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नाम के साथ बदनामी-हिन्दी हास्य कविता(naam ke sath badnami-hindi comedy poem)


मंदिर में मिलते ही बोला फंदेबाज

‘‘दीपक बापू तुमने इतना लिखा

फिर भी फ्लाप रहे,

पता नहीं किसके शाप सहे,

इससे तो अच्छा होता तुम

कोई संत बन जाते,

खेलते माया के साथ

शिष्य की बढ़ती भीड़ के साथ

जगह जगह आश्रम बनाते,

कुछ सुनाते कवितायें,

दिखाते कभी गंभीर

कभी हास्य अदायें,

हल्दी लगती न फिटकरी

प्रचार जगत के सितारे बन जाते।

हंसकर बोले दीपक बापू

‘‘यह तुम्हारी सहृदयता है

या दिल में छिपा कोई बुरा भाव,

हमें उत्थान की राह दिखाते हो

या पतन पर लगवा रहे हो दांव,

अपनी चिंता के बोझ से ही

हो जाते हैं बोर

भीड़ की भलाई सोचते हुए

बुद्धि से भ्रष्ट हो जाते,

कितना भी ज्ञान क्यों न हो

माया है महाठगिनी

अपने ही इष्ट भी खो जाते,

अनाम रहने से

स्वतंत्रता छिन नहीं जाती,

मुश्किल होती है जब

नाम के साथ बदनामी

लेकर आती संकट

घिन हर कहीं छाती,

प्रसिद्धि का शिखर

बहुत लुभाता है,

गिरने पर उसी का

छोटा पत्थर भी कांटे  चुभाता है,

सत्य का ज्ञान

होने पर भी

अपने आश्रम महल बनाकर

माया के अंडे हर ज्ञानी पाता है,

मगर होता है जब भ्रष्ट

अपनी सता से

तब अपने पीछे लगा

डंडे का हर दानी पाता है,

तुम्हारी बात मान लेते

हम इस धरती पर

चमकते भले ही पहले

मगर बाद में बिचारे बन जाते।

———————————

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep””
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

————————-

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हिन्दी दिवस पर सम्मान-हास्य कविता


रास्ते में तेजी से चलता

मिल गया फंदेबाज और बोला

‘‘दीपक बापू तुम्हारे पास ही आ रहा था

सुना है दस सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग लेखक

सम्मान पाने वाले हैं,

ऐसा लगता है हिन्दी के अंतर्जाल पर भी

अच्छे दिन आने वाले हैं,

हो सकता है तुमको भी

कहीं से सम्मान मिल जाये,

हमारा छोटा शहर भी

ऐसी किसी खबर से हिल जाये,

आठ साल अंतर्जाल पर हो गये लिखते,

पहल दिन से आज तक

तुम फ्लाप कवि ही दिखते,

मिल जाये तो मुझे जरूर याद करना

मैंने ही तुम्हारे अंदर हमेशा

उम्मीद जगाई,

सबसे पहले दूंगा आकर बधाई।

सुनकर हंसे दीपक बापू और बोले

‘‘अंतर्जाल पर लिखते हुए अध्यात्म विषय

हम भी हम निष्काम हो गये हैं,

कोई गलतफहमी मत रखना

हमसे बेहतर लिखने वाले

बहुत से नाम हो गये हैं,

हमारी मजबूरी है अंतर्जाल पर

हिन्दी में लिखते रहना,

शब्द हमारी सासें हैं

चलाते हैं जीवन रुक जाये वरना,

मना रहे हैं जिस तरह

टीवी चैनल हिन्दी दिवस

उससे ही हमने प्रसन्नता पाई,

नहीं मिलेगा हमें यह तय है

फिर भी देंगे

सम्मानीय ब्लॉग लेखको को हार्दिक बधाई,

हम तो इसी से ही प्रसन्न हैं

हिन्दी ब्लॉग लेखक शब्द

अब प्रचलन में आयेगा,

अपना परिचय देना

हमारे लिये सरल हो जायेगा,

सम्मान का बोझ

नहीं उठा सकते हम,

उंगलियां चलाते ज्यादा

कंधे उठाते कम,

इसी से संतुष्ट हैं कि

अंतर्जाल पर हिन्दी लिखकर

हमने अपने ब्लॉग लेखक होने की छवि

अपनी ही आंखों में बनाई।

————

लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

लश्कर, ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com

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धर्म अब व्यवसाय बन गया है-हिन्दी व्यंग्य काव्य रचनायें


