Tag Archives: mastram

आग लगाने वाले मशहूर हो गए-हिंदी कविता


रौशनी का चिराग रखा
अंधेरी गली में
मुसाफिरों को रास्ता दिखाने के लिये
किसी ने तारीफ नहीं की
लगाई आग जिन्होंने सड़क पर
मशहूर हो गये,
सनसनी फैलायी जिन्होंने
लोगों के जज़्बातों का कत्ल कर
कभी चमक रहे पर्दे पर
कभी मंच पर चढ़ रहे हैं,
दर्द बांटते रहे
सहलाते रहे जख्म
पूरे ज़माने का
भीड़ में कहीं इसलिये खो गये।
कहें दीपक बापू
दुनियां मे जुल्म करने वाले
कसूरवार नहीं है,
आदी हो गये हैं जमाने के लोग
मर मरकर जीने के
फिर सजा देने वाले
फरिश्ते भी अब उनके हमदर्द हो गये।
——————————
लेखक एवं कवि- दीपक राज कुकरेजा,ग्वालियर
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

धोखा और वफा भी-हिन्दी शायरी


रिश्ते जो दूर हो गये
यादों में धुंधले हो जाते हैं,
उनके साथ गुजरे पल
याद्दाश्त से होते हैं बाहर
मतलब है जिनसे
वही यार ताजगी भर पाते हैं,
कहें दीपक बापू
इस दुनियां में धोखा भी
वफा भी मिल जाती है
मगर लोगों के नजरिये अलग अलग
जिसकी नजर जैसी
वैसी ही तस्वीर वह सामने पाते हैं।
———
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
poet, Writer and editor-Deepak ‘Bharatdeep’,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
 
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खामोशी से बड़ा दोस्त -हिन्दी कविताएँ


उनकी जुदाई के गम में
कभी हमने आँसू नहीं बहाये
भले ही उनको देखने के लिए तरसते रहे,
मगर टूटा आसमान सिर पर
जब पता चला कि
वह दूसरों की बाहों में
बहार बनकर बरसते रहे।
——————
खामोशी से  बड़ा दोस्त
बहुत ढूँढने पर भी नहीं मिला,
सच बोले तो लोग बने दुश्मन
झूठ बोले तो हुआ जमाने में हमारा गिला।
फिर भी कोई शिकायत नहीं हैं
इस जहाँ में
भला कब किसे
अपनी जुबान से निकले लफ्जों का कद्रदान मिला।
——————
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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ईमानदारी और भ्रष्टाचार-हिन्दी हास्य कविता (imandari aur bhrashtachar-hindi hasya kavita)


भ्रष्टाचारी ने ईमानदार को फटकारा
‘‘क्या पुराने जन्म के पापों का फल पा रहे हो,
बिना ऊपरी कमाई के जीवन गंवा रहे हो,
अरे
इसी जन्म में ही कोई अच्छा काम करते,
दान दक्षिणा  दूसरों को देकर
अपनी जेब भरने का काम भी करते,
लोग मुझे तुम्हारा दोस्त कहकर शरमाते हैं,
तुम्हारे बुरे हालात सभी जगह बताते हैं,
सच कहता हूं
तुम पर बहुत तरस आता है।’’
ईमानदार ने कहा
‘‘सच कहता हूं इसमें मेरा कोई दोष नहीं है,
घर में भी कोई इस बात पर कम रोष नहीं है,
जगह ऐसी मिली है
जहां कोई पैसा देने नहीं आता,
बस फाईलों का ढेर सामने बैठकर सताता,
ठोकपीटकर बनाया किस्मत ने ईमानदार,
वरना दौलत का बन जाता इजारेदार,
एक बात तुम्हारी बात सही है,
पुराने जन्म के पापों का फल है
अपनी ईमानदारी की बनी बही है,
यही तर्क अपनी दुर्भाग्य का समझ में आता है।
———-
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
poet, Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
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इंसान के भेष में शैतान-हिन्दी शायरी


