Tag Archives: hindi lekh

एक फिल्म और कार्टून से क्यों घबडाहट फैलाई जाती है-हिंदी लेख


           एक सामान्य योग साधक तथा गीता पाठक होने के नाते इस लेखक का मानना है कि हर मनुष्य के लिये धर्म एक निजी विषय है।  यह धर्म उच्च आचरण का प्रतीक होने के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान से जुड़ा होना चाहिए।  इतना ही नहीं एक  अध्यात्मिक ज्ञानी कभी अपने ज्ञान या इष्ट को लेकर सार्वजनिक चर्चा नहीं करेगा यह भी इस लेखक का मानना है।  ऐसे में जब कुछ अल्पज्ञानी या अज्ञानी जब अपने धार्मिक विषय को सार्वजनिक बनाते हैं तो यह उनके अहंकार का ही प्रमाण होता है।  सार्वजनिक रूप से अपनी बात कहने पर उसकी प्रतिकूल प्रतिक्रिया सहने की क्षमता उनमें नहीं होती।  अज्ञानी तथा अल्पज्ञानी स्वयं को श्रेष्ठ  धार्मिक व्यक्त्तिव का स्वामी  बताने के चक्कर में एक दूसरे पर पर आक्षेप करते हैं।  अगर सामने वाला भी उस जैसा हुआ तो फिर झगड़ा बढ़ता है।  श्रीमद्भागवत गीता साधक के लिये दोनों ही एक जैसे होते है-अहंकारी, अज्ञानी और अन्मयस्क।
       आधुनिक विश्व में कभी  अनेक ऐसे प्रसंग आते हैं जब कार्टून, लेखक, और भाषणों को लेकर अनेक धर्मभीरु लोग इसलिये उत्तेजित होते हैं क्योंकि उसमें उनके इष्ट और विचारधारा पर कटाक्ष किये होते हैं।  उस समय समर्थन और विरोध के शोर के बीच ज्ञानियों के सच पर कोई विचार नहीं करता। अपनी जीत और श्रेष्ठता प्रमाणित करने का यह दंभपूर्ण प्रयास विश्व समाज में तात्कालिक  रूप से अस्थिरता पैदा करता है।  अभी हाल ही में एक फिल्म को लेकर अमेरिका के विरुद्ध पूरे विश्व में वातावरण बन रहा है।  यह फिल्म एक धार्मिक विचाराधारा पर प्रहार करती है। तय बात है कि फिल्म निर्माण से जुड़े लोग कोई तत्वज्ञानी नहीं है इसलिये ही तो उन्होंने दूसरे की धार्मिक विचाराधारा पर प्रहार कर अपनी आसुरी प्रवृत्ति का परिचय दिया है।  अब इस विवाद में बौद्धिक समुदाय दो भागों में बंट गया हैं। एक तो लोगों की आस्थाओं को ठेस पहुंचाने पर आर्तनाद कर हिंसा कर रहा है तो दूसरा अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई दे रहा है।
     हमारा मानना है कि ऐसी फिल्म नहीं बनना चाहिये थी यह बात ठीक है पर जिस तरह इसका विरोध हो रहा है वह भी संशय से भरा है।  अगर इस फिल्म का विरोध नहीं होता तो दुनियां के कई देशों में अनेक लोग  उसका नाम तक नहीं जान पाते।  भारतीय अध्यात्म दर्शन ऐसे विषयों में उपेक्षासन की बात कहता है।  अगर कथित धर्मभीरु लोग ज्ञान की शरण लें तो उन पर ऐसी फिल्मों या कार्टूनों का कोई प्रभाव नहीं होता। वैसे हमारा मानना है कि पूरे विश्व में अर्थव्यवस्था जिस जटिल दौर से गुजर रही है सभी विचाराधारा के लोगों के लिये रोजी रोटी कमाना ही कठिन हो गया है।  