुकूलन यंत्र की शरण लेनी ही पड़ती है या मिल ही जाती है।  हमने अपने पूरे शैक्षणिक जीवन में कूलर नहीं देखा था।  तपते कमरे में हमने पढ़ाई की है।  पूरे महीने भर तक इस गर्मी को झेलने की आदत रही है पर अब उकताहट होने लगती है। कभी कूलर या वातानुकूलन यंत्र की सीमा से बाहर आये तो पता लगा कि गर्मी ने पकड़ लिया या कभी गर्मी से इनकी सीमा में गये तो जुकाम का शिकार हो गये। इस समय बिजली की खपत बढ़ जाती है पर उत्पादन या आपूर्ति उस अनुपात में न बढ़ने से कटौती शुरु हो जाती है। यही कारण है कि बड़े शहर आमतौर से संकट का सामना करते हैं।  गांवों में लोग अपनी पुरानी आदत के चलते कम परेशान होते हैं पर शहर का आदमी तो बिजली के अभाव में कुछ ही घंटों में टूटने लगता है।

         दूसरी बात यह कि छतो पर सोने की आदत लोगों को नहंी रही। देखा जाये तो गर्मी के दिन छत पर सोने के लिये ही हैं।  इस समय मच्छर भीषण गर्मी में काल कलवित हो जाते हैं इसलिये उनके परेशान करने की संभावना नहीं रहती।  जिन लोगों पर छत की सुविधा है वह बिजली न होने पर सो सकते हैं पर जिनको नहीं है उनके लिये तो मुश्किल ही होती है।

      हम अंतर्जाल पर सात वर्षों से लिख रहे हैं।  प्रथम दो वर्षों में हमने गर्मी पर कविता लिखी तो उसी दिन वर्षा हो गयी।  मित्रों ने इस पर बधाई भी दी थी। पांच वर्षों से इस पर कभी सोचा नहीं पर इस बार की गर्मी से त्रस्त ही कर दिया है।  कल हमने गर्मी पर एक कविता लिखी तो आशा थी कि बरसात हो जायेगी-हालांकि विशेषज्ञों ने बता दिया है था कि तीन चार दिन आसार नहीं है। हमने आज यह लेख इस उम्मीद में लिखा है कि शायद बरसात हो जाये। कविता छोटी थी जबकि लेख बड़ा है इसलिये शायद इसका असर हो।  जब दुनियां टोटका कर सकती है तो हम तो स्वांत सुखाय लेखक हैं तो क्यों नहीं अपना स्वाभाविक टोटका आजमा सकते।

 

 

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

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कीमत पर वफा का सौदा-हिन्दी कविता


जिंदगी के हर मोड़ पर
लोग मिल ही जाते हैं,
कभी हमें होता अपने कदम  भटकने का अहसास
होती हैरानी यह देखकर
उन्हीं रास्तों  को नया मानकर
लोग चले आते हैं।
कहें दीपक बापू
बेबस ज़माना,
जाने बस पैसा कमाना,
कीमत लेकर करता है वफा का सौदा,
विश्वास निभाने का नहीं, चर्चा का होता मसौदा,
ज़मीन पर जिंदा रहना आता नहीं
लोग पहाड़ों पर सांसों में सुगंध ढूंढने जाते हैं।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
jpoet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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विज्ञापन और सुंदरियां-हिंदी कविता


कुछ खबरें खुशी में झुलाती हैं,
कुछ खबरें जोर से रुलाती हैं।
कमबख्त!
किस पर देर तक गौर करें
अपनी खूंखार असलियतें भी
जल्दी से अपनी तरफ बुलाती हैं।
कहें दीपक बापू
खबरचियों का धंधा है
लोगों के जज़्बातों से खेलना,
कभी होठों में हंसी लाने की कोशिश होती
कभी शुरु होता आंखों में आंसु पेलना,
बिकने के लिये बाज़ार में बहुत सामान है,
ग्राहक खुश है खरीद कर शान में,
हमारे जज़्बातों से न कर पाये खिलवाड़ कोई
इसलिये फेर लेते हैं नज़रे
विज्ञापनों में दिखने वाली सुंदरियों से
खबर और बहस के बीच कंपनियों के
उत्पाद बिकवाने के लिये
अपने हाथ में झुलाती हैं।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh
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एक कहानी-हिंदी कविता


एक कहानी बनी

पढ़ी लोगों ने

कई कहानियां बन गयी।

कहीं पात्रों के नाम बदले

तो कहीं हालात

लगती है हर कहानी नयी।

कहें दीपक बापू

इंसानों को मजा आता है

एक दूसरे की तकलीफ देखने में

सभी को नहीं मालुम

अंदर खुशी ढूंढने का तरीका

दूसरे के मुसीबत

सभी के दर्द की दवा यूं ही बन गयी।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

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चौराहे पर चाहे जितनी बहस कर लो-हिंदी व्यंग्य कविता