खौफ आसमान से बिजली गिरने का नहीं है,
डर जमीन के धसकने का भी नहीं है,
नहीं घबड़ाते सांप के जहर से
फिर भी दिल घबड़ाता है
इस बात से
रोज मिलने वाले इंसानों में
कोई शैतान तो नहीं है।
————
लोग नहीं बदलते चेहरा
बस, बयान बदल देते हैं,
बेशर्मी अब बुरी आदत नहीं कहलाती
कुछ मजबूरी
कुछ व्यापार बन गयी हैं बेदर्दी
लोग हालत बदलने के बहाने
अपनी अदायें बदल देते हैं।
———
संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक   ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
Editor and writer-Deepak  ‘Bharatdeep’,Gwalior
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बेशर्मी अब बुरी आदत नहीं कहलाती-हिन्दी व्यंग्य कविता


खौफ आसमान से बिजली गिरने का नहीं है,
डर जमीन के धसकने का भी नहीं है,
नहीं घबड़ाते सांप के जहर से
फिर भी दिल घबड़ाता है
इस बात से
रोज मिलने वाले इंसानों में
कोई शैतान तो नहीं है।
————
लोग नहीं बदलते चेहरा
बस, बयान बदल देते हैं,
बेशर्मी अब बुरी आदत नहीं कहलाती
कुछ मजबूरी
कुछ व्यापार बन गयी हैं बेदर्दी
लोग हालत बदलने के बहाने
अपनी अदायें बदल देते हैं।
———
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चांद और समंदर-हिन्दी कविता (chand aur samandar-hindi poem)


चांद पर भी कहीं न कहीं दाग है,
समंदर में भी कहीं न कहीं आग है।
ऊपर और नीचे होता खेल कुदरत का है
इंसान गाता मुख से अपना ही राग है।
शिष्टाचार बैठा है सोने के तख्त पर
सजावट में भ्रष्टाचार का पूरा भाग है।
कहें दीपक बापू दिखते सभी यहां इंसान
पर उनमें भी कोई भेड़िया कोई नाग है।
—————-
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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भरोसे के नाम पर तोहफा धोखे का-हिन्दी व्यंग्य कविता (bharose ka naam par tohfe dhokhe ka-hindi vyangya akvita)


तख्त के लिये मची है चारों तरफ जंग,
इंसानों के मुंह खुले पर दिमाग हैं तंग।
सजे हुए सब चेहरे, ओढ़े चमकीले कपड़े
मगर सभी की नीयत का काला है रंग।
भरोसा का नाम, मिलता तोहफा धोखे का
सच की लय को भ्रम ने किया है भंग।
कहें दीपक बापू अंधों के आगे क्या रोना
समाज बड़ा है, पर बंधे है उसके सारे अंग।
संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक   ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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भ्रष्टाचार एक अदृश्य राक्षस–हिन्दी हास्य कविताएँ/शायरी (bhrashtachar ek adrishya rakshas-hindi hasya kavitaen)


भ्रष्टाचार के खिलाफ
लड़ने को सभी तैयार हैं
पर उसके रहने की जगह तो कोई बताये,
पैसा देखकर
सभी की आंख बंद हो जाती है
चाहे जिस तरह घर में आये।
हर कोई उसे ईमानदारी से प्यार जताये।
———-
सभी को दुनियां में
भ्रष्ट लोग नज़र आते हैं,
अपने अंदर झांकने से
सभी ईमानदार घबड़ाते हैं।
भ्रष्टाचार एक अदृश्य राक्षस है
जिसे सभी गाली दे जाते हैं।

सुसज्जित बैठक कक्षों में
जमाने को चलाने वाले
भ्रष्टाचार पर फब्तियां कसते हुए
ईमानदारी पर खूब बहस करते है,
पर अपने गिरेबों में झांकने से सभी बचते हैं।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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हास्य कविता-भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन (hasya kavita-bhrashtachar ke khilaf andolan)


