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स्वर्ग व मोक्ष का दृश्यव्य रूप नहीं-हिन्दी लेख


                                   हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के भ्रम फैलाये गये हैं। खासतौर से स्वर्ग और मोक्ष के नाम पर ऐसे प्रचारित किये गये हैं जैसे वह  देह त्यागने के बाद ही प्राप्त होते हैें।  श्रीमद्भागवतगीता के संदेशों का सीधी अर्थ समझें तो यही है कि जब तक देह है तभी तक इंसान अपने जीवन में स्वर्ग तथा मोक्ष की स्थिति प्राप्त कर सकता है। देह के बाद कोई जीवन है, इसे हमारा अध्यात्मिक दर्शन मनुष्य की सोच पर छोड़ता है। अगर माने तो ठीक न माने तो भी ठीक पर उसे अपनी इस देह में स्थित तत्वों को बेहतर उपयोग करने के लिये योग तथा भक्ति के माध्यम से प्रयास करने चाहिये-यही हमारे अध्यात्मिक दर्शन का मानना है।

अष्टावक्र गीता में कहा गया है कि

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मोक्षस्य न हि वासीऽस्ति न ग्राम्यान्तरमेव वा।

अज्ञानहृदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतः।।

                                   हिन्दी में भावार्थ-मोक्ष का किसी लोक, गृह या ग्राम में निवास नहीं है किन्तु अज्ञानरूपी हृदयग्रंथि का नाश मोक्ष कहा गया है।

                                   जिस व्यक्ति को अपना जीवन सहजता, सरलता और आनंद से बिताना हो वह विषयों से वहीं तक संपर्क जहां तक उसकी दैहिक आवश्यकता पूरी होती है।  उससे अधिक चिंत्तन करने पर उसे कोई लाभ नहीं होता।  अगर अपनी आवश्यकताआयें सीमित रखें तथा अन्य लोगों से ईर्ष्या न करें तो स्वर्ग का आभास इस धरती पर ही किया जा सकता है। यही स्थिति मोक्ष की भी है।  जब मनुष्य संसार के विषयों से उदासीन होकर ध्यान या भक्ति में लीन में होने मोक्ष की स्थिति प्राप्त कर लेता है।  सीधी बात कहें तो लोक मेें देह रहते ही स्वर्ग तथा मोक्ष की स्थिति प्राप्त की जाती है-परलोक की बात कोई नहीं जानता।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

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लोगों से मन की बात कहने और सुनने से बढ़ती है लोकप्रियता-कौटिल्य का अर्थशास्त्र


                                   एक अमेरिकी अनुसंधान संस्था के अनुसार भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अभी भी बरकरार है। इस पर अनेक लोगों को हैरानी होती है। आमतौर से राजसी कर्म में लगे लोगों की लोकप्रियता समय के साथ गिरती जाती है जबकि श्रीनरेंद्रमोदी के मामले में यह लक्षण अभी तक नहीं देखा गया। अनुसंधान संस्था ने इस लोकप्रियता में निरंतरता के कारकों का पता नहीं लगाया पर हम जैसे अध्यात्मिक साधकों के लिये यह लोकप्रियता जनता से नियमित संवाद के कारण बनी हुई है।  खासतौर से वह नियमित रूप से रेडियो के माध्यम से जो मन की बात करते हैं उससे आमजन से उनकी करीबी अभी भी बनी हुई है।

कौटिल्य अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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वार्ता प्रजा सधयन्ति वार्त वै लोक संश्रय।

प्रजायां व्यसनस्थायां न किञ्चिदपि सिध्यति।।

हिन्दी में भावार्थ-वार्ता ही प्रजा को साधती है, वार्ता ही लोक को आश्रित करती है। यदि व्यसनी हो जाये तो कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकता।

                                   राजसी कर्म एक ऐसा विषय है जिसमें सभी को एक साथ प्रसन्न नहीं रखा जा सकता है।  लोग आशा रखते हैं किसी की पूरी होती तो किसी को निराशा हाथ आती है।  ऐसी स्थिति से निपटने का एक ही उपाय रहता है कि गुड़ न दे तो गुड़ जैसी बात दे।  आमतौर जीवन निर्वाह के लिये राजसी कर्म करना ही पड़ता है। हर व्यक्ति अपने परिवार, समाज, या सार्वजनिक जीवन में राजसी पद पर होता ही है। ऐसे में उसे अपने पर आश्रित लोगों के साथ सदैव वार्ता करते रहना चाहिये।  किसी को उसकी सफलता पर बधाई तो देना चाहिये पर निराश व्यक्ति का भी मनोबल बढ़ाना भी आवश्यक है।  मनुष्य अपनी वाणी से न केवल अपने बल्कि दूसरे के भी काम सिद्ध कर सकता है पर अगर वह व्यसनी हो जाये तो सारे प्रयास निरर्थक हो जाते हैं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

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राज्य प्रबंध में कुशल प्रबंध की आवश्यकता-हिन्दी लेख


                                   किसी जाति, भाषा या धर्म के लोगों को सरकारी सेवाओें में आरक्षण दिलाने के नाम पर आंदोलनकारी लोग कभी अपने अपने समाज के नेताओं से यह पूछें कि ‘क्या वास्तव में देश के सरकारी क्षेत्र  उनके लिये नौकरियां कितनी हैं? सरकार में नौकरियों पहले की तरह मिलना क्या फिर पहले की तरह तेजी से होंगी? क्या सभी लोगों को नौकरी मिल जायेगी।

                                   सच बात यह है कि सरकारी क्षेत्र के हिस्से का बहुत काम निजी क्षेत्र भी कर रहा है इसलिये स्थाई कर्मचारियों की संख्या कम होती जा रही है।  सरकारी पद पहले की अपेक्षा कम होते जा रहे हैं। इस कमी का प्रभाव अनारक्षित तथा आरक्षित दोनों पदों पर समान रूप से हो रहा है।  ऐसे में अनेक जातीय नेता अपने समुदायों को आरक्षण का सपना दिखाकर धोखा दे रहे हैं।  समस्या यह है कि सरकारी कर्मचारियों के बारे में लोगों की धारणायें इस तरह की है उनकी बात कोई सुनता नहीं।  पद कम होने के बारे में वह क्या सोचते हैं यह न कोई उनसे पूछता है वह बता पाते है।  यह सवाल  सभी करते भी हैं कि सरकारी पद कम हो रहे हैं तब इस  तरह के आरक्षण आंदोलन का मतलब क्या है?

