मनुस्मृति के आधार पर संदेश-पानी को गंदा करना अनुचित


            भारतीय उपमहाद्वीप में को पूरे विश्व में समशीतोष्ण क्षेत्र माना जाता हैं। यहां गर्मी, सर्दी और बरसात हमेशा ही प्रचुर मात्रा में अपना प्रभाव दिखाती है।  प्रकृति की अनुकंपा के रूप  में अनेक ऐसी नदियां यहां विद्यमान रही हैं जिन्होंने यहां जल का प्रवाह सदियों से जीवन को प्रफुल्लित बनाये रखा है। इसके बावजूद गर्मी के दिनों में यहां पानी का अभाव हो जाता है।  आधुनिक प्रबंधकीय व्यवस्था के चलते अनेक नदियों पर बड़े बांध भी बनाये गये।  कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़े बांधों की बजाय छोटे बांध बनाने चाहिये। हमारे देश में प्रचुर मात्रा में बरसात होती है। देवराज इंद्र की कृपा इस देश पर कभी कम हो ऐसा देखा नहीं गया। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि वर्षा के जल का संचय करने के लिये छोटे छोटे बांध बनाकर देश में किसी वर्ष अवर्षा की स्थिति पैदा होने पर उससे निपटा जा सकता है। इतना ही नहीं अब तो हार्वेस्ट के माध्यम से घरों में भी जल सुरक्षा की प्रणाली भी प्रचलन में आ गयी है।

बढ़ती जनसंख्या की दृष्टिगत जिस प्रकार के जलप्रबंधन की आवश्यकता थी वह किया गया नहीं गया जिससे देश में ग्रीष्मकाल के दौरान पानी के लिये अनेक स्थानों पर त्राहि त्राहि मची रहती है। यह संकट तब तक चलता है जब तक वर्षा नहीं हो जाती। वर्षा होने के बाद फिर बाढ़ का प्रकोप भी सामने आता है। इस बाढ़ में नदियां ही नाले भी उफनते हुए अपना जल घरों में ले आते हैं। सच बात तो यह कहें कि परमात्म की कृपा भारत देश पर अधिक हुई इसलिये यहां जल की प्रचुर मात्रा में है पर यहां के जनमानस में जल के प्रति जरा भी सम्मान का भाव नहीं है। कहा जाता है कि जिस चीज की उपलब्धता अधिक होती है उसकी मांग घट जाती है पर जल कोई वस्तु नहीं जीवन है। यही बात लोगों की समझ में नहीं आती।

मनुस्मृति में कहा गया है कि
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नाप्सु मूत्रं पुरीषं वाष्ठीवनं वा समुत्सृजेत्।
अमेध्यमलिप्तमन्द्वा लोहतं वा विषाणि वा।
       हिन्दी में भावार्थ-जल में मल मूत्र, कूड़ा, रक्त तथा विष आदि नहीं विसर्जित करना चाहिये। इससे पानी प्रदूषित हो जाता है।
लोग नदियों और नालों में ही बिना विचारे गंदगी का विसर्जन करते हैं। सबसे हैरानी बात तो यह कि कारखानों के कचड़े का रुख भी उन नदियों और नालों की तरफ कर दिया गया है जिनमें जीवन के लिये जल प्रवाहित होता है। लोग तथा पशु पक्षी उनमें नहाते हैं।  अभी हाल ही में इलाहाबाद कुंभ के दौरान अनेक टीवी चैनलों पर नदियों के प्रदूषित होने के विषय पर  बहस आ रही थी।  उसमें भाग लेने वाले साधु संतों ने देश की पवित्र नदियों प्रदूषित होने पर जो टिप्पणियां कीं वह समाज की आंखें खोलने के लिये काफी थी।  जो साधु संत इन नदियों के जल पवित्र होने पर उनमें  नहाना धर्म मानते हैं वही  बता रहे थे कि ऐसा करना शरीर के लिये कष्टकारक है।  अनेक साधु संतों ने यह जानकारी भी दी कि  इन नदियों में उनके उद्गम  स्त्रोत से निकला पानी पानी आना तो दूर बरसात का पानी भी बहकर नहीं आता। बड़े बांधों में उनका पानी रोका जाता है और बड़े शहरों का गंदा पानी बहकर नदियों का नाम जीवित किये हुए है।

      जल का ऐसा अपमान हो रहा है। उसका परिणाम यह है कि देश में गर्मी के ऋतु में जलसंकट लोगों की हालत खराब कर देता है।  इसलिये जहां तक हो सके जल के प्रति पवित्र संकल्प रखना चाहिये। जहां तक हो सके जल को प्रदूषित करने से बचाना चाहिये। यह जल ही  हमारे जीवन का आधार है।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

writer and poet-Deepak raj kukreja “Bharatdeep”,Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर  

athor and editor-Deepak  “Bharatdeep”,Gwalior

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पैसे से भी गर्मी और सर्दी पैदा होती है -हिंदी व्यंग्य चिंत्तन


               आजकल भारत में बेमौसम क्रिकेट मैच के आयोजन हो रहे हैं।  पहले जब भारत में कोई विदेशी क्रिकेट टीम आती थी तो उसके लिये सर्दी का मौसम तय हुआ करता था। उस काल में  नवंबर से फरवरी तक ही टेस्ट मैचों का आयोजन होता था। भारतीय टीम भी तभी विदेशों में जाती थी जब वहां का मौसम इस खेल के अनुकूल होता था।  जब से इस खेल ने फिल्म और टीवी की तरह मनोरंजक के साथ ही व्यवसायिक रूप लिया है तब से इसका कोई मौसम नहीं रहा।

कभी देश भक्ति का वास्ता देकर क्रिकेट प्रेमियों को आकर्षित किया गया था। अब शहरों की प्रतिष्ठा का विषय बनाया गया है। तय बात है कि बड़े शहरों के नाम पर बने इन क्लबों के बीच होने वाले व्यवसायिक मैचों को वैसह हार्दिक अभिनंदनीय मान्यता नहीं है जैसे दो देशों के बीच होने वाले मैचों को मिलती थी।  एक सज्जन उस दिन कह रहे थे कि यह क्लबस्तरीय प्रतियोगिता होना देश का गौरव है।  होगी भई, कौन इसका विरोध कर सकता है?  फिर छोटे शहरों में रहने वाले बुद्धिजीवी इस पर अपनी प्रतिकूल टिप्पणियां दे भी तो उसे सुनने वाला कौन है?  क्लब स्तरीय इस प्रतियोगिता से खेल का क्या लेना देना है, यह आज तक समझ में नहंी आया।  कुछ लोगों इसे खेल के विकास के लिये अत्यंत उपयुक्त बताया है। इस पर हंसी आती है।  खेलों का विकास कैसे होता है यह आज तक समझ में नहीं आया।  अगर अधिक से अधिक लोगों उसे खेलने लगें और उसे ही विकास कहा जाये तो भी बात जमती नहीं क्योंकि क्रिकेट खेलने वाले हमारे देश में बहुत सारे लोग हैं।   वह सारे लोग क्रिकेट खेलते हैं जिन्हे मैदान और साथ मिल जाते हैं। अगर खिलाड़ियों को अधिक पैसा मिलना ही विकास है तो फिर प्रश्न आता है कि कितने खिलाड़ियों को यह पैसा मिल रहा है?  पैसा कमाने वालों की संख्या हजार या डेढ़ हजार से ऊपर दिख नहीं सकती। जिस देश में करोड़ों बेरोजगार हों वहां यह संख्या विकास का स्वरूप नहीं दिखाती।

यह प्रतियोगिता शुद्ध रूप से मनोरंजन के लिये है।  अगर अपने पास समय है।  टीवी पर कोई ढंग का कार्यक्रम नहीं आ रहा हो तब अगर क्रिकेट का अभिनय करते क्रिकेट खिलाड़ियों को देखना बुरा नहीं है।  बीच बीच में विज्ञापनों का भी मनोंरजन आ ही जाता है।  कुछ बिफरे हुए आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि इस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता के साथ मनोरंजन के क्षेत्र जैसा व्यवहार होना चाहिये।  यह उनका अपना नजरिया है पर एक बात तय है कि गर्मी के मौसम में इस खेल का आयोजन करना कोई सरल काम नहीं है। कहते हैं कि पैसा आदमी में गर्मी पैदा करता है पर जब इस क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का आयोजन इस तर्क का जनक भी है कि यही पैसा ठंड का काम भी करता है।