समाज सेवक की पत्नी ने कहा
‘तुम भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
शामिल मत हो जाना,
वरना पड़ेगा पछताना।
बंद हो जायेगा मिलना कमीशन,
रद्द हो जायेगा बालक का
स्कूल में हुआ नया एडमीशन,
हमारे घर का काम
ऐसे ही लोगों से चलता है,
जिनका कुनबा दो नंबर के धन पर पलता है,
काले धन की बात भी
तुम नहीं उठाना,
मुश्किल हो जायेगा अपना ही खर्च जुटाना,
यह सच है जो मैंने तुम्हें बताया,
फिर न कहना पहले क्यों नहीं समझाया।’
सुनकर समाज सेवक हंसे
और बोले
‘‘मुझे समाज में अनुभवी कहा जाता है,
इसलिये हर कोई आंदोलन में बुलाता है,
अरे,
तुम्हें मालुम नहीं है
आजकल क्रिकेट हो या समाज सेवा
हर कोई अनुभवी आदमी से जोड़ता नाता है,
क्योंकि आंदोलन हो या खेल
परिणाम फिक्स करना उसी को आता है,
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में
मेरा जाना जरूरी है,
जिसकी ईमानदारी से बहुत दूरी है,
इसमें जाकर भाषण करूंगा,
अपने ही समर्थकों में नया जोशा भरूंगा,
अपने किसी दानदाता का नाम
कोई थोडे ही वहां लूंगा,
बस, हवा में ही खींचकर शब्द बम दूंगा,
इस आधुनिक लोकतंत्र में
मेरे जैसे ही लोग पलते हैं,
जो आंदोलन के पेशे में ढलते हैं,
भ्रष्टाचार का विरोध सुनकर
तुम क्यों घबड़ाती हो,
इस बार मॉल में शापिंग के समय
तुम्हारे पर्स मे ज्यादा रकम होगी
जो तुम साथ ले जाती हो,
इस देश में भ्रष्टाचार
बन गया है शिष्टाचार,
जैसे वह बढ़ेगा,
उसके विरोध के साथ ही
अपना कमीशन भी चढ़ेगा,
आधुनिक लोकतंत्र में
आंदोलन होते मैच की तरह
एक दूसरे को गिरायेगा,
दूसरा उसको हिलायेगा,
अपनी समाज सेवा का धंधा ऐसा है
जिस पर रहेगी हमेशा दौलत की छाया।’’
———–
कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
poet writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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————————

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होली पर ध्यान लगायें-हिन्दी कविता (holi and meditesion-hindi poem)


आओ ध्यान लगायें,
नकली गुलाल और रंग में
खेलने से जलेंगी आंखें और बदन
इसलिये अपने अंतर्मन में
स्थापित कर लें एक सुंदर स्वरूप

उसके आगे   अपनी हृदय का दीपक जलायें।

————
किस पर रंग फैंककर
किसका व्यक्तित्व अपने हाथ से चमकायें,
अपने हृदय को कर दें ध्यान में मग्न,
हो जायेंगे कीचड़ की समाधियां भग्न,
बरस भर जमा किया है कीचड़ मन में
वहां ज्ञान का कमल लगायें।
————

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर 
poet writer and editor-Deepak Bharatdeep, Gwalior
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तलवारें कब तक पहरा देंगी-हिन्दी व्यंग्य कविता (talwar ka pahara-hindi vyangya kavita


सिंहांसन पर बैठने से
गिरने का खतरा है,
ताज है सिर पर
तो गर्दन कटने का खतरा है।
तलवारें कब तक पहरा देंगी,
बंदूकें कभी कायरों की वीरता का
परचम नहीं फहरा देंगी,
जहां को लूट कर
अपने महल सजाने वाले
कब तक सलामत रहेंगे
जहां का लूट का माल लेकर
उनको अपने पहरेदारों से ही खतरा है।
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महंगाई देश भक्ति को कुचल जायेगी-हिन्दी कविता (mehangai aur deshbhakti-hindi hasya kavita)


भूखे इंसान के पास देश भक्ति कहां से आयेगी,
रोटी की तलाश में भावना कब तक जिंदा रह पायेगी।
पत्थर और लोहे से भरे शहर भले देश दिखलाते रहो
महंगाई वह राक्षसी है जो देशभक्ति को कुचल जायेगी।
———-
क्रिकेट और फिल्म में
बहलाकर
कब तक देश के भूखों की
भावनाओं को दबाओगे।
असली भारत का दर्द जब बढ़ जायेगा,
तब तुम्हारा रोम रोम भी जल जायेगा,
कब तक पर्दे पर
नकली इंडिया सजाओगे।
————-

कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior
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नाम का आदर्श-हिन्दी व्यंग्य कविता


आदर्श होने का दावा
बाहर से लगता है
मगर उसके अंदर छिपे ढेर सारे दाग हैं,
रावण और कंस जैसे
नाम रखकर कोई कातिल बने
यह जरूरी नहीं है
देवताओं का मुखौटा लगाकर
उजाड़े कई लोगों ने बहुत सारे बाग हैं।
————
नाम में वाकई कुछ नहीं रखा है,
दैत्यों ने भी कलियुग का अमृत चखा है,
अब उनको मरने का डर नहीं लगता
देवताओं के मुखौटे पहने लोग अब उनके सखा है।
———–

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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भाषा और अखबार-लघु हास्य व्यंग्य (bhasha aur akhabar-hindi short comic satire article)


‘पापा, यह कांफिडेंस क्या होता है।’ 14 साल के बच्चे ने अपने पास ही चाय पी रहे पिताजी से पूछा।’
उन्होंने जवाब दिया-‘बेटा, अंग्रेजी के कांफिडेंस शब्द का हिन्दी में मतलब होता है, आत्म विश्वास।’
बेटा बोला-‘ यह तो मुझे भी पता है पर हिन्दी में यह कांफिडेंस क्या होता है? आप देखो अखबार में लिखा है कि हर समय कांफिडेंस रखना चाहिये।’
पिताजी ने कहा-‘अरे, ऐसे ही लिख दिया होगा। आजकल हिन्दी में अखबार यही करने लगे हैं।
थोड़ी देर बात फिर बेटे ने पूछा-‘यह गुड लुक क्या होता है।’
पिताजी ने कहा-‘बेटा, यह भी अंग्रेजी भाषा का शब्द है जिसका मतलब है अच्छा दिखना।’
बेटा बोला-‘यह तो मुझे भी पता है पर यह हिन्दी में क्या होता है? इस अखबार में लिखा है कि हमेशा गुड लुक रहें।’
पिताजी ने कहा-‘ऐसे ही लिख दिया होगा।’
थोड़ी देर बाद फिर बेटे ने कहा-‘पापा, यह बी केअरफुल मस्ट ड्यूरिंग प्रिगनैंसी का क्या मतलब होता है।’
पिताजी ने कहा-‘बेटा आप अखबार में वही शब्द पढ़ो जो हिन्दी में समझ में आता हो, बाकी छोड़ दो।’
बेटा बोला-‘ठीक है पापा, अब मैं अखबार में वही पढ़ूंगा जो समझ में आये पर इसमें कोई भी ऐसा छपा नहीं मिल रहा है तो क्या करूं।
पिताजी ने कहा-‘तुम समाचार पढ़ो यह लेख मत पढ़ो।’
बेटा बोला-‘समाचारों में भी ऐसे ही शब्द लिखे हैं जो हिन्दी में न होने के कारण समझ में नहीं आते। मैं जब हिन्दी पढ़ता हूं तो हिन्दी याद रहती है और जब अंग्रेजी पढ़ता हूं तो वही याद रहती है।
पिताजी चुप हो गये।
थोड़ी देर बाद फिर बेटे ने पूछा-‘यह ‘सैक्सी सीन’ क्या होता है। इस अखबार एक समाचार में लिखा है कि इंटरनेट पर ‘सैक्सी सीन’ ज्यादा देखे जाते हैं।
पिताजी के समझ में कुछ नहीं आया तब वह बोले-‘बेटे, अगर अपनी हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में एक ही जैसे ‘स्ट्रांग’ रहना चाहते हो तो हिन्दी अखबार पढ़ना छोड़ दो। यह भी बता देता हू कि स्ट्रांग अंग्रेजी का शब्द है जिसका मतलब है ‘मजबूत’।
—————

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आशिक खिलाड़ी-हिन्दी दिवस पर हास्य कविता (player and lover-comic poem on hindi diwas)