हर कोई बैठा है हाथ में लेकर मूर्तियां पुजवाने के लिये,

जिसकी नहीं पुजे लग जाता दूसरे की तुड़वाने के लिये।

किसी ने लगाया ने अपने माथे पर चंदन की टीका

किसी ने अपने चेहरे पर स्थापित दाढ़ी बढ़ा ली,

चाहे जहां सर्वशक्तिमान के नाम पर शब्दों की जंग लड़ा ली,

कहें दीपक बापू भक्ति का मसला दिल से जुड़ा है

धर्म के ठेकेदारों ने बना लिया धंधा कमाने के लिये।

———–

सर्वशक्तिमान की  भक्ति करने पर वह इतराते हैं,

दिल है खाली जुबान पर नाम लेकर इठलाते हैं।

कहें दीपक बापू पाखंड से पहचानी जा रही आस्था,

सत्य के नाम पर सत्ता का बना रहे रास्ता,

ज्ञान की राह कभी सभी समझी नहीं

रट लिये शब्द अब दूसरों को सिखलाते हैं।

———–

धर्म के मसले पर हर रोज नयी चर्चा हो जाती है,

शब्दों की भारी भीड़ अधर्म की पहचान पर खर्चा हो जाती है।

कहें दीपक बापू विद्वानों के बीच बहस की जगह जंग होती है

तस्वीरों से शुरु शून्य पर खत्म चर्चा हो जाती है।

——–

आओ कोई मुद्दा नहीं है धर्म पर बात कर लें,

बैठे बिठाये अधर्म पर घात कर लें।

मौन रहने में शक्ति है पर देखता कौन है,

अपनी छवि दिखाने के लिये सभी आमादा

शोर के बीच अकेला खड़ा है वह शख्स जो मौन है।

कहें दीपक बापू किसी ने जप लिये वेद मंत्र,

कोई बना रहा है सर्वशक्तिमान के नाम पर तंत्र,

रट लेते जिन्होंने शब्द ग्रंथ से

लगा लिया है उन्होंने धर्म का बाज़ार,

भ्रम के धुंऐं के बीच बेच रहे आस्था का अचार,

सच्चे ज्ञानी का इकलौता एक ही साथ मौन है।

—————

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

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हिन्दी में लिख लिया तो समझ लो अच्छा दिन है-राष्ट्रभाषा पर निबंध


          देश में राजनीतिक परिवर्तन के साथ ही इस बात पर भी बहस एक टीवी चैनल पर चली कि क्या हिन्दी के भी अच्छे दिन आने वाले हैं? दरअसल इस बहस का आधार यह था कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी हिन्दी भाषा के प्रचार प्रसार के एक बहुत समर्थक  भी हैं।  वह भविष्य में  विदेशी नेताओं से हिन्दी में बात करेंगे।  इसे लेकर हिन्दी के कुछ विद्वान उत्साहित हैं।  उनका मानना है कि जिस तरह देश के आर्थिक विकास की लहर पूरे देश के अच्छे दिन आने के नारे को बहाकर लायी है उसी तरह हिन्दी भी अब अंतराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानजनक स्थान प्राप्त करेगी।  हमारा मानना है कि हिन्दी भाषा अंततः भविष्य में वैश्विक भाषा बनेगी पर इसके लिये भारत के सामान्य जनमानस में यह विश्वास जगाना आवश्यक है कि भविष्य में उसका काम बिना हिन्दी के चलने वाला नहीं है।