टीवी की बात हो रही है तो आजकल दो कॉमेडी धारावाहिक आते हैं।  दोनों का समय टकराता है। तब चैनल बदल बदल कर उनको देखना पड़ता है।  हमेशा ही अपने साथ बोरियत का सामान लेकर चलने वाले लोगों के लिये  कॉमेडी  अच्छा विषय है।  यह अलग बात है कि कॉमेडी प्रस्तुत करने वाले को भी कुछ विनोदप्रिय होना चाहिये। दोनों कॉमेडी धारावाहिक देखकर लगता नहीं है कि उनके साथ कोई लेखकीय न्याय हो रहा है।  हमारे देश के धनपति साहित्य, कला, खेल, फिल्म और अन्य मनोरंजक व्यवसायों से पैसा तो कमाना चाहते हैं पर उसके लिये प्रतिभाओं की खोज उनके बूते का नहीं है। सच बात तो यह है कि पाश्चात्य व्यवसायी भी पैसा कमाते हैं पर उनकी अपने काम से प्रतिबद्धता होती है। कुछ नया करना उनका मौलिक स्वभाव है।  उनकी यह प्रवृत्ति उनका प्रबंध कौशल बढ़ाती है।  इसके विपरीत भारतीय व्यवसायी पैसा कमाते हैं पर उनकी काम से अधिक कमाई से प्रतिबद्धता रहती है। कुछ नया करने की बजाय वह उपलब्ध व्यवस्था और साधनों का ही उपयोग करते हैं। यही कारण है कि फिल्म और टीवी प्रसारणों में अंग्रेजी फिल्मों और धारावाहिकों की नकल दिखती है।  खास बात यह कि भारत में लेखक को एक दोयम दर्जे का जीव माना जाता है। दूसरी बात यह कि हमारे देश में हिन्दी  मनोरंजक  कार्यक्रम मुबंई में बनते जहां की मूल भाषा भले ही मराठी है पर हिन्दी एक तरह से खिचड़ी भाषा बन गयी है।  यही कारण है कि मुंबईया फिल्म और धारावाहिकों की हिन्दी उत्तर भारत की मूल हिन्दी भाषा का प्रतिनिधित्व नहीं करती। इन दोनों कारणों से हिन्दी कार्यक्रम अमौलिक हो जाते हैं।  बड़े बड़े दिग्गज हिन्दी लेखक हिन्दी फिल्मों में काम करने गये पर बेरंग वापस लौटे आये। इसका कारण यह कि मुंबई के थैलीशाह हिन्दी लेखक के मनोविज्ञान को नहीं समझते।  स्थिति यह है कि इतने सारे हिन्दी धारावाहिक तथा फिल्मों के पुरस्कार वितरण समारोह होते हैं वहां उसे लिखने वाले को सम्मान मिलने वाली घटना सामने नहीं आती। सच बात तो कहें कि हमें लगता है कि इन फिल्मों और धारावाहिकों के कथा, पटकथा और संवाद लेखकों की हैसियत स्पॉट बॉय से अधिक नहीं होगी।  यही कारण है कि भाषा की दृष्टि से हिन्दी कार्यक्रम स्तरीय नहीं होते।  कल्पनाशक्ति का अभाव साफ दिखता है। यही कारण है कि कॉमेडी कार्यक्रमों में पुरुष अभिनेताओं को महिलाओं के वस्त्र पहनाकर हास्य का भाव पैदा किया जाता है।

पहले कहा जाता था कि हिन्दी गरीबों की भाषा है। यह अलग बात है कि ऐसा कहने वाले प्रसिद्धि भी हिन्दी में अधिक पाते रहे हैं।  अब हिन्दी वालों के पास पैसा भी खूब है।  यही कारण है कि अब क्लब स्तरीय प्रतियोगिता का प्रसारण हिन्दी में भी हो रहा है। यह भी एक तरह से अंग्रेजी व्यवसायियों की प्रबंध कुशलता का परिणाम है।  जबकि भारतीय मनोरंजन व्यवसायी हिन्दी का खाकर उसे दुत्कारते भी हैं। हिन्दी लेखकों के प्रति असम्मान का भाव रखन उसकी भाषा को दुत्कारने जैसा ही है।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

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रामनवमी के दिन चिंत्तन करना भी श्रेयस्कर-हिन्दी लेख


      आज रामनवमी का पर्व पूरे देश में बड़े उल्लास के साथ मनाया जा रहा है।  इस अवसर पर अनेक धर्मभीरु लोग मंदिरों में जाकर आरती, भजन तथा वहां मूर्तियों के अभिषेक आदि कार्यक्रमों में भाग लेकर आनंद उठाते हैं।  अनेक मंदिरों में लंगर आदि का कार्यक्रम भी होता है।  हम जैसे योग तथा ज्ञानसाधकों को ऐसे अवसर नये नये अनुभवों को अपने साथ जोड़ने का होता है। सच बात तो यह है कि योगविद्या के साथ ही श्रीमद्भागवत गीता के साथ जुड़ने पर इस संसार को देखने का हमारा ही दृष्टिकोण ही बदल गया है।  नित नयी अनुभूतियां होती हैं।  अनेक सुखद प्रसंग सामने इस तरह आते हैं कि कहना पड़ता है कि परमात्मा के खेल निराले हैं।

      पिछले दस बारह वर्षों से भारत में योग विद्या का प्रचार बढ़ा है। अनेक लोग मिलजुलकर योग साधना करते हैं।  इस दौरान आसन, प्राणायाम, ध्यान और मंत्रजाप करते करते वह एक दूसरे के सत्संगी बन जाते हैं।  भारतीय योग संस्थान और पतंजलि योग संस्थान के बैनरों के साथ होने वाले इन योग शिविरों ने सत्संगियों का एक नया समूह बनाया है।  हमने देखा है कि हमारे देश में पूजा पद्धतियों को लेकर अनेक पंथ बन चुके हैं। उनके पंथ प्रमुख अपने भक्तों के लिये पूज्यनीय माने जाते हैं।  उनके परमधाम गमन के पद उनका विश्राम आसन या कहें कुर्सी पर बैठने वाला दूसरा मनुष्य भी वहां प्रतिष्ठत होकर उनका  संचालन करता है।  इस तरह  पेशेवर ढंग से हमारे धार्मिक पंथ भी अपनी अध्यात्मिक विरासात संभाले रहते हैं।  आमतौर से अनेक धार्मिक विशेषज्ञ इन पंथों में बंटे समाज के विरोधी है पर योग शिविरों के आधार पर इन समूहों को वैसा नहीं माना जा सकता।

          पिछले कुछ वर्षों से रामनवमी, मकर सक्रांति, होली, जन्माष्टमी तथा अन्य धार्मिक पर्वों के अवसर पर हमारा संपर्क ऐसे ही योग शिविर से जुड़े लोगों से बढ़ता जा रहा है।  ऐसे अवसरों पर उनके साथ मिलकर बैठने में आनंद आता है।  यह आनंद रक्तशिराओं में जिस तरह के अमृत का संचालन करता है वह केवल योग से जुड़ी देह के लिये ही संभव है।

    आज रामनवमी के अवसर पर ऐसे ही एक योग सत्संगी के साथ हम अपने ही शहर के उन मंदिरों में गये जहां पहले भी जाते रहे हैं। इन मंदिरों का समय के साथ साथ आकर्षण बढ़ता ही गया है।  वह सत्संगी इन मंदिरों में हमारे साथ पहली बार चले।  वह बहुत प्रसन्न हुए।  कहने लगे ‘आपके साथ इतना घूमने में आज आनंद आ गया।’

 हमने हंसकर कहा कि‘‘जब भी ऐसे धार्मिक पर्व आते हैं हम अपने ही शहर के मंदिरों में जाकर आंनद उठाते हैं। सच बात तो यह है कि लोगों को बाहर दूसरे शहर में जाकर आंनद उठाने की बात मन में इसलिये आती है क्योंकि वह अपने शहर में घूमते नहीं।  उनका आदत ही नहीं। अगर अपने शहर में ही आनंद उठाने का अभ्यास हो तो फिर मन तृप्त हो जाता है तब कहीं बाहर जाकर भटकने का विचार नहीं आता है।’’

    वह हमारी बात से  सहमत हुए। सांई बाबा, वैष्णो देवी, राम मंदिर, और गोवर्धन के मंदिर हमारे शहर में भी हैं।  इन स्थानों में जाकर ध्यान लगाने के बाद मन तृप्त हो जाता है।  ऐसे में कोई व्यक्ति दूसरे शहर में प्रसिद्ध मंदिरों जाकर वहां दर्शन के लिये प्रेरित करता है तब उसे ना करना पड़ता है।  नाराज लोग कहते हैं कि‘‘यार, कहीं बाहर जाकर घूमा करो। क्या हमेशा यहीं पड़े रहते हो?’’