महलों में रहने,

हवाई जहाज पर सवारी

और अपनी जिंदगी का बोझ

गुलामों के कंधों पर रखने वालों से

हमदर्दी की आशा करना है बेकार,

जिन्होंने दर्द नहीं झेला

कभी अपने हाथ काम करते हुए

ओ मेहनतकश,

 उनसे दाद पाने को न होना बेकरार।

कहें दीपक बापू

चौराहों पर चाहे जितनी बहस कर लो,

अपना दर्द बाजार में बेचने के लिये भर लो,

मगर भले के सौदागरों से न करना कभी

इलाज के बदले दिल देने का करार।

—————————————
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’’,

ग्वालियर, मध्यप्रदेश

एक फिल्म और कार्टून से क्यों घबडाहट फैलाई जाती है-हिंदी लेख


           एक सामान्य योग साधक तथा गीता पाठक होने के नाते इस लेखक का मानना है कि हर मनुष्य के लिये धर्म एक निजी विषय है।  यह धर्म उच्च आचरण का प्रतीक होने के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान से जुड़ा होना चाहिए।  इतना ही नहीं एक  अध्यात्मिक ज्ञानी कभी अपने ज्ञान या इष्ट को लेकर सार्वजनिक चर्चा नहीं करेगा यह भी इस लेखक का मानना है।  ऐसे में जब कुछ अल्पज्ञानी या अज्ञानी जब अपने धार्मिक विषय को सार्वजनिक बनाते हैं तो यह उनके अहंकार का ही प्रमाण होता है।  सार्वजनिक रूप से अपनी बात कहने पर उसकी प्रतिकूल प्रतिक्रिया सहने की क्षमता उनमें नहीं होती।  अज्ञानी तथा अल्पज्ञानी स्वयं को श्रेष्ठ  धार्मिक व्यक्त्तिव का स्वामी  बताने के चक्कर में एक दूसरे पर पर आक्षेप करते हैं।  अगर सामने वाला भी उस जैसा हुआ तो फिर झगड़ा बढ़ता है।  श्रीमद्भागवत गीता साधक के लिये दोनों ही एक जैसे होते है-अहंकारी, अज्ञानी और अन्मयस्क।
       आधुनिक विश्व में कभी  अनेक ऐसे प्रसंग आते हैं जब कार्टून, लेखक, और भाषणों को लेकर अनेक धर्मभीरु लोग इसलिये उत्तेजित होते हैं क्योंकि उसमें उनके इष्ट और विचारधारा पर कटाक्ष किये होते हैं।  उस समय समर्थन और विरोध के शोर के बीच ज्ञानियों के सच पर कोई विचार नहीं करता। अपनी जीत और श्रेष्ठता प्रमाणित करने का यह दंभपूर्ण प्रयास विश्व समाज में तात्कालिक  रूप से अस्थिरता पैदा करता है।  अभी हाल ही में एक फिल्म को लेकर अमेरिका के विरुद्ध पूरे विश्व में वातावरण बन रहा है।  यह फिल्म एक धार्मिक विचाराधारा पर प्रहार करती है। तय बात है कि फिल्म निर्माण से जुड़े लोग कोई तत्वज्ञानी नहीं है इसलिये ही तो उन्होंने दूसरे की धार्मिक विचाराधारा पर प्रहार कर अपनी आसुरी प्रवृत्ति का परिचय दिया है।  अब इस विवाद में बौद्धिक समुदाय दो भागों में बंट गया हैं। एक तो लोगों की आस्थाओं को ठेस पहुंचाने पर आर्तनाद कर हिंसा कर रहा है तो दूसरा अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई दे रहा है।
     हमारा मानना है कि ऐसी फिल्म नहीं बनना चाहिये थी यह बात ठीक है पर जिस तरह इसका विरोध हो रहा है वह भी संशय से भरा है।  अगर इस फिल्म का विरोध नहीं होता तो दुनियां के कई देशों में अनेक लोग  उसका नाम तक नहीं जान पाते।  भारतीय अध्यात्म दर्शन ऐसे विषयों में उपेक्षासन की बात कहता है।  अगर कथित धर्मभीरु लोग ज्ञान की शरण लें तो उन पर ऐसी फिल्मों या कार्टूनों का कोई प्रभाव नहीं होता। वैसे हमारा मानना है कि पूरे विश्व में अर्थव्यवस्था जिस जटिल दौर से गुजर रही है सभी विचाराधारा के लोगों के लिये रोजी रोटी कमाना ही कठिन हो गया है।  उनके लिये इस बात के लिये यह जानने का समय नहीं है कि कौन उनकी धार्मिक विचाराधारा पर क्या कह रहा है? मगर धर्म के ठेकेदारों को अपने समूहों पर नियंत्रण बनाये रखने के लिये ऐसे ही विवादास्पद विषय चाहिए।  फिल्म वालों को प्रचार चाहिए ताकि अधिक से अधिक दर्शक मिलें।  इसके लिये अनेक फिल्म वाले धन भी खर्च करते हैं।  संभव है कि कुछ धार्मिक ठेकेदारों ने  उनसे विरोध फिक्स किया हो।  खालीपीली प्रदर्शन से काम न चले इसलिये हिंसा भी कराई गयी हो।  इसका संदेह इसलिये उठेगा क्योंकि एक फिल्म या कार्टून से किसी पुरानी विचाराधारा का कुछ बिगड़ सकता है यह बात यकीन लायक नहीं है।  आस्था पर चोट का सवाल उठाता है तो फिर ज्ञान और अज्ञान की बात भी सामने आयेगी।  किसी भी समुदाय में सभी ज्ञानी हैं यह सोचना गलत है तो सभी अज्ञानी है यह मानना भी महान मूर्खता है। हम यह नहीं कहते कि यह सब प्रायोजित है पर जिस तरह मानव समुदायों को विभिन्न भागों के बांटकर उन पर पेशेवराना अंदाज में नियंत्रण करने की प्रवृत्ति आधुनिक समय में देखी जाती है  उसके चलते कुछ भी अनुमान किया जा सकता है।
            दूसरा भी एक पक्ष है। अगर हम अज्ञानता वश अपने मुख से अपने धर्म या इष्ट का बखान सार्वजनिक रूप से करते हैं तो संभव है कि ज्ञानी कुछ न कहें पर अपने जैसा अज्ञानी सामने आयेगा तो वह दस बातें कहेगा।  सार्वजनिक रूप से अपने इष्ट या विचारधारा की प्रशंसा करने पर उसकी निंदा सुनने को भी तैयार रहना चाहिए।  ऐसे में वाद विवाद से तनाव बढ़ता है।  ऐसे में एक ज्ञानी का मौन रहना बेहतर है।  ज्ञानी लोग अगर कोई जिज्ञासु मनुष्य उनके ज्ञान के बारे में जानना चाहे तो उसे अपने ज्ञान और अभ्यास के बारे में बतायें।  इतना ही नहीं अगर वह कोई प्रश्न पूछता है तो उसका जवाब दे।  जिज्ञासु से अपनी विचारा कहे पर दूसरे के ज्ञान या विचारधारा पर आक्षेप न करे।  दूसरे की निंदा या उस आक्षेप करने वाले कभी समाज में लोकप्रिय नहीं होते।  फिल्म  बनाकर या कार्टून बनाकर क्षणिक प्रतिष्ठा भले ही मिल जाये पर कालांतर में वह कष्टदायक होता है।  वैसे देखा जाये तो ज्ञानी हर समाज में हैं।  अगर ऐसा नहीं होता यह संसार अनेक बार अपनी ही आग से नष्ट हो चुका होता।  इसका मतलब यह है कि हर समुदाय का आम आदमी अपना निजी जीवन शांति से जीना चाहता है।  यही कारण है कि चंद स्थानों पर कुछ दिन ऐसे विषयों पर प्रायोजित हाहाकार बचने के बाद स्थिति सामान्य हो जाती है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
witer ane poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
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सपनो का बोझ-हिंदी कविता