                                   हैरानी की बात है कि अनेक आंदोलनकारी नेता अपनी तुलना भगतसिंह से करते है।  कमाल है गुंलामी (नौकरी) में भीख के अधिकार (आरक्षण) जैसी मांग और अपनी तुलना भगतसिंह से कर रहे हैं। भारत में सभी समुदायों के लोग शादी के समय स्वयं को सभ्रांत कहते हुए नहीं थकते  और मौका पड़ते ही स्वयं को पिछड़ा बताने लगते हैं।

             हमारा मानना है कि अगर देश का विकास चाहते हैं तो सरकारी सेवाओं में व्याप्त अकुशल प्रबंध की समस्या से निजात के लिय में कुशलता का आरक्षण होना चाहिये। राज्य प्रबंध जनोन्मुखी होने के साथ दिखना भी चाहिये वरना जातीय भाषाई तथा धार्मिक समूहों के नेता जनअसंतोष का लाभ उठाकर उसे संकट में डालते हैं। राज्य प्रबंध की अलोकप्रियता का लाभ उठाने के लिये जातीय आरक्षण की बात कर चुनावी राजनीति का गणित बनाने वाले नेता उग आते हैं। जातीय आरक्षण आंदोलन जनमानस का ध्यान अन्य समस्याओं से बांटने के लिये प्रायोजित किये लगते हैं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

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गुलामी जब जायेगी तभी तो आजादी आयेगी-हिन्दी लेख


                                   15 अगस्त भारत का स्वतंत्रता दिवस हमेशा अनेक तरह से चर्चा का विषय रहता है। अगर हम अध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो भारत कभी गुलाम हुआ ही नहीं क्योंकि भौतिक रूप से कागजों पर  इसका नक्शा छोटा या बड़ा  भले ही होता रहा हो पर धार्मिक दृष्टि से भौतिक पहचान रखने वाले तत्वों में  गंगा, यमुना और नर्मदा नदियां वहीं बहती रहीं हैं जहां थीं।  हिमालय और विंध्याचल पर्वत वहीं खड़े रहे जहां थे। अध्यात्मिक दृष्टि से श्री रामायण, श्रीमद्भागवत गीता तथा वेदों ने अपना अस्तित्व बनाये रखा-इसके लिये उन महान विद्वानों को नमन किया जाना चाहिये जो सतत इस प्रयास में लगे रहे। भारत दो हजार साल तक गुलाम रहा-ऐसा कहने वाले लोग शुद्ध राजसी भाव के ही हो सकते हैं जो मानते हैं कि राज्य पर बैठा शिखर पुरुष भारत या यहां की धार्मिक विचारधारा मानने वाला नहीं रहा।

                                   हम जब अध्यात्मिक दृष्टि से देखते हैं तो पाते हैं कि विदेशों से आयी अनेक जातियां यहीं के समाज में लुप्त हो गयीं पर उस समय तक विदेशों में किसी धार्मिक विचाराधारा की पहचान नहीं थी। जब विदेशों में धार्मिक आधार पर मनुष्य में भेद रखना प्रारंभ हुआ तो वहां से आये राजसी व्यक्तियों ने भारत में आकर धार्मिक आधार पर भेद करने वाला  वही काम किया जो वहां करते थे।  अब तो स्थिति यह है कि भारतीय विचाराधारा न मानने वाले लोग यहीं के प्राचीन इतिहास से परे होकर विदेशी जमीन से अपनी मानसिक सोच चलाते हैं।  पाकिस्तानी मूल के कनाडाई लेखक तारिक फतह ने एक टीवी चैनल में साक्षात्कार में अपने ही देश की विचारधारा की जो धज्जियां उड़ाईं वह अत्यंत दिलचस्प है।  उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का मुसलमान यह सोचता है कि वह अरब देशों से आया है जबकि उसे समझना चाहिये कि वह प्राचीन भारतीय संस्कृति का हिस्सा है।

                                   भारतीय उपमहाद्वीप में आये विदेशी लोगों ने यहां अपना वर्चस्प स्थापित करने के लिये जो शिक्षा प्रणाली चलाई वह गुलाम पैदा करती है। अगर हम राजसी दृष्टि से भी देखें तो भी आज वही शिक्षा प्रणाली प्रचलन में होने के कारण भारत की पूर्ण आजादी पर एक प्रश्न चिन्ह लगा मिलता है।  लोगों की सोच गुलामी के सिद्धांत पर आधारित हो गयी है।  विषय अध्यात्मिक हो या सांसरिक हमारे यहां स्वतंत्र सोच का अभाव है।  लोग या तो दूसरों को गुलाम बनाने की सोचते हैं या फिर दूसरे का गुलाम बनने के लिये लालयित होते हैं। इसलिये स्वतंत्रता दिवस पर इस बात पर मंथन होना चाहिये कि हमारी सोच स्वतंत्र कैसे हो?

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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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मीडिया की बहस से अध्यात्मिक दर्शन का लाभ नहीं-हिन्दी चिंत्तन लेख


                                   हम जैसे योग तथा ज्ञानसाधक मानते हैं कि  लीलामय संत सुंदर कपड़े और गहने पहने पर उसमें उनका भाव लिप्त नहीं है तो चलेगा। कुछ संतों पर प्रचार युद्ध चल रहा है। हमारे अंदर अनेक तरक के विचार घूम रहे हैं। विवादास्पद गुरु ज्ञानी नहीं होते यह बात मीडिया वाले कैसे तय कर लेते हैं। क्या श्रीगीता का ज्ञान उन्होंने धारण कर लिया है? अनेक सवाल हमारे मन में आते हैं। हमारा तो यह भी कहना है कि आर्थिक उदारीकरण के बाद हमारे हमारे समाज में अस्थिरता आयी है जिसे मनोरोगों के साथ ही शारीरिक रूप से भी लोगों में अनेक विकार पैदा हो रहे हैं।  ऐसे में  तनाव और रोगों से घिरे समाज में मानसिक रूप से कमजोरों का सहारा बनने वाले पेशेवर संत प्रशंसायोग्य ही कहना चाहिये। उनका कमाना भी बुरा नहीं।

                                   इस विषय पर समाचर माध्यमों में जमकर बहस हो रही है पर लगता नहीं है कि धर्म के विषय पर कोई पेशेवर विद्वान  अपनी समझ का प्रदर्शन कर पा रहा है। कर्मकांडों के आधार पर तर्क गढ़ने में सभी माहिर दिखते हैं पर अध्यात्मिक ज्ञान का अभाव है। मीडिया-हिन्दी समाचार चैनल- अमीर संतों के कारनामों की चर्चा के लिये समाचार और बहस के बीच इतना समय अपने विज्ञापनदाताओं की चीजें बिकवाने के लिये लगाता है। इससे अध्यात्मिक साधकों को परेशान होने की जरूरत नहीं है।

             एक योग तथा ज्ञान साधक होने के नाते हमारा मानना है कि  गीता का ज्ञान एक ऐसा चश्मा है जो अंतर्चक्षुओं पर पहनना ही चाहिये। उसे गुरु मानकर पढ़ो, समझो और फिर उसके आधार पर संसार को समझो। धर्म और धन लीला की समझ के साथ मजा भी आयेगा। मीडिया अमीर संतों के कारनामों की चर्चा के लिये समाचारा और बहस के बीच इतना समय अपने विज्ञापनदाताओं की चीजें बिकवाने के लिये लगाता है।

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लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

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सावन का महीना बीमारियों का शोर-सावन माह पर नया हिन्दी पाठ