    उनके ताने पर मुस्कराकर चुप रहना ही पड़ता है। श्रीमद्भागवत गीता के  संदेशों की बात उनसे करना व्यर्थ है।  हमने देखा है कि ऐसे महान दर्शन के बाद घर लौटे लोग अपने साथ थकावट लाते हैं। यह थकावट उनके दर्शन के आनंद को सुखा देती है।  रेल की यात्रा करने के बाद भीड़ में जूझते हुए जिन मंदिरों के वह दर्शन करते हैं इसके लिये उनकी प्रशंसा ही करना चाहिये। मगर घर लौटकर सभी के सामने उसका प्रचार करने की बात कुछ जमती नहीं है।  फिर जब हमारा दर्शन कहता है कि परमात्मा सभी जगह मौजूद है तब ऐसे प्रयास करना अजीब लगता है।  एक बात तय रही कि ऐसे लोग अपने ही शहरों में घूमते नहीं है।  उनके लिये दूर के ढोल ही सुहावने हैं। हमारी यह अनुभूति है कि  पास के ढोल का आनंद उठाने के लिये योग वि़द्या के साथ जुड़ना ही एकमात्र विकल्प है।  सच बात तो यह है कि योग तो सभी करते हैं। अंतर इतना है कि योग विद्या से जुड़ा साधक सहज योग करता है और न करने वाला असहज योगी हो जाता है। देह में स्थित मन इधर उधर दौड़ाकर असहज करता है। जबकि योग साधक अपने मन को जोड़ने के लिये विकल्प स्वयं चुनता है।  कुछ धार्मिक प्रवचनकर्ता कहते हैं कि काम, क्रोध, मोह, लोभ तथा अहंकार छोड़ दो।  यह संभव नहीं है। योग विद्या से उन पर नियंत्रित किया जा सकता है।

               आज रामनवमी का पर्व हमारे लिये अध्यात्मिक सक्रियता का दिन रहता है।  मंदिरों में जाकर ध्यान लगाते हैं।  वहां अन्य भक्तों के श्रद्धामय प्रयास सुखद अनुभूति देते हैं।  इस आंनद को व्यक्त करने के लिये शब्द नहीं होते। किसी पर हंसते नहीं है वरन् उनकी सक्रियता देखकर उनके चेहरे पर आये सहज भाव को पढ़ते हैं।  सच बात तो यह है कि जब कोई आदमी पूजा, आरती या भजन कार्यक्रम में शामिल होता है तब उसके हृदय का भाव सात्विक हो जाता है।  यही चेहरे पर प्रकट होता है।

      इस रामनवमी पर सभी ब्लॉग लेखक मित्रों तथा पाठकों के इस आशा के साथ बधाई। साथ ही इस बात की शुभकामनायें कि उनके हृदय का अध्यात्मिक विकास हो।

 

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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विक्रम संवत 2070 प्रारंभःभिन्न रूपों के बावजूद सांस्कृतिक एकता का प्रतीक-हिन्दू नववर्ष पर एक लेख


आज पूरे भारत में भारतीय नववर्ष 2070 मनाया जा रहा है। इसे हम विक्रमी संवत भी कहते हैं।  मूलतः इसे हिन्दू नर्व वर्ष कहते हैं पर इसे प्रथक प्रथक समाज अपने ढंग से मनाते हैं।  सिन्धी समाज चेटीचांड तो पंजाबी इसे वैशाखी के रूप तो दक्षिण में इसे उगादि का नाम देकर मनाया जाता है। प्रथक नाम होने के बावजूद समाजों में कहीं वैचारिक भिन्नता का भाव नहीं होता।  यही हमारे संस्कार और संस्कृति हैं।

आश्चर्य इस बात का है कि इस अवसर पर भारतीय प्रचार माध्यम केवल औपचारिकता निभाते हुए समाचार भर देते हैं जबकि इसे मनाने वालों की संख्या अंग्रेजी नव वर्ष पर झूमने वालों से अधिक होती है।  इससे यह बात तो पता लगती है कि बाज़ार और प्रचार माध्यम उस नयी पीढ़ी को लक्ष्य कर  अपने कार्यक्रम तथा समाचार बनाते हैं जो उन  आधुनिक वस्तुओं की क्रेता बनती है जिसके विज्ञापन उनके संस्थान चलाते हैं।  हमने दोनो नववर्षों की तुलना करते हुए भारतीय नववर्ष के मनाने वालों की संख्या इसलिये ज्यादा बताई क्योंकि अंग्रेजी नववर्ष पर बधाई ढोने की औपचारिकता वह समाज अब बड़े अनमने ढंग से निभा रहा है जिससे अंग्रेजी भाषा और संस्कृति ने लाचार बना दिया है। हम यह तो नहीं कहते कि अंग्रेजी संस्कृति या भाषा कोई बुरी बात नहीं है पर इतना जरूर मानते हैं कि भाषा, भाव, और भक्त की अपनी अपनी भूमि  से संबंध होता है। भूमि का भूगोल भावों का निर्माण करता है जो कि भाषा और भक्त के स्वरूप का निर्धारित करने वाला तत्व है।  जिस तरह चाय की फसल के लिये असम  तो गेहूं के लिये उत्तर भारत का मैदानी इलाका उपयुक्त है। उसी तरह सेव के लिये हिमालय के बर्फीले इलाके प्रकृति ने बनाये हैं। चावल के लिये छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहा जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि  हम एक फसल को दूसरी जगह नहीं पैदा कर सकते। इन्हीं फसलों के अनुसार ही पर्व बनते हैं। भारतीय नववर्ष सभी जगह भिन्न रूपों में इसी कारण मनाया जाता है।  यह पर्व हर भारतीय धर्म  के मानने वाले के घर में सहजता से मनाया जाता है जबकि अंग्रेजी संवत् के लिये बाज़ार को प्रचार का तामझाम लेकर  जूझना पड़ता है।

हम यहां श्रीमद्भागवत गीता की बात करें तो शायद लोगों को अजीब लगे।  उसमें ‘‘गुण ही गुण को बरतता है’’ वाला सूत्र बताया गया है।  यह  अत्यंत वैज्ञानिक सूत्र है। फिर यह भी कहा जाता है कि जैसा खाये वैसा अन्न। दरअसल अन्न में आत्मा होती है और उसके स्वभाव के भिन्न  रूपों का भी भिन्न स्वभाव है इसलिये उनका सेवन करने वाला उससे प्रभावित होता है।  हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि आदमी रहन सहन, खान पान, और संगत से प्रभावित होता है।  बात को लंबा खींचने की बजाय संक्षेप में यह कहें कि भूमि के अनुसार ही संस्कृति बनती है।  अंग्रेजी भाषा और संस्कृति का भारत में प्रचार हो इसका विरोध हम नहीं कर रहे पर यह स्पष्ट कर दें कि भाषा, भूगोल, भाव तथा भक्त के स्वभाव में वह कभी स्थाई जगह नहीं सकती।  जबरन या अनायास प्रयास से अंग्रेजी संस्कृति, संस्कार और सभ्यता लाने का प्रयास यहां लोगों को अन्मयस्क बना रहा है। लोग न इधर के रहे हैं  न उधर के।  भाषा की दृष्टि में तुतलाहट, भाव की दृष्टि में फुसलाहट और भक्त की दृष्टि में झुंझलाहट स्पष्ट रूप से सामने आती जा रही है। भक्त से हमारा आशय सभ्य मनुष्य से है और विरोधाभास में फंसा हमारा समाज उसका एक समूह है।

