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गर्मी पर लिखकर बरसात लाने का प्रयास-फुर्सत में लिखा गया लेख


         देश में गर्मी पड़ना कोई नयी बात नहीं है।  सब जानते हैं कि जून का माह सबसे ज्यादा गर्म रहता है।  हिन्दू संवत् के अनुसार यह जेठ का महीना होता है जिसकी पहचान ही आग बरसाती गर्मी से होती है। जिन लोगों ने नियमित रूप से इस गर्मी का सामना किया है वह जानते हैं कि वर्षा ऋतु के आगमन का मार्ग यही जेठ का महीना तय करता है।  गर्मियों की बात करें तो नौतपा यानि नौ दिन तो भीषण गर्मी की वजह से ही पहचाने जाते हैं। हमारा बरसों से  यह अनुभव रहा है इन नौतपा में जमकर गर्म हवा चलती है।  धर की जिस वस्तु पर हाथ रखो वही गर्म मिलती है भले ही छाया में रखी हो।  इतना ही नहीं रात में भी गर्म हवा चलती है।  यह सब झेलते हैं यह सोचकर कि नौ दिन की ही तो बात है यह अलग बात है कि आजकल नौतपा इतने नहीं तपते जितने बाद के दिन तपाते हैं।  नौतपा समाप्त होते ही बरसात का इंतजार प्रारंभ हो जाता है। इस बार बरसात विलंब से आयेगी यह मौसम विशेषज्ञों ने बता दिया है इसलिये हम इसके लिये तैयार हैं कि जब तक पहली बरसात होगी तब तक यह झेलना ही है।

           वैसे देखा जाये तो पूरे विश्व में गर्मी का प्रकोप बढ़ा है।  माना यह जा रहा है कि दुनियां के सभी देश जो गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं उससे ओजोन परत में बड़ा छेद हो गया है। ओजोद परत वह है जो सूरज की किरणों को परावर्तित कर धरती पर आने देती है। जिस तरह हम देश की अनेक कालोनियों में देखतेे हैं कि लोग अपनी छतो पर एक हरी चादर लगा देते हैं जिससे कि सूरज की किरणे उनके आंगन पर सीधे न पड़ें और ठंडक रहे। यही काम धरती के लिये ओजोन परत करती है।  इसके जिस हिस्से मे छेद हो गया है वहां से सूरज की किरणें सीधे धरती पर आती हैं और यही विश्व में पर्यावरण प्रदूषण का कारण है।  विश्व के जिन हिस्सों में हमेशा बर्फ जमी रहती थी वहां इस गर्मी का प्रभाव होने से वह पिघल रही हैं। जिससे बरसात भी अधिक होती है।  यही कारण है कि आज जहां हम आग बरसते देख रहे हैं वहीं कुछ दिन में बाढ़ की स्थिति भी नजर आ सकती है।

        विशेषज्ञ पर्यावरण असंतुलन की जो बात करते हैं वह इसी ओजोन परत में बढ़ते छेद के कारण है।  हमने लू को झेला है। पहले सड़क पर चलते हुए ऐसा लगता था जैसे कि आग की भट्टी के थोड़ा दूर से निकल रहे हैं पर तो ऐसा लगता है जैसे उसके एकदम पास से चल रहे हैं।  एक समय यह तपिश असहनीय पीड़ा में बदल जाती है। अगर शरीर में पानी या खाना कम हो तो यकीनन आदमी बीमार हो जाये। संकट दूसरा भी है कि पहले की तरह निरंतर गर्मी से लड़ने की आदत भी नहीं रही।  दिन में कूलर या वातानुकूलन यंत्र की शरण लेनी ही पड़ती है या मिल ही जाती है।  हमने अपने पूरे शैक्षणिक जीवन में कूलर नहीं देखा था।  तपते कमरे में हमने पढ़ाई की है।  पूरे महीने भर तक इस गर्मी को झेलने की आदत रही है पर अब उकताहट होने लगती है। कभी कूलर या वातानुकूलन यंत्र की सीमा से बाहर आये तो पता लगा कि गर्मी ने पकड़ लिया या कभी गर्मी से इनकी सीमा में गये तो जुकाम का शिकार हो गये। इस समय बिजली की खपत बढ़ जाती है पर उत्पादन या आपूर्ति उस अनुपात में न बढ़ने से कटौती शुरु हो जाती है। यही कारण है कि बड़े शहर आमतौर से संकट का सामना करते हैं।  गांवों में लोग अपनी पुरानी आदत के चलते कम परेशान होते हैं पर शहर का आदमी तो बिजली के अभाव में कुछ ही घंटों में टूटने लगता है।