                              आज से सावन का महीना प्रारंभ हो गया है। जब  वर्षा ऋतु अपनी  जलधारा से गर्मी की उष्णा को ठंडा करती है तब  मनुष्य ही नहीं वरन् हर जीव अपने अंदर एक नयी स्फूर्ति का अनुभव करता है। सावन में संतुलित वर्षा देह को अत्यंत सुखद लगती है पर मौसम विशेषज्ञों ने बता दिया है कि अनेक जगह वर्षा कहर बरसायेगी तो अनेक  जगह अल्प वर्षा की स्थिति भी तरसायेगी।  हमारा क्षेत्र दूसरी स्थिति वाला है।  उज्जैन में महाकाल के शिखर तक जल पहुंचाने वाले बादल हमारे शहर तक आते आते सूख जाते हैं। हवा का प्रवाह रुक जाता है और उमस त्रास का कारण बनती है। बादल शहर तक न आयें एक दुःख पर आकर न बरसें और फिर हवा रोक कर उमस बरसायें तो मानसिक संताप के साथ बीमारियां भी बढ़ती हैं।

                              मनभावन होने के बावजूद सावन का महीना मार्गशीर्ष जैसा पवित्र नहीं होता-श्रीमद्भागवत गीता में यही महीना श्रेष्ठ माना गया है।  मौसम की दृष्टि से यह मार्गशीर्ष  का  महीना न केवल सुहाना होता है वरन् अध्यात्मिक दृष्टि से भी उसका महत्व है।  सावन के महीने में जलाशय भर जाते हैं और देव प्रतिमाओं पर जलाभिषेक का क्रम भी प्रारंभ होता है। धन्य है वह भक्त जो प्रातःकाल ही मंदिरों में जाते हैं-उनकी वजह से सैर सपाटे करने वालों को अंधियारी सड़कों पर चहल पहल मिलती है।

                              इस महीने को संभवतः इसलिये भी अध्यात्मिक दृष्टि से मार्गशीर्ष से कम महत्व शायद इसलिये ही दिया गया क्योंकि इस माह में बीमारियों का भी प्रकोप रहता है।  वैसे तो जिस तरह का खानपान हो गया है उससे बिमारियां सदाबाहर हो गयी हैं पर इसके बावजूद सावन में चिकित्सालयों में कमाई की झड़ी लग जाती है। जब तक उच्च चिकित्सा सरकार के दायरे में थी तब तक ठीक था पर अब तो निजी क्षेत्र में तो इलाज का एक  ऐसा उद्योग बन गया है जिसमें संवेदनाओं का कोई स्थान नहीं है।  इस लेखक से उम्र में बड़ा एक बुद्धिमान मित्र बताता था कि बरसात में खाने को  लेकर मन में बड़ी उत्तेजना रहती है पर पाचन की दृष्टि से मौसम अत्यंत संवदेनशील होता है।

                              हमारे यहां वर्षा के चार मास शांति से एक स्थान पर बने रहने के साथ ही जलाशयों से दूर रहने की बात कहते हैं ।।  हमारे यहां स्थिति उलट गयी है।  आज खाये पीये अघाये लोगों को पिकनिक मनाने के लिये जलाशय भाते हैं।  अनेक जगह भारी उमस में पका भोजन किया जाता है। कहा जाता है कि पहले सड़के नहीं थी इसलिये ही वर्षा में पर्यटन वर्जित किया गया था।  हमें लगता है कि यह विकासवाद का अंधा तर्क है वरना तो वर्षा में सड़कें अब भी लापता लगती हैं-उल्टे अब कचड़े के निष्पादन के अभाव के उसके ढेर बांध बनकर पानी रोकते हैं और सड़कें नदियां बन जाती हैं। शहरों में जिस तरह पानी से जूझते हुए लोग दिखते हैं उतना तो गांवों में नहीं दिखते।

                              बहरहाल हमारा मानना है कि सावन का महीना भले ही मनभावन है पर इस समय खान पान और चाल चलन में सावधानी रखने का भी है।

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त्यागियों की ही वजह से भारत बचा हुआ है-हिन्दी चिंत्तन लेख


                एक बार अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जूनियर जार्जबुश ने विश्व में बढ़ती महंगाई को भारतीय जनता में व्याप्त अधिक खाने की प्रवृत्ति को बताया था।  उस समय अनेक विद्वानों ने इसका मजाक उड़ाया था। अंतर्जाल पर सक्रियता में नवीन व्यक्ति होने के कारण  हमने भी अधिक पाठक बटोरने की दृष्टि से बुश साहब से अपनी असहमति जताई थी। यह सात वर्ष पहले की बात थी। उस समय निजी टीवी चैनल और अंतर्जाल दोनों ही संचार जगत में एक नयी शुरुआत कर रहे थे। जैसे जैसे संचार की शक्ति बढ़ी तो नयी नयी जानकारियां आने लगीं। भारत में इस दौरान खानपान की आदतों में भारी बदलावा भी आया। उस समय हमने लिखा था कि चूंकि भारत के चाट भंडारों में भीड़ रहती है इसलिये कोई भी यह सोच सकता है कि भारत में लोग खाते बहुत हैं।  सात वर्ष बाद अब तो  भारत में मॉल के रूप में आधुनिक बाज़ार का रूप लिया है और आकार में बड़े होने के कारण वहां भी भीड़ अधिक दिखती है। यह अलग बात है कि वहां खाद्य पदार्थों के अलावा फिल्मों के उपभोक्ता और दर्शक ही अधिक आते हैं। इस तरह उपभोग प्रवृत्ति में बदलाव तथा उपभोक्ताओं की बड़ी संख्या किसी विकास का परिचायक नहीं  है क्योंकि इसके पीछे हमारा कोई नवीन निर्माण नहीं है।  रोजगार, स्वास्थ्य तथा नैतिक आचरण का पैमाना बहुत नीचे चला गया है। कर्ज लेकर घी पीने के जिस सिद्धांत पर समाज चला है उसे देखकर तो अब विदेशी यह भी कह सकते हैं कि भारतीय कमाते कम हैं खाते ज्यादा हैं।

                              सब कुछ बदला है पर यहां के धनपितयों की प्रवृत्ति जस की तस है। खाद्य पदार्थों में मिलावट तथा पहनने ओढ़ने में नकली सामान बनाने  की वही कहानी अब भी जारी है। पहले बाज़ार से अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थों में मिलावट के समाचार आते थे पर अब तो एक टीवी समाचार चैनल ने प्लास्टिक के चावल बनने की बात कहकर हैरान ही कर दिया है। हम सभी जानते हैं कि अन्न से मन और मन से मनुष्य का अस्तित्व है। अगर इसी तरह अन्न से प्लास्टिक का मेल होने की बात आगे बढ़ी तो फिर हमें शुद्ध मनुष्य ढूंढना ही मुश्किल हो जायेगा।

                              हमने पहले भी कहा था और अब भी कह रहे हैं कि भारत में प्रकृत्ति की कृपा अन्य देशों से कहीं अधिक है।  यहां भूजल का बेहतर स्तर, हर तरह के अन्न की फसल और विभिन्न खनिजों संपदा को देखकर कोई नहीं कह सकता कि भारत अभिशप्त देश है। यह अलग बात है कि यहां लोभ की ऐसी प्रवृत्ति है कि कोई धनपति अपनी कमाई से संतुष्ट होने की बजाय दूसरे के मुंह से निवाला निकालकर या खींचकर अपनी तरफ करने पर ही प्रसन्न होता है। यही कारण है कि हमारा देश सब कुछ होते हुए भी गरीब और अविकसित कहा जाता है। मजे की बात यह है कि जितना अज्ञानी समुदाय है उससे ज्यादा ज्ञानी लोगों का समूह है।  शायद यही कारण है कि यह देश चल रहा है। अज्ञानी के लोभ की प्रवृत्ति के बावजूद ज्ञानियों का त्याग भाव हमारे देश को बचाये हुए है।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