         इसमें कोई संदेह नहीं है कि नये प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रभाव से ओतप्रोत हैं पर यह भी सच है कि देश में आर्थिक विकास करने के साथ ही संास्कृतिक उत्थान बिना सामान्य जन के बिना  संभव नहीं है।  हम यहां केवल हिन्दी भाषा की चर्चा कर रहे हैं इसलिये यह कहने में संकोच नहीं है कि इस संबंध में आम भारतीय का रवैया भी वही है जो उसका अपने जीवन को लेकर है।  जिस तरह वह यह आशा करता है कि उसके जीवन का उद्धार कोई अवतारी पुरुष करेगा वही हिन्दी के संबंध में भी उसकी धारणा है।  हर सभ्रांत व्यक्ति चाहता है कि उसके बच्चे को अंग्रेजी में महारथ हासिल करना चाहिये और हिन्दी का सम्मान दूसरे लोग करें।  स्थिति यह है कि अनेक कलाकारों, विद्वानों, तथा लेखकों का जीवन हिन्दी भाषा के दम पर चल रहा है पर वह अपनी बात कहने के लिये अंग्रेजी का सहारा लेते हैं।  सबसे बड़ी बात यह है कि सभ्रांत वर्ग जो कि भाषा, संस्कृति, संस्कार तथा ज्ञान की रक्षा में सबसे ज्यादा योगदान देता है उसमें आत्मविश्वास का अभाव है। उसे नहीं लगता कि हिन्दी के सहारे आर्थिक विकास किया जा सकता है। उसका दूसरा संकट यह भी है कि वह पूरी तरह से अंग्रेंजी का आत्मसात भी नहीं कर पाया है। हमने अनेक कलाकारों, विद्वानों, तथा लेखकों को हिन्दी की खाते और अंग्रेजी की बजाते देखा है पर यह पता ही नहीं लग पाता कि वह अंग्रेजी में ही सोचते हैं या हिन्दी में सोचकर अंग्रेजी में बोलते हैं।  हिन्दी विद्वानों में भी भारी अंतर्द्वंद्व है। वह हिन्दी का प्रयोग बढ़ाने के लिये उसमें जमकर अंग्रेजी शब्द ठूंसने की बात करता है। परिणाम यह हो रहा है कि एक हिंग्लििश भाषा का निर्माण हो रहा है जो भविष्य में किसी काम की नहीं है। भाषा की रक्षा साहित्य से होती है और हिंग्लिश वाले किसी साहित्य रचना योग्य नहीं लगते।  जिनकी हिन्दी लेखन में रुचि है वह अपनी भाषा में शब्दों का प्रयोग सावधानी से करते हैं।

     बाज़ार हिन्दी भाषियों को उपभोक्ता से अधिक स्तर प्रदान नहीं करता।  अंतर्जाल पर भी यही हाल है। अंग्रेजी पर टीका टिप्पणी करने वालों को प्रचार माध्यम महत्व देते हैं।  किसी के हिन्दी वाक्य अगर प्रचारित होते हैं तो वह कोई बड़ा धनी, पदवान या कलाकार होता है।  सामान्य लोगों को अपने फेसबुक या ट्विटर पर आने वालों को यह प्रचार माध्यम दिखाते हैं पर किसी खास विषय पर लिखे गये किसी ब्लॉग या फेसबुक के ऐसे पाठ की चर्चा कभी नहीं देखी गयी जो किसी सामान्य लेखक ने लिखा हो।

     हिन्दी के अच्छे दिन आयेंगे या नहीं यह तो नहीं कहा जा सकता पर हिन्दी में लेखन करने वालों को यह कदापि आशा नहीं करना चाहिये कि उन्हें कोई सम्मान या पुरस्कार  चमचागिरी या संगठित ठेकेदारों की चरणवंदना किये बिना मिल जायेगा। हिन्दी लेखन तो स्वांत सुखाय ही हो सकता है।  अगर आप लेखक हैं तो अपनी कोई रचना लिख लें तो समझिये वही अच्छा दिन है। पिछले सात वर्षों से अंतर्जाल पर लिखते हुए हमने यही अनुभव किया है।

 

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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जहान के गम से परेशान-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


