भगवान के भक्त को कभी असहज नहीं होना चाहिए-हिंदी चिंत्तन लेख


                        रामनवमी के अवसर पर  दतिया के निकट रतनगढ़ माता के मंदिर में भगदड़ में मच जाने से से सौ लोगों के मरने की खबर ने देश को हिला दिया| भक्तों को जिस तरह बदहवास कर मौत के मुंह में धकेला गया उससे समाज के हर भक्त प्रेमी का दुखी होना स्वाभाविक है| प्रशासन के अनुसार कुछ लोगों ने एक पक्के पुल के गिरने की अफवाह फैलाकर मंदिर में स्थित श्रद्धालुओं की भीड़  को उत्तेजित कर दिया। लोग मंदिर से भागकर जल्दी से जल्दी पुल करना चाहते थे पर वह इतना चौड़ा नहीं था कि इतनी भीड़ उसमें समा सके।  ऐसे में यह हादसा हो गया।  सबसे ज्यादा हैरानी की बात है कि लोग भगवान के दर्शन करने तो जाते हैं पर उस पर यकीन कितना करते हैं, ऐसे हादसे देखकर यह प्रश्न मन में उठता है। इस हादसे के बाद भी मंदिर में भक्त दर्शन कर रहे थे तो दूसरी तरफ उससे डेढ़ किलोमीटर दूर पुल पर कोहराम मचा हुआ था। इससे एक बात तो साफ होती है कि वहां उस समय मौजूद लोगों में अफवाह के बाद  घर वापसी की आशंका पैदा हुई होगी या फिर दर्शन कर लौट रहे लोग जल्दी में होंगे इसलिये भागे। यह भी बताया जा रहा है कि मंदिर में दर्शन करने के लिये उतावले युवकों ने ही यह अफवाह फैलायी।  कितनी आश्चर्यजनक बात है कि भगवान के दर्शन करने के लिये कुछ लोग झूठ बोलने की हद तक चले जाते हैं।

                        भक्तों में भी कई प्रकार के भक्त होते हैं।  हमने एक ऐसे भक्त को देखा है कि वह प्रतिदिन नियमपूर्वक एक मंदिर में प्रातः आठ बजे जाते हैं पर विशेष अवसरों पर  वह वहां प्रातः प्रांच बजे होकर ही आ जाते हैं या फिर रात्रि को जाते है जब वहंा भीड़ कम हो।  एक बार हमारी उनसे सामान्य दिनों में ही  हमारी उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने पूछा-‘‘आप यहां प्रतिदिन आते होंगे।’’

                        हमने कहा्-‘‘नही, जब मन कहता है चले आते हैं।’’

                        वह बोले-‘‘आप यहां आकर ध्यान लगाते हैं, यह देखकर अच्छा लगता है।

                        हमने हंसकर पूछा‘‘आप यहां रोज आते होंगे?’’

                        वह बोले-‘‘हां, पर जिस दिन किसी खास अवसर पर भीड़ अधिक हो तो दूसरे मंदिर चला जाता हूं।’’

                        हमने पूछा-‘‘ऐसा क्यों?’’

                        वह बोले-‘‘अरे, जिस भगवान के हमें प्रतिदिन सहजता से दर्शन होते हैं उनके लिये धक्के खाने की आवश्यकता महसूस नहीं करता। आम मजेदार बात सुनिये। हमारे परिवार के लोग खास अवसर पर यहां लाने का आग्रह करते हैं तो मैं मना कर देता हूं, तब वह ताने देते हुए यहां आकर दर्शन करते हैं।  अनेक बार उनके दबाव में आना पड़ता है तो मैं बाहर ही खड़ा हो जाता हूं।’’