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दंड शक्ति होने के बावजूद योगी उद्दण्ड नहीं बनते-हिन्दी चिंत्तन लेख


                              एक पूर्व क्रिकेट खेल व्यापारी का किस्सा इन दिनों अंतर्जाल और प्रचार माध्यमों में छाया हुआ है। क्रिकेट के व्यापार में अनेक आरोपों का बोझ उठाये वह लंदन में बैठकर भारत में दूसरों पर आक्षेप कर अपने नायकत्व की छवि बना रहा है। भारतीय राजनीति के अनेक शिखर व्यक्तित्व उसके निशाने पर हैं।  हमारी इस तरह के राजसी विषय में इतनी रुचि नहीं है कि इस पर अधिक लिखने का प्रयास करें पर जिस तरह इस आड़ में योग विषय का मजाक बनाया जा रहा है वह थोड़ा आपत्तिजनक लग रहा है। उसे लेकर भारतीय शासन क्या कदम उठायेगा इस पर टिप्पणी करना हमारा काम नही है पर इस प्रसंग से उत्साहित कुछ लोग बराबर यह कह रहे हैं कि समाज को  योग साधना की प्रेरणा देने की बजाय शिखर पुरुषों को राजसी विषयों पर अपना हाथ दिखाना चाहिये।

                              अभी 21 जून को योग दिवस के अवसर भारत के अनेक राजसी शिखर पुरुषों ने सार्वजनिक  स्थानों पर साधना करते हुए समाज में चेतना लाने का प्रयास किया।  इससे समाज में चेतना कितनी फैली यह अलग से चर्चा का विषय है पर एक बात तय है कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर योग विषय का विस्तार होगा।  योग न करने वाले कभी इसके अभ्यास करने वालों को समझ नहीं पाते तो विरोधियों का कहना ही क्या? योग साधकों को किसी विषय पर उत्तेजित नहीं करना चाहिये। जिन्होंने इसका बरसों अभ्यास किया हो उन्हें हम जैसे कम अवधि के साधक भी चुनौती नहीं देते। जब कोई दूसरा उनको देता है तो उस पर हंसी ही आती है। सच बात तो यह है कि अधिक अभ्यास करने वाले योगियों के पास दंड देने की स्वाभाविक रूप से आ जाती है पर इसका मतलब यह कतई नहीं कि वह उद्दंडता पर उतर कर दूसरों को संतुष्ट करने का प्रयास करें।  दूसरी बात यह कि योगी का मौन हमेंशा चिंत्तन और मनन की क्रिया के लिये होता है इसलिये किसी खास विषय पर उनसे तत्काल निष्कर्ष बताने की आशा नहीं करते।  जब वह अपने समय पर बताते हैं तो दूसरे को हतप्रभ कर देते हैं। हम स्पष्ट कर दें कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अगर योग का विषय अनावश्यक रूप से नहीं घसीटा जाता तो हम कभी यह लेख नहीं लिखते। अपने बारह अभ्यास से योग विशारद लोगों की छवि हमारे हृदय में है उसी के कारण यह लिखने के लिये प्रेरित भी हुए। किसी के प्रति भ्रम या दृढ़ विश्वास व्यक्त करना भी हमारा लक्ष्य नहीं है क्योंकि अंततः यह धरती गोल है-यहां समय ही सबसे बलवान है।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

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योग साधना नित्य कर्म बनायें-हिन्दी चिंत्तन लेख


                                    21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर सभी देशों में आयोजनों की तैयारियां चल रही हैं।  अनेक प्रकार की चर्चायें चल रही हैं पर उनका संबंध इसके दैहिक लाभ से ही है।  इसके अध्यात्मिक शक्ति मिलने की बात बहुत कम लोग कर रहे हैं। योग साधक भी अनेक प्रकार हैं। एक तो वह जो कभी कभार ही करते हैं। दूसरे वह जो अक्सर करते हैं। ऐसे योग साधकों की संख्या नगण्य है जो इसे नियमित करते हैं। जिन लोगों के लिये यह एक आदत या नशा है पर मौसम की परवाह नहीं करते है। हम जैसे योग साधकों के लिये तो यह सुबह का नशा है। प्रातः अगर शुद्ध वायु का सेवन न करें तो पूरा दिन ऐसा लगता है जैसे कि नींद से उठे ही नहीं।

                                    हमारी दृष्टि से तो योग साधना के अभ्यास से शरीर का तेल निकल जाता है-डरने की बात नहीं जब हम पूर्ण साधना कर लेते हैं तब  शरीर में मक्खन बनने की अनुभूति भी आती है।  गर्मी में तो हवा चलती है इसलिये थोड़ी राहत मिलती है पर जब वर्षा ऋतु में  बादल मुंह फेरे रहते हैं तब तो आसनों के समय पसीना इस तरह निकलता है कि चिढ़ भी आने लगती है। शरीर में गर्मी लाने वाले आसनों से उस समय परहेज की जा सकती है पर तब यह आदत छूटने की आशंका से यह विचार छोड़ना पड़ता है।

                                    इस समय चहूं ओर योग साधना की बात हो रही है। अंग्रेजी महीना जून और भारतीय माह आषाढ़ एक साथ चल रहे हैं।  जब हम योग साधना करते हैं तब 21 जून विश्व योग दिवस वाली बात तो भूल ही जाते हैं। कभी कभी हवा राहत देती है तो कभी शरीर में इतनी उष्णता लगती है कि सोचते हैं जितना कर लिया ठीक है।  फिर हवा चलती है तो धीरे धीरे अपनी साधना भी बढ़ती है।  अंत में जब मंत्र जाप करते हैं तो मन में यह उत्साह पैदा होता है कि चलो हमने किसी तरह अपनी साधना तो पूरी कर ली। स्नान और पूजा से निवृत होकर जब चाय पीते समय टीवी पर कहीं योग का कार्यक्रम देखते हैं तभी ध्यान आता है कि हम भी यही कर आ रहे हैं।  इन कार्यक्रमों में योग स्थान देखकर लगता है कि काश! हम भी वहीं जाकर साधना करें। अब उन स्थानों तक पहुंचने के लिये रेल या बस यात्रा तो करनी ही होगी-तब यह सोचकर खुश होते हैं कि जहां भी कर ली वहीं ठीक है।