         दूसरी बात यह कि छतो पर सोने की आदत लोगों को नहंी रही। देखा जाये तो गर्मी के दिन छत पर सोने के लिये ही हैं।  इस समय मच्छर भीषण गर्मी में काल कलवित हो जाते हैं इसलिये उनके परेशान करने की संभावना नहीं रहती।  जिन लोगों पर छत की सुविधा है वह बिजली न होने पर सो सकते हैं पर जिनको नहीं है उनके लिये तो मुश्किल ही होती है।

      हम अंतर्जाल पर सात वर्षों से लिख रहे हैं।  प्रथम दो वर्षों में हमने गर्मी पर कविता लिखी तो उसी दिन वर्षा हो गयी।  मित्रों ने इस पर बधाई भी दी थी। पांच वर्षों से इस पर कभी सोचा नहीं पर इस बार की गर्मी से त्रस्त ही कर दिया है।  कल हमने गर्मी पर एक कविता लिखी तो आशा थी कि बरसात हो जायेगी-हालांकि विशेषज्ञों ने बता दिया है था कि तीन चार दिन आसार नहीं है। हमने आज यह लेख इस उम्मीद में लिखा है कि शायद बरसात हो जाये। कविता छोटी थी जबकि लेख बड़ा है इसलिये शायद इसका असर हो।  जब दुनियां टोटका कर सकती है तो हम तो स्वांत सुखाय लेखक हैं तो क्यों नहीं अपना स्वाभाविक टोटका आजमा सकते।

 

 

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’

कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक ‘भारतदीप”,ग्वालियर 

poet,writer and editor-Deepak ‘BharatDeep’,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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अर्थशास्त्री जब श्रीमद्भागवत गीता पर बोले-हिन्दी व्यंग्य चित्तन (arthshastri jab shrimadhbhagwat gita par bole-hindi vyangya chittan)