आशिक ने माशुका से कहा
‘तुम आज जाकर अपने माता पिता से
अपनी शादी की बात करना,
मेरी प्रशंसा का उनकी आंखों के सामने बहाना झरना,
उनको बताना
मेरा आशिक कई खेलों का खिलाड़ी है,
अपने प्रतिद्वंद्वियों की हालत उसने हमेशा बिगाड़ी है,
हॉकी में बहुत सारे गोल ठेलता है,
तो कुश्ती के लिये भी डंड पेलता है,
बहुत दूर तक भाला उछालता है,
तो बॉल भी उछल कर बॉस्केट में डालता है,
देखना वह खुश हो जायेंगे,
तब हम अपनी शादी बनायेंगे।’

जवाब में माशुका बोली
‘‘मैंने उनको यह सब बताया था,
पर उनको खुश नहीं पाया था,
उन्होनें मुझे समझाया कि
‘खिलाड़ी नहायेगा क्या
निचोड़ेगा क्या,
जो क्रिकेट नहीं खेले वह खिलाड़ी कैसा,
पैसा न कमाये वह होता अनाड़ी जैसा,
अगर खेल प्रतियोगिता का ठेकेदार होता
तो बात कुछ बनती,
कहीं मैदान बनवाता तो कहीं खरीदता खेल का सामान
तब कमीशन लेने पर ही जिंदगी उसकी छनती,
हमने तो बड़े बड़े खिलाड़ियों को सोने का पदक
पीतल के भाव बेचते देखा है,
कईयों को ठेला खींचते भी देखा है,
खेलने में मज़दूरी जितनी कमाई,
भला किसके काम आई,
अगर हो कोई खेल प्रबंधक तो ही
रिश्ता मंजूर है,
वरना उसके लिये दिल्ली अभी दूर है,’
इसलिये तुम खेलना बंद करो,
या मुझे भूल जाओ,
कहीं अपनी जुगाड़ लगाओ
इतने सारे संगठन हैं
कहीं सचिव या अध्यक्ष पद पर कब्जा कर
बढ़ाओ अपना सामाजिक सम्मान,
नामा और मिले और नाम,
वरना अपने सपने अधूरे रह जायेंगे।’’
———–

कवि, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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आतंक और युद्ध में फर्क होता है-हिन्दी लेख (diffarence between terarrism and war-hindi aticle)


फर्जी मुठभेड़ों की चर्चा कुछ
इस तरह सरेआम हो जाती कि
अपराधियों की छबि भी
समाज सेवकों जैसी बन जाती है।
कई कत्ल करने पर भी
पहरेदारों की गोली से मरे हुए
पाते शहीदों जैसा मान,
बचकर निकल गये
जाकर परदेस में बनाते अपनी शान
उनकी कहानियां चलती हैं नायकों की तरह
जिससे गर्दन उनकी तन जाती है।
——–
टीवी चैनल के बॉस ने
अपने संवाददाता से कहा
‘आजकल फर्जी मुठभेड़ों की चल रही चर्चा,
तुम भी कोई ढूंढ लो, इसमें नहीं होगा खर्चा।
एक बात ध्यान रखना
पहरेदारों की गोली से मरे इंसान ने
चाहे कितने भी अपराध किये हों
उनको मत दिखाना,
शहीद के रूप में उसका नाम लिखाना,
जनता में जज़्बात उठाना है,
हमदर्दी का करना है व्यापार
इसलिये उसकी हर बात को भुलाना है,
मत करना उनके संगीन कारनामों की चर्चा।
———–

कवि लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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निगाहों ने खो दी है अच्छे बुरे की पहचान-हिन्दी शायरी (nanigah ne kho di pahchan-hindi shayari)


लोगों की संवेदनाऐं मर गयी हैं
इसलिये किसी को दूसरे का दर्द
तड़पने के लिये मजबूर नहीं कर पाता है।

निगाहों ने खो दी है अच्छे बुरे की पहचान
अपने दुष्कर्म पर भी हर कोई
खुद को साफ सुथरा नज़र आता है।