अध्यात्म ज्ञान के अभाव में आत्ममंथन की प्रक्रिया हो नहीं  सकती जबकि   एक सभ्य, संस्कारवान और सशक्त व्यक्ति बनने क लिये आत्ममंथन की प्रक्रिया से गुजरना जरूरी है। फिलहाल तो प्रचार माध्यम देश के विकास को लेकर आत्ममुग्ध हैं पर उससे जो भाषा, भाव और भक्त का विनाश हुआ है उसका आंकलन करने का समय अभी किसी के पास नहीं है।  अर्थोपार्जन ने अध्यात्म के विषय को गौण कर दिया है।  ऐसे में इस नववर्ष पर आत्ममंथन की प्रक्रिंया से गुजरने का प्रण करें तो शायद हमें इस विकसित संसार का वह पतनशील दृश्य भी दिखाई दे जिससे हम बचना चाहते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि फिर भी कुछ लोग हैं जो पुरानी राह पर चल रहे हें और उनसे ही यह अपेक्षा की जाती है कि वह आधार भक्त  स्तंभ की तरह भाषा और भाव को बचाये रहेंगे।

इस नववर्ष पर सभी पाठकों को हार्दिक बधाई तथा शुभाकामनायें।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep”"
Gwalior, madhyapradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

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वीडियो प्रस्तुति के रूप में प्रयोग के लिए दो छोटी कविताएँ


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वीडियो प्रस्तुति के रूप में प्रयोग के लिए दो छोटी कविताएँ

रंगों के त्यौहार होली का आध्यात्मिक महत्व-हिंदी लेख


     होली का पर्व पूरे देश में मनाया जा रहा है। जब हम किसी त्यौहार की बात करते हें तो उसके दो पहलू हमारे सामने होते हैं-एक अध्यात्मिक दूसरा सामाजिक।  हम अपने पर्वों पर हमेशा ही सामाजिक दृष्टिकोण से विचार करते हैं। यह माना जाता है कि लोग इस अवसर पर एक दूसरे मिलते हैं जिससे उनके बीच संवाद कायम होता है जो कि  आपसी सामंजस्य मनाये रखने के लिये यह आवश्यक है।  अपने नियमित काम से बचता हुआ आदमी जब कोई पर्व मनाता है तो यह अच्छी बात है।  इस अवसर पर सामाजिक समरसता बनने का दावा भी किया जाता है।  वैसे हमारे देश में अनेक पर्व मनाये जाते हैं।  पूरा देश ही हमेशा पर्वमय रहता है।  अगर मई जून के गर्मी के महीने छोड़ दिये जायें तो हर महीने कोई न कोई त्यौहार होता है इसलिये किसी खास त्यौहार में सामजिक सरोकार ढूंढना व्यर्थ है।

इसके अलावा हमारे देश में  तो अब मगलवार को हनुमानजी और सोमवार के दिन भगवान शिव के मंदिर के अलावा गुरुवार को सांई बाबा के मंदिर में भी भीड़ रहती है।  आम भक्त को कभी कहीं जाने में परहेज नही होती।  इसके अलावा अब तो रविवार लोगों के लिये वैसे भी अध्यात्मिक दिवस बन गया है-हालांकि इसके पीछे अंग्रेजी संस्कृति को अपनाना ही है। यह अलग बात है कि अवकाश की वजह से लोग अब अपने ढंग से छुट्टियां मनाते हैं। कोई अपने गुरु के दरबार जाता है तो कोई कहीं किसी तीर्थस्थान की तरफ निकल जाता है।  जहां तक समाज में औपचारिक मिलन की बात है तो दिवाली, राखी, रामनवमी, कृष्णजन्माष्टमी तथा अन्य अनेक पर्व आते हैं।  लोग एक दूसरे से मिलते हैं। मिलन से भीड़ एकत्रित होती है और वहां चहलपहल के वातावरण में एकांत साधना या ध्यान का कोई स्थान नहीं होता जो कि अध्यात्मिक शांति के लिये आवश्यक है।

इन पर्वो का अध्यात्मिक महत्व भी है।  एकांत में बैठकर चिंत्तन और ध्यान कर हम अपने ज्ञान चक्षुओं को जाग्रत कर सकते हैं जो जागते हुए भी बंद रहते हैं।  होली रंगों का पर्व है पर इसका मतलब यह कतई नही है कि केवल भौतिक पदार्थ ही रंगीन होते हैं। दुनियां का हर रंग हमारे अंदर हैं।  जिस तरह हिन्दी साहित्य में नौ रस है वैसे शब्दों के रंग भी हैं।  अलंकार भी हैं।  उनका कोई भौतिक अस्तित्व नहीं  दिखता क्योंकि शब्दों ही जो भाव होता है उसमें रंग, रस और अलंकार की अनुभूति होती हैं।  सीधा आशय यह है कि खेल केवल बाहर ही नहीं अपने ंअंतर में भी हो सकता है।  यह क्या बात हुई हृदय में सूखा है और बाहर पानी बरसा रहे हैं।  दिमाग में कोई रंग नहंी है पर बाहर हम मिट्टी को रंगकर होली मना रहे हैं। रसहीन विचार होते हैं पर उल्लास का पाखंड करते हैं।

मूल बात यह है कि सुख पाना चाहते हैं पर वह उसका स्वरूप क्या है? यह समझना अभी बाकी है।  लोग अपना मन बहलाने के लिये ताजमहल, कुतुबमीनार या कश्मीर जाते हैं। वहां जाकर अपने घर लौट आते हैं। सुख मिला कि पता नहीं पर घर आकर सफर की थकान मिटाते हुए उनको पसीना आ जाता है।  उस दिन एक सज्जन कुंभ से लौटे तो दो दिन तक घर में पड़े रहे।  दूसरे सज्जन ने पूछा-‘‘क्या बात है, आपकी तबियत ठीक नहीं है?’’

उन्होंने जवाब दिया-‘‘नहीं यार, कुंभ गया था।  बड़ा परेशान हुआ। अब थकान की वजह से बुखार आ गया है। इसलिये आराम कर रहा हूं।’’

क्या उन्होंने वाकई कुंभ में नहाने का सुख लिया। सुख लेने के बाद शरीर में स्फूर्ति होना चाहिये। यदि थकान है तो फिर सुख कहां गया?

सुख लेने या खुश होने के तत्व शरीर में अगर न हों तो फिर कोई इच्छित वस्तु, विषय या व्यक्ति के निकट होने पर भी न दिमाग को राहत मिलती है न ही देह विकार रहित हो पाती है।  आज के मिलावटी तथा महंगाई के युग में तो भौतिकता से वैसे भी सभी को सुख मिलना संभव नहीं है। जिनके पास माया का भंडार है वह भी सुखी नहीं है जिसके पास नहीं है तो उसके सुखी होने की बात  सोचना की गलत है। हमें तो अपने अंदर आनंद प्राप्त करने के लिये योगासन, प्राणायाम तथा ध्यान के अलावा कोई मार्ग नहीं दिखता।  यह एकांत में ही संभव है। कहीं भीड़ में जाकर आनंद ढूंढना एक व्यर्थ प्रयास है।  वहां से केवल थकावट साथ आती है सुख या खुशी मिलना तो एक स्वप्न होकर रह जाता है।