उनके लिये इस बात के लिये यह जानने का समय नहीं है कि कौन उनकी धार्मिक विचाराधारा पर क्या कह रहा है? मगर धर्म के ठेकेदारों को अपने समूहों पर नियंत्रण बनाये रखने के लिये ऐसे ही विवादास्पद विषय चाहिए।  फिल्म वालों को प्रचार चाहिए ताकि अधिक से अधिक दर्शक मिलें।  इसके लिये अनेक फिल्म वाले धन भी खर्च करते हैं।  संभव है कि कुछ धार्मिक ठेकेदारों ने  उनसे विरोध फिक्स किया हो।  खालीपीली प्रदर्शन से काम न चले इसलिये हिंसा भी कराई गयी हो।  इसका संदेह इसलिये उठेगा क्योंकि एक फिल्म या कार्टून से किसी पुरानी विचाराधारा का कुछ बिगड़ सकता है यह बात यकीन लायक नहीं है।  आस्था पर चोट का सवाल उठाता है तो फिर ज्ञान और अज्ञान की बात भी सामने आयेगी।  किसी भी समुदाय में सभी ज्ञानी हैं यह सोचना गलत है तो सभी अज्ञानी है यह मानना भी महान मूर्खता है। हम यह नहीं कहते कि यह सब प्रायोजित है पर जिस तरह मानव समुदायों को विभिन्न भागों के बांटकर उन पर पेशेवराना अंदाज में नियंत्रण करने की प्रवृत्ति आधुनिक समय में देखी जाती है  उसके चलते कुछ भी अनुमान किया जा सकता है।
            दूसरा भी एक पक्ष है। अगर हम अज्ञानता वश अपने मुख से अपने धर्म या इष्ट का बखान सार्वजनिक रूप से करते हैं तो संभव है कि ज्ञानी कुछ न कहें पर अपने जैसा अज्ञानी सामने आयेगा तो वह दस बातें कहेगा।  सार्वजनिक रूप से अपने इष्ट या विचारधारा की प्रशंसा करने पर उसकी निंदा सुनने को भी तैयार रहना चाहिए।  ऐसे में वाद विवाद से तनाव बढ़ता है।  ऐसे में एक ज्ञानी का मौन रहना बेहतर है।  ज्ञानी लोग अगर कोई जिज्ञासु मनुष्य उनके ज्ञान के बारे में जानना चाहे तो उसे अपने ज्ञान और अभ्यास के बारे में बतायें।  इतना ही नहीं अगर वह कोई प्रश्न पूछता है तो उसका जवाब दे।  जिज्ञासु से अपनी विचारा कहे पर दूसरे के ज्ञान या विचारधारा पर आक्षेप न करे।  दूसरे की निंदा या उस आक्षेप करने वाले कभी समाज में लोकप्रिय नहीं होते।  फिल्म  बनाकर या कार्टून बनाकर क्षणिक प्रतिष्ठा भले ही मिल जाये पर कालांतर में वह कष्टदायक होता है।  वैसे देखा जाये तो ज्ञानी हर समाज में हैं।  अगर ऐसा नहीं होता यह संसार अनेक बार अपनी ही आग से नष्ट हो चुका होता।  इसका मतलब यह है कि हर समुदाय का आम आदमी अपना निजी जीवन शांति से जीना चाहता है।  यही कारण है कि चंद स्थानों पर कुछ दिन ऐसे विषयों पर प्रायोजित हाहाकार बचने के बाद स्थिति सामान्य हो जाती है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
witer ane poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior, madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियरhindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior

http://dpkraj.blgospot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।अन्य ब्लाग

1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका

2.अनंत शब्दयोग

3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन

6.हिन्दी पत्रिका 

७.ईपत्रिका 

८.जागरण पत्रिका 

९.हिन्दी सरिता पत्रिका

Advertisements

जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह या आत्मनिर्णय से अधिक महत्वपूर्ण है सिंध की आजादी का प्रश्न-हिन्दी लेख(jammu kashmir mein janmat sangrah aur sindh ki azadi ka sawal-hindi article)


             अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के लक्ष्यों को लेकर तो उनके विरोधी भी गलत नहीं मानते। इस देश में शायद ही कोई आदमी हो यह नहीं चाहता हो कि देश में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो। अन्ना हजारे ने जब पहली बार अनशन प्रारंभ किया तो उनको व्यापक समर्थन मिला। किसी आंदोलन या अभियान के लिये किसी संगठन का होना अनिवार्य है मगर अन्ना दिल्ली अकेले ही मैदान में उतर आये तो उनके साथ कुछ स्वयंसेवी संगठन साथ हो गये जिसमें सिविल सोसायटी प्रमुख रूप से थी। इस संगठन के सदस्य केवल समाज सेवा करते हैं ऐसा ही उनका दावा है। इसलिये कथित रूप से जहां समाज सुधार की जरूरत है वहां उनका दखल रहता है। समाज सुधार एक ऐसा विषय हैं जिसमें अनेक उपविषय स्वतः शामिल हो जाते हैं। इसलिये सिविल सोसायटी के सदस्य एक तरह से आलराउंडर बन गये हैं-ऐसा लगता है। यह अलग बात है कि अन्ना के आंदोलन से पहले उनकी कोई राष्ट्रीय छवि नहंी थी। अब अन्ना की छत्रछाया में उनको वह सौभाग्य प्राप्त हुआ है जिसकी कल्पना अनेक आम लोग करते हैं। इसलिये इसके सदस्य अब उस विषय पर बोलने लगे हैं जिससे वह जुड़े हैं। यह अलग बात है कि उनका चिंत्तन छोटे पर्दे पर चमकने तथा समाचार पत्रों में छपने वाले पेशेवर विद्वानों से अलग नहीं है जो हम सुनते हैं।
           बहरहाल बात शुरु करें अन्ना हजारे से जुुड़ी सिविल सोसायटी के सदस्य पर हमले से जो कि वास्तव में एक निंदनीय घटना है। कहा जा रहा है कि यह हमला अन्ना के सहयोगी के जम्मू कश्मीर में आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करने पर दिया गया था जो कि विशुद्ध रूप से पाकिस्तान का ऐजंेडा है। दरअसल यह संयुक्त राष्ट्र में पारित उस प्रस्ताव का हिस्सा भी है जो अब धूल खा रहा है और भारत की सामरिक और आर्थिक शक्ति के चलते यह संभव नहीं है कि विश्व का कोई दूसरा देश इस पर अमल की बात करे। ऐसे में कुछ विदेशी प्रयास इस तरह के होना स्वाभाविक है कि भारतीय रणनीतिकारों को यह विषय गाहे बगाहे उठाकर परेशान किया जाये। अन्ना के जिस सहयोगी पर हमला किया गया उन्हें विदेशों से अनुदान मिलता है यह बात प्रचार माध्यमों से पता चलती रहती है। हम यह भी जानते हैं कि विदेशों से अनुदान लेने वाले स्वैच्छिक संगठन कहीं न कहीं अपने दानदाताओं का ऐजेंडा आगे बढ़ाते हैं।
           हमारे देश में लोकतंत्र है और हम इसका प्रतिकार हिंसा की बजाय तर्क से देने का समर्थन करते हैं। कुछ लोगों को यह लगता है कि मारपीट कर प्रतिकार करें तो वह कानून को चुनौती देते हैं। इस प्रसंग में कानून अपना काम करेगा इसमें भी कोई शक नहीं है।