अपने सपनों का पूरा होने का बोझ
दूसरों के कंधों पर वह टिकाते हैं,
पूरे होने पर अपनी कामयाबी पर
अपनी ही ताकत दिखाते हैं।
कहें दीपक बापू
मेहनत और अक्ल का
इस्तेमाल करने का सलीका नहीं जिनको
वही दूसरों को अपनी जरूरतों के वास्ते
पहले सर्वशक्तिमान से याचना
फिर पूरी होने पर
ज़माने के सामने इतराना सिखाते हैं।

——————————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा

ग्वालियर मध्य प्रदेश

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
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मरे दिलों में जज़्बातों की तलाश-हिन्दी शायरी


अपनी आँखों से जो देखा है
वह सच किसी को न बताना,
अपने कानों से जो सुना नहीं
वह स्वर किसी को समझाना,
अपने दिमाग में भले ही पालो सपने
वह किसी के सामने न सजाना।
कहें दीपक बापू
जमाने के लोग अपने जिस्म का बोझ उठाने से लाचार है,
खरीदने वहाँ खड़े जाते, जहां खुशी का लगता बाज़ार है,
मरे जज़्बातों में हमदर्दी
ढूँढने में अपना वक्त गंवाना।
————————-
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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सच का इतिहास-हिन्दी कविता


उदासीन नहीं हैं,
बड़ों बड़ों के बीच लगी है
ऊंचे ऊंचे बयानों की ज़ंग
हम नहीं लड़ेंगे
क्योंकि किसी पद पर आसीन नहीं हैं।
कहें दीपक बापू
बरसों से अखबार पढ़ा है,
नहीं चाहिए किसी से
अपने चेतन होने का प्रमाणपत्र
हमारी सोच में
तुमसे अधिक सच का इतिहास जड़ा है।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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फेसबुक पर बधाईयां पढ़कर अपने जन्मदिन की याद आई-हिन्दी


           
आज फेसबुक देखा तो पता लगा की हमारे लिए खास दिन है। सामाजिक संपर्क बनाने मे इंटरनेट का जो योगदान है वह अब समझ में आ रहा है। बहरहाल अहो, आज 10 मार्च की तारीख पर हमारा जन्मदिन है। सच बात तो यह है कि अंतर्जाल पर ब्लॉग, फेसबुक और ट्विटर वगैरह पर हमने अपने जन्मदिन की तारीख डाली थी तो केवल इस बाध्यता की वजह से कि कहीं परिचय पूरा न होने की वजह से हमारी परिचय सामग्री अपंजीकृत न रह जाये। 10 मार्च को हमारा जन्म हुआ पर आज तक इस तारीख को हमने कभी महत्व नहीं दिया। जन्म दिन तो खैर हमने कभी मनाया ही नहीं। इस बार भी याद नहीं था अगर फेसबुक पर बधाई संदेश नहीं देखते। जन्म दिन की तारीख को भले महत्व नहीं दिया पर बदलते समय के साथ हमने अनेक लोगों को जन्मदिन की बधाई दी है। यह परंपरा हमें विरासत में नहीं मिली। भारतीय अध्यात्म दर्शन में कहीं भी इस तरह जन्म दिन मनाने की चर्चा नहीं है इसलिये हृदय में इस परंपरा को स्थान बहुत देर बाद ही मिला। हमारी स्थिति यह है कि कहीं हम खड़े हों और कोई 10 मार्च की तारीख पुकारे भी तो हम उसे नहीं बताते कि आज हमारा जन्म दिन है-यह अलग बात है कि हमें याद भी न आता हो। सोचते हैं कि क्यों किसी को औपचारिकता पूरे के लिये बाध्य करें। इसमें कोई संदेह नहीं है कि समकालीन लोगों से जन्मदिन की बधाई मिलना हृदय में स्पंदन उत्पन्न नहीं करता। इसकी वजह यह है कि हमारी तरह उनका हाल भी यही है कि जन्म दिन पर औपचारिक रूप से बधाई देकर अपना मित्र धर्म निभाओ भले हृदय में तो उसका स्थाई भाव रहता नहीं हो।
         इधर फेसबुक, ब्लॉग और ट्विटर पर जो नयी पीढ़ी के लोग सक्रिय हैं उनके लिये जन्म दिन का विशेष महत्व है। जन्म दिन की बधाई देना उनके हृदय का स्थाई भाव बन चुका है। ऐसे में जब हम जैसा भावुक आदमी अपने जन्म दिन पर बधाई संदेश पढ़ता है तो पुरानी लीक से हटकर नयी लीक को स्वीकार कर लेता है। नयी पीढ़ी को पाश्चात्य संस्कृति से सराबोर होने का उलाहना देना ठीक नहीं है। आखिर, इसके लिये जिम्मेदार तो हम और हमारे समकालीन ही हैं। फिर हमारे जैसा लेखक बधाई संदेश के उत्तर में केवल धन्यवाद शब्द लिखकर निकल जाये तो वह हृदय स्वीकार नहीं करता। जिस तरह जन्म दिन पर बधाई देना हृदय का स्थाई भाव नहीं है उसी तरह धन्यवाद जैसी औपचारिकता निभाना भी नहीं है। पहली समस्या के हल के लिये हम कुछ नहीं कर सकते पर दूसरे के माध्यम से हम अपने नये मित्रों को यह दिखाकर प्रसन्न तो कर ही सकते हैं कि जिसे उन्होंने जन्म दिन की बधाई दी उसने अपने हृदय से उसे स्वीकार किया। एक लेखक के रूप में हमारे जैसे आम इंसान के लिये भारतीय अध्यात्म दर्शन एक शक्तिपुंज है इसमें कोई संदेह नहीं हैं। उसके अध्ययन से जहां उचित नवीन परंपराओं को स्वीकार करने का सहज भाव पैदा होता है वहीं प्राचीन ज्ञान की आधुनिक संदर्भों में व्याख्या करने की प्रेरणा हृदय में स्थापित हो जाती हैं। अपने जन्म दिन पर बधाई देने वाले अपने नये तथा पुराने मित्रों को धन्यावाद करते हुए जो हमने लिखा है वह हृदय से ही लिखा है। आशा है वह अपना सहयोग आगे भी बनाये रखेंगे।
अपने जन्मदिन के अवसर पर प्रस्तुत है यह कविता
——————————–
अपने जन्मदिन की तारीख
हम कहाँ याद रख पाते हैं,
कैलेंडर में तारीख बदलती हैं
घड़ियाँ बदलती समय
हम हालातों से जूझते रहे उम्र भर
नतीजों के हिसाब में ही
हमेशा खो जाते हैं।
कहें दीपक बापू
पूरे दिन की थकावट
बना देती है रात को बुझा चिराग
हम ठहरे आम इंसान
अंधेरे में अपने ही मौन को साथी पाते हैं,
प्रात: उगता सूरज देता हैं कुछ देर राहत
बाकी दिन तो
अपनी जरूरतों के आग से ही नाता निभाते हैं। 
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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ख्यालों का दरिया-हिन्दी कविता


