इस तरह लगने लगा वहां भी मेला-हास्य कविता

उदास बैठा था चेला
तो गुरू ने उसका कारण पूछा
तो वह बोला
‘गुरूजी सभी आश्रम
पर भक्तों का लगता है मेला
खूब चढ़ावा उनके
गुरुओं के पास आ रहा है
अपने यहां नहीं आ रहा धेला
आखिर कब तक हम फ्लाप आश्रम चलायेंगे
कब भक्तों में हिट हो पायेंगे
कोई ऐसा उपाय बताईये
आप गुरु के रूप में मशहूर हो जायें
तो मैं प्रसाद पाकर हो जाऊं खास चेला’

गुरू ने अपना सिर खुजाया और कहा
‘सारे जतन कर देख लिये
हर विषय पर प्रवचन दिये
कोई भी उपाय काम नहीं आया
इससे तो अपनी चाय की दुकान पर
ही ठीक था
दोस्त ने ही मुझे बाबा बनने का
रास्ता बताया
मैं भी इस आश्रम के धंधे में आया
यहां आकर भी नहीं हाथ आयी माया
इससे तो अच्छा था चाय का ठेला’

सुनकर चेले ने अपना सिर खुजाया
और बोला
‘आपकी बात पर यह विचार मेरे मन में आया
आप अपना नाम रख लो
‘चाय वाले बाबा’
नाम में कुछ स्वाद होना जरूरी है
इस पर भी लोग आते हैं
कौन देखता है गुण-अवगुण एक दिन में
अपनी जिंदगी में लोग किसी को
नहीं समझ पाते हैं
हो सकता है इस नाम का कुछ असर हो
लग जाये अपने यहां मेला’

गुरु ने बात मान ली
बन गये वह चाय वाले बाबा
सलाहकार बन गया चेला
पहले तो लोग चाय पीने के भ्रम में
आश्रम में चले आते
फिर चेले बन जाते
इस तरह लगने लगा वहां भी मेला
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3 Comments

  1. Posted जुलाई 19, 2008 at 06:05 | Permalink

    बहुत बढिया चोट मारी है हास्यव्यंग्य द्वारा।

  2. Posted जुलाई 19, 2008 at 06:35 | Permalink

    चलिये, जैसे भी हो, मेला तो लगने लगा. बधाई.

  3. Posted जुलाई 19, 2008 at 21:26 | Permalink

    अच्छे लगे आश्रम वाले बाबा


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