                        खास अवसर पर मंदिरों में लगने वाले मेलों के दौरान कुछ लोग खास दिन के  उत्साह में शामिल होते हैं तो अनेक बार कुछ लोगों को पारिवारिक बाध्यता के कारण वहां जाना पड़ता है।  खासतौर से पहाड़ी अथवा एकांत में जलस्तोत्रों के निकट बने मंदिरों को सिद्ध बताकर उनका प्रचार इस तरह किया जाता है कि लोग पर्यटन के मोह में भी वहां आयें।  हमने तो यह भी देखा है कि देश के कुछ मंदिर तो फिल्मों की वजह से लोकप्रियता पाकर भक्तों को धन्य कर रहे हैं।  यह मंदिर भी ऐसे हैं जिनका भारतीय धार्मिक पंरपरा के अनुसार कोई इतिहास नहीं है।  यह मंदिर ही क्या जहां यह स्थित है उस क्षेत्र का भी कोई विशेष महत्व धार्मिक दृष्टि से नहीं रहा।  बहरहाल प्रचार और बाज़ार समूहों ने उनको लोकप्रिय बना दिया है। होता यह है कि कुछ धर्मभीरु इन गैरपरंपरागत स्थानों में जाना नहीं चाहते पर उनके परिवार के सदस्य उन पर दबाव डालते हैं कि वहां चलो क्योंकि भीड़ वहां जाती है।

                        मूलतः धर्म एक हृदय में धारण किया जाने वाला विषय है और वह स्वयं कहीं नहीं चलता बल्कि साधक उसके अनुसार जीवन की राह पर चलकर प्रमाण देता है कि वह धर्मभीरु है। हमारे देश में एक वर्ग रहा है जो धर्म को सक्रिय विषय केवल इसलिये  रखना चाहता है कि उसे लाभ होता रहे।  उसके लाभ के नये क्षेत्र बने इसी कारण अनेक नये भगवान बाज़ार के सौदागरों ने प्रचार प्रबंधकों की मदद से खड़े किये हैं।  आदमी का मन खाली दीवार में नहीं लगता वहीं अगर कोई तस्वीर लगा दी जाये तो वह उसकी तरफ आकर्षित होता है।  हमारे बाज़ार के सौदागर और प्रबंधक संयुक्त प्रयासों से ऐसी तस्वीरें बनाते रहते हैं कि आदमी को धर्म के नाम भटकाया जा सके।  खासतौर से चमत्कारों के प्रति लोग बहुत जल्दी आकर्षित होते हैं इसलिये कथित सिद्ध स्थानों पर जाने पर जीवन में  चमत्कारी परिवर्तन आने के दावे किये जाते हैं।

            वर्तमान समय में जब भौतिकतावाद ने सभी के मन और बुद्धि पर नियंत्रण कर लिया है तब लोगों में मानसिक तनाव होना स्वाभाविक है। इसमें फिलहाल कमी आती नहीं दिखती।  जिस उपचार से जीवन सुखमय हो सकता है वह ज्ञान अब कम ही लोगों में है। जिनमें है भी तो वह बघारते हैं उस राह पर चलकर नहीं दिखाते।  ऐसे में वह समाज के प्रेरक नहीं बनते इसी कारण वह भटकाव के दौर में है।  यही कारण कि लोग घर से बदहवास होकर बाहर आते हैं और जहां  भी जाते हैं वहां उनकी मानसिक स्थिति पीछा नहीं छोड़ती। यही कारण है कि अनेक अवसरों पर मेलों में भारी भीड़ होने पर ऐसे हादसे पेश आते हैं। इस दुर्घटना में मृत लोगों का हमें बहुत दुःख है और घायलों से भी सहानुभूति है। भगवान दुर्घटना में मृत लोगों के परिवार के सदस्यों को यह हादसा झेलने की शक्ति प्रदान करे तथा घायल जल्दी स्वास्थ लाभ करनें ऐसी कामना है।

 कवि एवं लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

ग्वालियर, मध्य प्रदेश

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

poet, writer and editor-Deepak “BharatDeep”,Gwalior

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