खत अब हम कहाँ लिखते हैं,
जज़्बातों को फोन पर
बस यूं ही फेंकते दिखते हैं।
कहें दीपक बापू
बोलने में बह गया
ख्यालों का दरिया
खाली खोपड़ी में
लफ्जों का पड़ गया है अकाल
आवाज़ों में टूटे बोल जोड़ते दिखते हैं।
—————-
इस जहां में
लोगों से क्या बात करें
पहले अपनी रूह की तो सुन लें।

कहें दीपक बापू
बात का बतंगड़ बन जाता है
मज़े की महफिलों में
दूसरों की बातें सुनकर
हैरान या परेशान हों
बेहतर हैं लुत्फ उठाएँ
अपने दिल के अंदर ही
जिन्हें खुद सुन सकें
उन लफ्जों का जाल बुन लें।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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नई साज सज्जा के साथ भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दृश्य पटल पर लाने के तैयारी-हिन्दी लेख


            टीवी या अखबार पर कोई समाचार देखकर ब्लॉग पर लिखना अपने आप मे एक अजीब परेशानी के साथ ही आश्चर्य भी पैदा करता है। हमने अन्ना हजारे के आंदोलन पर कल एक लेख लिखा था कि प्रचार माध्यमों ने उसे रेल की तरह यार्ड में खड़ा कर दिया है क्योंकि इस समय उत्तरप्रदेश में चुनाव चल रहे हैं जिसके कारण उनके पास विज्ञापन दिखाने के लिये पर्याप्त सामग्री है और जब उनके पास अपने प्लेटफार्म पर कोई सनसनीखेज मनोरंजन समाचार नहीं होगा तब वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को नयी साज सज्जा के साथ लायेंगे। इस लेख को लिखे एक घंटा भी नहीं हुआ था कि अन्ना हजारे साहेब के सेनापति का बयान आया जिसमें जनप्रतिनिधि सभाओं पर ही आक्षेप कर डाले। इसी कारण उनसे अनेक लोग नाराज हो गये। तत्काल इस विषय पर बहस प्रारंभ हो गयी। मतलब यह कि इधर उत्तरप्रदेश में चुनाव समाप्त होने की तरफ हैं तो इधर अब आंदोलन को एक बार फिर चर्चा में लाने का प्रयास भी शुरु हो गया।
इस विवादास्पद बयान को अन्ना साहेब के सेनापति ने ट्विटर पर भी जारी किया। प्रचार माध्यम आम ब्लाग लेखकों के साथ ही ट्विटर तथा फेसबुक वालों की तरफ ताकते नहीं है इसलिये यह कहना पड़ता है कि उनकी नज़र में बाज़ार से प्रायोजित लोग ही महत्वपूर्ण होते हैं। अब अन्ना जी के सेनापति साक्षात्कार भी आने लगे हैं। आरोपी और अपराधी में अंतर होना चाहिए, यह तक अब सुनाया जा रहा हैं। एक उद्घोषक ने सेनानति से पूछा कि-‘‘आप अब चुनाव खत्म होते ही अपनी छबि चमकाने के लिये पुनः अवतरित होने के लिये ऐसा बयान दे रहे हैं।’’
              सेनापति का बयान था कि‘‘इस तरह का बयान तो हम पहले भी दे चुके हैं, अब आप ही इसे तूल दे रहे हैं।’’
इस वार्तालाप से जाहिर है कि अगर अन्ना हजारे के समर्थक प्रचार समूहों से प्रायोजित नहीं है तो यह बात तो प्रमाणित होती है कि प्रचार प्रबंधक कहीं न कहीं स्वतः ही उनका उपयोग करने की कला में माहिर हैं। हम अन्ना हजारे के आंदोलन पर करीब से नज़र रखते रहे हैं। जिस तरह अन्ना के सक्रिय साथी और प्रचार माध्यम    एक साथ सक्रिय हुए इससे फिक्सिंग का संदेह आम आदमी को भी होगा इसमें संशय नहीं हैं।
             देश में भ्रष्टाचार हटना चाहिए इस तर्क से तो सहमति है पर कार्यप्रणाली को लेकर हमारा विचार थोड़ा अलग है। थोड़ा डरते हुए भी लिख रहे हैं बल्कि कहना चाहिए कि हमारी और उनकी सोच में ही मूलभूत अंतर है। बहरहाल अब यह देखना है कि प्रचार प्रबंधक किस तरह इस आंदोलन को भुनाते हैं। कहीं ऐसा न हो कि बिग बॉस की तरह यह भी फ्लाप योजना साबित न हो। इधर कॉमेडी सर्कस भी फ्लाप हो रहा है। सच कहें तो हमारे देश में मसखरे बहुत हैं पर मसखरी लिखना भी एक कला है जो विरलों को ही आती है। प्रचार प्रबंधकों के लिये इस समय सबसे बड़ा संकट यह होगा कि वह किस तरह कोई ऐसा विषय लायें जिससे देश के जनमानस को व्यस्त रखा जा सकें। 
                अन्ना हज़ारे का आंदोलन बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों की सोची समझी योजना का एक भाग है-यह संदेह हमेशा ही अनेक असंगठित स्वतंत्र लेखकों को रहा है। जिस तरह यह आंदोलन केवल अन्ना हजारे जी की गतिविधियों के इर्दगिर्द सिमट गया और कभी धीमे तो कभी तीव्र गति से प्रचार के पर्दे पर दिखता है उससे तो ऐसा लगता है कि जब देश में किसी अन्य चर्चित मुद्दे पर प्रचार माध्यम भुनाने में असफल हो रहे थे तब इस भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की रूपरेखा इस तरह बनाई कि परेशान हाल लोग कहीं आज के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, कला, टीवी तथा फिल्म के शिखर पुरुषों की गतिविधियों से विरक्त न हो जायेे इसलिये उनके सामने एक जननायक प्रस्तुत हो जो वस्तुओं की बिक्री बढ़ाने वाले विज्ञापनों के बीच में रुचिकर सामग्री निर्माण में सहायक हो। हालांकि अब अन्ना हज़ारे साहब का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अब जनमानस में अपनी छबि खो चुका है पर देखने वाली बात यह है कि प्रचार माध्यम अब किस तरह इसे नई साज सज्जा के साथ दृश्य पटल पटल पर लाते हैं।