                                    आमतौर से लोग सुबह के भ्रमण या व्यायाम को योग के समकक्ष रखते हैं पर यह दृष्टिकोण उन्हीं लोगों का है जो इसे केवल शारीरिक अभ्यास के रूप में पहचानते हैं।  हमने अपने अभ्यास से तो यही निष्कर्ष निकाला है कि योग साधना के नियमपूर्वक आसन, प्राणायाम और ध्यान करने से मानसिक तथा वैचारिक लाभ भी होते हैं।  अनेक लोग इसे धर्मनिरपेक्ष बताकर प्रचारित कर रहे हैं जबकि हमारी दृष्टि से योग स्वयं एक धर्म है।  विश्व में जितने भी संज्ञाधारी धर्म है वह वास्तव में आर्त भाव में स्थिति हैं जिसमें सर्वशक्तिमान से जीवन सुखमय बनाने के लिये प्रार्थना की जाती है। समय के साथ मनुष्य सांसरिक विषयों में निरंतर लिप्त रहने के कारण कमजोर हो जाता है इसलिये वह अपना मन हल्का करने के लिये आर्त भाव अपना लेता है जबकि योग से न केवल ऊर्जा का क्षरण रुकता है वरन नयी स्फूर्ति भी आती है इसलिये मनुष्य आर्त भाव की तरफ नहीं जाता। इसलिये वह सर्वशक्तिमान से याचना की बजाय उसे अध्यात्मिक संयोग बनाने का प्रयास करता है। यही कारण है कि सभी कथित धार्मिक विद्वान इसके केवल शारीरिक लाभ की बात कर रहे हैं ताकि लोग अध्यात्मिक रूप से इस पर विचार न करें।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’

ग्वालियर मध्यप्रदेश

Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
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लोकप्रिय लोगों की मजबूरी है प्रचार माध्यमों से जुड़ा रहना-हिन्दी चिंत्तन लेख


     आज का प्रचार तंत्र एकदम व्यवसायिक है। टीवी, समाचार पत्र तथा पत्रिकाओं के संचालक संस्थान विशुद्ध रूप से अर्थतंत्र के उन सिद्धांतों पर आधारित है जिनमें मानवीय सिद्धांतों का कोई स्थान नहीं है। आजादी के समय अनेक लोगों ने विशुद्ध रूप से देशभक्ति के भाव से समाचार पत्र पत्रिकायें निकाली थीं पर उसके बाद तो समाज तथा उस पर नियंत्रण करने वाली इकाईयों पर अपना प्रभाव रखने की प्रवृत्ति ही पत्रकारिता का उद्देश्य  रह गया है।

      एक संपादक ने अपना एक रोचक किस्सा इस लेखक को सुनाया। वह उस समय एक समाचार पत्र में प्रथम या मुख  पृष्ठ के संपादक थे, जब केवल एजेंसियों की खबर ही छपती थीं।  वह उन्हें लिखते या शीर्षक लगाते थे।  उनके साथ अनेक नये लड़के काम करते थे।  लड़के उनसे अक्सर यह कहते थे कि ‘साहब, आप हमें नगर समाचार पर काम करवाईये।’

वह कारण पूछते तो यही बताया जाता था कि इससे पुलिस तथा प्रशासन से संपर्क बनता है जो लाभदायक रहता है।’

     यह विचार  जब वेतनभोगी कर्मचारियों का हो तो स्वामियों का नहीं होगा यह सोचना ही बेकार है। वह दौर पुराना था पर अब इस दौर में जब वेतनभोगियों को अपनी नौकरी और स्वामियों को अपने संस्थान का प्रभाव बनाये रखने की चिंता नित हो तो फिर अधिक संवेदनशीलता की आशा कम से कम उन लोगों को तो करना ही नहीं चाहिये जो इसके सहारे प्रतिष्ठा और पद पा लेते हैं। इतना ही नहीं पद पाने से पहले समाज सेवक की भूमिका और बाद में अपनी सेवा के प्रचार के लिये सभी को प्रचार की आवश्यकता होती है। सच तो यह है कि प्रचार माध्यमों ने अनेक ऐसे लोगों को नायक बनाया जिनके अपेक्षा वह स्वयं भी नहंी की।

           अंततः प्रचार माध्यमों को जनता में बना रहना है इसलिये हमेशा ही किसी के सगे बनकर नहीं रह सकते। इसलिये कभी अपने ही बनाये नायक में खलनायक भी देखने लगते हैं। उन्हें अपनी खबरों के लिये कला, फिल्म, राजनीति, तथा खेल के शिखर पुरुषों से ही अपेक्षा रहती है। यही कारण है कि शिखर पुरुषों के जन्म दिन, सगाई, शादी, तलाक और सर्वशक्तिमान के दरबारों मत्था टेकने की खबरें भी प्रचार माध्यमों में आती हैं। इतना ही नहीं अंतर्जाल पर हजारों आम लोग सक्रिय हैं और उनकी अनेक रचनायें अद्वितीय लगती हैं पर ब्लॉग, फेसबुक, और ट्विटर पर शिखर पुरुषों की रचनायें ही प्रचार माध्यमों पर सुशोभित होती हैं। जब तक प्रचार प्रबंधकों को लगता है कि शिखर पुरुषों को नायक बनाकर उनकी खबरें बिक रही हैं तब तक तो ठीक है, पर जब उनको लगता है कि अब उन्हें खलनायक दिखाकर सनसनी फैलानी है तो वह यह भी करते हैं। जब तक शिखर पुरुषों को अपना प्रचार अनुकूल लगता है तब तक वह प्रचार माध्यमों को सराहते र्हैं, पर जब प्रतिकूल की अनूभूति होती तो वह उन पर आरोप लगाते हैं।

इस पर एक कहानी याद आती है।  रामलीला मंडली में एक अभिनेता राम का अभिनय करता था। आयु बढ़ी तो वह रावण बनने लगा जबकि उसके पुत्र को राम बनाया जाता था। एक बार इस पर उससे प्रतिक्रिया पूछी गयी। रामलीला मंडली में काम करने वाले अध्यात्मिक रूप से परिपक्व तो होते ही हैं। उसने जवाब दिया कि ‘समय की बलिहारी है। मैं कभी राम बनता था अब रावण का अभिनय करता हूं। यह मेरा रोजगार है। रामलीला मंडली छोड़ना मेरे लिये संभव नहीं है।’

        प्रचार माध्यम भी लोकतांत्रिक लीला में यही करते हैं। पहले नायकत्व की छवि प्रदान करते हैं और कालांतर में खलनायक का भूमिका सौंप देते हैं।  लोकतांत्रिक लीला में जिन्हें नित्य कार्य करना ही है वह जब नायकत्व की छवि का आनंद लेते हैं तो बाद में उन्हें प्रचार माध्यमों की खलनायक की भूमिका भी सहजता से स्वीकार करना चाहिये। उन्हें आशा करना चाहिये कि संभव है कभी उन्हें नायकत्व दोबारा न मिले पर खलनायक की  जगह उन्हें सहनायक की भूमिका मिल सकती है जैसे रामलीला में राम का चरित्र निभाने वाले को को अपने बेटे के लिये दशरथ की भूमिका मिलती है।

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कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

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योग एक अध्यात्मिक विज्ञान है-21 जून पर विश्व योग दिवस पर विशेष लेख


                  21 जून विश्व योग दिवस जैसे जैसे करीब आता जा रहा है वैसे वैसे भारतीय प्रचार माध्यम भारतीय अध्यात्मिक विचारधारा न मानने वाले समुदायों के कुछ लोगों को ओम शब्द, गायत्री मंत्र तथा सूर्यनमस्कार के विरोध करने के लिये बहस में निष्पक्षता के नाम पर बहसों में आगे लाकर अपने विज्ञापन का समय पास कर रहे हैं। हमारा मानना है कि भारतीय योग विद्या को विश्व पटल पर स्थापित करने के इच्छुक लोगों को ऐसी तुच्छ बहसों से दूर होना चाहिये। उन्हें विरोध पर कोई सफाई नहीं देना चाहिये।