उदारता हाथ ने खो दी है इसलिये
किसी के पीठ में खंजर घौंपते हुए नहीं कांपता,
ढेर सारे कत्ल करता कोई
पर खुद को कातिल नहीं पाता है।

जीभ ने खो दिया है पवित्र स्वाद,
इसलिये बेईमानी के विषैले स्वाद में भी
लोगों में अमृत का अहसास आता है।

किससे किसकी शिकायत करें
अपने से ही अज़नबी हो गया है आदमी
हाथों से कसूर करते हुए
खुद को ही गैर पाता है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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अब अंधेरों से डरने लगे हैं-हिन्दी व्यंग्य कविता


रौशनी के आदी हो गये, अब अंधेरों से डरने लगे हैं।
आराम ने कर दिया बेसुध, लोग बीमारियों से ठगे हैं।।
पहले दिखाया सपना विकास का, भलाई के ठेकेदारों ने
अब हर काम और शय की कीमत मांगने लगे हैं।।
खिलाड़ी बिके इस तरह कि अदा में अभिनेता भी न टिके
सौदागर सर्वशक्तिमान को भी सरेराह बेचने लगे हैं।
अपनी हालातों के लिये, एक दूसरे पर लगा रहे इल्ज़ाम,
अपना दामन सभी साफ दिखाने की कोशिश में लगे हैं।।
टुकुर टुकुर आसमान में देखें दीपक बापू, रौशनी के लिए,
खुली आंखें है सभी की, पता नहीं लोग सो रहे कि जगे हैं।।
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कबाड़ियों का चैनल प्रपंच-हिन्दी हास्य व्यंग्य