                कथित रूप से एक अर्थशास्त्री और लंदर स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स के एक भारतीय प्रोफेसर का मानना है कि गीता का उदाहरण पेश कर अहिंसा की बात नहीं की जा सकती है। उनका यह भी है कि गीता का अंतिम अर्थ यही निकलता है कि हर आदमी एक दूसरे को मारने के लिये निकल पड़े। योग साधना में रत गीता साधकों के लिये यह बयान हास्यासन करने के लिये एक उपयुक्त विषय हो सकता है। जब गीता के विषय पर किसी के अनर्गल बयान पर लिखने का मन आता है तो लगता है कि एक जोरदार हास्य व्यंग्य लिखा जाये पर यह संभव नहीं होता क्योंकि तब उसमें वर्णित कुछ बातों का अनचाहे जिक्र कर यह बताना पड़ता है कि उसके संदेश आज भी प्रासंगिक हैं तब चिंत्तन अपना काम करने लगता है। वैसे भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान का केवल उनके भक्तों में ही प्रचार करें पर हम इस आज्ञा का यह देखकर उल्लंघन कर जाते हैं कि बरसों से इस संसार में विराजी श्रीमद्भागवत गीता को पहले तो लोग अपने घर में स्वयं के धाार्मिक होने के प्रमाण में ही रखते हैं और भगवान को प्रसन्न करने के लिये हाथ भी लगाते हैं तो अध्ययन करने के बाद उसे नहीं समझ पाते तब हमारे लिखने से कुछ होने वाला नहीं है। हमने लिखा पर मान लेते हैं कि कुछ नहीं लिखा।
              प्रोफेसर साहब महात्मा गांधी के अहिंसा के विचारों पर बोलने के लिये बुलाया गया था। उनका यह मानना था कि जो गांधी श्रीगीता के प्रशंसक थे वह अहिंसा के प्रवर्तक नहंी माने जा सकते क्योंकि वह हिंसा के लिये प्रेरित करती है। एक बात निश्चित है कि भारतीय होकर विदेश के किसी विश्वविद्यालय से जुड़े होने के अलावा उन प्रोफेसर की दूसरी कोई योग्यता नहीं हो सकती। यहां अर्थशास्त्र के ज्ञाता बहुत हैं पर प्रसिद्ध सभी नहीं है। बाज़ार और प्रचार प्रबंधक केवल उन लोगों को अपने मंचों पर स्थान देते हैं जो या तो स्वयं ही कला, साहित्य, अर्थशास्त्र, राजनीति, समाज सेवा तथा फिल्म में लोकप्रियता कर चुके हों या फिर किसी विदेशी संस्था से जुड़े होने के साथ ही विदेश से सम्मान प्राप्त हों। अपनी तरफ से किसी व्यक्ति को महान बनाना उनका लक्ष्य नहीं रहता। यह प्रोफेसर साहब भी इसी तरह के रहे होंगें। उन्होंने न कभी गीता पढ़ी है न पढ़ेंगे। संभव है कि भारतीय धर्म को बदनाम करने के लिये श्रीगीता पर बहस छेड़ने का नाम इस तरह का तरीका अपनाया गया हो। हमने उन प्रोफेसर साहब का नाम इसलिये नहीं लिखा क्योंकि लगता है कि प्रचार कर्म में फिक्सिंग का खेल भी चलता है और हमें यहां लिखने का कोई आर्थिक लाभ-इसे कर्म फल से मत जोड़ियेगा-नहीं है। इसलिये किसी विषय के समर्थन या आलोचना में किसी का नाम नहीं लिखते।
         श्रीमद्भागवत गीता पर हमारे कई चिंत्तन हमारे बीस ब्लॉग पर लिखे जा चुके हैं। उनमें हम एक जगह लिख चुके हैं कि महाभारत युद्ध के दौरान जितनी भी हिंसा हुई वह भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सिर पर ली थी। गांधारी के शाप को शिरोधार्य किया। उनके द्वारका शहर का पूरा परिवार और प्रजा नष्ट हो गयी। अंततः उन्होंने एक शिकारी का बाण अपने पांव पर लेकर देह यहीं त्याग कर परमधाम गमन किया। श्रीमद्भागवत गीता के उपदेश के समय उन्होंने अर्जुन को यह स्पष्ट कहा था कि इस हिंसा का पाप तुम मुझे समर्पित करो। अर्जुन ने जब परमधाम गमन करते हुए युधिष्ठर से अपनी गति का कारण पूछा तो उसके उत्तर में उन्होंने यह नहीं कहा कि महाभारत युद्ध की हिंसा का अपराध उनकी दुर्दशा का कारण है। स्पष्टतः श्रीकृष्ण ने उस हिंसा को अपनी अवतारी देह पर इसलिये लिया क्योंकि वह उन्होंनें धारण की थी। अब भगवान श्रीकृष्ण ऐसी हिंसा का अपराध लेने के लिये कोई सदेह उपस्थित नहीं है-यह अलग बात है कि वह आज भी भारतीय जनमानस में विराजे हैं-जिससे कि वह अपने भक्तों की हिंसा का हिसाब चुकायें। इतनी बात तो हर भारतीय ज्ञानी जानता है इसलिये कभी अपने संदेश से किसी को हिंसा के लिये प्रेरित नहीं करता।