           जब अन्ना हजारे का आंदोलन चरम पर था तब भी हम जैसे स्वतंत्र आम लेखकों के लिये वह संदेह के दायरे में था। यह अलग बात है कि तब शब्दों को दबाकर भाव इस तरह हल्के ढंग से लिखे गये कि उनको समर्थन की आंधी का सामना न करना पड़े। इसके बावजूद कुछ अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि वालों लोगों ने उसे भारी ढंग से लिया और आक्रामक टिप्पणी दी। इससे एक बात तो समझ में आयी कि हिन्दी में गूढ़ विषय को हल्के ढंग से लिखने पर भी यह संतोष मन में नहीं पालना चाहिए कि बच निकले क्योंकि अभी भी कुछ लोग हिन्दी पढ़ने में महारत रखते हैं। अभी अन्ना साहब को कहीं सम्मान मिलने की बात सामने आयी। सम्मान देने वाले कौन है? तय बात है कि बाज़ार और प्रचार शिखर पुरुषों के बिना यह संभव नहीं है। इसे लेकर कुछ लोग अन्ना हजारे के आंदोलन के प्रायोजित होने का प्रमाण मान रहे तो उनके समर्थकों का मानना है कि इससे- क्या फर्क पड़ता है कि उनके आंदोलन और अब सम्मान के लिये पैसा कहां से आया? मूल बात तो यह है कि हम उनके विचारों से सहमत हैं।
             हमारी बात यहीं से शुरु होती है। कार्ल मार्क्स सारे संसार को स्वर्ग बनाना चाहते थे तो गांधी जी सारे विश्व में अहिंसक मनुष्य देखना चाहते थे-यह दोनों अच्छे विचार है पर उनसे सहमत होने का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि इन विचारों को वास्तविक धरातल क्रियाशील होते नहीं देखा गया। भ्रष्टाचार पर इंटरनेट पर हम जैसे लेखकों ने कड़ी हास्य कवितायें तो अन्ना हजारे के आंदोलन से पहले ही लिख ली थीं पर उनसे कोई इसलिये सहमत नहीं हो सकता था क्योंकि संगठित बाज़ार और प्रचार समूहों के लिये फोकटिया लेखक और समाजसेवक के प्रयास कोई मायने नहीं रखते। उनके लिये वही लेखक और समाजसेवक विषय वस्तु बन सकता है जिसे धनोपार्जन करना आता हो। सम्म्मान के रूप में भारी धनराशि देकर कोई किसी लेखक को धनी नहीं बनाता न समाज सेवक को सक्रिय कर सकता है। वैसे भी कहा जाता है कि जिस तरह हम लोग कूड़े के डिब्बे में कूड़ा डालते हैं वैसे ही सर्वशक्तिमान भी धनियों के यहां धन बरसाता है। स्वांत सुखाय लेखकों और समाजसेवकों को यह कहावत गांठ बांधकर रखना चाहिए ताकि कभी मानसिक तनाव न हो।
           उत्तर प्रदेश में चुनाव चल रहे हैं। विज्ञापनों के बीच में प्रसारण के लिये समाचार और चर्चा प्रसारित करने के लिये बहुत सारी सामग्री है। ऐसे में प्रचार समूहों को किसी ऐसे विषय की आवश्यकता नही है जो उनको कमाई करा सके। यही कारण है कि अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को वैसे ही यार्ड में सफाई आदि के लिये डालकर रखा गया है कि जब प्लेटफार्म पर कोइ गाड़ी नहीं होगी तब इसे रवाना किया जायेगा। यह गाड़ी प्लेटफार्म पर आयेगी इसकी यदाकदा घोषणा होती रहती है ताकि उसमें यात्रा करने वाले यात्री आशा बांधे रहें-यदा कदा अन्ना हजारे साहब के इस अस्पताल से उस अस्पताल जाने अथवा उनकी अपने चेलों से मुलाकात प्रसारित इसी अंदाज में किये जाते हैं। ऐसा जवाब हमने अपने उस मित्र को दिया था जो अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की स्थिति का आंकलन प्रस्तुत करने को कह रहा था।
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ज़िदगी का कारवां और नए पड़ाव-हिन्दी कविता