जब तक तक उनके चेहरे पर नकाब था
उनकी सुंदरता के अहसास से ही
दिल में हलचल मची थी
उतारा तो हमारी आंखें ही उदास हो गयीं
ख्यालों में बसी उनकी तस्वीरें कहीं खो गयीं।
कहें दीपक बापू मिट्टी से बने रंग बिरंगे खिलौने
सजावट में घर की शोभा बढ़ाते हैं,
टूटे तो हम उनके लिये बेकद्री जताते हैं,
इंसान तोड़ते हैं जब भरोसा खिलौने की  तरह
तब टूटते हैं हम खुद
फिर ढूंढते अपनी दूसरी जगह आशायें
जो दिल में कही सो गयीं।
————-

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

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दौलत के ढेर और आम इंसान-हिन्दी व्यंग्य कविता


आम इंसान जिंदा रहने के लिये मेहनत से जूझ रहा है,

जिसे मिला आराम का सामान वह मनोरंजक पहेलियां बूझ रहा है।

मुख से शब्दों की वर्षा करते हुए आसान है दिल बहलाना,

रोते अपने गम पर सभी नहीं आता दूसरे का दर्द सहलाना,

अपनी नीयत साफ नहीं पर पूरे ज़माने पर शक जताते,

अपनी गल्तियों पर जिम्मेदार खुद तोहमत गैरों पर लगाते,

बाज़ार से हसीन सपने खरीद लेते हैं सस्ते भाव में अमीर,

जज़्बातों के सौदे में कामयाब होते वही मार ले जो अपना जमीर,

कहें दीपक बापू दुनियां का कोई है उसूल यह बात जाओ भूल

दौलत के ढेर पर पहुंचा वही इंसान जो ज़माने का खून चूस रहा है।

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 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

 

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सेवा के स्वांग स्वामी बनने के लिये किये जाते है-हिन्दी व्यंग्य कवितायें


जिनके महल रौशन है वह क्या अंधेरे घरों का दर्द जानेंगे,

रोटियों को ढेर जिनके सामने है वह भूख का क्या दर्द मानेंगे।

कांपते है जिनके हाथ व्यवस्था में बदलाव के नाम से

वह क्रांति का दावा बेबस लोगों के सामने करते हैं,

घूमते हैं कार में रिक्शा चालकों की चिंता का दंभ भरते हैं,

आदर्शवादी बाते कहना आसान है अमल में लाना जरूरी नहीं,

पर्दे पर चमक जाओ बयानों पर चलने की फिर मजबूरी नहंी,

पानी की प्यास पर देते हैं बहुत सारे बयान

घर में पीने के लिये उनके यहां समंदर भरे हैं,

प्यासों के दर्द पर जताते सहानुभूति वही

खुद प्यासे मरने के भय से जो डरे हैं,

कहें दीपक बापू नहीं मांगना रोटी और पानी

कभी भलाई के धंधेबाज दलालों से नहीं मांगना

तुम्हें भीड़ में भेड़ की तरह लगाकर अपना सीना तानेंगे।

——————-

सेवा के स्वांग स्वामी बनने के लिये किये जाते हैं,

दूसरे लोग बदनाम अपनी इज्जत बढ़ाने के लिये किये जाते हैं।

हर इंसान जी रहा स्वार्थ के लिये पर परमार्थ का करता दावा,

पुजने के लिये सभी तैयार आता रहे रोज उनके पास चढ़ावा।

दूसरे को नसीहतें देते हुए ढेर सारे उस्ताद मिल जायेंगे,

दाम खर्च करो तो बड़े बड़े ईमानदार हिलते नज़र आयेंगे,

शिक्षा कहीं नहीं मिलती ज़माने से वफादारी दिखाने की,

गद्दारी करते सभी जल्दी कामयाबी अपने नाम लिखाने की,

कहें दीपक बोते सभी अपने घर में बबूल हमेशा

आम उगने की उम्मीद सर्वशक्तिमान से किये जाते हैं।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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आदर्शवाद का ढोंग-हिन्दी व्यंग्य कविता