        जब वह प्रोफेसर विदेश में कार्यरत हैं तो तय बात है कि वहां के वातावरण का ही उन पर प्रभाव होगा। चेले चपाटे और संगी साथी भी ऐसे ही होंगे जो श्रीगीता के बारे में इधर उधर से सुनकर अपनी राय बनाते होंगे। उनकी सोच महाभारत युद्ध से पहले श्रीकृष्ण के अर्जुन को युद्ध के लिये प्रेरित करने के लिये उपदेश देने की घटना लगने के साथ ही युद्ध के बाद हुए परिणामों पर ही केंद्रित होती है। ऐसे में उनकी बात पर बहस छेड़ना भी मूर्खता है। यह अलग बात है कि कहीं भारतीय धर्म गंथों कोे बदनाम करने के लिये कहीं कोई प्रचार योजना फिक्स हुई हो। अभी रूस में इस्कॉन के संस्थापक के गीता संस्करण पर रोक का मामला सामने आया था तब प्रचार तंत्र ने खूब उसे भुनाया।
     सच बात कहें तो आधुनिक अर्थतंत्र और अर्थशास्त्रियों के लिये श्रीगीता के संदेश विष की तरह हैं। अर्थशास्त्रियों के लिये हीं वरन् शारीरिक विज्ञान शास्त्र, समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र, मनोविज्ञान शास्त्र तथा तमाम शास्त्रों का ज्ञान भी श्रीमद्भागवत गीता में वर्णित है। अगर श्रीमद्भागवत गीता पढ़ने वाले कहंी लोग पूरे विश्व में अधिक हो गये तो आधुनिक ज्ञान शास्त्रियों को मूर्ख समझने लगेंगे। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने उपदेशों में योग का प्रचार किया है जिसके आठ भाग हैं। उनमें एक यम भी है जिसमें अहिंसा तत्व प्रमुख रूप से बताया जाता है। ऐसे में श्रीगीता के साथ महाभारत युद्ध को जोड़ना गलत है।
        अपने को लेकर हमें कोई खुशफहमी नहंी है पर हम भी क्या करें? जब श्रीगीता को लेकर विवाद उठता है तो हमारा ध्यान उस आदमी के नित्य कर्म की तरह जाता है। वह जिस विषय या विद्या का ज्ञाता हो हम उसे श्रीगीता के संदेशों में देखने लगते हैं। तब लगता है कि जैसे सारे विषय श्रीमद्भागवत गीता में समाहित हैं।
आखिरी बात यह कि आधुनिक अर्थशास्त्र में कहा जाता है कि उसमें दर्शनशास्त्र का अध्ययन नहीं किया जाता। इसका सीधा मतलब यह है कि उन प्रोफेसर साहब ने गीता को नहीं पढ़ा। हमने उनका नाम इसलिये भी नहीं लिखा क्योंकि अगर हमारा यह विचार कोई उनको बता दे कि श्रीमद्भागवत् गीता का ज्ञान हो जाये तो सारे एक ही आदमी सारे शास्त्रों का ज्ञाता हो जाता है। उसमें कहीं दर्शनशास्त्र भी हो सकता है पर इतना तय है कि उसमें जो अर्थशास्त्र के सिद्धांत है वह कहीं अन्यत्र नहीं मिल सकते। ऐसे में प्रोफेसर के प्रायोजक और समर्थक कहीं उनको सही साबित करने के लिये कोई बड़ी प्रायोजित बहस न करा दें। बहरहाल जिन लोगों को श्रीमद्भागवत गीता पर हमारे विचार पढ़ना हो वह दीपक भारतदीप और श्रीमद्भागवत गीता शब्द डालकर सर्च इंजिनों मे ढूंढ सकते हैं। एक गीता साधक के रूप में हमेशा ही ऐसे लोगों की बातें हैरान करती हैं जो उसे पढ़ते बिल्कुल नहीं और पढ़ते हैं तो समझते नहीं और समझते हैं तो सही रूप में व्यक्त नहीं कर पाते क्योकि वह उनकी धारणा शक्ति से परे होती है। हम परेशान नहीं होते क्योंकि एक गीता साधक में इतनी शक्ति तो आ ही जाती है कि वह ऐसी बातों से विचलित नहीं होता। ब्लॉग पर श्रीमद्भागत गीत के विषय पर लिखने का जब अवसर उपस्थित होता है तो लगता है कि यह सौभाग्य हमें ही मिल सकता है।