ज़िंदगी का कारवां
बस यूं ही बढ़ता जाएगा,
रास्ते में आएंगे नए पड़ाव
साथी और हमसफरों के चेहरे भी
बदलते रहेंगे
कोई पीछे छूटेगा
कोई आगे निकाल जाएगा।
कहें दीपक बापू
महफिलों में मिलने वाले लोग
भले ही ताउम्र साथ चलने का वादा करें
मगर रात बीतते बीतते
उनके दावों का असर भी खत्म हो जाएगा,
सुबह फिर कोई नया चेहरा सामने आयेगा।
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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अन्ना हजारे (अण्णा हज़ारे) की कोर टीम और ब्लॉगर की ज़ंग-हिन्दी व्यंग्य (ward war between anna hazare core team and his blogger-hindi satire article)


             अन्ना हजारे की टीम ने राजू परूलेकर नामक ब्लॉगर से पंगा लेकर अपने लिये बहुत बड़ी चुनौती बुला ली है। हमने परुलेकर को टीवी चैनलों पर देखा। अन्ना टीम का कोई सदस्य भी योग्यता में उनके मुकाबले कहीं नहीं टिकता। अब भले ही अन्ना हजारे ने अपनी टीम को बचाने के लिये उससे किनारा कर लिया है पर यह कहना कठिन है कि भविष्य में क्या करेंगे? अगर राजू परुलकर की बात को सही माने तो एक न एक दिन अन्ना का अपनी इसी कोर टीम से टकराव होगा।
             अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अब एक ऐसी बहुभाषी फिल्म लगने लगी है जिसकी पटकथा बाज़ार के सौदागरों के प्रबंधकों ने राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक विषयों में पारंगत लेखकों से लिखवाया है तो इन्हीं क्षेत्रों में सक्रिय उनके प्रायोजित नायकों ने अभिनीत किया है। बाज़ार से पालित प्रचार माध्यम सामूहिक रूप से फिल्म को दिखा रहे हैं। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि जैसे किसी टीवी चैनल पर कोई कई कड़ियों का धारावाहिक प्रसारित हो रहा है। इसमें सब हैं। कॉमेडी, रोमांच, रहस्य, कलाबाजियां और गंभीर संवाद, सभी तरह का मसाला मिला हुआ है।
          अन्ना के ब्लॉगर राजू ने जिस तरह राजफाश किया उसके बाद अन्ना की गंभीर छवि से हमारा मोहभंग नहीं हुआ पर उनके आंदोलन की गंभीरता अब संदिग्ध दिख रही है। यहां हम पहले ही बता दें कि सरकार ने एक लोकपाल बनाने का फैसला किया था। उस समय तक अन्ना हजारे राष्ट्रीय परिदृश्य में कहीं नहीं दिखाई दे रहे थे। लोकपाल विधेयक के संसद में रखते ही अन्ना हजारे दिल्ली में अवतरित हो गये। उससे पहले बाबा रामदेव भी जमकर आंदोलन चलाते आ रहे थे। देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक वातावरण बन गया था जिसका लाभ उठाने के लिये चंद पेशेवर समाजसेवकों ने अन्ना हजारे के लिये दिल्ली में अनशन की व्यवस्था की। अन्ना रालेगण सिद्धि और महाराष्ट्र में भले ही अपने साथ कुछ सहयोगी रखते हों पर दिल्ली में उनके लिये यह संभव इसलिये नहीं रहा होगा क्योंकि उनका कार्यक्षेत्र अपने प्रदेश के इर्दगिर्द ही रहा है। इन्हीं पेशेवर समाज सेवकों ने प्रचार माध्यमों की सहायता से अण्णा हजारे को महानायक बना दिया। देश में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी तथा बीमारी से परेशान लोगों के लिये अण्णा हजारे एक ऐसी उम्मीद की किरण बन गये जिससे उनको रोशनी मिल सकती थी। प्रचार माध्यमों को एक ऐसी सामग्री मिल रही थी जिससे पाठक और दर्शक बांधे जा सकते थे ताकि उनके विज्ञापन का व्यवसाय चलता रहे।
        हालांकि अब अन्ना हजारे का जनलोकपाल बिल पास भी हो तो जनचर्चा का विषय नहीं बन पायेगा क्योंकि महंगाई का विषय इतना भयानक होता जा रहा है कि लोग अब यह मानने लगे हैं कि भ्रष्टाचार से ज्यादा संकट महंगाई का है जबकि अन्ना हजारे जनलोकपाल के नारे के साथ ही चलते जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह कि वह दूसरों को बनाये प्रारूप पर काम कर रहे हैं। स्पष्टतः यह जनलोकपाल उनके स्वयं का चिंत्तन का परिणाम नहीं है। गांधीजी की तरह उनकी गहन चिंत्तन की क्षमता प्रमाणिक नहीं मानी जा सकती। जहां तक उनके आंदोलनों और अनशन का सवाल है तो वह यह स्वयं कहते हैं कि उन्होंने कई मंत्री हटवायें हैं और सरकारें गिरायी