होली का पर्व अपने अध्यात्मिक महत्व के कारण अत्यंत रंगीन है। मगर  सच बात तो यह भी है कि इस पर्व को अत्यंत संकीर्ण बना दिया गया है। अनेक शहरों में जिन लोगों  आज से बीस साल पहले तक की होली देखी होगी उनका मन कड़वाहर से भर जाता होगा।  उसमें होली के नाम हुड़दंग के अलावा दूसरों को अपमानित करने वालों ने इसे बदनाम किया।  कीचड़ फैंकना, नाली में किसी को गिराना, पगड़ी या गमछा कांटे से खींचना आदि ऐसे प्रसंग जो एक समय इसका हिस्सा थे। अनेक लोग  जबरदस्ती किसी दूसरे पर रंग डाल या मुंह काला कर  अपनी भड़ास निकालते या अपनी शक्ति दिखाते थे।  अब पुलिस तथा प्रशासन की मुस्तैदी के चलते रास्तों में ऐसी बदतमीजी करना खतरे से खाली नहीं है।  इसी कारण ऐसी घटनायें कम हो गयी हैं। फिर अब समय बदल गया है पर फिर भी पुराने लोग आशंकित रहते ही है।  जो लोग इस पर्व की प्रशंसा करते हैं वह जाकर शहरों की हालत देख लें। रंग खेलने  के समयकाल  में सड़कों में भीड़ एकदम इतनी कम हो जाती है जैसे कर्फ्य लगा हो।  अनेक लोग घर में दुबक जाते हैं।  वह तो गनीमत है कि अब मनोरंजन के लिये बहुत सारे साधन हो गये हैं पर जब कम थे तब भी अनेक भले लोग बोरियत झेलते पर घर के बाहर नहीं आते थे।

बहरहाल जिन लोगों को होली भौतिक रंगों से खेलनी है वह खेलें, मगर जिन लोगों को रंगों से परहेज है वह ध्यान और चिंत्तन कर अपना समय निकालें।  उनको होली जैसा एकांत मिलना मुश्किल है। अध्यात्मिक शांति के लिये एकांत में ध्यान के साथ चिंत्तन करना आवश्यक है।  इस होली पर इतना ही। सभी को होली की ढेर सारी शुभकामनायें।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर
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बालपन का गुलशन-हिंदी शायरी


बालपन की कच्ची माटी में
खिला था गुलशन
उम्र के दौर के साथ मुरझा गया
ख्वाहिशों ने बढ़ाये कदम दिल में
पत्थरों के शहर में सपना सजा नया,
कहें दीपक बापू
उस्ताद के ओहदे पर बैठे लोगों ने
सिखाई केवल मतलबपरस्ती,
दिखाई दौलत के दरिया में मस्ती,
अपनी उम्र से अब वह टूटे
हैंउनके ख्वाब आंखों से रूठे हैं,
अब तक रहे हैं
जवां शार्गिदों के माटी से बने पत्थर दिल में
कब बहेगी नदी बनकर दया।

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 

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कीमत पर वफा का सौदा-हिन्दी कविता


जिंदगी के हर मोड़ पर
लोग मिल ही जाते हैं,
कभी हमें होता अपने कदम  भटकने का अहसास
होती हैरानी यह देखकर
उन्हीं रास्तों  को नया मानकर
लोग चले आते हैं।
कहें दीपक बापू
बेबस ज़माना,
जाने बस पैसा कमाना,
कीमत लेकर करता है वफा का सौदा,
विश्वास निभाने का नहीं, चर्चा का होता मसौदा,
ज़मीन पर जिंदा रहना आता नहीं
लोग पहाड़ों पर सांसों में सुगंध ढूंढने जाते हैं।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

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विज्ञापन और सुंदरियां-हिंदी कविता


कुछ खबरें खुशी में झुलाती हैं,
कुछ खबरें जोर से रुलाती हैं।
कमबख्त!
किस पर देर तक गौर करें
अपनी खूंखार असलियतें भी
जल्दी से अपनी तरफ बुलाती हैं।
कहें दीपक बापू
खबरचियों का धंधा है
लोगों के जज़्बातों से खेलना,
कभी होठों में हंसी लाने की कोशिश होती
कभी शुरु होता आंखों में आंसु पेलना,
बिकने के लिये बाज़ार में बहुत सामान है,
ग्राहक खुश है खरीद कर शान में,
हमारे जज़्बातों से न कर पाये खिलवाड़ कोई
इसलिये फेर लेते हैं नज़रे
विज्ञापनों में दिखने वाली सुंदरियों से
खबर और बहस के बीच कंपनियों के
उत्पाद बिकवाने के लिये
अपने हाथ में झुलाती हैं।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poem-Deepak Raj Kukreja “”Bharatdeep”"
Gwalior, madhyapradesh
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बाज़ार और प्रचार का चिंत्तन-हिंदी लेख


                  जब कभी टीवी पर बैठें हमारा चिंतन चल पड़ता है।  कभी हंसी आती है तो कभी दुःख होता है। हमारे टीवी चैनलों ने समाज की बौद्धिक शक्ति का हरण किया है वह आश्चर्यजनक है। वह जैसा चाहते हैं वैसे ही लोग सोचते हैं।  अपना सोचना एक तरह से लोग भूल ही गये हैं।  इंग्लैंड की टीम अपने ही घर पर बीसीसीआई की टीम को धो पौंछकर घर गयी।  लगातार हार पर चैनलों का विलाप होता रहा।  टेस्ट मैचों में बुरी तरह हारी बीसीसीआई की टीम के लिये चैनल चीखते  रहे-अब यहां जीतो वहां जीतो।  बाद में आये  बीस ओवरीय मैच, जिनको उतना प्रचार नहीं मिला।  दरअसल टीवी चैनलों को यह मौका मिला दिल्ली में एक गैंगरैप की घटना के कारण!  इस दौरान समाचार वाले टीवी चैनलों ने तो इंग्लैंड के साथ होने वाले बीस ओवरीय मैचों की खबर अत्यंत हल्के ढंग से दी। यहां तक कि हर मैच में टॉस की खबर देने वाले समाचार चैनलों ने अपने दर्शकों को इस तरह उलझाया कि बहुत कम लोगों ने यह मैचा देखा होगा।  हर मैच में टॉस की खबर देने वाले चैनलों ने इसे शोक में छिपाया यह व्यवसायिक मजबूरियों के कारण कहना मुश्किल है। वैसे इस दौरान गैंगरैप पर हुई बहसों में टीवी चैनलों का विज्ञापन समय खूब पास हुआ। इतना ही नहीं बीसीसीआई की टीम के इंग्लैंड की पराजय से उस पर विज्ञापन समय खर्च करने से कतराने वाले टीवी समाचार चैनल पांच दिन  गैंगरैप के मसले को इस तरह प्रचारित करते रहे कि अवकाश के दिनों में उसका  पारा चढ़ ही गया और इधर भीड़ बढ़ी तो उनको विज्ञापन समय पास करने के लिये अच्छा समय मिला। भीड़ के प्रदर्शन का उन्होंने सारा दिन मैच की तरह प्रसारित किया।  पुलिस के साथ भीड़ के झगड़े का प्रसारण इस तरह हो रहा था जैसे कि कोई हॉकी या फुटबॉल मैच हो रहा हो।  यकीनन देश के अनेक बौद्धिक चिंत्तक इस पर चिंतित हो रहे होंगे।  भीड़ का प्रदर्शन मैच की तरह प्रसारित कर टीवी समाचार चैनल अपने किस व्यवसायिक सिद्धांत का पालन कर रहे थे, यह समझना कठिन है

       इधर इस खबर का जोर कम हुआ तो पाकिस्तान की टीम आ गयी।  अब उसके साथ होने वाले बीस ओवरीय मुकाबले पर समाचार चैनल पिल पड़ हैं। महामुकाबला, सुपर मुकाबला तथा जोरदार मुकाबला आदि जैसे नारे लग रहे हैं। पांच साल बाद पाकिस्तान टीम भारत आ रही है इससे बड़ा झूठ क्या हो सकता है? पिछली बार पाकिस्तान की टीम विश्व क्रिकेट कप का सेमीफायनल मैच खेलने भारत आयी थी।  चलिये मान लिया। मगर उसका स्वागत इस तरह हो रहा है जैसे कि कोई नोबल पुरस्कार जीतकर आ रहा हो।  तय बात है कि यह स्वागत केवल दिखावा है और इस पर हो रही बहसों में विज्ञापन का समय पास हो रहा है।  बहरहाल छोटे और बड़े पर्दे का प्रभाव लोगों पर पड़ता ही है।  न भी पड़े तो विज्ञापनदाताओं को तो यह लगता ही है कि उनके उत्पाद का सही समय पर प्रचार हो रहा है।