इस विषय पर इस लेखक का यह ब्लॉग और उसका पाठ अवश्य पढ़ें।  
सामवेद से संदेश-तुम प्रतिदिन युद्ध करते हो (samved-tum pratidin yuddh karte ho-samved se sandesh)

           श्रीमद्भागवत गीता के आलोचक उसे युद्ध से उपजा मानकर उसे तिरस्कार करते हैं पर शायद वह नहीं जानते कि आधुनिक सभ्यता में भी युद्ध एक व्यवसाय है जिसे कर्म की तरह किया जाता है। सारे देश अपने यहां व्यवसायिक सेना रखते हैं ताकि समय आने पर देश की रक्षा कर सकें।
         भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के समय श्री अर्जुन से कहा था कि अभी तू युद्ध छोड़ देगा पर बाद में तेरा स्वभाव इसके लिये फिर विवश करेगा। अर्जुन एक योद्धा थे और उनका नित्य कर्म ही युद्ध करना था। जब श्रीकृष्ण उसे युद्ध करने का उपदेश दे रहे थे तो एक तरह से वह कर्मप्रेरणा थी। मूलतः योद्धा को क्षत्रिय माना जाता है। इसे यूं भी कहें कि योद्धा होना ही क्षत्रिय होना है। इसलिये श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म प्रेरणा दी है यह अलग बात है कि युद्ध करना उसका स्वाभाविक कर्म था। श्रीमद्भागवत में कृष्ण यह भी कहते हैं कि अपने स्वाभाविक कर्म में लगा कोई भी व्यक्ति हो-कर्म के अनुसार क्षत्रिय, ब्राह्मण वैश्य और शुद्र का विभाजन माना जाता है-मेरी भक्ति कर सकता है। इस तरह श्रीमद्भागवत गीता को केवल युद्ध का प्रेरक मानना गलत है बल्कि उसके अध्ययन से तो अपने कर्म के प्रति रुचि पैदा होती है। इसी गीता में अकुशल और कुशल श्रम के अंतर को मानना भी अज्ञान कहा गया है। आजकल हम देखते हैं कि नौकरी के पीछे भाग रहे युवक अकुशल श्रम को हेय मानते हैं।
सामवेद में कहा गया है कि
————
अभि विश्वानि काव्या
‘‘सारे सुकर्म कर।’
दिवे दिवे वाजं सस्निः।
‘‘प्रतिदिन तुम युद्ध करते हो।’’
मो षु ब्रह्मेव तन्द्रर्भवो।
‘‘आत्मज्ञानी बनकर कभी आलसी मत बनना।’’
             मनुष्य अपनी देह पालन के लिये कर्म करता है जो युद्ध का ही रूप है। हम आजकल सामान्य बातचीत में यह बात मानते भी हैं कि अब मनुष्य का जीवन पहले की बनस्पित अधिक संघर्षमय हो गया है। जबकि हमारे वेदों के अनुसार तो हमेशा ही मनुष्य का जीवन युद्धमय रहा है। जब हम भारतीय अध्यात्म में वर्णित युद्ध विषयक संदर्भों का उदाहरण लेते हैं तो यह भी देखना चाहिए कि उन युद्धों को तत्कालीन कर्मप्रेरणा के कारण किया गया था। इतना ही नहीं इन युद्धों को जीतने वाले महान नायकों ने अपने युद्ध कर्म का नैतिक आधार भी प्रस्तुत किया था। वह इनको जीतने पर राजकीय सुविधायें भोगने में व्यस्त नहीं हुए वरन् उसके बाद समाज हित के लिये काम करते रहे।
      संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है।