                 योग तथा ज्ञान साधक के रूप में हमारा मानना है कि ऐसी बहसों में न केवल ऊर्जा निरर्थक जाती है वरन् तर्क वितर्क से कुतर्क तथा वाद विवाद से भ्रम उत्पन्न होता है।  भारतीय प्रचार माध्यमों की ऐसे निरर्थक बहसों से योग विश्वभर में विवादास्पद हो जायेगा। विश्व योग दिवस पर तैयारियों में लगी संस्थायें अब विरोध की सफाई की बजाय उसके वैश्विक प्रचार के लिये योग प्रक्रिया तथा विषय का प्रारूप बनाने का कार्य करें। जिन पर इस योग दिवस का जिम्मा है वह अगर आंतरिक दबावों से प्रभावित होकर योग विद्या से छेड़छाड़ करते हैं तो अपने ही श्रम को व्यथ कर देंगे।

           हम यहां बता दें कि भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा का देश में ही अधिक विरोध होता है। इसका कारण यह है कि जिन लोगों ने गैर भारतीय विचाराधारा को अपनाया है वह कोई सकारात्मक भाव नहीं रखते। इसके विपरीत यह कहना चाहिये कि नकारात्मक भाव से ही वह भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा से दूर हुए हैं।  उन्हें समझाना संभव नहीं है।  ऐसे समुदायों के सामान्य जनों को समझा भी लिया जाये पर उनके शिखर पुरुष ऐसा होने नहीं देंगे। इनका प्रभाव ही भारतीय विचाराधारा के विरोध के कारण बना हुआ है। वैसे हम एक बात समझ नहीं पाये कि आखिर चंद लोगों को गैर भारतीय विचाराधारा वाले समुदायों का प्रतिनिधि कैसे माना जा सकता है?  समझाया तो भारतीय प्रचार माध्यमों के चंद उन लोगों को भी नहीं जा सकता जो निष्पक्षता के नाम पर समाज को टुकड़ों में बंटा देखकर यह सोचते हुए प्रसन्न होते हैं कि विवादों पर बहसों से उनके विज्ञापन का समय अव्छी तरह पास हो जाता है।

    योग एक विज्ञान है इसमें संशय नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता संसार में एक मात्र ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान तथा विज्ञान है। यह सत्य भारतीय विद्वानों को समझ लेना चाहिये।  विरोध को चुनौती समझने की बजाय 21 जून को विश्व योग दिवस पर समस्त मनुष्य योग विद्या को सही ढंग से समझ कर इस राह पर चलें इसके लिये उन्हें मूल सामग्री उलब्ध कराने का प्रयास करना चाहिये।  विरोधियों के समक्ष उपेक्षासन कर ही उन्हें परास्त किया जा सकता है। उनमें  योग विद्या के प्रति सापेक्ष भाव लाने के लिये प्रयास करने से अच्छा है पूरी ऊर्जा भारत तथा बाहर के लोगों में दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक रूप से स्वस्था रहने के इच्छुक लोगों को जाग्रत करने में लगायी जाये।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

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नाम के साथ बदनामी-हिन्दी हास्य कविता(naam ke sath badnami-hindi comedy poem)


मंदिर में मिलते ही बोला फंदेबाज

‘‘दीपक बापू तुमने इतना लिखा

फिर भी फ्लाप रहे,

पता नहीं किसके शाप सहे,

इससे तो अच्छा होता तुम

कोई संत बन जाते,

खेलते माया के साथ

शिष्य की बढ़ती भीड़ के साथ

जगह जगह आश्रम बनाते,

कुछ सुनाते कवितायें,

दिखाते कभी गंभीर

कभी हास्य अदायें,

हल्दी लगती न फिटकरी

प्रचार जगत के सितारे बन जाते।

हंसकर बोले दीपक बापू

‘‘यह तुम्हारी सहृदयता है

या दिल में छिपा कोई बुरा भाव,

हमें उत्थान की राह दिखाते हो

या पतन पर लगवा रहे हो दांव,

अपनी चिंता के बोझ से ही

हो जाते हैं बोर

भीड़ की भलाई सोचते हुए

बुद्धि से भ्रष्ट हो जाते,

कितना भी ज्ञान क्यों न हो

माया है महाठगिनी

अपने ही इष्ट भी खो जाते,

अनाम रहने से

स्वतंत्रता छिन नहीं जाती,

मुश्किल होती है जब

नाम के साथ बदनामी

लेकर आती संकट

घिन हर कहीं छाती,

प्रसिद्धि का शिखर

बहुत लुभाता है,

गिरने पर उसी का

छोटा पत्थर भी कांटे  चुभाता है,

सत्य का ज्ञान

होने पर भी

अपने आश्रम महल बनाकर

माया के अंडे हर ज्ञानी पाता है,

मगर होता है जब भ्रष्ट

अपनी सता से

तब अपने पीछे लगा

डंडे का हर दानी पाता है,

तुम्हारी बात मान लेते

हम इस धरती पर

चमकते भले ही पहले

मगर बाद में बिचारे बन जाते।

———————————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

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हिन्दी दिवस पर सम्मान-हास्य कविता


रास्ते में तेजी से चलता

मिल गया फंदेबाज और बोला

‘‘दीपक बापू तुम्हारे पास ही आ रहा था

सुना है दस सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग लेखक

सम्मान पाने वाले हैं,

ऐसा लगता है हिन्दी के अंतर्जाल पर भी

अच्छे दिन आने वाले हैं,

हो सकता है तुमको भी

कहीं से सम्मान मिल जाये,

हमारा छोटा शहर भी

ऐसी किसी खबर से हिल जाये,

आठ साल अंतर्जाल पर हो गये लिखते,

पहल दिन से आज तक

तुम फ्लाप कवि ही दिखते,

मिल जाये तो मुझे जरूर याद करना

मैंने ही तुम्हारे अंदर हमेशा

उम्मीद जगाई,

सबसे पहले दूंगा आकर बधाई।

सुनकर हंसे दीपक बापू और बोले

‘‘अंतर्जाल पर लिखते हुए अध्यात्म विषय

हम भी हम निष्काम हो गये हैं,

कोई गलतफहमी मत रखना

हमसे बेहतर लिखने वाले

बहुत से नाम हो गये हैं,

हमारी मजबूरी है अंतर्जाल पर

हिन्दी में लिखते रहना,

शब्द हमारी सासें हैं

चलाते हैं जीवन रुक जाये वरना,

मना रहे हैं जिस तरह

टीवी चैनल हिन्दी दिवस

उससे ही हमने प्रसन्नता पाई,

नहीं मिलेगा हमें यह तय है

फिर भी देंगे

सम्मानीय ब्लॉग लेखको को हार्दिक बधाई,

हम तो इसी से ही प्रसन्न हैं

हिन्दी ब्लॉग लेखक शब्द

अब प्रचलन में आयेगा,

अपना परिचय देना

हमारे लिये सरल हो जायेगा,

सम्मान का बोझ

नहीं उठा सकते हम,

उंगलियां चलाते ज्यादा

कंधे उठाते कम,

इसी से संतुष्ट हैं कि

अंतर्जाल पर हिन्दी लिखकर

हमने अपने ब्लॉग लेखक होने की छवि

अपनी ही आंखों में बनाई।

————

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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धर्म अब व्यवसाय बन गया है-हिन्दी व्यंग्य काव्य रचनायें