हैं। ऐसे में यह पूछा जा सकता है कि उनके प्रयासों से रिक्त हुए स्थानों पर कौन लोग विराजमान हुए? क्या वह अपने पूर्ववर्तियों  की तरह से साफ सुथरे रह पाये? आम आदमी को उनसे क्या लाभ हुआ? सीधी बात कहें तों उनके अनशन या आंदोलन दीर्घ या स्थाई परिणाम वाले नहीं रहे। अगर उनका प्रस्तावित जनलोकपाल विधेयक यथारूप पारित भी होता है तो वह परिणाममूलक रहेगा यह तय नहीं है। ऐसे में उनका आंदोलन आम लोगों को अपनी परेशानियों से अलग हटाकर सपनों में व्यस्त व्यस्त रखने का प्रयास लगता है। जिस तरह फिल्मों के सपने बेचे जाते हैं उसी तरह अब जीवंत फिल्में समाचारों के रूप प्रसारित होती दिख रही हैं।
           अभी तक अन्ना को निर्विवाद माना जाता था पर राजू ब्लॉगर को हटाकर उन्होंने अपनी छवि को भारी हानि पहुंचाई है। राजू ब्लॉगर के अनुसार अन्ना चौकड़ी के दबाव में आ जाते हैं। इतना ही नहीं यह चौकड़ी उनका सम्मान नहीं करती। जिस तरह अन्ना ने पहले इस चौकड़ी से पीछा छुड़ाने की बात कही और दिल्ली आकर फिर उसके ही कार्यक्रम को आगे बढ़ा रहे हैं उससे लगता है कि कहीं न कहंी न वह अपने अनशन और आंदोलन पर खर्च होने वाले पैसे के लिये उनके कृतज्ञ हैं। जब देश में पेट्रोल के दाम बढ़ने पर शोर मचा है तब अपने फोन टेपिंग का मामला प्रचार माध्यमों में उछाल रहे हैं। एक तरफ कहते हैं कि हमें इसकी चिंता नहीं है दूसरी तरफ अपने राष्ट्रभक्त होने का प्रमाणपत्र दिखा रहे हैं। सीधी बात कहें तो पेट्रोल की मूल्यवृद्धि से लाभान्वित पूंजीपतियों को प्रसन्न कर रहे हैं जो कहीं न कहीं इन पेशेवर समाजसेवकों के प्रायोजक हो सकते हैं।
        अब हमारी दिलचस्पी अन्ना हजारे से अधिक राजू ब्लॉगर में हैं। अन्ना ने दूसरा ब्लाग बनाकर दो सहायकों को रखने की बात कही है। राजू ब्लॉगर ने एक बात कही थी कि उनके ब्लॉग देखकर अन्ना टीम ने यह प्रतिबंध लगाया था कि उनसे पूछे बगैर उस पर कोई सामग्री नहीं रखी जाये। अन्ना ने इस पर सहमति भी दी थी। राजू ब्लॉगर ने उस पर अमल नहीं किया पर अब लगता है कि अन्ना के नये सहायक अब यही करेंगे। ऐसा भी लगता है कि उनकी नियुक्ति अन्ना टीम अपने खर्च पर ही करेगी। ऐसे में अन्ना हजारे पूरी तरह से प्रायोजक शक्तियों के हाथ में फंस गये लगते हैं। वह त्यागी होने का दावा भले करते हों पर रालेगण सिद्धि से दिल्ली और दिल्ली से रालेगण सिद्धि बिना पैसे के यात्रा नहंी होती। बिना पैसे के अनशन के लिये टैंट और लाउडस्पीकर भी नहीं लगते। अन्ना की टीम के चार पांच पेशेवर समाज सेवक पैसा लगाते हैं इसलिये पच्चीस सदस्यीय समिति में उनका ही रुतवा है। अभी तक अन्ना इस रुतवे में फंसे नहीं दिखते थे पर अगर राजू परुलेकर की बात मानी जाये तो अब वह स्वतंत्र नहीं दिखते। आखिरी बात यह है कि कहीं न कहीं अन्ना हजारे के मन में आत्मप्रचार की भूख है जिसे शांत रखने के लिये वह किसी की भी सहायता ले सकते हैं। राजू ब्लॉगर के अनुसार अन्ना ने अपनी टीम के सबसे ताकतवर सदस्य के बारे में कहा था कि ‘समय पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है।’
          मतलब अन्ना जांगरुक और त्यागी हैं तो आत्मप्रचार पाने के इच्छुक होने के साथ ही चालाक भी हैं। इधर अन्ना टीम ने एक ऐसे ब्लॉगर से पंगा लिया है जो लिखने पढ़ने और जानकारी के विषय में उनसे कई गुना अधिक क्षमतावान है। अभी तक अन्ना विरोधी जो काम नहीं कर पाये यह ब्लॉगर वही कर सकता है। ऐसे में अगर वह अन्ना टीम प्रचार माध्यमों में भारी पड़ा तो अन्ना पुनः उसे बुला सकते हैं। बहरहाल आने वाला समय एक जीवंत फिल्म में नये उतार चढ़ाव का है। आखिर इस धारावाहिक या फिल्म में एक ब्लॉगर जो दृश्य में आ रहा है। यह अलग बात है कि फिल्म या धारावाहिकों में इस तरह का परिवर्तन नाटकीय लगता है पर अन्ना हजारे के आंदोलन के जीवंत प्रसारण में यह एकदम स्वाभाविक है। हम यह दावा नहीं करते कि यह आंदोलन प्रायोजित है पर अगर है तो पटकथाकारों को मानना पड़ेगा।
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खामोशी से बड़ा दोस्त -हिन्दी कविताएँ