साढ़े चार साल में चला दो लाख पाठक/पाठ पठन संखया तक यह ब्लाग-हिन्दी संपादकीय


            कल दीपक बापू कहिन ब्लाग ने दो लाख की पाठ पठन/पाठक संख्या पार कर ली। इसमें उसे चार साल का समय लगा जबकि इससे बाद के बने ब्लाग ‘हिन्दी पत्रिका’ तथा ‘ईपत्रिका’ ने ढाई लाख की सीमा तक पदार्पण कर लिया है। अभी भी यह कहना कठिन है कि हिन्दी ब्लाग जगत अपनी कोई उपस्थिति समाज की प्रक्रिया में दर्ज करा पा रहा है।
दीपक बापू कहिन के दो लाख पाठ पठन/पाठक संख्या पार करने पर प्रसन्नता व्यक्त करने से अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि यह जिंदगी के अनुभव सिखाने और समझाने वह ब्लाग है जिस पर लिखा जाता है पढ़ने के लिये, पर यह पढ़कर कई चीजें दिखाने वाला साबित हुआ है। यह इस लेखक का सबसे पहला ब्लाग है। ब्लाग बन गया यह भी पता नहीं लगा। यह ब्लाग है इसका पता दूसरा ब्लाग बनाने पर लगा।
       बहरहाल अपने साढ़े चार वर्ष की ब्लाग यात्रा से इस लेखक को बहुत कुछ ऐसी बातें प्रत्यक्ष रूप से अब समझ में आयीं जिनका पहले अनुमान भर  था। यह महत्वपूर्ण बात नहीं है कि हमारे ब्लागों को कितने लोगों ने पढ़ा बल्कि इन ब्लागों ने भारतीय समाज की सच्चाईयों कों गहराई से समझने का अवसर मिला यह तथ्य अत्यंत रोचक है। इसका आभास ब्लागों पर लिखे बिना नहीं हो सकता था क्योंकि बाज़ार, प्रचार तथा समाज के शिखर पुरुषों के लक्ष्य और उनकी पूर्ति में लगे प्रबंधकों ने अभिव्यक्ति के संगठिन साधनों पर इस कदर नियंत्रण कर रखा है उनकी योजनाबद्ध विचारधारा के प्रवाह को कोई समझ ही नहीं सकता। न लेखक न पाठक, न रचनाकार न दर्शक! लेखक रचनाकार प्रायोजित होकर वही लिख और रच रहे हैं जैसे उनके प्रायोजक चाहते हैं तो पाठक और दर्शक उसे स्वतंत्र वह मौलिक कृति समझ लेते हैं। एक सच यह कि प्रायोजित लेखन और रचना में अभिव्यक्ति अपना प्रभाव नहीं दिखाती क्योंकि वह चिंत्तन रहित होती है। दूसरा सच यह कि लेखन और रचनाकारी का प्रभाव अंततः समाज पर पड़ता है चाहे कोई इसे माने या नहीं। अगर हम आज अपने समाज को उथला, अंगभीर, चेतना विहीन, कायर तथा सामयिक विषयों से उदासीन पाते हैं तो इसका कारण यही है कि हमारे अखबार, टीवी, फिल्में और अन्य कलायें समाज के ऐसे ही स्वरूप का निर्माण कर रही हैं जिसमें आम इंसान के समक्ष प्रश्न छोड़ जाते हैं पर उत्तर नहीं होता। संवेदनााओं को उभारकर निराशा के अंधेरे में धकेला जाता है। साफ बात है कि प्रायोजक नहीं चाहते कि समाज स्वतंत्र रूप से मौलिक चिंतन वाला हो क्योंकि इससे वह अपने प्रश्नों का उत्तर ढूंढेगा। निराशा से आगे आकर आशाओं के लिये युद्ध करेगा जो कि उनके व्यापार के लिये खतरनाक है। जड़ समाज शिखर पुरुषों की सत्ता को स्थिर बनाये रखने में सहायक है कालांतर में वह राष्ट्र के लिये चिंत्तन के नाम पर केवल स्वार्थ पूर्ति का भाव संड़ांध फैलाने जा रहा है।