हर कोई बैठा है हाथ में लेकर मूर्तियां पुजवाने के लिये,

जिसकी नहीं पुजे लग जाता दूसरे की तुड़वाने के लिये।

किसी ने लगाया ने अपने माथे पर चंदन की टीका

किसी ने अपने चेहरे पर स्थापित दाढ़ी बढ़ा ली,

चाहे जहां सर्वशक्तिमान के नाम पर शब्दों की जंग लड़ा ली,

कहें दीपक बापू भक्ति का मसला दिल से जुड़ा है

धर्म के ठेकेदारों ने बना लिया धंधा कमाने के लिये।

———–

सर्वशक्तिमान की  भक्ति करने पर वह इतराते हैं,

दिल है खाली जुबान पर नाम लेकर इठलाते हैं।

कहें दीपक बापू पाखंड से पहचानी जा रही आस्था,

सत्य के नाम पर सत्ता का बना रहे रास्ता,

ज्ञान की राह कभी सभी समझी नहीं

रट लिये शब्द अब दूसरों को सिखलाते हैं।

———–

धर्म के मसले पर हर रोज नयी चर्चा हो जाती है,

शब्दों की भारी भीड़ अधर्म की पहचान पर खर्चा हो जाती है।

कहें दीपक बापू विद्वानों के बीच बहस की जगह जंग होती है

तस्वीरों से शुरु शून्य पर खत्म चर्चा हो जाती है।

——–

आओ कोई मुद्दा नहीं है धर्म पर बात कर लें,

बैठे बिठाये अधर्म पर घात कर लें।

मौन रहने में शक्ति है पर देखता कौन है,

अपनी छवि दिखाने के लिये सभी आमादा

शोर के बीच अकेला खड़ा है वह शख्स जो मौन है।

कहें दीपक बापू किसी ने जप लिये वेद मंत्र,

कोई बना रहा है सर्वशक्तिमान के नाम पर तंत्र,

रट लेते जिन्होंने शब्द ग्रंथ से

लगा लिया है उन्होंने धर्म का बाज़ार,

भ्रम के धुंऐं के बीच बेच रहे आस्था का अचार,

सच्चे ज्ञानी का इकलौता एक ही साथ मौन है।

—————

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

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हिन्दी में लिख लिया तो समझ लो अच्छा दिन है-राष्ट्रभाषा पर निबंध


          देश में राजनीतिक परिवर्तन के साथ ही इस बात पर भी बहस एक टीवी चैनल पर चली कि क्या हिन्दी के भी अच्छे दिन आने वाले हैं? दरअसल इस बहस का आधार यह था कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी हिन्दी भाषा के प्रचार प्रसार के एक बहुत समर्थक  भी हैं।  वह भविष्य में  विदेशी नेताओं से हिन्दी में बात करेंगे।  इसे लेकर हिन्दी के कुछ विद्वान उत्साहित हैं।  उनका मानना है कि जिस तरह देश के आर्थिक विकास की लहर पूरे देश के अच्छे दिन आने के नारे को बहाकर लायी है उसी तरह हिन्दी भी अब अंतराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानजनक स्थान प्राप्त करेगी।  हमारा मानना है कि हिन्दी भाषा अंततः भविष्य में वैश्विक भाषा बनेगी पर इसके लिये भारत के सामान्य जनमानस में यह विश्वास जगाना आवश्यक है कि भविष्य में उसका काम बिना हिन्दी के चलने वाला नहीं है।

         इसमें कोई संदेह नहीं है कि नये प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रभाव से ओतप्रोत हैं पर यह भी सच है कि देश में आर्थिक विकास करने के साथ ही संास्कृतिक उत्थान बिना सामान्य जन के बिना  संभव नहीं है।  हम यहां केवल हिन्दी भाषा की चर्चा कर रहे हैं इसलिये यह कहने में संकोच नहीं है कि इस संबंध में आम भारतीय का रवैया भी वही है जो उसका अपने जीवन को लेकर है।  जिस तरह वह यह आशा करता है कि उसके जीवन का उद्धार कोई अवतारी पुरुष करेगा वही हिन्दी के संबंध में भी उसकी धारणा है।  हर सभ्रांत व्यक्ति चाहता है कि उसके बच्चे को अंग्रेजी में महारथ हासिल करना चाहिये और हिन्दी का सम्मान दूसरे लोग करें।  स्थिति यह है कि अनेक कलाकारों, विद्वानों, तथा लेखकों का जीवन हिन्दी भाषा के दम पर चल रहा है पर वह अपनी बात कहने के लिये अंग्रेजी का सहारा लेते हैं।  सबसे बड़ी बात यह है कि सभ्रांत वर्ग जो कि भाषा, संस्कृति, संस्कार तथा ज्ञान की रक्षा में सबसे ज्यादा योगदान देता है उसमें आत्मविश्वास का अभाव है। उसे नहीं लगता कि हिन्दी के सहारे आर्थिक विकास किया जा सकता है। उसका दूसरा संकट यह भी है कि वह पूरी तरह से अंग्रेंजी का आत्मसात भी नहीं कर पाया है। हमने अनेक कलाकारों, विद्वानों, तथा लेखकों को हिन्दी की खाते और अंग्रेजी की बजाते देखा है पर यह पता ही नहीं लग पाता कि वह अंग्रेजी में ही सोचते हैं या हिन्दी में सोचकर अंग्रेजी में बोलते हैं।  हिन्दी विद्वानों में भी भारी अंतर्द्वंद्व है। वह हिन्दी का प्रयोग बढ़ाने के लिये उसमें जमकर अंग्रेजी शब्द ठूंसने की बात करता है। परिणाम यह हो रहा है कि एक हिंग्लििश भाषा का निर्माण हो रहा है जो भविष्य में किसी काम की नहीं है। भाषा की रक्षा साहित्य से होती है और हिंग्लिश वाले किसी साहित्य रचना योग्य नहीं लगते।  जिनकी हिन्दी लेखन में रुचि है वह अपनी भाषा में शब्दों का प्रयोग सावधानी से करते हैं।

     बाज़ार हिन्दी भाषियों को उपभोक्ता से अधिक स्तर प्रदान नहीं करता।  अंतर्जाल पर भी यही हाल है। अंग्रेजी पर टीका टिप्पणी करने वालों को प्रचार माध्यम महत्व देते हैं।  किसी के हिन्दी वाक्य अगर प्रचारित होते हैं तो वह कोई बड़ा धनी, पदवान या कलाकार होता है।  सामान्य लोगों को अपने फेसबुक या ट्विटर पर आने वालों को यह प्रचार माध्यम दिखाते हैं पर किसी खास विषय पर लिखे गये किसी ब्लॉग या फेसबुक के ऐसे पाठ की चर्चा कभी नहीं देखी गयी जो किसी सामान्य लेखक ने लिखा हो।