           इधर अन्ना के सहयोगी पर हमले की निंदा का क्रम कुछ देर चला पर अब बात उनके बयान की हो रही है कि उसमें भी बहुत सारे दोष हैं। कहीं न कहीं हमला होने की बात पीछे छूटती जा रही है। एक आम लेखक और नागरिक के रूप में हम अपनी बात कहें तो शायद कुछ लोगों को अजीब लगे। हमने अन्ना के सहयोगी के इस बयान को उन पर हमले के बाद ही सुना। इसका मतलब यह कि यह बयान आने के 15 दिन बाद ही घूल में पड़ा था। कुछ उत्तेजित युवकों ने मारपीट कर उस बयान को पुनः लोकप्रियता दिला दी। इतनी कि अब सारे टीवी चैनल उसे दिखाकर अपना विज्ञापनों का समय पास कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठता है कि कहीं यह उत्तेजित युवक यह बयान टीवी चैनलों पर दिखाने की कोई ऐसी योजना का अनजाने में हिस्सा तो नहीं बन गये। संभव है उस समय टीवी चैनल किसी अन्य समाचार में इतना व्यस्त हों जिससे यह बयान उनकी नजर से चूक गया हो। यह भी संभव है कि दिल्ली, कलकत्ता, मुंबई बैंगलौर या अहमदाबाद जैसे महानगरों पर ही भारतीय प्रचार माध्यम ध्यान देते हैं इसलिये अन्य छोटे शहरों में दिये गये बयान उनकी नजर से चूक जाते हैं। इस बयान का बाद में जब उनका महत्व पता चलता है तो कोई विवाद खड़ा कर उसे सामने लाने की कोई योजना बनती हो। हमारे देश में अनेक युवक ऐसे हैं जो अनजाने में जोश के कारण उनकी योजना का हिस्सा बन जाते हैं। यह शायद इसी तरह का प्रकरण हो। हमला करने वाले युवकों ने हथियार के रूप में हाथों का ही उपयोग किया इसलिये लगता है कि उनका उद्देश्य अन्ना के सहयोगी को डराना ही रहा होगा। ऐसे में मारपीट कर उन्होंनें जो किया उसके लिये उनको अब अदालतों का सामना तो उनको करना ही होगा। हैरानी की बात यह है कि हमला करने वाले तीन आरोपियों में से दो मौके से फरार हो गये पर एक पकड़ा गया। जो पकड़ा गया वह अपने कृत्य पर शार्मिंदा नहीं था और जो फरार हो गये वह टीवी चैनलों पर अपने कृत्य का समर्थन कर रहे थे। हैरानी की बात यह कि उन्होंने अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के प्रति समर्थन देकर अपनी छवि बनाने का प्रयास किया। इसका सीधा मतलब यह था कि वह अन्ना की आड़ में उनके सहयोगी के अन्य ऐजेंडों से प्रतिबद्धता को उजागर करना चाहते थे। वह इसमें सफल रहे या नहीं यह कहना कठिन है पर एक बात तय है कि उन्होंने अन्ना के सहयोगी को ऐसे संकट में डाल दिया है जहां उनके अपने अन्य सहयोगियों के सामने अपनी छवि बचाने का बहुत प्रयास करना होगा। संभव है कि धीरे धीरे उनको आंदोलन की रणनीतिक भूमिका से प्रथक किया जाये। कोई खूनखराबा नहीं  हुआ यह बात अच्छी है पर अन्ना के सभी सहयोगियों के सामने अब यह समस्या आने वाली है कि उनकी आलराउंडर छवि उनके लिये संकट का विषय बन सकती है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन निर्विवाद है पर जम्मू कश्मीर, देश की शिक्षा नीति, हिन्दुत्ववाद, धर्मनिरपेक्षता तथा आतंकवाद जैसे संवेदनशील विषयों पर अपनी बात सोच समझकर रखना चाहिए। यह अलग बात है कि लोग चिंत्तन करने की बजाय तात्कालिक लोकप्रियता के लिये बयान देते हैं। यही अन्ना के सहयोगी ने किया। स्थिति यह है कि जिन संगठनों ने उन पर एक दिन पहले उन पर हमले की निंदा की दूसरे दिन अन्ना के सहयोगी के बयान से भी प्रथक होने की बात कह रहे हैं। अन्ना ने कुशल राजनीतिक होने का प्रमाण हमले की निंदा करने के साथ ही यह कहकर भी दिया कि मैं हमले की असली वजह के लिये अपने एक अन्य सहयेागी से पता कर ही आगे कुछ कहूंगा।