 पहले हम जब फिल्म देखते थे तब यह अंदाज नहीं था कि उनका प्रभाव कितना हमारे मन पर पड़ता है।  पता तब चला जब फिल्मों से अलग हो गये।  वह भी तब छोटे पर्दे पर समाचारों में ऐसे दृश्य सामने आये जहां कहीं किसी आदमी को अनेक आदमी मिलकर मार रहे  है और भीड़ खड़ी देख रही है। हमने एक फिल्म देखी थी जिसमें एक अपराधी समूह से जूझले वाली  महिला को अनेक गुंडे सरेआम उसके घर के बाहर निर्वस्त्र किया  पड़ौसी अपने घरों दुबक कर  यह सब देख रहे थे।  उस फिल्म की कहानी मुंबई की पृष्ठभूमि पर थी।  हमें लगा कि अगर यह सब हमारे शहर में कहीं होता तो एक दो भला आदमी बीच में आ ही गया होता। अब नहीं लगता कि कोई भला आदमी सड़क पर देश के किसी भी हिस्से में किसी नारी की इज्जत बचाने आयेगा।  समाचारों में अनेक जगह महिलाओं पर सरेआम अत्याचार देखकर लगता है कि अब तो पूरा देश ही उस समय की मुंबई जैसा हो गया है जब हमने फिल्म देखी थी।  दूसरों की क्या कहें अपने पर भी संदेह है कि हम अकेले कहीं किसी अनाचार पर बोल पायेंगे कि नहीं।  सच कहें तो बड़े पर्दे की फिल्मों ने कहीं न कहीं कायरपन का बोध भर ही दिया है।

         हमारा स्पष्ट आरोप है कि मुंबईया फिल्मों में जानबूझकर ऐसे दृश्य डाले गये जिससे लोग किसी अपराधी गिरोह के विरुद्ध विद्रोह न करें या कहीं एक होकर अपराधियों पर सार्वजनिक रूप से प्रहार करें।  केवल नायक के अवतरण की प्रतीक्षा करते हुए सब देखते रहें। लगता है कि  इन फिल्मों में धन देने वाले लोग  ऐसे काले धंधों वाले रहे होंगे जो भीड़ से अपने गुर्गों को बचाना चाहते होंगे।  उनकी वजह से ही ऐसी नायक प्रधान कहानियां लिखी गयी जिससे समाज में कायरता या निर्लिप्तता का भाव आ जाये।  अब छोटे पर्दे पर भी यही दिखाई दिया।  जब यह सब देखते रहे तो चिंत्तन भी चलता रहा। अब लगता है कि बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों का एक समूह है जो अपने समय और हित के अनुसार समाज का पथप्रदर्शन इस तरह करता है कि उसका नेतृत्व धन लेकर उनके हितों का ध्यान रखते  हुए  अपनी भूमिका तय करता रहे।  कब देश में देशभक्ति का भाव जगाना है और कब लोगों  प्रेम और उदारता का नारा दिखाकर विदेश के प्रति आकर्षित करना है, यह सब अपने हिसाब से बाज़ार तथा प्रचार प्रबंधक तय करते हैं।  देखा जाये तो वह हर हाल में सफल हैं।  नफरत से सनसनी और प्रेम में मनोरंजन बेचने की जो कला बाज़ार और प्रचार प्रबंधकों ने सीखी है वह आश्चर्यजनक है।

          सच बात तो यह है कि समाज छोटे और बड़े पर्दे से प्रभावित हो रहा है।  हमें इस पर आपत्ति नहीं होती पर चिंता इस बात की है कि लोगों ने स्वचिंतन की शक्ति को खो दिया है। यह देश के लिये खतरनाक संकेत है।

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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एक कहानी-हिंदी कविता


एक कहानी बनी

पढ़ी लोगों ने

कई कहानियां बन गयी।

कहीं पात्रों के नाम बदले

तो कहीं हालात

लगती है हर कहानी नयी।

कहें दीपक बापू

इंसानों को मजा आता है

एक दूसरे की तकलीफ देखने में

सभी को नहीं मालुम

अंदर खुशी ढूंढने का तरीका

दूसरे के मुसीबत

सभी के दर्द की दवा यूं ही बन गयी।

लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

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सामान महंगा, आदमी सस्ता-हिंदी हास्य कविता


चेले ने कहा उस्ताद से

‘‘महाराज,

केवल झाड़ फूंकने से अब काम नहीं चलने वाला,

कुछ नया करो वरना लग जायेगा आपकी दरबार में ताला,

आप भी अब फिल्मी हीरो की तरह

माशुका पटाने के नुस्खे बताना शुरु करें,

शायद नये युवा आपके नाम के साथ  शब्द गुरु भरें,

वरना यही सब थम जायेगा,

खालीपन का यहां गम आयेगा,

मेरा भी अब यहां मन नहीं लगता

छोड़ दूंगा आना जब वह उचट जायेगा।सुनकर उस्ताद ने कहा

‘‘जाना है तो चला जा,

तू ही इश्क गुरु बन कर आ,

हमसे यह बेईमानी नहीं हो पायेगी,

इश्क तो मिल जाये पैसे के धोखे मे,

अपनी तबाही पर रोते  लोग

जब जिंदगी की सच्चाई दिखती अभाव के खोके में,

महंगाई का हाल यह है कि

सामान हो गये महंगे

आदमी सस्ता हो गया है,

आशिकी हो सकती है थोड़ी देर

जिंदगी का हाल खस्ता हो गया है,

जब तक किसी ने इश्क करने के तरीके पूछे

तभी तक ठीक है

हम फिल्म के हीरो नहीं

जिंदगी के फलासफे के उस्ताद है

किसी ने पूछा अगर गृहस्थी चलाने का तरीका

तब हमारे पास जवाब मुश्किल होगा,

कमबख्त,

जिस रास्ते से भाग कर

सर्वशक्तिमान का यह डेरा जमाया है

कुछ नहीं केवल उस्ताद का खिताब कमाया है

हम जानते हैं जो इश्क में हमने भोगा,

तू भी कर बंद आना कल से

वरना हमारे अंदर मरे आशिक का

भूत जाकर तेरी पीछे लग जायेगा।

—————–

 

 

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

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इन्सान और वफ़ा का रिश्ता-हिंदी कविता


हमने बरसों तक उन पर रखा यकीन

मौका आया तो

पल भर में उन्होंने तोड़ दिया,

हर कदम पर हमसफर रहे

पल भर लड़खड़ायी हमारी किस्मत

उन्होंने हमें अकेला छोड़ दिया।

कहें दीपक बापू

किसके मिलने पर खुश हों

किसके बिछड़ने पर रोयें

धरती पर सांस ले रहे पशु और पक्षी भी

भरोसे के दिखते हैं

इंसानों ने रिश्ते निभाने में

जोड़ दी अपनी अपनी शर्तें

जहां दिखी अपने लिये उम्मीद

वहीं वफा का नाता जोड़ दिया।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

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कौटिल्य का अर्थशास्त्र-राजा ही युग बनाता और बिगाड़ता है