          ऐसे में ब्लाग लेखन एक आशा है पर फिलहाल उस पर विराम लगा मानना चाहिए। वजह यह कि बाज़ार और प्रचार के संयुक्त उपक्रमों ने टेलीफोन कंपनियों के प्रयोक्ता बनाये रखने के लिये एक समय ब्लाग का प्रचार किया। असीमित अभिव्यक्ति और पाठकों के बीच यह सेतु तेजी से बन सकता था पर बाद में ट्विटर और अब फेसबुक के प्रचार ने इसे हाशिए पर डाल दिया है। पहले अभिनेताओं, नेताओं, कलाकारों तथा अन्य प्रसिद्ध हस्तियों के ब्लागों की चर्चा होती थी। अब यही ट्विटर और फेसबुक के लिये हो रहा है। पहले सुपर स्टार के ब्लाग की चर्चा हुई अब उनके ट्विटर और फेसबुक की बात होने लगी है। मतलब एक सुपर स्टार है जिसे बाज़ार अभिव्यक्ति की हर विधा के प्रचार लिये उपयोग करता है ताकि आम प्रयोक्ता आकर्षण के शिकार बने रहें। लोग भी उधर जाते हैं। अब लोगों से चर्चा में पता लगता है कि फेसबुक उनके लिये महत्वपूर्ण विषय हैं। ऐसे में ब्लाग लेखन निरुत्साहित हुआ है यानि अभी पहने तो यहां नये हिन्दी लेखकों यहां अपेक्षा नहंी करना चाहिए और अगर आयें तो उनको पाठक आसानी से मिलें यह संभव नहीं हैं। ऐसे में पाठक हमारा ब्लाग देखें तो वह कहीं उसे फेसबुक समझकर भूल जायेंगे यह सत्य भी स्वीकार करना चाहिए।
बीच में पाठक संख्या बढ़ती नज़र आती थी पर अब थम गयी है। सही मायने में अपनी औकात बतायें तो वह यह है कि हम अभी भी एक इंटरनेट प्रयोक्ता हैं और लेखक के रूप में हमारी भूमिका एक लेख के रूप में भारत में कहीं चर्चित होने की संभावना नहीं है। हर महीने सवा छह सौ रुपये अगर इंटरनेट पर न भरें तो अपने ही ब्लागों को देखने से वंचित रह जायें। फिर यह कोई कहने वाला भी नहीं है कि आकर दुबारा लिखो। फिर भी विचलित नहीं है क्योंकि बाज़ार, प्रचार और समाज के शिखर पुरुषों के संगठित गिरोह के रूप में कार्य करने का पहले तो अनुमान ही था पर अब लिखते लिखते दिखने भी लगा है। इससे आत्मविश्वास बढ़ा ही है कि चलो किसी का दबाव हम पर नहीं है।
         प्रायोजक लेखकों की औकात देख ली। किसी ने पाठ चुराये तो किसी ने विचार। हमारे एक मित्र ने एक बड़े लेखक का लेख देखकर हमसे कहा कि ‘यार, ऐसा लगता है कि जो बातें तुम हमसे कहते हो वही उसने अब लिखी हैं। कहीं ऐसा तो नहीं तुम्हारा ब्लाग पढ़ा हो। वरना इतने साल से वह लिख रहे हैं पर ऐसी बात नहीं लिख पाये।’’
हमने कहा-‘‘पता नहीं, पर इतना जरूर जानते हैं कि आम पाठक भले ही ब्लाग न पढ़ता हो पर ऐसा लगता है कि बौद्धिक लोग पढ़ते होंगे और संभव है उन्होंने भी पढ़ा हो। अलबत्ता हमें आत्ममुग्धता की स्थिति में मत ढकेलो।’’
          हमारे दो पाठों के अनेक अंश लेकर एक लेख बना दिया गया। अध्यात्मिक ब्लाग को तो ऐसा मान लिया गया है जैसे कि कोई मुफ्त में लिख रहा हो। हमें हंसी आती है। पहले दुःख हुआ था पर श्रीमद्भागत गीता, पतंजलि योग शास्त्र, चाणक्य नीति, विदुर नीति, कबीर, रहीम, तुलसीदास,कौटिल्य का अर्थशास्त्र तथा गुरुग्रंथ साहिब पर लिखते लिखते ज्ञान चक्षु खुलते जा रहे हैं। ऐसे में दृष्टा बनकर देह को कर्ता के रूप में देखते हैं। वह दैहिक कर्ता कुछ नहीं कह सकता पर उसकी बात हम उससे लिखवा रहे हैं कि ‘ऐ मित्रों, पाठ चुराते रहो, विचार चुराते रहो इससे कुछ नहीं होने वाला! तुम इसके अलावा कुछ कर भी नहीं सकते। हमने कर्ता को देखा है वह जिन हालातों में लिखता है, सोचता है और चिंत्तन करता है वैसे में रहने की तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। सबसे बड़ी बात उस जैसा परिश्रम तुम नहीं कर सकते न तुम में वह योग्यता है। यह योग्यता केवल अध्यात्मिक चेतनाशील व्यक्ति के पास ही आ सकती है। पाखंड, शब्द चोरी, अहंकार और भ्रष्टाचार में लगे तुम जैसे लोगों के पास न भक्ति है न शक्ति! बस आसक्ति है जो कभी तुम्हें ऐसा लिखने नहीं देगी।’’