            आखिरी बात जम्मू कश्मीर के बारे में की जाये। भारत में रहकर पाकिस्तान के ऐजेंडे का समर्थन करने से संभव है विदेशों में लोकप्रिय मिल जाये। कुछ लोग गला फाड़कर चिल्लाते हुए रहें तो उसकी परवाह कौन करता है? मगर यह नाजुक विषय है। भारत का बंटवारा कर पाकिस्तान बना है। इधर पेशेवर बुद्धिजीवी विदेशी प्रायोजन के चलते मानवाधिकारों की आड़ में गाहे बगाहे जनमत संग्रह की बात करते हैं। कुछ ज्ञानी बुद्धिजीवी इस बात को जानते हैं कि यह सब केवल पैसे का खेल है इसलिये बोलते नहीं है। फिर बयान के बाद मामला दब जाता है। इसलिये क्या विवाद करना? अलबत्ता इन बुद्धिजीवियों को कथित स्वैच्छिक समाज सेवकों को यह बता दें कि विभाजन के समय सिंध और पंजाब से आये लोग हिन्दी नहीं जानते थे इसलिये अपनी बात न कह पाये न लिख पाये। उन्होंने अपनी पीड़ा अपनी पीढ़ी को सुनाई जो अब हिन्दी लिखती भी है और पढ़ती भी है। यह पेशेवर बुद्धिजीवी अपने उन बुजुर्गों की बतायी राह पर चल रहे हैं जिसका सामना बंटवारा झेलने वाली पीढ़ी से नहीं हुआ मगर इनका होगा। बंटवारे का सच क्या था? वहां रहते हुए और फिर यहां आकर शरणार्थी के रूप में कैसी पीढ़ा झेली इस सच का बयान अभी तक हुआ नहीं है। विभाजन से पूर्व पाकिस्तान में सिंध, बलूचिस्तान और सिंध प्रांतों में क्या जनमत कराया गया था? पाकिस्तान जम्मू कश्मीर का स्वतंत्र अस्तित्व स्वीकार नहीं करता और जनमत संग्रह की मांग करने वाले खुले रूप से उससे हमदर्दी रखते हैं। ऐसे में जनमत संग्रह कराने का मतलब पूरा कश्मीर पाकिस्तान को देना ही है। कुछ राष्ट्रवादियों का यह प्रश्न इन कथित मानवाधिकारियों के सामने संकट खड़ा कर सकता है कि ‘सिंध किसके बाप का था जो पाकिस्तान को दे दिया या किसके बाप का है जो कहता है कि वह पाकिस्तान का हिस्सा है’। जम्मू कश्मीर को अपने साथ मिलाने का सपना पूरा तो तब हो जब वह पहले बलूचिस्तान, सीमा प्रांत और सिंध को आजाद करे जहां की आग उसे जलाये दे रही है। यह तीनों प्रांत केवल पंजाब की गुलामी झेल रहे हैं। इन संकीर्ण बुद्धिजीवियों की नज़र केवल उस नक्शे तक जाती है जो अंग्रेज थमा गये जबकि राष्ट्रवादी इस बात को नहीं भूलते कि यह धोखा था। संभव है कि यह सब पैसे से प्रायोजित होने की वजह से हो रहा हो। इसी कारण इतिहास, भूगोल तथा अपने पारंपरिक समाज से अनभिज्ञ होकर केवल विदेशियों से पैसा देकर कोई भी कैसा भी बयान दे सकता है। यह लोग जम्मू कश्मीर पर बोलते हैं पर उस सिंध पर कुछ नहीं बोलते जो हमारे राष्ट्रगीत में तो है पर नक्शे में नहीं है।
—————
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
hindi poet,writter and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://dpkraj.blgospot.com
यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द पत्रिका
2.अनंत शब्दयोग
3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका
4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका5.दीपक बापू कहिन
6.हिन्दी पत्रिका 
७.ईपत्रिका 
८.जागरण पत्रिका 
९.हिन्दी सरिता पत्रिका