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गर्मी पर लिखकर बरसात लाने का प्रयास-फुर्सत में लिखा गया लेख


         देश में गर्मी पड़ना कोई नयी बात नहीं है।  सब जानते हैं कि जून का माह सबसे ज्यादा गर्म रहता है।  हिन्दू संवत् के अनुसार यह जेठ का महीना होता है जिसकी पहचान ही आग बरसाती गर्मी से होती है। जिन लोगों ने नियमित रूप से इस गर्मी का सामना किया है वह जानते हैं कि वर्षा ऋतु के आगमन का मार्ग यही जेठ का महीना तय करता है।  गर्मियों की बात करें तो नौतपा यानि नौ दिन तो भीषण गर्मी की वजह से ही पहचाने जाते हैं। हमारा बरसों से  यह अनुभव रहा है इन नौतपा में जमकर गर्म हवा चलती है।  धर की जिस वस्तु पर हाथ रखो वही गर्म मिलती है भले ही छाया में रखी हो।  इतना ही नहीं रात में भी गर्म हवा चलती है।  यह सब झेलते हैं यह सोचकर कि नौ दिन की ही तो बात है यह अलग बात है कि आजकल नौतपा इतने नहीं तपते जितने बाद के दिन तपाते हैं।  नौतपा समाप्त होते ही बरसात का इंतजार प्रारंभ हो जाता है। इस बार बरसात विलंब से आयेगी यह मौसम विशेषज्ञों ने बता दिया है इसलिये हम इसके लिये तैयार हैं कि जब तक पहली बरसात होगी तब तक यह झेलना ही है।

           वैसे देखा जाये तो पूरे विश्व में गर्मी का प्रकोप बढ़ा है।  माना यह जा रहा है कि दुनियां के सभी देश जो गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं उससे ओजोन परत में बड़ा छेद हो गया है। ओजोद परत वह है जो सूरज की किरणों को परावर्तित कर धरती पर आने देती है। जिस तरह हम देश की अनेक कालोनियों में देखतेे हैं कि लोग अपनी छतो पर एक हरी चादर लगा देते हैं जिससे कि सूरज की किरणे उनके आंगन पर सीधे न पड़ें और ठंडक रहे। यही काम धरती के लिये ओजोन परत करती है।  इसके जिस हिस्से मे छेद हो गया है वहां से सूरज की किरणें सीधे धरती पर आती हैं और यही विश्व में पर्यावरण प्रदूषण का कारण है।  विश्व के जिन हिस्सों में हमेशा बर्फ जमी रहती थी वहां इस गर्मी का प्रभाव होने से वह पिघल रही हैं। जिससे बरसात भी अधिक होती है।  यही कारण है कि आज जहां हम आग बरसते देख रहे हैं वहीं कुछ दिन में बाढ़ की स्थिति भी नजर आ सकती है।

        विशेषज्ञ पर्यावरण असंतुलन की जो बात करते हैं वह इसी ओजोन परत में बढ़ते छेद के कारण है।  हमने लू को झेला है। पहले सड़क पर चलते हुए ऐसा लगता था जैसे कि आग की भट्टी के थोड़ा दूर से निकल रहे हैं पर तो ऐसा लगता है जैसे उसके एकदम पास से चल रहे हैं।  एक समय यह तपिश असहनीय पीड़ा में बदल जाती है। अगर शरीर में पानी या खाना कम हो तो यकीनन आदमी बीमार हो जाये। संकट दूसरा भी है कि पहले की तरह निरंतर गर्मी से लड़ने की आदत भी नहीं रही।  दिन में कूलर या वातानुकूलन यंत्र की शरण लेनी ही पड़ती है या मिल ही जाती है।  हमने अपने पूरे शैक्षणिक जीवन में कूलर नहीं देखा था।  तपते कमरे में हमने पढ़ाई की है।  पूरे महीने भर तक इस गर्मी को झेलने की आदत रही है पर अब उकताहट होने लगती है। कभी कूलर या वातानुकूलन यंत्र की सीमा से बाहर आये तो पता लगा कि गर्मी ने पकड़ लिया या कभी गर्मी से इनकी सीमा में गये तो जुकाम का शिकार हो गये। इस समय बिजली की खपत बढ़ जाती है पर उत्पादन या आपूर्ति उस अनुपात में न बढ़ने से कटौती शुरु हो जाती है। यही कारण है कि बड़े शहर आमतौर से संकट का सामना करते हैं।  गांवों में लोग अपनी पुरानी आदत के चलते कम परेशान होते हैं पर शहर का आदमी तो बिजली के अभाव में कुछ ही घंटों में टूटने लगता है।

         दूसरी बात यह कि छतो पर सोने की आदत लोगों को नहंी रही। देखा जाये तो गर्मी के दिन छत पर सोने के लिये ही हैं।  इस समय मच्छर भीषण गर्मी में काल कलवित हो जाते हैं इसलिये उनके परेशान करने की संभावना नहीं रहती।  जिन लोगों पर छत की सुविधा है वह बिजली न होने पर सो सकते हैं पर जिनको नहीं है उनके लिये तो मुश्किल ही होती है।

      हम अंतर्जाल पर सात वर्षों से लिख रहे हैं।  प्रथम दो वर्षों में हमने गर्मी पर कविता लिखी तो उसी दिन वर्षा हो गयी।  मित्रों ने इस पर बधाई भी दी थी। पांच वर्षों से इस पर कभी सोचा नहीं पर इस बार की गर्मी से त्रस्त ही कर दिया है।  कल हमने गर्मी पर एक कविता लिखी तो आशा थी कि बरसात हो जायेगी-हालांकि विशेषज्ञों ने बता दिया है था कि तीन चार दिन आसार नहीं है। हमने आज यह लेख इस उम्मीद में लिखा है कि शायद बरसात हो जाये। कविता छोटी थी जबकि लेख बड़ा है इसलिये शायद इसका असर हो।  जब दुनियां टोटका कर सकती है तो हम तो स्वांत सुखाय लेखक हैं तो क्यों नहीं अपना स्वाभाविक टोटका आजमा सकते।

 

 

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
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