                      हमारे देश में समाज, परिवार और राज्य व्यवस्था से निराश लोग आमतौर से यह सोचकर तसल्ली करते हैं कि यह कलियुग चल रहा है और कभी सतयुग आयेगा तो सभी ठीक हो जायेगा।  इतना ही नहीं  सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग को लेकर हमारे अनेक कथित महान संत देश के धर्मभीरु लोगों को  आज की वर्तमान सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षणिक तथा पारिवारिक स्थितियों से उपजी निराशा को कलियुग होने के कारण सहने का संदेश देते हैं।  यह विश्वास दिलाते हैं कि सतयुग आने वाला है। इतना ही नहीं सतयुग में भगवान विष्णु, त्रेतायुग में भगवान श्रीराम तथा द्वापर में  श्रीकृष्ण के अवतार को लेकर कलियुग में भी कल्कि अवतार होने का दावा प्रस्तुत किया जाता है।  हमारे देश में अनेक धार्मिक पेशेवर लोग श्रीराधा, श्रीकृष्ण और भगवान शिव के अवतार होने का दावा भी इस तरह प्रस्तुत करते हैं जैसे कि वह सभी का कल्याण कर देंगे।
            इस तरह युगों के नाम पर यह पाखंड वास्तव में तब मजाक लगता है जब हमें पता लगता है कि दरअसल यह सब राज्य और प्रजा की स्थिति पर निर्भर करता है।  पहले राजतंत्र था अब तो हमारे यहां पाश्चात्य पद्धति के आधार पर लोकतांत्रिक व्यवस्था है।  यहां कथित रूप से प्रजा से चुने लोग राज्य कर्म  के लिये उच्च पदों पर बैठते हैं।  ऐसी स्थिति में जब हम कहते हैं कि ‘घोर कलियुग आ गया है’ तब न केवल राज्यकर्म में लिप्त लोग के आचरण पर दृष्टिपात किया जाये  बल्कि प्रजा के लिये भी यह आत्ममंथन का विषय होता है। अगर हम धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करें तो वास्तव में राज्य व्यवस्था सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर तथा कलियुग का निर्माण करती है। इसके लिये राज्य प्रमुख की चेष्टायें ही आधार होती हैं
              कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में कहा है कि————————

कृतं त्रेतायुगं चैप द्वापरं कलिरेव च।

राज्ञोवृत्तानि सर्वाणि राजा के हि युगमुच्यते।


हिन्दी में भावार्थ-
किसी राज्य में राजा जिस तरह प्रजा के लिये व्यवस्था तथा चेष्टा करता है वही युग कहलाती है।  एक तरह से राजा का राज्यकाल ही सत्युग, त्रेता, द्वापर और कलियुग होती है। एक तरह से राजा का कार्यकाल ही युग होता है।

               कलिः प्रसुप्तो भवति सः जाग्रद्द्वापरं युगम।

कर्मस्यभ्युद्यतस्वेत्ता विचरेस्तु कृतं युगम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
राजा के निरुद्यम होने पर कलियुग, जाग्रत रहने पर द्वापर, कर्म में तत्पर रहने पर त्रेता तथा यज्ञानुष्ठान में रत होने पर सतयुग की अनुभूति होती है।

               आधुनिक लोकतंत्र में पूरे विश्व के देशों में राज्य की व्यवस्था में लगे लोग तथा प्रमुख के बीच अनेक प्रकार के पद होते हैं।  इस व्यवस्था में राज्य का आधार किसी राजा की बजाय  संविधान होता है जिसका संरक्षक राज्य प्रमुख प्रजा से चुना जाता है। इस तरह के संविधानों में राज्य प्रमुख की स्थिति निरुद्यम हो जाती है।  वह देख सकता है, बोल सकता है और सुन भी सकता है पर कर कुछ नहीं सकता।  उसे भी संविधान की तरफ देखना होता है।  फिर उस  पद पर उसके बने रहने की  भी निश्चित अवधि होने से  यह भय उसमें होना स्वाभाविक है कि वहां से हटने के बाद कुछ ऊंच नीच होने पर उसे परेशानी होगी। इतना ही एक बार पद से हटे तो सुविधायें, सम्मान और साथी कम हो जायेंगें। यही कारण है कि वह पद पर आने के बाद प्रजाहित की बजाय अपने वैभव को स्थाई बनाये रखने के लिये संचय के मार्ग की ओर प्रवृत्त होता है। यही प्रवृत्ति उसे भ्रष्टाचार की तरफ ले जाती हैं  पूरे विश्व में इस समय भ्रष्टाचार को लेकर अनेक आंदोलन चल रहे हैं यह उसका प्रमाण है।

आमतौर से लोग राज्यतंत्र को आधुनिक समय में एक असभ्य व्यवस्था बताते हैं पर आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में राज्य प्रमुख अपनी धवल छवि बनाये रखने के लिये दंड, अपराध की जांच और उद्दंड व्यक्तियों के विरुद्ध कोई भी प्रत्यक्ष कार्यवाही करने से अपने हाथ दूर रखते हैं।  उनके अंतर्गत आने वाली संस्थाओं पर यह जिम्मा रहता है और उनमें कार्यरत लोगों की कार्यप्रणाली में उस मानसिक दृढ़ता का अभाव दिखता है जो  कि प्रत्यक्ष रूप से कार्य करने वाले राज्य प्रमुख में होता है।  इतना ही नहीं आधुनिक लोकतंत्र व्यवथा में सभी पदों पर नियुक्त लोगों की राज्य प्रमुख स्वयं प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय नहीं रहता।  एकदम निचले पद पर काम करने वाले व्यक्ति के लिये राज्य प्रमुख दूर का विषय होता है जबकि कानून, नीतियां, कार्यक्रम तथा प्रजा से प्रत्यक्ष संपर्क करने वाले यही निम्न पदों पर कार्यरत लोग ही होते हैं।  इस तरह राज्य प्रमुख और प्रजा की बहुत दूरी होती है जिसका लाभ भ्रष्टाचार करने वाले खूब उठाते हैं।  प्रजा के सामने राज्य प्रमुख की छवि एक निष्क्रिय पदाधिकारी की होती है जो कलियुग का प्रमाण है।

इस आधुनिक व्यवस्था में सतयुग और त्रेतायुग के दर्शन तो हो नहीं सकते क्योंकि इसके लिये राज्य प्रमुख का स्वयं ही युद्धवीर होना आवश्यक है  अलबत्ता प्रचलित  लोकतंत्र व्यवथा में राज्य प्रमुख के निरंतर जाग्रत होकर प्रजा हित के लिये तत्पर रहने  पर द्वापर का दर्शन हो सकता है क्यों  उसमें  राज्य प्रमुख को अपनी ही व्यवस्था में लोगों से महाभारत करते रहना होगा।  एक बात तय रही कि हमें इन युगों को प्राकृतिक रूप से परिवर्तन होने वाली स्थिति नहीं माना जा सकता।  अगर ऐसा न होता तो हर युग में भ्रष्टाचारी और अपराधी नहीं होते जिनका संहार करने के लिये भगवान के अवतार होते रहे हैं।

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,ग्वालियर मध्यप्रदेश

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हल के लिये सजती हैं महफिलें

बहसों में रोज वही चेहरे

नये अल्फाजों के साथ आते हैं,

नतीजा सिफर है

कहने वालों को मालुम नहीं क्या कहा

सुनने वाले भी भूल जाते हैं।

कहें दीपक बापू

हम तो चले भगवान भरोसे हमेशा

कभी खुश हुए कभी गमगीन,

पर्दे पर आते चेहरे देखे

कोई मीठे कोई नमकीन,

सभी बो रहे जमाने के लिये कांटे

अपने लिये उधार मे फूल लाते हैं।

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लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”
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विदुर नीति-आत्मप्रवंचना से दूर रहने वाला ही लोकप्रिय होता है


      मनुष्य में पूज्यता का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है।  दूसरे लोग उसे देखें और सराहें यह मोह विरले ही छोड़ पाते हैं।  हमारे देश में जैसे जैसे  समाज अध्यात्मिक ज्ञान से परे होता गया है वैसे वैसे ही हल्के विषयों ने अपना प्रभाव लोगों पर जमा लिया है।  फिल्म और टीवी के माध्यम से लोगों की बुद्धि हर ली गयी है।  स्थिति यह है कि अब तो छोटे छोटे बच्चे भी क्रिकेट खिलाड़ी, फिल्म या टीवी अभिनेता अभिनेत्री और गायक कलाकर बनने के लिये जूझ रहे हैं।  आचरण, विचार और व्यवहार में उच्च आदर्श कायम करने की बजाय बाह्य प्रदर्शन से समाज में प्रतिष्ठा पाने के साथ ही धन कमाने का स्वप्न लियेे अनेक लोग विचित्र विचित्र पोशाकें पहनते हैं जिनको देखकर हंसी आती है।  ऐसे लोग  अन्मयस्क व्यवहार करने के इतने आदी हो गये हैं कि देश अब सभ्रांत और रूढ़िवादी दो भागों के बंटा दिखता है।  जो सामान्य जीवन जीना चाहते हैं उनको रूढ़िवादी और जो असामान्य दिखने के लिये व्यर्थ प्रयास कर रहे हैें उनको सभ्रांत और उद्यमी कहा जाने लगा है।  यह समझने का कोई प्रयास कोई नहीं करता कि बाह्य प्रदर्शन से कुछ देर के लिये वाह वाही जरूर मिल जाये पर समाज में कोई स्थाई छवि नहीं बन पाती।
   विदुर नीति में कहा गया है कि