किसी से शिकायत करना बेकार है। अंग्रेजी शिक्षा के धारण कर चुका और हिन्दी फिल्मों की नाटकीयता को सत्य मानकर चलने वाला समाज चेतना दिखाये ऐसी अपेक्षा करना भी बेकार है। श्रीमद्भागत गीता में कहा गया है कि ‘गुण ही गुणों में बरत रहे हैं‘ और इंद्रियों ही इंद्रिय गुणों में सक्रिय हैं, यह विज्ञान का सूत्र भी है। यह आज तक किसी ने नहीं लिखा कि श्रीमद्भागवत गीता दुनियां के अकेला ऐसा ग्रंथ है जिसमें ज्ञान और विज्ञान दोनों ही हैं। ऐसे में जब समाज जिन पदार्थों को ग्रहण कर रहा है, जिन दृश्यों को देख रहा है और जिस गंध को निरंतर सूंध रहा है उसमें विरलों के ही ज्ञानी और चेतनशील होने की संभावना है। अधिक अपेक्षा रखना हम जैसे योग और ज्ञान साधक के लिये उचित भी नहीं है।
          फिर भी हम लिखते रहेंगे क्योंकि आखिरी सच यह कि हजारों में से कोई एक पढ़ेगा। उन हजारों में से भी कोई एक समझेगा। उन हजारों में से भी कोई एक मानेगा। यह हमारे लिये बहुत है। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भावगत का संदेश देते समय यह मान लिया था कि सभी उनकी बात नहीं समझेंगे। फिर भी उन्होंने दिया। वह हमारे आदर्श पुरुष हैं। यह उनकी कृपा है कि नित लिखते लिखते या कहें ज्ञान बघारते बघारते हम उस राह पर चल पड़े जिसकी कल्पना भी नहीं की। इसलिये हम तो विरले ही हुए। लोग खूब ज्ञान पर लिखते हैं उसे बघारते हुए धन ंसंपदा भी बना लेते हैं पर वह ज्ञान उनकी जिंदगी में काम नहीं आता। हमारे काम खूब आ रहा है। कई बार वाणी से शब्द निकलते हैं, अपने हाथ से ऐसे काम हो जाते हैं, ऐसे स्वर सुनने में आते हैं और ऐसे दृश्य सामने प्रस्तुत होते हैं जिनके आत्मिक संपर्क से हमारा मन प्रसन्न हो जाता है। हम कह सकते हैं कि यह पहले भी होता होगा पर सुखद अनुभूतियां अब होने लगी हैं। जिन लोगों को लगता हो कि यह फालतु आदमी है लिखता रहता है उनको बता दें कि हमारे पास अपने मन को लगाने के लिये लिखने के अलावा कोई मार्ग कभी रहा ही नहीं है। जय श्रीकृष्ण, जय श्री राम, हरिओम
इस अवसर पर अपने पाठकों और साथी ब्लाग लेखकों का आभार इस विश्वास के साथ कि आगे भी अपना सहयेाग बनाये रखेंगे। यह उनके पठन और सत्संग का ही परिणाम है कि हमारे अंदर गजब का आत्मविश्वास आया है। इसके लिये आभारी हैं।जय श्रीकृष्ण, जय श्री राम, हरिओम
लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
writer and editor-Deepak Bharatdeep,Gwalior, madhyapradesh
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                  यह आलेख/हिंदी शायरी मूल रूप से इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान-पत्रिका’पर लिखी गयी है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं है।
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