एक कबाड़ी ने जब सुना कि अमुक चैनल अपना पूरा तामझाम बेचकर दूसरी जगह से चालू होने वाला है तो वह तत्काल अपने साथी दूसरे कबाड़ी के पास पहुंचा।
दूसरे कबाड़ी ने उसे देखते ही कहा-‘आ गये जासूसी करने!’
पहल कबाड़ी बोला-‘‘नहीं यार, आज तो मैं एक साझा काम करने का प्रस्ताव लाया हूं। हम दोनों अमुक टीवी चैनल को खरीद लेते हैं वह बिक रहा है और दूसरी जगह से शुरु होने वाला है। उसके प्रबंधक नाम के अलावा सबकुछ बेचने वाले हैं। वहां के एक चपरासी ने मुझे बताया जो कि वहां से अब निकाले जाने वाला है।’
दूसरे कबाड़ी ने कहा-‘‘ तो हम क्या करेंगे? इतना महंगा सामान होगा, हमारे किस काम का? उसे बेचेंगे कहां?’’
पहले कबाड़ी ने कहा-‘‘बेचना नहीं है। हमें वह चैनल कबाड़ी न्यूज चैनल के नाम से चलाना है। अरे, ठीक है हम कबाड़ी हैं पर हमारे पास पैसा कोई कम नहीं है। फिर अपने बच्चों के नाम से कबाड़ी नाम का संबोधन कितना बुरा लगता हैै।’’
दूसरे कबाड़ी ने कहा-‘मूर्ख कहीं के! कबाड़ी का काम है पुरानी चीजें खरीद कर बेचना न कि घर में रखना।’
पहले कबाड़ी ने कहा-‘‘लगता है कि अपने बच्चों के भविष्य से तुम्हें प्रेम नहीं है। फिर आगे चलकर हम भी नयी जगह पर वह चैनल चलायेंगे तब सारा सामान बेच देंगे।’
दोनों जब बातचीत कर रहे थे तब उनका ध्यान पास बैठे उस आदमी की तरफ नहीं गया जो चुपचाप एक बैंच पर बैठ कर बीड़ी पी रहा था। वह एकदम मैला कुचला सफेद पायजमा कुर्ता पहने हुए था। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी और बालों से ऐसा लग रहा था कि जैसे बरसों से नहाया न हो। दरअसल वह तीसरा कबाड़ी था जो व्यवसाय से संबंधित गोपनीय सूचनायें एकत्रित करने दूसरे कबाड़ी के पास आकर बैठता था।
दूसरे कबाड़ी ने कहा-‘पर चैनल चलाने का अपने पास तो अनुभव ही नहीं है। हां, यह बात सही है कि मैं समाचारों का शौकीन हूं और अमुक चैनल पहले बहुत देखता था पर अब वह तो बेकार हो गया है।’
पहले ने कहा-‘यार, कैसे कबाड़ी हो, तुम्हें पता है यहां अनुभव वगैरह तो केवल दिखाने के लिये हैं। वरना सच तो यह है कि अधिकतर लोग धूप में बाल सफेद करते हैं। समाचार चैनल चलाना कौन सा मुश्किल काम है।’
दूसरे ने कहा-‘जरा अपनी योजना बताओ तो सही।
पहला कबाड़ी-‘सुनो! समाचार चैनलों में एक घंटे के दौरान केवल दो मिनट के समाचार होते हैं बाकी तो इधर उधर की कबाड़ में मिलने वाली कटिंग से ही काम चलायेंगे। अपना घीसू कबाड़ी है न…………’
दूसरे ने कहा-‘वही न! जो फिल्म लाईन में चला गया है।’
पहले ने कहा-‘काहे की फिल्म लाईन! पुरानी फिल्में कबाड़ में लाकर बेचता है। उससे कहेंगे कि अब वह थोड़ा कम पुरानी फिल्में खरीद कर हमारे अमुक चैनल पर दे। वैसे भी आजकल की फिल्में तीन दिन में ही कबाड़ हो जाती हैं। फिर क्रिकेट के खिलाड़ियों का रैम्प में नाचना, किसी फिल्म अभिनेता द्वारा लोगों से मारपीट की सच्ची घटना तथा लाफ्टर शो जैसे कार्यक्रम दूसरे चैनल आज दिखाते हैं हम तीन दिन बाद कबाड़ में खरीद कर उसे चलायेंगे। वैसे इस देश में गिनती के तीन चार लोग ऐसे भी हैं जो अपने छिछोरेपन की वजह से हमेशा ही न्यूज में बने रहते हैं। उनका भी सभी कुछ मसाला कबाड़ में मिल जायेगा। घीसू कबाड़ी के रिश्ते दूर दूर तक हैं। कोई ना करे यह संभव नहीं है। प्रबंध निदेशक उस चपरासी को बनायेंगे जिसने यह समाचार दिया है। हां, बस दो मिनट के लिये कोई समाचार वाचक रखना पड़ेगा और संपादक भी। ’
दूसरे ने कहा-‘तुम चिंता मत करो। समाचार संपादक तो मैं ही बन जाऊंगा क्योंकि आजकल समाचार न सुन पाने की भड़ास निकालने के लिये मौका मुझे चाहिए। वाचक की चिंता मत करो मेरा भतीजा निकम्मा घूम रहा है। वह इस काम के लिये कई जगह आवेदन भेज चुका है उसको काम पर रख लेंगे। मैंने भाई से कर्जा लेकर यह काम शुरु किया था तो उसका भी बदला चुक जायेगा। हां, एक तो महिला या लड़की भी तो रखनी पड़ेगी।’