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यो नोद्भुत कुरुते जातु वेषं न पौकषेणापि विकत्वत्तेऽयान्।


न मूचर््िछत्रः कटुकान्याह किंचित् प्रियं सदा तं कुरुते जनेहि।।

 


हिन्दी में भावार्थ-सभी लोग उस मनुष्य की प्रशंसा करते हैं जो कभी अद्भुत वेश धारण करने से परे रहने के साथ कभी  आत्मप्रवंचना नहीं  करता और क्रोध में आने पर भी कटु वाणी के उपयोग बचते हैं।



न वैरमुद्दीययाति प्रशांतं न दर्पभाराहृति नास्तमेसि।


न दुर्गतोऽस्पीति करोत्यकार्य समार्यशीलं परमाहुरायांः।।

 


हिन्दी में भावार्थ- सभी लोग उत्तम आचरण वाले उस पुरुष को सर्वश्रेष्ठ कहते हैं जो कभी एक बार बैर शांत होने पर फिर उसे याद नहीं करता, कभी अहंकार में आकर किसी को त्रास नहीं देता और न ही कभी अपनी हीनता का प्रदर्शन सार्वजनिक रूप  करता है।
     इस विश्व में बाज़ार के धनपति स्वामियों और प्रचार प्रबंधकों ने सभी क्षेत्रों में अपने बुत इस तरह स्थापित कर दिये हैं कि उनके बिना कहीं एक पत्ता भी नहीं हिल सकता।  इनकी चाटुकारिता के बिना खेल, फिल्म या कला के क्षेत्र कहीं भी श्रेष्ठ पद प्राप्त नहीं हो सकता।   क्रिकेट, फिल्म और कला के शिखरों पर सभी नहीं पहुंच सकते पर जो पहुंच जाते हैं-यह भी कह सकते हैं कि बाज़ार और प्रचार समूह अपने स्वार्थों के लिये कुछ ऐसे लोगों को अपना लेते हैं जो पुराने बुतों के घर में ही उगे हों और मगर भीड़ को नये चेहरे लगें-मगर सभी को ऐसा सौभाग्य नहीं मिलता।  ऐसे में अनेक आम लोग निराश हो जाते हैं।  अलबत्ता अपने प्रयासों की नाकामी उन्हे समाज में बदनामी अलग दिलाती है।  ऐसे में अनेक लोग हीन भावना से ग्रसित रहते हैं।  पहले अहंकार फिर हीनता का प्रदर्शन आदमी की अज्ञानता का प्रमाण है।  इससे बचना चाहिए।
  हमें यह बात समझना चाहिए कि व्यक्तिगत व्यवहार और छवि समाज में लंबे समय तक प्रतिष्ठा दिलाती है। यह स्थिति गाना गाकर या नाचकर बाह्य प्रदर्शन की बजाय आंतरिक शुद्धता से व्यवहार करने पर मिलती है। खिलाड़ी या अभिनेता होने से समाज का मनोरंजन तो किया जा सकता है।  बाज़ार और प्रचार समूह भले ही वैभव के आधार पर समाज के मार्गदर्शके रूप में चाहे कितने भी नायक नायिकायें प्रस्तुत करें पर कालांतर में उनकी छवि मंद होही जाती है।
लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”
ग्वालियर, मध्यप्रदेश 

Writer and poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”

Gwalior, Madhya pradesh

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर

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दिल की एक कविता


भीड़ में जाकर
अपना दर्द कहना
अब  हमें नहीं सुहाता है,
अपने गमों से हारे
चीखते चिल्लाते लोग
कानों से सुनते नहीं
अपनी जुबां से
उनको अपना हाल  बयान करना ही  आता है।
कहें दीपक बापू
सर्वशक्तिमान का शुक्रिया
अपने दर्द और खुशी पर
कविता या गीत लिखने की
कला दी है
दिल हर नजारे पर
यूं ही कुछ लफ्ज गुनागुनाता है।
लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
witer ane poet-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior, madhya pradesh
कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर

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आंसुओं के सौदागर-हिंदी व्यंग्य कविता


हादसों पर रोते लोगों के आंसु

पौंछने का जिम्मा जिन लोगों ने लिया

वह हमदर्दी का सौदा करने लगे हैं,

दवा लाने के लिये घायलों से लेकर पैसा

अपनी जेब भर लगे हैं।

कहें दीपक बापू

चौराहे पर रोने का कोई फायदा नहीं

कदम कदम पर कराहते लोग

क्या दर्द बांटेंगे,

कुछ पेशेवर दरियादिल भी हैं

जो जख्म की जात छांटेंगे,

फिर भी उम्मीद नहीं

दरबारों से नहीं आती मदद,

दोस्त दुश्मन बांट लेते रसद,

सिंहासनों पर बैठे लोग केवल मतलब के सगे हैं।

_________________________________

लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
poet and writer-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”
Gwalior Madhyapradesh
लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”

ग्वालियर, मध्यप्रदेश

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मतलब के सगे-हिंदी व्यंग्य कविता


हादसों पर रोते लोगों के आंसुपौंछने का जिम्मा जिन लोगों ने लिया

वह हमदर्दी का सौदा करने लगे हैं,

दवा लाने के लिये घायलों से लेकर पैसा

अपनी जेब भर लगे हैं।

कहें दीपक बापू

चौराहे पर रोने का कोई फायदा नहीं

कदम कदम पर कराहते लोग

क्या दर्द बांटेंगे,

कुछ पेशेवर दरियादिल भी हैं

जो जख्म की जात छांटेंगे,

फिर भी उम्मीद नहीं

दरबारों से नहीं आती मदद,

दोस्त दुश्मन बांट लेते रसद,

सिंहासनों पर बैठे लोग केवल मतलब के सगे हैं।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश 
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Gwalior Madhyapradesh
लेखक और कवि-दीपक राज कुकरेजा “भारतदीप”ग्वालियर, मध्यप्रदेश

 

 

कवि, लेखक और संपादक-दीपक “भारतदीप”,ग्वालियर 
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चौराहे पर चाहे जितनी बहस कर लो-हिंदी व्यंग्य कविता




महलों में रहने,

हवाई जहाज पर सवारी

और अपनी जिंदगी का बोझ

गुलामों के कंधों पर रखने वालों से

हमदर्दी की आशा करना है बेकार,

जिन्होंने दर्द नहीं झेला

कभी अपने हाथ काम करते हुए

ओ मेहनतकश,

 उनसे दाद पाने को न होना बेकरार।

कहें दीपक बापू

चौराहों पर चाहे जितनी बहस कर लो,

अपना दर्द बाजार में बेचने के लिये भर लो,

मगर भले के सौदागरों से न करना कभी

इलाज के बदले दिल देने का करार।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’’,

ग्वालियर, मध्यप्रदेश

रोगियों की समाज सेवा-हिंदी व्यंग्य कविता


 समाज की हर बीमारी के इलाज का

दावा करते हैं वह लोग,

अस्पतालों के पीछे जाकर

छिपाते हैं जो अपने रोग।

कहें दीपक जिनकी देह

अपनी शक्ति से संभाली नहीं जाती

ज़माने भर की समस्याओं पर

उनकी ज्यादा ही नज़र जाती,

कोई चंदा कोई दान जुटा रहा,

 उनके इलाज का बोझ भी समाज ने सहा,

लाचार इंसानों के जज़्बातों से

खेलना कितना आसान हो गया है

उसमें उम्मीदों का झूठा जोश जगा रहे

फरिश्ता बने कुछ लोग,

जिनके तन और मन

बेबस हो गये हैं करते हुए भोग।

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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,

ग्वालियर मध्यप्रदेश

कवि, लेखक एवं संपादक-दीपक ‘भारतदीप’ग्वालियर

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