     हिन्दी के अच्छे दिन आयेंगे या नहीं यह तो नहीं कहा जा सकता पर हिन्दी में लेखन करने वालों को यह कदापि आशा नहीं करना चाहिये कि उन्हें कोई सम्मान या पुरस्कार  चमचागिरी या संगठित ठेकेदारों की चरणवंदना किये बिना मिल जायेगा। हिन्दी लेखन तो स्वांत सुखाय ही हो सकता है।  अगर आप लेखक हैं तो अपनी कोई रचना लिख लें तो समझिये वही अच्छा दिन है। पिछले सात वर्षों से अंतर्जाल पर लिखते हुए हमने यही अनुभव किया है।

 

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

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जहान के गम से परेशान-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


जब तक तक उनके चेहरे पर नकाब था
उनकी सुंदरता के अहसास से ही
दिल में हलचल मची थी
उतारा तो हमारी आंखें ही उदास हो गयीं
ख्यालों में बसी उनकी तस्वीरें कहीं खो गयीं।
कहें दीपक बापू मिट्टी से बने रंग बिरंगे खिलौने
सजावट में घर की शोभा बढ़ाते हैं,
टूटे तो हम उनके लिये बेकद्री जताते हैं,
इंसान तोड़ते हैं जब भरोसा खिलौने की  तरह
तब टूटते हैं हम खुद
फिर ढूंढते अपनी दूसरी जगह आशायें
जो दिल में कही सो गयीं।
————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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दौलत के ढेर और आम इंसान-हिन्दी व्यंग्य कविता


आम इंसान जिंदा रहने के लिये मेहनत से जूझ रहा है,

जिसे मिला आराम का सामान वह मनोरंजक पहेलियां बूझ रहा है।

मुख से शब्दों की वर्षा करते हुए आसान है दिल बहलाना,

रोते अपने गम पर सभी नहीं आता दूसरे का दर्द सहलाना,

अपनी नीयत साफ नहीं पर पूरे ज़माने पर शक जताते,

अपनी गल्तियों पर जिम्मेदार खुद तोहमत गैरों पर लगाते,

बाज़ार से हसीन सपने खरीद लेते हैं सस्ते भाव में अमीर,

जज़्बातों के सौदे में कामयाब होते वही मार ले जो अपना जमीर,

कहें दीपक बापू दुनियां का कोई है उसूल यह बात जाओ भूल

दौलत के ढेर पर पहुंचा वही इंसान जो ज़माने का खून चूस रहा है।

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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

 

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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सेवा के स्वांग स्वामी बनने के लिये किये जाते है-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


जिनके महल रौशन है वह क्या अंधेरे घरों का दर्द जानेंगे,

रोटियों को ढेर जिनके सामने है वह भूख का क्या दर्द मानेंगे।

कांपते है जिनके हाथ व्यवस्था में बदलाव के नाम से

वह क्रांति का दावा बेबस लोगों के सामने करते हैं,

घूमते हैं कार में रिक्शा चालकों की चिंता का दंभ भरते हैं,

आदर्शवादी बाते कहना आसान है अमल में लाना जरूरी नहीं,

पर्दे पर चमक जाओ बयानों पर चलने की फिर मजबूरी नहंी,

पानी की प्यास पर देते हैं बहुत सारे बयान

घर में पीने के लिये उनके यहां समंदर भरे हैं,

प्यासों के दर्द पर जताते सहानुभूति वही

खुद प्यासे मरने के भय से जो डरे हैं,

कहें दीपक बापू नहीं मांगना रोटी और पानी

कभी भलाई के धंधेबाज दलालों से नहीं मांगना

तुम्हें भीड़ में भेड़ की तरह लगाकर अपना सीना तानेंगे।

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सेवा के स्वांग स्वामी बनने के लिये किये जाते हैं,

दूसरे लोग बदनाम अपनी इज्जत बढ़ाने के लिये किये जाते हैं।

हर इंसान जी रहा स्वार्थ के लिये पर परमार्थ का करता दावा,

पुजने के लिये सभी तैयार आता रहे रोज उनके पास चढ़ावा।

दूसरे को नसीहतें देते हुए ढेर सारे उस्ताद मिल जायेंगे,

दाम खर्च करो तो बड़े बड़े ईमानदार हिलते नज़र आयेंगे,

शिक्षा कहीं नहीं मिलती ज़माने से वफादारी दिखाने की,

गद्दारी करते सभी जल्दी कामयाबी अपने नाम लिखाने की,

कहें दीपक बोते सभी अपने घर में बबूल हमेशा

आम उगने की उम्मीद सर्वशक्तिमान से किये जाते हैं।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior
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आदर्शवाद का ढोंग-हिन्दी व्यंग्य कविता


जिनके महल रौशन है वह क्या अंधेरे घरों का दर्द जानेंगे,

रोटियों को ढेर जिनके सामने है वह भूख का क्या दर्द मानेंगे।

कांपते है जिनके हाथ व्यवस्था में बदलाव के नाम से

वह क्रांति का दावा बेबस लोगों के सामने करते हैं,

घूमते हैं कार में रिक्शा चालकों की चिंता का दंभ भरते हैं,

आदर्शवादी बाते कहना आसान है अमल में लाना जरूरी नहीं,

पर्दे पर चमक जाओ बयानों पर चलने की फिर मजबूरी नहंी,

पानी की प्यास पर देते हैं बहुत सारे बयान

घर में पीने के लिये उनके यहां समंदर भरे हैं,

प्यासों के दर्द पर जताते सहानुभूति वही

खुद प्यासे मरने के भय से जो डरे हैं,

कहें दीपक बापू नहीं मांगना रोटी और पानी

कभी भलाई के धंधेबाज दलालों से नहीं मांगना

तुम्हें भीड़ में भेड़ की तरह लगाकर अपना सीना तानेंगे।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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दिल का सौदा और कीमत-होली 2014 के अवसर पर विशेष हिंदी व्यंग्य कविता


चेहरे का रंग उड़ा है जिनका उन पर कौनसा रंग लगायें,

हुलिया बिगाड़ा है जिन्होंने स्वयं का उनके साथ कैसे होली मनायें।

हर पल देते हैं जो धोखा वह  लोग क्या समझेंगे हास परिहास,

शब्दों का जो अनर्थ करते वह क्या जायेंगे किसी के दिल के पास,

सभी के साथ वादे करते हुए जिंदगी गुजारी कभी पूरे किये नहीं,

दिखाकर सपने दिल का सौदा किया  दाम कभी पूरे दिये नहीं,

भूख, भ्रष्टाचार और भय के विषय बेचते हैं बाजार में सस्ता जताकर,

अपनी मंजिल पर पहुंचते हैं वही दूसरों को रास्ता भटकाकर,

चाल जिनकी टेढ़ीमेढ़ी चरित्र लापता  चेहरे पर पाखंड की छाया है,

चमक रहे  कैमरे पर वही चेहरे जिनकी  असुंदर नीयत और काया है

कहें दीपक बापू होली पर झूठ बोलकर करते हैं  लोग मजाक

करें प्रतिदिन  प्रलाप उनके शब्दों में कहां हास्य का तत्व हम पायें।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

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