उनकी जुदाई के गम में
कभी हमने आँसू नहीं बहाये
भले ही उनको देखने के लिए तरसते रहे,
मगर टूटा आसमान सिर पर
जब पता चला कि
वह दूसरों की बाहों में
बहार बनकर बरसते रहे।
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खामोशी से  बड़ा दोस्त
बहुत ढूँढने पर भी नहीं मिला,
सच बोले तो लोग बने दुश्मन
झूठ बोले तो हुआ जमाने में हमारा गिला।
फिर भी कोई शिकायत नहीं हैं
इस जहाँ में
भला कब किसे
अपनी जुबान से निकले लफ्जों का कद्रदान मिला।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
poet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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ईमानदारी और भ्रष्टाचार-हिन्दी हास्य कविता (imandari aur bhrashtachar-hindi hasya kavita)


भ्रष्टाचारी ने ईमानदार को फटकारा
‘‘क्या पुराने जन्म के पापों का फल पा रहे हो,
बिना ऊपरी कमाई के जीवन गंवा रहे हो,
अरे
इसी जन्म में ही कोई अच्छा काम करते,
दान दक्षिणा  दूसरों को देकर
अपनी जेब भरने का काम भी करते,
लोग मुझे तुम्हारा दोस्त कहकर शरमाते हैं,
तुम्हारे बुरे हालात सभी जगह बताते हैं,
सच कहता हूं
तुम पर बहुत तरस आता है।’’
ईमानदार ने कहा
‘‘सच कहता हूं इसमें मेरा कोई दोष नहीं है,
घर में भी कोई इस बात पर कम रोष नहीं है,
जगह ऐसी मिली है
जहां कोई पैसा देने नहीं आता,
बस फाईलों का ढेर सामने बैठकर सताता,
ठोकपीटकर बनाया किस्मत ने ईमानदार,
वरना दौलत का बन जाता इजारेदार,
एक बात तुम्हारी बात सही है,
पुराने जन्म के पापों का फल है
अपनी ईमानदारी की बनी बही है,
यही तर्क अपनी दुर्भाग्य का समझ में आता है।
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कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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समाज और खानदान की छबि -दो व्यंग्य क्षणिकायें


जिन कहानियों में हर पल
क्लेशी पात्र सजाये जाते
उसी पर बने नाटक
सामाजिक श्रेणी के कहलाते
सच है समाज के नाम पर
लोग भी खुशी कहां पाते।
………………..
जिनकी बेइज्जती
सरेआम नहीं की जाती
बड़े खानदान की छबि उनकी बन जाती।
फिर भी बड़े खानदान पर
यकीन नहीं करना
उनकी बेईमानी भी
ईमानदारी की श्रेणी में आती।

……………………….

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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

टेलीफोन की हड़ताल का तिलिस्म-व्यंग्य


देश की एक टेलीफोन कंपनी में कर्मचारियों की हड़ताल हो गयी तो उसके इंटरनेट प्रयोक्ताओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। इस लेखक का कनेक्शन उस कंपनी से जुड़ा नहीं है इसलिये उसे यह केवल अन्य ब्लाग लेखकों से ही पता चल पाया कि उनकी पाठन पाठन की नियमित प्रक्रिया पर उसका बुरा प्रभाव पड़ा। अनेक ब्लाग लेखकों को उनके मित्र ब्लाग लेखकों की नवीनतम रचनायें पढ़ने का अवसर नहीं मिल पाया तो लिखने से भी वह परेशान होते रहे। हड़ताल दो दिन चली और सुनने में आया कि वह समाप्त हो गयी।
अच्छा ही हुआ कि हड़ताल समाप्त हो गयी वरना इस ब्लाग/पत्रिका लेखक को अनेक प्रकार के भ्रम घेर लेते। हुआ यूं कि इस लेखक के बाईस ब्लाग पर पिछले तीन दिनों से जिस तरह पाठकों का आगमन हुआ वह हैरान करने वाला था। पिछले दो दिनों से यह संख्या हजार के पार गयी और उस दिन भी इसकी संभावना लगती हती कि कर ही लेगी। पांच ब्लाग पर यह संख्या आठ सौ के करीब है। आखिर ऐसा क्या हुआ होगा? जिसकी वजह से इस ब्लाग लेखक के ब्लाग पर इतने पाठक आ गये। हिंदी ब्लाग जगत में अनेक तेजस्वी ब्लाग लेखक हैं जिनके लिखे को पढ़ने में मजा आता है। मगर टेलीफोन कंपनी के कर्मचारियों की हड़ताल हो तो फिर पाठक कहां जायें?
नियमित रूप से जिन ब्लाग लेखकों के पाठ हिंदी ब्लाग जगत को सूर्य की भांति प्रकाशमान करते हैं उनका अभाव पाठकों के लिये बौद्धिक रूप से अंधेरा कर देता है। शायद यही वजह है कि इस ब्लाग लेखक के चिराग की तरह टिमटिमाते पाठों में उन्होंने हल्का सा बौद्धिक प्रकाश पाने का प्रयास किया होगा।
यह एक दिलचस्प अनुभव है कि एक टेलीफोन कंपनी की हड़ताल से दूसरी टेलीफोन कंपनी के प्रयोक्ता ब्लाग लेखकों को पाठक अधिक मिल जाते हैं। दावे से कहना कठिन है कि कितने पाठक बढ़े होंगे और क्या यह संख्या आगे भी जारी रहेगी? वैसे तो इस लेखक के ब्लाग/पत्रिकाओं के करीब साढ़े सात सौ से साढ़े नौ सौ पाठ प्रतिदिन पढ़े जाते हैं। संख्या इसी के आसपास घूमती रहती है। पिछले तीन दिनों से यह संख्या तेरह सौ को पार कर गयी जो कि चैंकाने वाली थी। इसको टेलीफोन कर्मचारियों की हड़ताल का असर कहना इसलिये भी सही लगता है कि उस दिन शाम के बाद पाठक संख्या कम होती नजर आ रही और अगर यह संख्या एक हजार पार नहीं करती तो माना जाना चाहिये था कि यही बात सत्य है।
इस दौरान पाठकों की छटपटाहट ने ही उनको ऐसे ब्लागों पर जाने के लिये बाध्य किया होगा जो उनके पंसदीदा नहीं है। पढ़ने का शौक ऐसा भी होता है कि जब मनपसंद लेखक या पत्रिका नहीं मिल पाती तो निराशा के बावजूद पाठक विकल्प ढूंढता है। यह अच्छा ही हुआ कि हड़ताल समाप्त हो गयी वरना इस लेखक को कितना बड़ा भ्रम घेर लेता? भले ही आदमी कितनी भी ज्ञान की बातें लिखता पढ़ता हो पर सफलता को मोह उसे भ्रम में डाल ही देता है। अब कभी ऐसे तीव्र गति से पाठ पढ़े जायें तो यह देखना पड़ेगा कि उसकी कोई ऐसी वजह तो नहीं है कि जिसकी वजह से पाठक मजबूर होकर आ रहे हों। यह हड़ताल का तिलिस्म था जो इतने सारे पाठक दिखाई दिये। अच्छा ही हुआ जल्दी टूट गया वरना तो भ्रम बना ही रहता। वैसे टेलीफोन कंपनियों की हड़ताल से वही प्रयोक्ता परेशान होंगे जो उसके प्रयोक्ता होंगे। आज कोई और हुआ तो कल हम भी हो सकते हैं।
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