जिनके महल रौशन है वह क्या अंधेरे घरों का दर्द जानेंगे,

रोटियों को ढेर जिनके सामने है वह भूख का क्या दर्द मानेंगे।

कांपते है जिनके हाथ व्यवस्था में बदलाव के नाम से

वह क्रांति का दावा बेबस लोगों के सामने करते हैं,

घूमते हैं कार में रिक्शा चालकों की चिंता का दंभ भरते हैं,

आदर्शवादी बाते कहना आसान है अमल में लाना जरूरी नहीं,

पर्दे पर चमक जाओ बयानों पर चलने की फिर मजबूरी नहंी,

पानी की प्यास पर देते हैं बहुत सारे बयान

घर में पीने के लिये उनके यहां समंदर भरे हैं,

प्यासों के दर्द पर जताते सहानुभूति वही

खुद प्यासे मरने के भय से जो डरे हैं,

कहें दीपक बापू नहीं मांगना रोटी और पानी

कभी भलाई के धंधेबाज दलालों से नहीं मांगना

तुम्हें भीड़ में भेड़ की तरह लगाकर अपना सीना तानेंगे।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
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दिल का सौदा और कीमत-होली 2014 के अवसर पर विशेष हिंदी व्यंग्य कविता


चेहरे का रंग उड़ा है जिनका उन पर कौनसा रंग लगायें,

हुलिया बिगाड़ा है जिन्होंने स्वयं का उनके साथ कैसे होली मनायें।

हर पल देते हैं जो धोखा वह  लोग क्या समझेंगे हास परिहास,

शब्दों का जो अनर्थ करते वह क्या जायेंगे किसी के दिल के पास,

सभी के साथ वादे करते हुए जिंदगी गुजारी कभी पूरे किये नहीं,

दिखाकर सपने दिल का सौदा किया  दाम कभी पूरे दिये नहीं,

भूख, भ्रष्टाचार और भय के विषय बेचते हैं बाजार में सस्ता जताकर,

अपनी मंजिल पर पहुंचते हैं वही दूसरों को रास्ता भटकाकर,

चाल जिनकी टेढ़ीमेढ़ी चरित्र लापता  चेहरे पर पाखंड की छाया है,

चमक रहे  कैमरे पर वही चेहरे जिनकी  असुंदर नीयत और काया है

कहें दीपक बापू होली पर झूठ बोलकर करते हैं  लोग मजाक

करें प्रतिदिन  प्रलाप उनके शब्दों में कहां हास्य का तत्व हम पायें।

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गरीबी किसी को नहीं भाती है-हिंदी व्यंग्य कविता


अपने गुनाहों पर नज़र किसकी जाती है,

दूसरे की गलती ही गुनाह हो जाती है।

कहें दीपक बापू इंसान की जुबान बाहर ही बोलती है,

अंदर बैठी नीयत कभी अपना हिसाब नहीं तोलती है,

सभी दावा करते अपनी ईमानदारी का अपने बयान में,

बेईमान छिपी है तलवार की तरह सभी की म्यान में,

जब तक कोई पकड़ा न जाये साहुकार की कहलाता है,

समय का पंजा गढ़ जाये तो मजबूरी हर कोई बताता है,

सच्चाई यह है कि  गरीबी किसी को नहीं भाती है,

बदकिस्मती मानते लोग जिनके हिस्से बेईमानी नहीं आती है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

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writer and poet-Deepak Raj kurkeja “Bharatdeep”

Gwalior Madhya Pradesh

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क्रिकेट मैच की पटकथा-हिंदी व्यंग्य कविता


गेंद बल्ले का खेल देखकर हम बरसों तक अपना दिल बहलाते रहे,

हैरान है यह जानकर कि धोखे में सट्टे के खेल को सहलाते रहे।

खिलाड़ी खेलते खेलते अभिनेताओं की तरह अभ्यस्त हो गये,

गेंद और बल्ले को बाहर के इशारों में नचाते में मस्त हो गये,

परिणाम देखकर सोचते थे खेल में हार जीत होती रहती है,

हर बाल और प्रहार वैस ही हुआ जो तय पटकथा कहती है,

खिलाड़ियों के सफेद कपड़े  देखते देखते रंगीन हो गये,

दौलत और शौहरतमंदों के इस खेल में जुर्म संगीन हो गये,

कहें दीपक बापू  खेल वही है जो हम खुद खेल कर मजा लें,

वक्त किया बेकार पर्दे पर खेल रूपी नाटक में आंखें नहलाते रहे।

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