पहले ने कहा-‘उसकी चिंता नहीं है। मेरी साली इसके लिये योग्य है।’
दूसरे ने कहा-‘यार, पर मुझे डर लग रहा है। इतना बड़ा काम है!
पहले ने कहा-‘तुमने अगर कबाड़ का काम किया है इसलिये कोई भी काम कर लोगे। इसलिये तो चैनल का ही नाम मैंने कबाड़ी सुझाया है।’
दूसरे ने कहा-फिर देर किस बात की।’
पहले ने कहा-‘ठीक है, तो मेरी मोटर साइकिल पर बैठो और चलो।’
दोनों मोटर साइकिल पर चल पड़े। थोड़ी दूर जाकर वह बंद हो गयी तो दूसरा कबाड़ी बोला-‘यार, कैसी मोटर साइकिल लाये हो।’
पहला कबाड़ी-‘कल ही कबाड़ में खरीदी है कोई पुरानी नहीं लाया।’
थोड़ी देर तक दोनों पैदल ही मोटर साइकिल घसीटते रहे तब कहंी जाकर उसको बनाने वाली दुकान मिली। वहां एक घंटा लग गया। मैकनिक से बहुत चिकचिक होती रही। दोनों बैठकर फिर अपनी राह चले। थोड़ी दूर चले तो पिछला पहिये से हवा निकल गयी। फिर दोनों घसीटते हुए पंचर बनवाने की दुकान पर आये।
पंचर बनाने वाले ने पहिये में से ट्यूब निकाला और उसे बनाने लगा। उसके यहां छोटे टीवी पर अमुक चैनल आ रहा था। दूसरा कबाड़ी उसे देखने लगा तो वहां ब्रेकिंग न्यूज आ रही थी। दूसरा कबाड़ी एकदम चिल्ला पड़ा-‘अरे यार देख, अमुक चैनल बिक गया है और दूसरी जगह से शुरु होगा। किसी चालू कबाड़ी ने खरीदा है।’
पहले कबाड़ी का मुंह खुला का खुला रह गया-‘बहुत बुरा हुआ। अब समझ में आया। अरे, यही चालू कबाड़ी वही था जो हमारी बातें सुन रहा था। मैं उसे जानता हूं पर वहां वेश बदले बैठा था इसलिये समझ नहीं पाया। वह तुम्हारे यहां तुम्हारी जासूसी करने अक्सर ऐसे ही आता है मुझे उसके एक नौकर ने बताया था।’’
दूसरा कबाड़ी बोला-‘‘उसने चैनल का नाम भी रख दिया है, ‘‘कबाड़ न्यूज चैनल’’, हमारी पूरी योजना चोरी कर गया। चल उससे रॉयल्टी मांगते हैं।’’
पहला बोला-‘‘कोई फायदा नहीं। उसने अपने चैनल का नाम ‘कबाड़ी’ नहीं बल्कि ‘कबाड़’ चैनल रखा है।’
दूसरा कबाड़ी बोला-‘‘तेरे को धंधे  का उसूल नहीं मालुम। अरे, हम पुराने सामान खरीदने और बेचने वाले हैं न कि उनके इस्तेमाल करने वाले। तुझे यह कबाड़ में खरीदी मोटर साइकिल नहीं लानी थी। इस चालू कबाड़ी को देख नयी कार चलाता है और कितनी जल्दी फुर्र से उड़कर वहां पहुंच गया।’
पहले ने कहा-‘‘चिंता मत करो, खरीदा तो है पर चला नहीं पायेगा।’
दूसरे ने कहा-‘‘पर तुमने तो कहा था कि कबाड़ी कुछ भी कर सकता है।’’
पहले ने कहा-‘‘यह मैंने अपने और तुम्हारे लिये कहा था। उसके लिये नहीं। देखना वह जल्दी इसे बेच देगा। तब हम उससे सस्ते में खरीदेंगे।’
दूसरे ने कहा-‘नहीं, कबाड़ी से कोई सामान नहीं खरीदना यह मेरा उसूल है। वह भले ही न्यूज चैनल वाला हो गया है पर मेरी नज़र में रहेगा तो कबाड़ी ही न!’
पहले वाले ने कहा-‘नहीं पर उसकी असलियत बदल गयी है। मैंने तुम्हें बताया था न!’
दूसरे ने कहा-‘अब तुम्हारी नहीं सुनना। मेरी नज़र में उसकी असलियत नहीं बदलेगी।’
पहले ने कहा-‘ठीक है, कोई बात नहीं। यह चालू कबाड़ी तो ऐसा है कि सब जगह कबाड़ कर देता है। इस धंधे  का भी यही करेगा, तब दूसरे चैनल कबाड़ में खरीद कर चलायेंगे।’
दोनों खुश होकर वहां से चले गये। उधर चालू कबाड़ी घीसू कबाड़ी को फोन कर रहा था।
नोट-यह हास्य व्यंग्य किसी घटना या व्यक्ति पर आधारित नहीं है। किसी की कारिस्तानी से मेल खा जाये तो वहीं इसके लिये जिम्मेदार होगा। इसे पाठकों के मनोरंजन के लिये लिखा गया है।

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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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